बजरंगबली

बजरंगबली ये एक सच्चाई है जिसे मैंने कविता का रूप दिया है : आज भी बजरंगबली ,चहुँ ओर विधमान है l श्री राम के दूत है,हम कहते इन्हे हनुमान हैll रूप विशाल है ,सिर पर मुकुट विराजमान है l हाथ में गदा लिए, चमक लाली सामान है ll देते है दर्शन उन्हें, जिनका मन पवित्र है l करते जो निऱ्स्वार्थ सेवा उनके वो मित्र हैll स्वयं को नहीं मानते, ईश्वर का वो रूप l कहते है दूत हूँ उनका नहीं हूँ उनका रूपll मै अपने भक्तों को हर संकट से बचाता हूँ l करता हूँ उनकी रक्षा,रक्षक बन जाता हूँ Continue reading बजरंगबली

मुझ संग अगर तुम गावो तो

मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अकेला मैं गाऊँ तो यह मात्र प्रार्थना कहलावेगा। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। मेरी प्रार्थना तू सुने न सुने यह तेरी इच्छा पर निर्भर है। पर मेरे गीत का अमरत्व तो तेरे स्वर-संगम पर निर्भर है। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। तेरे कारण बादल तब आकर नभ गीतों से गुंजित कर देंगे। रह रहकर बिजली के कंपन से गीतों के स्वर-लय चपल बनेंगे। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। प्रेरित हो जुगनू की चमचम से Continue reading मुझ संग अगर तुम गावो तो

तुम कुछ तो गावो

तुम कुछ तो गावो     वीणा के टूटे तारों पर बंसी के प्यासे अधरों पर जीवनधुन कुछ तो भर जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   अपनी लीला गीत बनाकर संगीत मधु का पान करा कर तुम जीवन तरस मिटा डालो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   घूँघट में जो संगीत छिपा है आलिंगन को तरस रहा है परिचय उसका तुम दे जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   मौन पड़े विस्तार गगन में तपन भरे उसके चिंतन में मेघों की गर्जन भर जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   मेरी भी कँपती साँसों को साँसों Continue reading तुम कुछ तो गावो

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया । पहले तो मैने समझा था इस जग में बस मैं ही मैं हूँ जब से देखा दीन जनों को तुझे खोजने लगा हुआ हूँ इसी खोज में लगा हुआ अब मैंनेे जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। डाल डाल पर, फुदक फुदक कर चिड़ियाँ गाती हैं तेरे गीत रंगबिरंगी फूलों पर जा झूमे भ्रमर-सा जब संगीत तेरी महिमा उनसे सुनकर मैंने जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। Continue reading हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

कृष्णावतार

कृष्णावतार (रास छंद। 8,8,6 मात्रा पर यति। अंत 112 से आवश्यक और 2-2 पंक्ति तुकांत आवश्यक।) हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ। घोर घटा में, कड़क रही थी, बीजलियाँ हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा। दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।। यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी। विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी। मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया। कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।। घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया। जग को करते, एक बार तो, बावरिया। सन्देश छिपा, हर विपदा में, धीर रहो। दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।। अर्जुन Continue reading कृष्णावतार

गीत समर्पित तुझको करने

गीत समर्पित तुझको करने गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है। तेरे  ही  संगीत  धुनों  में लय  बँधती गुँथती जाती है।   है  शाश्वत  संगीत तुम्हारा इनसे हम क्या ताल मिलायें मेरे गीतों  की  नश्वर लय क्षणभंगुरता   ही   दर्शायें   मेरे  साँसों की  लहरें  तो लघुता  अपनी  दर्शाती  हैं। गीत समर्पित  तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है।   तेरा  तो  है  संगीत  अमर प्रतिध्वनि-सा अनंत समय का सृष्टि सृजन के भी पहले का शब्दनाद-सा विकट प्रलय का   मेरे मन की उठती लहरें तो लघुमंथन की  बस होती  हैं गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत Continue reading गीत समर्पित तुझको करने

हे प्रभू

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।) हे प्रभू! तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।   देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।   सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो। हे प्रभू! तुम भी Continue reading हे प्रभू

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता गर तू पतवार न बनता मैं क्यू नैया लेकर आता इस आँधी में तू ही आया मेरी नैया पार लगाया लहरें आती हँसती जाती औ उदास मैं होता रहता   निर्जीव नाव लिया हुआ ही मैं बस बीच भँवर में तड़पा होता। सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता।   गर तू जग से रूठा होता निष्ठुर बनकर बैठा होता कौन पूछता तुझे जगत में कौन तुम्हारी पूजा करता यही जानकर मैं तुझको यह पतवार हठीली दे आया   तब तेरे बिन लाचार बना मैं बस बैठ किनारे लहरें गिनता। सच, तेरे बिन Continue reading सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।   तूने तो सारा विष पीकर बूँदें इसमें छलका दी हैं धीरे धीरे मेरी काया कलुषित भावों से भर दी हैं     मैं भक्ति-भाव कैसे उर के कूट कूटकर भर सकता हूँ तूने तो कुछ बूँदों से ही यह विषमय पूरा कर डाला।   सासें हैं फुफकार बनी-सी जहर उगलती हैं बस प्रतिक्षण और जहर से जहर सरीखे भाव  उमड़ते हैं बस हर क्षण   सोता हूँ ज्यों चिरनिद्रा में ऐसा है मुझको कर डाला हृदय हमारा Continue reading हृदय हमारा रचकर तूने

मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ बिखराव तपन-सी रहती है सुनसान अंधेरे पथ पर भी कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है। पर आशा की लहरें तब भी चंचल मन में आ बसती हैं। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। तुमसे हटकर दूर चलूँ तो सफर विकट-सा बन जाता है और अकेला निकल पडूँ तो पथ अनजाना बन जाता है। पर इन घड़ियों में भी आशा तेरा रूप लिये रहती है। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं तट पर जा लहरें गिनता भूल गया था साँसें गिनना क्रोध Continue reading मेरे अंतः की आशायें

थकी प्रार्थना

थकी प्रार्थना थक गई प्रार्थना हो निष्फल सो गई साधना पूर्ण विफल अब क्यूँकर दीप जले निश्चल अब क्या मंदिर में पैर धरू? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? सभी आस निरास बन बैठी सुख की घड़ियाँ पीड़ा में ऐंठी मिली न वरदानों की लाठी अब किसको माला गुँथकर दूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? आँसू अब मुझसे शरमाते पलको में आ थम थम जाते पीड़ित मन भी कहता जावे कितने दुख को अपना समझूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से Continue reading थकी प्रार्थना

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   कँप कँप लहरें उठती जाती हर छंद बद्ध के मंथन की गीतों में उठती जाती है हर छवि तेरे दर्शन की।   ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   नभ में उड़ते खगगण सारे करते हैं नवगीत तरंगित इससे मौन-हृदय में होती गीतों की हर रचना मुखरित।   जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   छिप जाती सीपी सागर में मोती भी सीपी के अन्दर वैसे छिपते Continue reading छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सत रंगी फूलों से सुर ले तू रचता जीवन मेला था। राग-रागिनी पूर्ण हुई जब अंतिम गीतों की बारी थी तू पतझर बनकर आ बैठा जब महकी यह फुलवारी थी। तोड़ गया तू उस डाली को जिस पर मेरा डेरा था मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सोचा था तू खगवृन्दों का गीत सुरीला बन आवेगा गूँज उठेगा गीत बाग में सुर जब मेरा सध जावेगा। सुप्त हुआ पर भक्ति भाव जो तेरी वीणा से जागा था। मेरे गीतों की बगिया Continue reading मेरे गीतों की बगिया में

तू रहता कहाँ?

तू रहता कहाँ? आकाश और सागर के मध्य, क्षितिज के उस पार कहीं दूर, जहाँ मिल जाती होंगी सारी राहें, खुल जाते होंगे द्वार सारे मौन के, क्या तू रहता है दूर वहीं कही? क्षितिज के पार गगन मे उद्भित, ब्रम्हांड के दूसरे क्षोर पर उद्धृत, शांत सा सन्नाटा जहां है छाता, मिट जाती जहां जीवन की तृष्णा, क्या तू रहता क्षितिज के पार वहीं? कोई कहता तू घट-घट बसता, हर जीवन हर निर्जीव मे रहता, कण कण मे रम तू ही गति देता, क्षितिज, ब्रह्मान्ड को तू ही रचता, मैं कैसे विश्वासुँ तू हैं यहीं कहीं?

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ तृप्ति-सिन्धु  है  मंदिर  तेरा फिर क्यूँ मैं प्यासा रह जाऊँ?   मुझको  भूल गया  फिर भी तेरा  साया  मैं   पाता  हूँ हर   खामोशी  सन्नाटे  में धड़कन अपनी सुन पाता हूँ   देख   देखकर  तेरी  मूरत क्यूँ ना  दर्शन-प्यास बुझाऊँ भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?   रही  न अब पतवार हमारी आँधी  औ  तूफान क्षणों में तू ही तो इन निष्ठुर पल में स्फूर्ति  जगाता था  प्राणों में   अब  क्यूँ ना मैं तुझे पुकारूँ क्यूँ न  शरण में  तेरी जाऊँ Continue reading भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी