पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

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जंग लगी मेरी वीणा को

 जंग लगी मेरी वीणा को  सूखी डाली हरियाने को तुम आँसू मेरे बहने दो जंग लगी मेरी वीणा को अपनी धुन में बजने दो।   फूल नहीं तो शूल समझकर दामन में  अपने उलझा लो प्रतिकूल लगे बंधन फिर भी तुम मुक्त न मुझको होने दो।   बनकर मैं दीपक की बाती जलता हूँ तो जल जाने दो धुआँ बने मँडराते मन को काजल-सा ही बन जाने दो।   हर आँधी  में  पाल बिंधाकर तुम मुझको  आहत  होने दो जीवन-जल का  कीच छिपाने तुम कमलरूप बस बन जावो।   कुंठाओं के  नीड़  बनाकर बस उसमें मुझको पलने दो टूटे बिखरे  Continue reading जंग लगी मेरी वीणा को

मेरा जीवन पूरा तूने

मेरा जीवन पूरा तूने मेरे पुण्य कर्म को तूने पापों की श्रेणी में रखकर और मधुरवाणी को मेरी कटुता का ही भेद बताकर मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला अब साँसें ही मचल रही हैं तज पंखों को उड़ जाने को और नीड़ में बैठी श्रद्वा बस व्याकुल है कुछ पाने को पर तूने श्रद्वा सुमनों को भक्ति विमुख ही कर डाला मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला तन ही मेरा शेष बचा है ज्यों इक सीपी रेत पड़ी हो और लहर के आते-जाते लुढ़क लुढ़ककर टूट पड़ी हो तूने तो जीवन आशा को Continue reading मेरा जीवन पूरा तूने

सूनी सूनी साँसों के सुर में

सूनी सूनी साँसों के सुर में सूनी सूनी  साँसों के सुर में ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे। कभी कहीं  ये आवाज थमेगी अब जग में ना आँसू बरसेंगे।   ये साँसें  हैं  दीप  सरीखी इक जलती है, इक बुझती है धुँआ बाती-सी जीवन ज्योति जलती     है,  ना  बुझती है।   दिव्य ज्योति जब आँखों में हो तो आँसू   मोती  से   ही  चमकेंगे सूनी  सूनी   साँसों  के  सुर में ये   आँसू  कब  तक   थिरकेंगे।   तरस रहे हैं बूँद बूँद को पनघट पनघट  खाली है साँसों का भंडार  भरा है जीवन  गागर  खाली है।   दरक उठी जब माटी की गागर हर Continue reading सूनी सूनी साँसों के सुर में

उम्र की दोपहरी

उम्र की दोपहरी उम्र की दोपहरी, अब छूने लगी हलके से तन को… सुरमई सांझ सा धुँधलाता हुआ मंजर, तन को सहलाता हुआ ये समय का खंजर, पल पल उतरता हुआ ये यौवन का ज्वर, दबे कदमों यहीं कहीं, ऊम्र हौले से रही है गुजर। पड़ने लगी चेहरों पर वक्त की सिलवटें, धूप सी सुनहरी, होने लगी ये काली सी लटें, वक्त यूँ ही लेता रहा अनथक करवटें, हाथ मलती रह गई हैं,  जाने कितनी ही हसरतें। याद आने लगी, कई भूली-बिसरी बातें, वक्त बेवक्त सताती हैं, गुजरी सी कई लम्हातें, ढलते हुए पलों में कटती नहीं हैं रातें, ये Continue reading उम्र की दोपहरी

श्रापमुक्त

श्रापमुक्त कुछ बूँदे! … जाने क्या जादू कर गई थी? लहलहा उठी थी खुशी से फिर वो सूखी सी डाली…. झेल रहा था वो तन श्रापित सा जीवन, अंग-अंग टूट कर बिखरे थे सूखी टहनी में ढलकर, तन से अपनों का भी छूटा था ऐतबार, हर तरफ थी टूटी सी डाली और सूखे पत्तों का अंबार.. कांतिहीन आँखों में यौवन थी मुरझाई, एकांत सा खड़ा अकेला दूर तक थी इक तन्हाई, मुँह फेरकर दूर जा चुकी थी हरियाली, अब दामन में थे बस सूखी कलियों का टूटता ऐतबार… कुछ बूँदे कहीं से ओस बन कर आई, सूखी सी वो डाली Continue reading श्रापमुक्त

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

जिन्दगी चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये गरीब की झोपड़ी में झाँक के देखा जाये यहीं पे ईश्वर और उसकी आस्था बसती है चलो, गरीब के आँसू तैर के देखा जाये।   कल ही रात में बड़ी जोर की बारिश हुई थी झोपड़ी ढह गई होगी जाके देखा जाये मुआवजा माँगती वहाँ कई लाश तो होंगी उनकी मुस्कराहट को पास से देखा जाये।   चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये इक चमचमाती कार में चल के देखा जाये बहुत सुखद लगता है गरीब का दर्द देखना चलो, भूखे बच्चे को तड़पते देखा जाये।   बहुत ऊब Continue reading चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

काफी नहीं ?

काफी नहीं ? बैठे रहते है जब हम खोये हूँए सपनो की खोज में , आसमान से टपकते पानी से संवेदना हथेली पर शायद फिर से संजोले ! पर .. ये जो समय है, वो दूर से चमककर टूटते हुए तारे की तरहा बिखर बिखर जाता है, और ..आंसुओ की सतह पर सदीओ तक चमकता रहता है, फिर भी ज़िंदा हूँ काफी नहीं ? –मनीषा ‘जोबन ‘

रक्तधार

रक्तधार अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू, अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू….. चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को, मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई, सतत प्रयत्न कर भी पाप धरा के न धो पाई, व्यथित हृदय ले यह रोती अब, जा सागर में समाई। व्यर्थ हुए हैं प्रयत्न सारे, पीड़ित है इसके हृदय, अन्तस्थ तक मन है क्षुब्ध, सागर हुआ लवणमय, भीग चुकी वसुन्धरा, भीगा न मानव हृदय, हत भागी सी सरिता, अब रोती भाग्य को कोसती। व्यथा के आँसू, कभी बहते व्यग्र लहर बनकर, तट पर Continue reading रक्तधार

जीवन हाला

जीवन हाला यों ही एक प्रयास:- टुटे हुवे प्यालो में जीवन- हाला बेबस पीने कोे बैठ गया मधुशाला बुदं बुंद तड़पाये पीने की ज्वाला अद्दाओं से भरमाये साकीवाला किस डगर जाऊं,भरूं मद प्याला बंद होने आई जीवन- मधुशाला कोई जतन बतायें,कोई मतवाला रिस रहा मधु-रस टुटा है प्याला राम नाम का रस पीले मतवाला दर दर क्यों भटके लेकर ज्वाला  

माँ

माँ माँ शब्द है जिन दिलो में यहाँ, पार हूॅआ है जग जूलो में यहाँ। दुःख की परछाईयों में जो घिरा , छलकते थे दर्द आंखो में वहाँ। माफ़ किया है उसी माँ ने सदा , हम सभी गुनाहगारो है यहाँ। बरसती उस ह्रदय से दुआ सभी , कामयाबी आज ढेरो है यहाँ। नींद लेते सुख सपने देखते, जागती वो रात हजारो है यहाँ। साथ में वो रोई थी हमारे कभी , राह में खाई ठोकरों में यहाँ। बात से उनकी कहानी निकले, फिरते थे फूल तारों में यहाँ। देखती थी मूरते मंदिर में , फिरभी माँ को हूँ प्यारो Continue reading माँ

वक्त

वक्त वक्त से सीखा की वक्त किसी के लिये रूकता नहीं वक्त ने ही जताया, वक्त सब का एक सा चलता नहीं बदलते वक्त के साथ जो बदल गये,उन्हें परेशानी नहीं जो बदल नहीं पाये,उनकी निशानी वक्त ने छोड़ी नहीं वक्त से पहचान,वक्त के आगे किसी की चली नहीं जब वक्त आये, पतन का कारण,अभिमानी जाने नहीं अहम अपने ग़रूर का,वहम से असर को माने नहीं वक्त बनाता,वक्त ही मिटाता,यह बात अनजानी नहीं सजन

नवगीत

नवगीत अनकहे, अनसुलझे जज्बातों से मन मचलता है जैसे रोता बच्चा खिलौना पाने चाहे सम्भाल पाये या नहीं ढंग से ……! उमंग हैं अपनी जाने कैसे अनजानी पहचान से जैसे होते सपने, जब तक उम्मीद दिल में खूब ललचाता है जज्बातों के खेल में मन गिरगिट सा रंग बदलता है जैसे रोता बच्चा पाने को हर चीज नासमझे कोई बंधन बेफिक्र दिल से रोता न मिलने पर । या फिर मिलने पर खुब खेलता कुछ वक्त और फिर तोड़कर न समझ सका देख देख कर पर जोड़ने की कोशिश, हारकर झट पट बहुत पलटता है खेल खेल में नये जज्बातों Continue reading नवगीत

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ माँ बेटो को जन्म देकर पछताती है। लड़की रात को घर से बाहर निकलने से घबराती है, और निर्भया की आत्मा आज तक लज्जाति है।। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ राजपद की आस रोज कोई दंगा करवाती है। भारत माँ जहाँ रोज आसूं बहाती है, शहीद स्मारक की आग जहां शर्मिंदगी से बुझ जाती है। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी।। ***नि-3***

बेचैन खग

बेचैन खग तट के तीरे खग ये प्यासा, प्रीत की नीर का जरा सा, नीर प्रीत का तो मिलता दोनो तट ही! कलकल सा वो बहता, इस तट भी! उस तट भी! पर उभरती कैसी ये प्यास, सिमटती हर क्षण ये आश, यह कैसी है विडम्बना? या शायद है यह इक अमिट पिपास….? या है अचेतन मन के चेतना की इक अधूरी यात्रा, या भीगे तन की अंतस्थ प्यास की इक अधूरी ख्वाहिश! उस डाली खग ढूंढे बसेरा, चैन जहाँ पर हो जरा सा, छाँव प्रीत का तो मिलता हर डाली पर! रैन बसेरा तो रमता, इस डाली भी! उस Continue reading बेचैन खग