मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ बिखराव तपन-सी रहती है सुनसान अंधेरे पथ पर भी कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है। पर आशा की लहरें तब भी चंचल मन में आ बसती हैं। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। तुमसे हटकर दूर चलूँ तो सफर विकट-सा बन जाता है और अकेला निकल पडूँ तो पथ अनजाना बन जाता है। पर इन घड़ियों में भी आशा तेरा रूप लिये रहती है। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं तट पर जा लहरें गिनता भूल गया था साँसें गिनना क्रोध Continue reading मेरे अंतः की आशायें

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थकी प्रार्थना

थकी प्रार्थना थक गई प्रार्थना हो निष्फल सो गई साधना पूर्ण विफल अब क्यूँकर दीप जले निश्चल अब क्या मंदिर में पैर धरू? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? सभी आस निरास बन बैठी सुख की घड़ियाँ पीड़ा में ऐंठी मिली न वरदानों की लाठी अब किसको माला गुँथकर दूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? आँसू अब मुझसे शरमाते पलको में आ थम थम जाते पीड़ित मन भी कहता जावे कितने दुख को अपना समझूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से Continue reading थकी प्रार्थना

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   कँप कँप लहरें उठती जाती हर छंद बद्ध के मंथन की गीतों में उठती जाती है हर छवि तेरे दर्शन की।   ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   नभ में उड़ते खगगण सारे करते हैं नवगीत तरंगित इससे मौन-हृदय में होती गीतों की हर रचना मुखरित।   जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   छिप जाती सीपी सागर में मोती भी सीपी के अन्दर वैसे छिपते Continue reading छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सत रंगी फूलों से सुर ले तू रचता जीवन मेला था। राग-रागिनी पूर्ण हुई जब अंतिम गीतों की बारी थी तू पतझर बनकर आ बैठा जब महकी यह फुलवारी थी। तोड़ गया तू उस डाली को जिस पर मेरा डेरा था मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सोचा था तू खगवृन्दों का गीत सुरीला बन आवेगा गूँज उठेगा गीत बाग में सुर जब मेरा सध जावेगा। सुप्त हुआ पर भक्ति भाव जो तेरी वीणा से जागा था। मेरे गीतों की बगिया Continue reading मेरे गीतों की बगिया में

तू रहता कहाँ?

तू रहता कहाँ? आकाश और सागर के मध्य, क्षितिज के उस पार कहीं दूर, जहाँ मिल जाती होंगी सारी राहें, खुल जाते होंगे द्वार सारे मौन के, क्या तू रहता है दूर वहीं कही? क्षितिज के पार गगन मे उद्भित, ब्रम्हांड के दूसरे क्षोर पर उद्धृत, शांत सा सन्नाटा जहां है छाता, मिट जाती जहां जीवन की तृष्णा, क्या तू रहता क्षितिज के पार वहीं? कोई कहता तू घट-घट बसता, हर जीवन हर निर्जीव मे रहता, कण कण मे रम तू ही गति देता, क्षितिज, ब्रह्मान्ड को तू ही रचता, मैं कैसे विश्वासुँ तू हैं यहीं कहीं?

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ तृप्ति-सिन्धु  है  मंदिर  तेरा फिर क्यूँ मैं प्यासा रह जाऊँ?   मुझको  भूल गया  फिर भी तेरा  साया  मैं   पाता  हूँ हर   खामोशी  सन्नाटे  में धड़कन अपनी सुन पाता हूँ   देख   देखकर  तेरी  मूरत क्यूँ ना  दर्शन-प्यास बुझाऊँ भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?   रही  न अब पतवार हमारी आँधी  औ  तूफान क्षणों में तू ही तो इन निष्ठुर पल में स्फूर्ति  जगाता था  प्राणों में   अब  क्यूँ ना मैं तुझे पुकारूँ क्यूँ न  शरण में  तेरी जाऊँ Continue reading भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

तुझे अंबे कहू या दुर्गा

तुझे अंबे कहू या दुर्गा तुझे अंबे कहू या दुर्गा, तू काली है या महामाया l दुःख दूर करो महारानी , मैं तेरे ही दर पे आया ll तुझे अंबे कहू या दुर्गा, तू काली …………………….. मुझे दुःख ने आज है घेरा ,मेरे चारों तरफ अँधेरा l मेरी  नैय्या  पार लगा दो ,  मैं बच्चा हूँ माँ तेरा ll तू  संकट  हरने  वाली , मेरी जगदंबे  महामाया l दुःख दूर करो महारानी , मैं तेरे ही दर पे आया ll तुझे अंबे कहू या दुर्गा, तू काली ………………… तेरा भक्त्त हूँ मैं महारानी,मुझे अपनी शरण में ले लें l मेरा Continue reading तुझे अंबे कहू या दुर्गा

माँ

माँ तू अनंत का विस्तार मैं शून्य का आकार हूँ तू ममता सागर अनंत मैं बस इक जलधार हूँ। तू मेरा संसार है मैं बस इक लघु श्रंगार हूँ तू देवी साक्षात है मैं तो भक्तावतार हूँ। तू करुणा की रागिनी मैं कंपित एक तार हूँ तू पायल है कर्म की मैं तो एक झंकार हूँ। तू कलम की प्रेरणा है मैं सिर्फ ग्रंथकार हूँ तू ही शक्ति तू ही बुद्धि मैं तो बस उद्गार हूँ। तू तूलिका रंग भरती मैं सिर्फ रेखाकार हूँ तू मणि माणिक रत्न है तो मैं पिरोया हार हूँ। तू रण की अंतिम विजय मैं Continue reading माँ

जब से मैंने तुम्हें निहारा

जब से मैंने तुम्हें निहारा तुझमें मुझमें रहा ना अंतर तुझे प्रतीक्षा रहती मेरी मैं उलटी साँसें गिनता हूँ बाट जोहता रहता है तू मैं गिरता चलता रहता हूँ पद रखने की आहट पाकर सपनों की दुनिया के अंदर मैं तेरे अंदर जग जाता तू जग जाता मेरे अंदर जब से मैंने तुम्हें निहारा तुझमें मुझमें रहा ना अंतर तुम हो कल्पित साथी मन के मेरे एकाकी जीवन के मैं भी बंदी बनकर तेरा जीता हूँ हर पल जीवन के करता है तू बस मुझसे ही जन्म-मरण के प्रश्न चिरंतर मैं आँसू के कण गिन गिनकर सोचा करता मैं क्या Continue reading जब से मैंने तुम्हें निहारा

धुन एक ही

धुन एक ही यह शरीर नश्वर तर जाए भव सागर जीवन की! धुन एक ही लगी बस सागर पार जाने की, तड़ जाऊँ सब बाधा विघ्न दुनियाँ की, जोगी सा रमता मन धुन बस रम जाने की। मन मस्त कलंदर बावरा दिल रमता जोगी, लगन लगी अथाह सागर तर जाने की, कागद के टुकड़ों सा तन बस गल जाने की। धुन में रमता मन परवाह नही कुछ तन की, पल आश-निराश के समय अवसान की, पल पल गलता जीवन हिमखंड शिलाओं सी। शरण आया तेरे ईश्वर आस लिए मोक्ष की, कुछ बूँद छलका दे अपनी अनुकंपा की, ये शरीर नश्वर Continue reading धुन एक ही

वंदना

“वन्दना” इतनी ईश दया दिखला, जीवन का कर दो सुप्रभात। दूर गगन में भटका दो, अंधकारमय जीवन रात।।1।। मेरे कष्टों के पथ अनेक, भटका रहता जिनमें यह मन। ज्ञान ज्योति दर्शाओ प्रभो, सफल बने मेरा यह जीवन।।2।। मेरी बुद्धि की राहों में, ये दुर्बुद्धि रूप पाषाण पड़े। विकशित ज्ञान की सरिता में, ये अचल खड़े भूधर अड़े।।3।। मेरे जीवन की सुख निंद्रा, मोह निंद्रा में बदल गई। जीवन की वे सुखकर रातें, है घन अंधकार से सन गई।।4।। मेरी वाणी वीणा का, है बिखर गया हर तार तार। वीणा रहित गुंजित मन का, कैसे प्रगटे वह भाव सार।।5।। स्वच्छ हृदय Continue reading वंदना