बेखबर

काश! मिल पाता मुझे मेरी ही तमन्नाओं का शहर! चल पड़े थे कदम उन हसरतों के डगर, बस फासले थे जहाँ, न थी मंजिल की खबर, गुम अंधेरों में कहीं, था वो चाहतों का सफर, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! बरबस खींचती रहीं जिन्दगी मुझे कहीं, हाथ बस दो पल मिले, दिल कभी मिले नहीं, शख्स कई मिले, पर वो बंदगी मिली नही, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! साहिल था सामने, बस पावों में थे भँवर, बहती हुई इस धार में, बहते रहे हम बेखबर, बांध टूटते रहे, टूटता रहा मेरा सबर, Continue reading बेखबर

नेपथ्य

मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। जब मौन हो ये मंच, तो बोलता है नेपथ्य, यूँ टूटती है खामोशी, ज्यूँ खुल रहा हो रहस्य, गूँजती है इक आवाज, हुंकारता है सत्य, मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। पार क्षितिज के कहीं, प्रबल हो रहा नेपथ्य, नजर के सामने नहीं, पर यहीं खड़ा है नेपथ्य, गर्जनाओं के संग, वर्जनाओं में रहा नेपथ्य, क्षितिज के मौन से, आतुर है कहने को अकथ्य। जब सत्य हो पराश्त, असत्य की हो विजय, चूर हो जब आकांक्षाएँ, सत्यकर्म की हो पराजय, लड़ने को असत्य से, पुनः आएगा Continue reading नेपथ्य

क्यों?

क्यों? तेरे धुंधली स्वप्नों की विस्मृति में, मन का उन्माद निखरता क्यों? सुरभित लहरों की उमंगों में, सागर का वैभव बिखरता क्यों? रुपहली रातों की शीतल छाया में, तारों की तरूणाई बहकती क्यों? माना मेरा भाग्य गगन धुंधला-सा, पर तुम उस पर थिरकती क्यों? किरणें बन तू दे उज्ज्वल आभा, नटखट दिनकर दमकता क्यों? मैं नित्य अतृप्त प्रेम भिखारी तेरा, त्रिषित दिल फिर तड़पता क्यों? कोमल ह्रदय के उष्ण अंचल में, आत्मोत्सर्ग की अतृप्ति क्यों? गोधूलि के धूमिल रजत पट पर, चांदनी रात की दिव्य दीप्ति क्यों? मेरी तीव्र पीड़ा पर छिड़केगी तू, कुसुम-धूलि मकरंद घोल क्यों? असह्य विरह की Continue reading क्यों?

इधर सांझ भी अलसाई है

इधर सांझ भी अलसाई है लौट चले है पंछी नीड़ में, तिमिर जो गहराई है, क्षितिज है मुस्कुराता, इधर सांझ भी अलसाई है| बयार पग धरे मंद-मंद, डूबती लालिमा मुस्कुराई है, क्लांति छाई नील गगन में, इधर सांझ भी अलसाई है। खोई-खोई-सी निशा है, खोई-सी उसकी तनहाई है, बेक़रार वह पिया मिलन को, इधर सांझ भी अलसाई है। मध्यम हुई बेचैन किरणें, धुंधली दिनकर की परछाई है, अधीर मुस्कान लिए लताऐं, इधर सांझ भी अलसाई है। आकुल मेघा चली परदेश को, पूरब दिशा भी शरमाई है, बेक़रार क्यों है हर दिल यहाँ, इधर सांझ भी अलसाई है। प्रचण्ड अहसासों के Continue reading इधर सांझ भी अलसाई है

कोलाहल

कोलाहल क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? काँप उठी ये वसुन्धरा, उठी है सागर में लहरें हजार, चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार, दुर्बल सा ये मानव, कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? कोलाहल के है ये स्वर, कण से कण अब रहे बिछर, स्रष्टा ने तोड़ी खामोशी, टूट पड़े हैं मौन के ज्वर, त्राहिमाम करते ये मानव, तज अहंकार, ईश्वर का अब कर रहे पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? या है छलनी उस रचयिता का Continue reading कोलाहल

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम कहाँ थे, कहाँ हैं, और कल कहाँ होंगे हम साथ लेकर चले थे जो कहाँ भटक गए वो कदम हिमालय के चुम्बन को चले थे कहाँ अदृश्य गए वो करम अपने ही पगों के भूले निशाँ न लज़्ज़ा, न आती हमको शर्म कर्म-पथ पर अग्रसर हैं क्यों सींचते हैं ऐसे भ्रम बयार शीतल आई पूरब से मगर अहसास क्यों इसके गरम धरम का ज्ञान देने चले थे मगर क्यों भूले अपना ही धरम जो कदम उठे थे जोश में अचानक क्यों पड़ गए हैं नरम जख्मों से बहता रुधिर हमारे लगाएगा कौन इन पर Continue reading कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

रे मनुआ! अब तो धीरज धार

रे मनुआ! अब तो धीरज धार क्यों होता व्याकुल इतना, व्यथा होता क्यों बेचैन चैतन्य को बना सारथी, सूर्यरथ होकर पर सवार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार भोर भई अब आंखें खोल, बावरे क्यों तू सोवत है पतवार संभाल अपनी, कश्ती है तेरी मंझधार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार प्राण पखेरू हो जायेंगे जब, कब तू जागत है सह ले पीड़ा अपनी, कोई ना सुने तेरी पुकार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार अपनी पीड़ा तू ही जाने और न Continue reading रे मनुआ! अब तो धीरज धार

मेरी इकलौती परछाई

मेरी इकलौती परछाई गुजरा जब तेरे हुस्न का काफ़िला हवाओं के संग मेरे गाँव से होकर बादल भी चले संग तेरे-तेरे और बदला मौसम का भी मिज़ाज़ लेकिन हम न कर सके दीदार तेरे हुस्न के चाँद का क्योंकि उन रुपहले पलों में मैं रात के घने अँधेरे में, बलखाती सन्नाटे की उबड़-खाबड़ पगडंडियों किनारे खोज रहा था अपनी ही परछाई को जो शायद तुम्हारे हुस्न की तरुणाई देख सिमट गई थी कहीं रात के सन्नाटे के अंचल की ओट में कुछ शर्माकर-कुछ सकुचाकर खोकर तुम्हें अब नहीं खोना चाहता अपनी इकलौती परछाई को जो चलती है हरदम संग मेरे Continue reading मेरी इकलौती परछाई

भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य)

भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य) “स्वच्छ गाँव अभियान” का शुभारम्भ हुआ ढोल-नगाड़े से मेरे गांव में नेताओं की उतारी गई आरती और मंगल गीत गाये गए उनकी शान में मगर गांव की एक भैंस नाम था जिसका “शीला की जवानी” न जाने क्यों खोई-खोई-सी रहती अनायास ही एक दिन वह गाँव के तालाब में चली गई जब साथी भैंसों ने पूछा कारण तो वह बोली कि पेट में उठ रहे थे मरोड़े इसलिए दीर्घ-शंका हेतु शरण लेनी पड़ी तालाब की क्योँकि “स्वच्छ गाँव अभियान” में बनने थे जो शौचालय, नहीं बन पाए सम्पूर्ण राशि जो प्रशासन ने Continue reading भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य)

बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम

देखूं जब कोई निराश्रित शिशु का चेहरा बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम जान न पाया मेरा ये निष्ठुर ह्रदय कभी क्यों हैं इस उदास चेहरे पर इतने गम क्या यही गुनाह था उस मासूम का कि निर्धन घर में हुआ इस बालक का जन्म उसकी जिज्ञासा भरी आँखों से झरते आंसुओं को क्या कभी पोंछ पायेंगे हम क्या सपने उसके-क्या उसकी अभिलाषा जा कर कोई पूछे मगर नहीं किसी में दम निर्दयी ज़माने ने दिए जख्म उसको इतने नहीं कोई वनस्पति जो कर दे उनको कम काँटों भरी राह में पाँव उसके रक्तरंजित चलते-चलते थक जायेंगे और Continue reading बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१) हे मानव व्यर्थ में क्यों करता, तू गर्व अपनी ही रचना पर तूफान में डगमगाती कश्ती तेरी, क्यों करता है अभिमान तोड़ सारे नियम स्वयं के, क्यों कर तू इतना इतराता है निशाचर विचरते निर्भीक, क्यों चिर-निद्रा में तेरा विधान किन्तु व्यग्रता तेरी तक़दीर नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान जकड़ लिया तेरे साम्राज्य को, तेरे ही मक्कड़ जालों ने अपने ही प्रगति-पथ पर, तेरा अहंकार बना है व्यवधान हिमीगिरि के उतुंग शिखर बैठ, गढ़ कोई इतिहास नया त्याग अहंमन्यता के भाव सारे, रच कोई नया कीर्तिमान किन्तु पथभ्रष्ट होना तेरा कर्म Continue reading क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार! मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार, झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर, किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार! हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार! जटिल बड़ी है यह पहेली,नहीं किसी की ये सहेली! झुंझलाहट होती दिशाहीन मन की गति पर, ठिठककर दबे पाँवों फिर देखता, समय का विस्तार! हूँ मैं इक लघुकण, क्या पाऊँगा अभिसार? निर्झर है यह समय, कर पाऊँगा मैं केसे अधिकार? अकुलाहट होती संहारी समय की नियति पर, निःशब्द स्थिरभाव  फिर देखता, समय का विस्तार! रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा Continue reading किंकर्तव्यविमूढ

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि ) प्यारे दोस्तों, ये कविता स्वo नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करता हूँ | प्रद्युमन रेयान पब्लिक स्कूल, गुरुग्राम (गुडगाँव) का वह छात्र है जो कुछ ही दिन पहले एक दरिंदे के हाथों हम सबको छोड़कर परियों के देश चला गया है| इश्वर उसकी अमर आत्मा को शांति दे| माँ मेरी कैसे मैं तुझे समझाऊँ क्या हुआ मुझे कैसे मैं बतलाऊँ पीड़ा अपनी मैं कैसे जतलाऊँ बिन तेरे माँ बहुत मैं घबराऊँ न करना अब इंतज़ार मेरा कभी न लौटेगा लाडला तेरा क्योंकि तू जान है Continue reading माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

वो जानवर है

वो जानवर है वो इंसान है शायद हमारी तरह नहीं दिखता उसकी सूरत नहीं मिलती हमसे कोई भी देख डर जाए उसे देखते शायद साँसे थम जाए अलबत्ता वो इंसान ही तो है हमारी तरह दोपाया ना सही चौपाया ही सही कई मायनों में हम इंसानों से बेहतर पेट की आग स्वाहा हो जाए बच्चे उसके भूखे ना सो जाए उसका भोर सूरज संग हो जाए उसका सांझ बीत जाए बस इतना ही तो उस इंसान को चाहिए। वो इंसान ही तो है या शायद नहीं क्योंकि वो हम इंसानों की तरह अपनों से छल नहीं करता ना वो किसी Continue reading वो जानवर है

प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि

प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि बड़े प्यार से स्कूल भेजा, माँ ने अपना दुलारा l नहीं जानती थी, नहीं अब वो आएगा दुबारा ll बेफिक्र थी ये सोचकर वो स्कूल पहुंच चुका है l नहीं पता था स्कूल में ही साँसे छोड़ चुका है ll सुनकर खबर बच्चे की माँ का कलेजा थरथराया l क्या हुआ जो दरिंदे ने उसे मौत की नींद सुलाया ll मेरे लाल की आँखे न होती,ये देख तो ना पाताl मेरा लाल मुझे छोड़कर मुझसे दूर तो ना जाता ll मासूम चेहरे को देखकर भी दरिंदे को दया न आई l बड़ी बेहरमी से उसकी गर्दन पर उसने छुरी Continue reading प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि