बचपन

बचपन अतीत से बचपन की शरारते टटोलता जब उन पन्नो को मैं बड़े प्यार से खोलता जब मन में शरारत के पल यादों में चल रहे तब अब देखो मेरी बचपन की शरारत लिखता जब शरारते करने में किसी से कम नहीं था तब घर,बाहर,या स्कूल मौका कोई मिलता जब दुसरे का खाना,कापी चोरी से लाता तब शरारत कर के कपड़ो पे स्याही मलता जब मस्ती में भाई का सामान छुपा देता तब वो ढूँढ़ कर परेशन, मैं मन ही मन हँसता जब बदले मे उस से मन चाह सामान लेता तब झूट-मूट के सांप बिछु से उसे डराता जब Continue reading बचपन

Advertisements

गोकुल धाम सोसाइटी मैं रोज नए नए धमाल है

गोकुलधाम सोसाइटी मे हर रोज नए नए धमाल है। गोकुलधाम सोसाइटी बहुत कमाल है। इनके निवासियों के बारे मे क्या कहना। मुझे एक बार गोकुलधाम सोसाइटी मे है रहना। तारक मेहता हर वक़्त डाइट फ़ूड की वजह से है परेशान है। हम तो उनकी कमाल की शायरी से परेशान है। उनके परम मित्र जेठालाल हर वक़्त परेशानियो से ग्रस्त रहते है। बबिता जी की तारीफ करने मे वो हर वक़्त व्यस्त रहते हैं। सोसाइटी की गरबा क्वीन सबको अच्छी लगती है। उनकी मुझे हंसी सबसे प्यारी लगती है। दोस्ती क लिये गोकुलधाम मिसाल है। यहाँ के वासियो की हर अदा Continue reading गोकुल धाम सोसाइटी मैं रोज नए नए धमाल है

शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस जिन राहों पर भारी क़दमों से रखता है, हर बचपन अपने क़दमों को, एक हाथ जो सम्हाल कर, सही मार्ग दिखा कर चलाता है सबको , गलतियों पर डांट कर, अच्छाइयों पर ताली बजा प्रोत्साहित करता  है जो, माता – न पिता होता है, पर उनसे भी बढ़कर भलाई का मार्ग दिखाता है जो, ऊंचाइयों पर पंहुचा दें, एक ही मकसद होता करता है मार्ग दर्शन  जो , अध्यापक हर जीवन में हजरूरी, ये अब क्या समझना  हमको , एक ही  दिन उनके सम्मान का हो ऐसा तो जरूरी नहीं, हर बचपन को सीखना होगा सम्मान करना उनका, Continue reading शिक्षक दिवस

नन्ही सी चिड़िया

नन्ही सी चिड़िया कभी ईख के पत्तों पर कभी जा बैठती पेड़ों पर तो कभी फुदकती मिलती है खेतों में लगगे हुए मेड़ों पर कितनी मासूम, कितनी भोली, कितनी प्यारी लगती है चहचहाती हुई चिड़िया मुस्कान लिये हुए चेहरों पर . हँसते हों जो सुख पर अपने दूसरों को दुख-दर्द देके आ जाएं गर फुर्सत न हो पल दो पल उधार ही लेके ममता की परिभाषा मानव सिख ले आकर इन चिड़ियों से कीचड़ उन पर भी पड़ता है जो कीचड़ में रोड़े फेंके . इन्हें देख लिखी गई अनेकता में एकता की नारा इन्सानों से ओझल इनकी आंखों में Continue reading नन्ही सी चिड़िया

मेरा बचपन

मेरा बचपन कक्षा सात का वो बच्चा तो बारिश में भीगते हुए घर आता था। कभी फिसलता गाँव की कच्ची सड़को पर तो कभी खड्ड़ो के इकट्ठे पानी से होली खेल कर आता था। माँ रोज़ डाँट लगाती थी, पर वो वही करता तो उसके मन को भाता था। कक्षा सात का वो बच्चा स्कूल जाने में डरता था। वक़्त जैसे ही होता स्कूल की बस का वो रोज़ नये बहाने करता था। खेल कूद में खूब मन लगता, पढाई लिखाई से घबराता था। कक्षा सात का वो बच्चा बेमन से स्कूल जाता था। साल भर मस्ती मज़ाक में गुजारता Continue reading मेरा बचपन

जंगल की स्कूल

जंगल की स्कूल — बाल गीत किसी शहर से बंदर पढ़कर जब जंगल में आया तब  उसने आँगन में अपने एक स्कूल खुलवाया   सारे  पक्षी]  सारे  बच्चे दौड़ दौड़ कर आये पीपल के पत्तों पर लिखने पेन साथ  भी लाये   भरी क्लास में तब बंदर ने अपनी पोथी खोली शोर मचाया  सब बच्चों ने बोली अपनी बोली   मुर्गे के  पंखों को गिनकर गणित समझ में आयी तोते से नित रटना सीखा भाषा   सुन्दर  पायी   जग भर का इतिहास बताने टिड्डीदल उड़ आया भूगोल  पढ़ाने   हाथी  भी पृथ्वी  बनकर आया   विज्ञान की बातें करने तब चिम्पेंजी Continue reading जंगल की स्कूल

कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ

कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ? मिल जाते हैं बच्चे उनको कैसे दूर करूँ? लाठी लेके चलता हूँ तो उनको बंदर-सा लगता हूँ वो ‘हू हू’ कर मुझे चिढ़ाते मैं मुस्काये खिसयाता हूँ बालपन की मस्ती भी क्यूँकर दूर करूँ? कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ? पान चबाने ओठ चलाऊँ तो हिप्पो जैसा लगता हूँ बच्चे तब ‘खीं खीं’ कर हँसते मैं लाठी ठक ठक करता हूँ तब मैं उनको दूर हटाने क्यूँकर क्रूर बनूँ? कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ? मुझे चिढ़ाने मुँह बिचकाते वो Continue reading कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ

बचपन की यादें

बचपन की यादें आओ चलो एक बार फिर बचपन में खो जाये l बचपन की उन शरारतों को फिर से हम दोहरायेll अपनी सारी चिन्ताओ को दूर कही छोड़ आये l आओ चलो एक बार फिर बचपन में खो जाये ll भिनी-भिनी मिट्टी की खुश्बू चखने को है बुलाती l डंडा लेकर दौड़ती माँ हमे याद बहुत है आती ll फिर से चूल्ले की रोटी और लोनी घी खाये l आओ चलो एक बार फिर बचपन में खो जाये ll आज के विडियो गेम वो मजा ना दे पाये l गिल्ली डंडा, खो-खो खेल खूब मजे आये ll गाँव के Continue reading बचपन की यादें

प्रकृति चन्दन

प्रकृति चन्दन दरअसल, सत्य तो यह है की ये पंक्तियाँ अपने बेटे को स्कूल की एक प्रतियोगिता में, स्वयं कि लिखी कविता बुलवाने की जिद में लिखी थीं| किन्तु जब शब्दों ने कागज़ पर उतरकर यह रूप लिया तब अहसास हुआ कि चाहे कोई भी युग,समय, स्तर अथवा विचारधारा रही हो, माता पिता सदा से ही अपने बच्चों के लिए इन विशिष्ट गुणों से परिपूर्ण होने कि कामना करते आये हैं| आज माँ के रूप में मेरी कामना भी कतई  अलग नहीं थी| अपने घर परिवार के बच्चों को समर्पित कर रही हूँ अपनी यह कामना| और हाँ, अगर इन Continue reading प्रकृति चन्दन

मेरी गुडिया सो रही…

मेरी गुडिया सो रही, उसे जगाना मत। अभी- अभी आँख लगी है, उसे रुलाना मत।। मेरी गुडिया सो रही, उसे जगाना मत। आँगन की चिडिया तुम, पंख मत फडफडाना। आकर दाना चुगना तुम, फिर धीरे से उड जाना।। मेरी गुडिया सो रही, उसे जगाना मत। भोर की पहली किरण तुम, चुपके- चुपके से आना। अपने तेज प्रकाश में, शीतलता तुम लाना।। मेरी गुडिया सो रही, उसे जगाना मत। मलय- पवन के झोंके तुम, धीरे- धीरे से बहना। बहकर मेरे आँगन को, अपनी सुगन्ध से महकाना।। मेरी गुडिया सो रही, उसे जगाना मत। आसमान के बादल तुम, अभि मत गरजना। अभी- Continue reading मेरी गुडिया सो रही…

धरती माता

धरती हमारी माता है, माता को प्रणाम करोबनी रहे इसकी सुंदरता, ऐसा भी कुछ काम करोआओ हम सब मिलजुल कर, इस धरती को ही स्वर्ग बना देंदेकर सुंदर रूप धरा को, कुरूपता को दूर भगा देंनैतिक ज़िम्मेदारी समझ कर, नैतिकता से काम करेंगंदगी फैला भूमि परमाँ को न बदनाम करें माँ तो है हम सब की रक्षकहम इसके क्यों बन रहे भक्षकजन्म भूमि है पावन भूमि, बन जाएँ इसके संरक्षककुदरत ने जो दिया धरा कोउसका सब सम्मान करोन छेड़ो इन उपहारों को, न कोई बुराई का काम करोधरती हमारी माता है, माता को प्रणाम करोबनी रहे इसकी सुंदरता, ऐसा भी कुछ Continue reading धरती माता

बचपन

नाज़ुक डाली सी काया, कोमल कली सा मन निर्मल निश्छल नीर सा, नटखट नादान बचपन एक पल अठखेलियाँ दूजे पल अनबन वेदमन्त्र- अज़ान सा, पवित्र-पाक-पावन कौतूहल से फैलती, छोटी-छोटी आँख चाँद-सितारे छूने को सपने है बेताब बाबा की अँगुली नहीं, है मुट्ठी में आकाश ममता के आँचल तले, स्वर्ग सा अहसास छल-कपट से कोसों दूर, बचपन की हर बात परीलोक सी दुनिया में, इन्द्रलोक सी रात बाबा का कुरता- चप्पल, पहन उन्हीं सा इठलाना बाहर की दुनिया माँ को, अपनी आँखों से दिखलाना बुलबुलों में साबुन के, इन्द्रधनुष भर लाते थे डाल चवन्नी गुल्लक में, धन्ना सेठ बन जाते थे Continue reading बचपन