थोड़ा वक्त लगता है

थोड़ा वक्त लगता है पानी को बर्फ में बदलने में वक्त लगता है …. ढले हुए सूरज को निकलने में वक्त लगता है …. थोड़ा धीरज रख, थोड़ा और जोर लगाता रह …. किस्मत के जंग लगे दरवाजे को खुलने में वक्त लगता है …. कुछ देर रुकने के बाद फिर से चल पड़ना दोस्त …. हर ठोकर के बाद संभलने में वक्त लगता है …. बिखरेगी फिर वही चमक तेरे वजूद से तू महसूस करना …. टूटे हुए मन को संवरने में थोड़ा वक्त लगता है …. जो तूने कहा कर दिखायेगा रख यकीन …. गरजे जब बादल तो Continue reading थोड़ा वक्त लगता है

‘ याद ‘

वो पल थे बड़े मधुर , जा खड़ा हो तुमसे दूर , मै तुमको ही ; देखा करता था.. समेट लिये होते कुछ पल , जो लगता जैसे हो अपना कल .. मखमल सी चेहरे की छवि .. जो अब भी नही होती ओझल. मेरे साथ ही होते वो हर पल. और नींद ना होती जब रातों मे , बँद आँख से देखा करता था .. बस याद तुम्हे मै करता  था.. “बस याद “.. ना सुनी कभी आवाज़ तेरी .. पर बात मै, तुमसे  करता  था . एक आश उठी,उठ जीने की  .. जो तन्हा दुनिया मे मरता था Continue reading ‘ याद ‘

“तड़प”

बड़ी अजब सी वो “तड़प” थी, लगता है जैसे खुद की, खुद से ही “झड़प” थी जब खड़ा दूर होकर मै, “रोता” तुम्हे देखता था.. मै “जलता”; तुम्हे देखता था, “तड़पती” थी तुम और मै; “तड़पता” तुम्हे देखता था….

“नारी हूं मै “

जो ममता देती सबको,वो खुद मां के प्यार को तरसी सी, कभी जन्मी, कभी अजन्मी सी, कही बोझ तो कही प्यारी हूं ‘मै’ हां “नारी हूं मै “… कही फूल चढ़े है मंदिर मे, कही बिकती, फूल बनी गलियों मे.. जालिम सा संसार है देखो, ज़हर छिड़कती कलियों मे.. बेची है सम्मान कही पर, लोगो की रंगरलियों मे, रोती,लाचार बेचारी हूं मै, हां “नारी हूं मै ” बाहर नज़रों से बचाकर, घर मे पांव तले रखते हैं.. ना समझ सके, क्या चीज़ हैं हम ? बस चीज़ बनाकर रखते हैं.. कुछ के लक्ष्मी मोह के कारण, खुद को आग लगाती Continue reading “नारी हूं मै “

‘मै अपना कल बुनना चाहता हूं..’

बुनियाद जीवन की, अतीत ही  होती है, अनुभव सुख-दुख, आशा-निराशा से, परिपूर्ण होती है..   जिसे मानकर मै नींव आने वाला कल बनाना चाहता हूं. एक दृढ़ मनोबल, एक चाह, एक उम्मीद लिए, मै जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहता हूं, हां!मै अपना कल बुनना चाहता हूं..’   कल जो की आने वाला है, उसकी सुखद कल्पना, सपने पूरी होने का  दौर, किसे अछा नही लगता होगा ? इसलिये आने वाले  कल के लिये, मै आज से सोचना चाहता हूं, अरे! हां, मै अपना कल बुनना चाहता हूं..   जीवन के पहलूओं  को, जो पहेलियों की तरह है, उलझते हुए Continue reading ‘मै अपना कल बुनना चाहता हूं..’

” वो गली “

उस गली का  वह पुराना घर, जहां बचपन बीती, जहां ना कोइ रिवाज़ थी, ना कोई रीति, और जहां चलती थी केवल, अपनी ही नीति..   वह गली छोड़ अब मै, मुहल्ले पर खड़ा हूं, अपनी ही बातों  को लेकर, कितनों से लड़ा हू…   कहते हैं आगे फ़िर, कोई बड़ा  शहर आयेगा, और अपने साथ ढेरों, चुनौतियां लायेगा..   पर भरोसा है मुझे खुद पर, मै अपनी बात कहूंगा, अब तक लड़ता आया हूं, लड़ता रहूंगा, लड़ता रहूंगा…

“काश इस मोहब्बत से अंजान होते”

काश हम इस मोहब्बत से अंजान होते, ना बिछड़ने का ग़म होता, ना मिलने के अरमान होते..   दूर होने के ख़याल से ही, आँखे नम  सी हो जाती है, जिंदगी जिस पर अभिमान है, उसे जीने की अभिलाषा, कम सी हो जाती है..   मेरे आँखो को चूमकर, कहते हो “रख लो सम्हालकर” ये प्यार है मेरा, न ये आंसू बने, ना बहे  यह  कभी, क्या करू मै सिवा बैठ रोने के अब, आँख भी साथ मेरी नही देती अब..   जलाओगे  जब तुम खतों को मेरे, देखना लफ्ज कितने बिखरके मेरे तेरे  पैरो से आकर लिपट जायेंगी.. फूल Continue reading “काश इस मोहब्बत से अंजान होते”