मोहब्बत हो गई समझो

मोहब्बत हो गई समझो जो साँसों के बंधे धागे मोहब्बत हो गई समझो। अनजानी राह मन भागे मोहब्बत हो गई समझो। धड़कनों का तो है काम दिल को लोरी सुनाने का इक आहट पे दिल जागे मोहब्बत हो गई समझो। गिरी इक बूँद बादल से विवश होकर हुई है जुदा जमीं की प्यास के आगे मोहब्बत हो गई समझो। अर्पण पुष्प को करते सभी बेजान बुत पर क्यूँ? जो भवँरा रात भर जागे मोहब्बत हो गई समझो। कदमों में झुकाना किसी को क्या ख़ाक चाहत है। जो समर्पण की दुआ मांगे मोहब्बत हो गई समझो। वैभव”विशेष”

बात तो फिर भी होती है

बात तो फिर भी होती है माना की तुम हो दूर बहुत मुलाक़ात तो फिर भी होती है। तन्हा-तन्हा सी रातों में कुछ बात तो फिर भी होती है। चाँद सितारे और गुलशन बस एक शिकायत करते हैं समझा लो मन,अश्कों की बरसात तो फिर भी होती है। चाहत के नुकीले नस्तर से मैंने संगे दिल को तराशा था पत्थर बन कर ही साथ सही वो साथ तो फिर भी होती है। समझा खुद को माहिर मैंने शतरंज बिछा दी चाहत की। मुमकिन नहीं जीतूँ हर बाजी,मात तो फिर भी होती है। मैं नहीं हूँ कोई जादूगर बस इक सच्चा Continue reading बात तो फिर भी होती है

नशा मुक्त हो विश्व

नशा मुक्त हो विश्व बदलता दौर है बदलो मगर इतना न बदलो तुम। शर्म से नज़रें हों बोझिल अभी है वक़्त सम्हलो तुम। शौक में फूंक दी साँसे छल्लों की नुमाइश में। धुएं में कैद है धड़कन,मरे जीने की ख्वाहिश में। ज़िन्दगी में अदाओं के बेहतर और भी सलीके हैं। नशे के बिना भी हैं खुशियाँ फिर क्यूँ गम लो तुम? बदलता दौर है बदलो मगर इतना न बदलो तुम। शर्म से नज़रें हों बोझिल अभी है वक़्त सम्हलो तुम। माँ-बाप को है गुमाँ की बेटा आसमाँ पे जाएगा। सच है,पर जरूरी नहीं की जमीं पे लौट आएगा। नशा लेकर Continue reading नशा मुक्त हो विश्व

जानूँ मैं

जानूँ मैं हृदय छुपी इस प्रेम अग्नि में जलन है कितनी जानूँ मैं। मैं भटक रहा प्यासा इक सावन विरह वेदना जानूँ मैं।   पर्वत,घाटी,अम्बर,नदिया जल सब नाम तुम्हारा लेते हैं। अम्बार लगा है खुशियों का फिर भी अश्रु क्यूँ बहते हैं?   मिथ्या दोषी मुझे कहने से क्या प्रीत मिटेगी बरसों की नयन कह रहे थे जो तुम्हारे वो बात अनकही जानूँ मैं।   कुछ तो विवशता रही तुम्हारी शीष झुका कर दूर गए। इक छोटा सा स्वप्न सजाया तुम कर के चकनाचूर गए।   पुनः मिलन को आओगे तुम विश्वास का दीप जलाया है थमने न दोगे श्वांस Continue reading जानूँ मैं

जबसे तुमसे दूर हुए

जबसे तुमसे दूर हुए हर बात अधूरी लगती है। हँसना भी महफ़िल में एक मजबूरी लगती है।   वैसे तो लोगों के करीब अक्सर ही रहता हूँ मैं। पर सच कहूँ खुद से भी खुद की दूरी लगती है।   बीते लम्हातों में जब ये दिल मेरा खो जाता है। आँखों के गुलशन में तू लता-कस्तूरी लगती है।   वो बातों में हाथों से हाथों को सहलाती तपिश। जुल्फों में छुपे चेहरे पर चाँद सी नूरी लगती है।   कभी रूठते कभी मनाते कभी मासूम शरारत से। होती है सुबह हसीन और शाम सिंदूरी लगती है।   मेरे लहू की Continue reading जबसे तुमसे दूर हुए

योग करे निरोग

योग करे निरोग जब मन हो व्याकुल व्याकुल और तन में लगा हो कोई रोग।   कैसे,कब,क्यूँ की चिंता में डूबे उदर को न भाये कोई भोग।   पद्मासन में बैठ फिर जाओ नेत्र बन्द कर ध्यान लगाओ।   समस्त समस्या का हल होगा रोग मिटेंगे कर लो सब योग।   पाश्चात्य देशों ने भी मान लिया योग का सही अर्थ जान लिया।   कपालभाती,भस्त्रिका प्राणायाम कर प्राप्त करो सुखद संयोग।   वैभव”विशेष”

सब कहते हमें खाली

सब कहते हमें खाली हम जमाना समेटे हैं।   पैमाने क्या बुझाते प्यास हम मयखाना समेटे हैं।   न सूरत देख ठुकराओ दिल में हैं प्यार की लहरें।   समन्दर भी तो है खारा  मगर खजाना समेटे है।   दोषी किस को ठहराऊँ ? सभी यहाँ मासूम चेहरे हैं।   हम तो बस उन निगाहों का निगाहों में शर्माना समेटे हैं।   मुफलिसी में गुजरी शामें दरारें बारिश में डराती थीं।   पुरानी यादें जुड़ी जिनसे उजड़ा आशियाना समेटे हैं।   कदम लड़खड़ाने की सजा खुदा को दे सकेगा कौन?   हम अनजानी एक भूल का आज भी जुर्माना समेटे Continue reading सब कहते हमें खाली

बुजुर्गों की दुआएं बिक गईं

बुजुर्गों की दुआएं बिक गईं जवानी की सत्ता में रिश्तों का बड़ा महंगा किराया हो गया।   बचपन गोद में खेला है जिसके आज वो शख्स पराया हो गया।   संस्कारों की जड़ें भी लोभ ने इस कदर खोखली कर दीं।   कि बुजुर्गों की दुआएं बिक गईं और कर्ज भी बकाया हो गया।   न दे सके महलों की चमक मगर तालीम,तहजीब,तजुर्बा तो दिया।   लेकिन आशीर्वाद का खजाना भी चन्द ख्वाहिशों पे जाया हो गया।   खून खौलता है अपने ही खून पर तन्हा जीने की तमन्ना बढ़ गई।   जर,जोरू,जमीन की जद्दोजहद में शामे-महफ़िल का सफाया हो Continue reading बुजुर्गों की दुआएं बिक गईं

अपना कहाँ आशियाना?

अपना कहाँ आशियाना? जब इंसानो की बस्ती में जा पंहुचा भटका एक परिंदा।   कई चेहरे चिढ़ कर बोल उठे न जाने कहाँ का है बाशिंदा?   भूखा प्यासा व्याकुल वो गिर पड़ा जमीं पर आकुल हो।   कुछ हृदय बोले अतिथि देव है फिर चाहे उसका कोई कुल हो।   एक आह भरी उसने हौले से कर ली अपनी आँखे बन्द।   खो गया अतीत की दुनिया में जब पवन बह रह थी मन्द-मन्द।   यहीं इसी जगह एक वृक्ष पर उसका छोटा सा था आशियाना।   आज वहीं पे अतिथि बनकर लेटा और सांसे भी रह गई हैं Continue reading अपना कहाँ आशियाना?