About Satyendra Govind

I always try to write the voice of my heart.

यूपी दुर्घटना विशेष

यूपी दुर्घटना विशेष यूपी दुर्घटना पर (जहाँ 30 मासूम बच्चों ने आक्सीजन के अभाव में दम तोड़ दिया).. . बच्चों के जीवन मृत्यु पर थोड़ा-सा तो गौर करते पैसे ही लेने थे जब तो काम कोई तुम और करते . ये मत सोंचो तुमने केवल आक्सीजन ही बंद किया बल्कि तुमने 30 मासूम धड़कनों को बंद किया . आक्सीजन तो तुम्हारी थी,रक्खो तुम ही पीयो तुम मरने वाले कौन सगे थे? खूब मस्ती में जीयो तुम . माना कि घटनास्थल पर फूटा बम नही है लेकिन किसी आतंकी हमला से यह कम नही है . तुमने मानवता को बिलकुल शर्मसार Continue reading यूपी दुर्घटना विशेष

किसी को चाहता तो हूँ

किसी को चाहता तो हूँ किसी को चाहता तो हूँ मगर बतला नही सकता, कोई किमत्त अदा कर दूँ उसे मै पा नही सकता। कि तुमने ही तो पैदा की है ये मजबूरियाँ मौला, वो पास आ नही सकती मै दूर जा नही सकता।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज, पश्चिमी चम्पारण,बिहार :-8051804177

पारो जैसी लगती हो

पारो जैसी लगती हो तुम तो पतझड़ मे भी बहारों जैसी लगती हो, किसी झरने की मीठी धारों जैसी लगती हो। मै तड़पता हुआ देवदास बन गया देखो, तुम मुझे बिछड़ी हुई पारो जैसी लगती हो।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज पश्चिमी चम्पारण :-8051804177

वक्त हीं कितना लगता है

वक्त हीं कितना लगता है ख़ुद ही जलकर नूर होने में सबके बीच मशहूर होने में . वक्त ही कितना लगता है सपने चकनाचूर होने में . शब्दभर का फासला है मिल जाने व दूर होने में . पहलू में खतरा ही खतरा एक बहादुर शूर होने में . दुनिया अब दुनिया लगती है तेरा एक सुरूर होने में . ©सत्येन्द्र गोविन्द 8051804177

गुरु क्या है

गुरु क्या है नीड़ में क्रीड़ा करती चिड़ियों की चहचहाहट है अँधेरे में आती हुई रौशनी की आहट है गुरु अलसाई आँखों की चमक है गूँधे हुये आटे में नमक है पूजा है आस्था है विश्वास है सूरभि है मन का मधुमास है गुरु वाणी है भँवरों की गुंजन है नीलम है आँखों का अंजन है रश्मि है माथे का टीका है सभ्यता है आचरण है सलीका है क्षमा है दया है पिता है कुरान है बाइबिल है गीता है गुरु एकता है प्रण है संबद्धता है दर्पण है आत्मा की शुद्धता है गुरु सुबह की गुनगुनी धूप है ब्रह्मा Continue reading गुरु क्या है

कौमी झड़प कैसी

कौमी झड़प कैसी अनेकताओं में एकता की संचित अद्भुत निधि है भारत ऐसा वृत्त है मानो जिसकी नही परिधि है भौरों की सोहबत में कोई खिलती हुई करह हो जैसे हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई दोनों दूध की तरह हो जैसे दोनों उत्तम,दोनों उम्दा दोनों सज्जन,दोनों नेक हुनरमंदी, कुशलता में दोनों एक से बढ़कर एक मानवता बाँधी है सबको चाहत की पट्टी बनकर उलझी गुत्थी सुलझती है रिश्तों की अट्टी बनकर एक चाँद की शीतलता है एक सूरज की लाली है मानवता की जड़ से पनपी मजहब तो बस डाली है कुछ लोग मगर हैं अवसरवादी हाथ-पाँव बस जोड़ते है दूध उबलता देख Continue reading कौमी झड़प कैसी

ओ भगत सिंह

ओ भगत सिंह ओ भगत सिंह,ओ भागत सिंह आप कहाँ बैठे हैं जाकर एक नई तूफ़ान उठी है यमुना के मँझधार में आकर . न तो आप न आपके साथी नज़र आते हैं कइयों मील तक मुल्क की कश्ती सुरक्षित कौन ले जाये साहिल तक . हम लगे हुए हैं जाने किस उधेड़बुन में और इधर तूफ़ां मग्न है अपनी धुन में अरबों लोग कोलाहल कर रहे हैं प्राणों की चिंता में लेकिन आपका एक शब्द भी गूँज नही रहा है उन में . ओ भगत सिंह,ओ भगत सिंह आइये फिर एक बार डूबती कश्ती बँचाने पोंछने ये अश्रुधार . Continue reading ओ भगत सिंह

कलम हूँ मै

कलम हूँ मै मासूम बच्चों की उँगलियां अलाव में देखकर माँ तुझे इस तरह तनाव में देखकर . दिल करता है जोर-जोर से चीखूं और चिल्लाऊं सन सैंतालिस के पहले के बेटों को बुलाऊं . बुलाऊं मै भगत सिंह को, बटुकेश्वर दत्त को और ढहा दूँ ढले-ढलाए अमानवीय छत को . अनायास ही चट्टानों के सीने को मै चीर दूँ ललकारूं फिर पाकिस्तान को आ तुझे कश्मीर दूँ . पर हाय हुकूमत की हाथों में छटपटाती कलम हूँ मै जनता की पीड़ा से पीड़ित चिल्लाती कलम हूँ मै . देशद्रोह के तीर से घायल तड़फड़ाती कलम हूँ मै नौजवानों के Continue reading कलम हूँ मै

थी रात चाँदनी

थी रात चाँदनी जिन्दगी के मेले मे बस जिन्दगी नही मिली दिल जल रहा था मेरा हीं मुझे रौशनी नही मिली . बहारें तो मिली मगर कर दी बहारों ने दगा बदनाम है खिजां जिसे कोई खुशी नही मिली . निकला तो था जमीं पे हीं किसी को ढूँढने देखा तो पाँव के नीचे जमीं नही मिली . दर-बदर, यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ, नही ढूँढा सब कुछ तो मिल गया मगर वहीं नही मिली . थी रात चाँदनी सुना कि मिलती है मन्नतें जब मै गया तो आसमां में चाँदनी नही मिली . एक शख़्स रोता रह गया पर दुनिया वालों को Continue reading थी रात चाँदनी

निश्छल आईना-सा

निश्छल आईना-सा व्यभिचारी,दुराचारी कलुषित,कदाचारी नर हो या फिर नारी उर पे सुसंगति की उबटन जरूरी है निश्छल आईना-सा आचरण जरूरी है . अतिशय,अनुशय निर्मूल,निर्णय करती है संक्षय ऐसे विचार का तो विघटन जरूरी है निश्छल आईना-सा आचरण जरूरी है . शिष्टता,विशिष्टता शालीनता,कुलीनता चित्त की सुदृढ़ता शुद्ध-शुद्ध विचारों का संकलन जरूरी है निश्छल आईना-सा आचरण जरूरी है ©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)

ये जख्म जो ताजे हैं

ये जख्म जो ताजे हैं जो कफ़न बाँधकर निकलते है वो घर नही जाते शुरमा शेरों को देखते ही डर नही जाते . आप कहते हो कि हम बडे जुबां के पक्के है तो कैसे मान लें ? होते तो यूं मुकर नही जाते . ये जख़्म जो ताजे है सब अपनों की निशानी है दुश्मनों ने दिये होते तो भर नही जाते . हम भूखे पेट सो जाते हैं अपने घर दो चार दिन खाली हाथ मगर बहनों के घर नही जाते . जुझने का जज्बा रक्खो अच्छे दिन भी आएंगे वक्त बुरे भी आते हैं तो ठहर नही Continue reading ये जख्म जो ताजे हैं

अब मुझे रुला के दिखा

अब मुझे रुला के दिखा उद्वेलित,क्रियान्वित गर्व से गौरवान्वित प्रमुदित,प्रफुल्लित सीना तू फुला के दिखा अब मुझे रुला के दिखा . अतिक्रमण, उल्लंघन ये हेकड़ी,ये अक्खड़पन विक्षिप्तता है अमूमन अंतरपट धुला के दिखा अब मुझे रुला के दिखा . रुष्ट क्षुब्ध मन ये मेरा ढूँढ़कर लाया सवेरा द्युति दीप्ति का मुंडेरा रजनी तमस भुला के दिखा अब मुझे रुला के दिखा ©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)

उम्र ये थोड़ीसी

उम्र ये थोड़ीसी उत्पाती,उन्मादी अलमस्त,दिलशादी हठधर्मी,हठवादी निर्बाध,निठल्ला,हँसी-ठिठोली हूँ नग हूँ,नगीना हूँ,बचपन की बोली हूँ . ओजस्वी,तेजस्वी प्रगाढ़,मनस्वी विख्यात,यशस्वी माटी का मटका हूँ,नींबू हूँ,पानी हूँ घुँघराले बालों में,उलझी जवानी हूँ . हाय रे निगोड़ी-सी उम्र ये थोड़ी-सी पोखर की कोड़ी-सी हिलती हुई कुत्ते की दुम-सी हो जाती है सरसर में बहती हुई गुम-सी हो जाती है ©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)

दिल

दिल हो दिल किसी गरीब का तो घर ढूँढ़ता है दीवाने का हो दिल तो दिलवर ढूँढ़ता है . अंधे का हो जो दिल तो ऩज़र ढूँढ़ता है पागल का दिल हमेशा सफर ढूँढ़ता है . हो राहगीर का दिल तो डगर ढूँढ़ता है दिल हो सलिल का तो लहर ढूँढ़ता है . किसान का दिल मौसम बेहतर ढूँढ़ता है मरीज दिल दवा का असर ढूँढ़ता है . पर दिल *गोविन्द का तो है बेखबर इन सबसे जो माता के आँचल में ईश्वर ढूँढ़ता है ©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)