सूखती नदी

चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! संग ले चली थी, ये असंख्य बूँदें, जलधार राह के, कई खुद में समेटे, विकराल लहरें, बाह में लपेटे, उत्श्रृंखलता जिसकी, कभी तोड़ती थी मौन, वो खुद, अब मौन सी हुई है… चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! कभी लरजती थी, जिसकी धारें, पुनीत धरा के चरण, जिसने पखारे, खेलती थी, जिनपर ये किरणें, गवाही जिंदगी की, देती थी प्रवाह जिसकी, वो खुद, अब लुप्त सी हुई है….. चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! अस्थियाँ, विसर्जित हुई है जिनमें, इस सभ्यता की नींव, रखी है Continue reading सूखती नदी

संघर्ष से स्वाभिमान तक

शब्द, गान विलुप्त हुए, मौन था अबाधित अव्यक्त, अछूता व्यक्तित्व, दिवस -रात्र संवाद रहित मुखर, चपल वर्चस्व हो गया पूर्णतया पराजित अंतःकरण में अंतर्द्वन्द, विकलता समाहित ।। रंगमंच पर अभिनीत ज्यों हर पल अनुभव दुःख सुख के आए वेष बदल अवलंबन से कुंठा हुई प्रबल अवहेलित, तृषित दृग सदा सजल।। निश्छल मन की पुलक थी कहीं खोई व्यथाओं से शिथिल मन हुआ निर्मोही उल्लास, उमंग की जो सृष्टि संजोई उस पथ से भटक गया बटोही।। प्रतिभा ने आशा का खोल दिया द्वार प्रज्वलित ज्ञान दीप से कल्पना हो उठी साकार सार्थक हो रहे स्वप्न विचार ले रहे आकार साधना में Continue reading संघर्ष से स्वाभिमान तक

मैं तो फकत शून्य था

मैं तो फकत शून्य था सृष्टि के बीज से फूटा था इक नन्हा अंकुर नीले नभ तले लेता था सांस कोई जैसे पंखुड़ी पहली खिली हो बसन्त के पीले आँचल में याद कर तूने ही बोया था बीज इस अंकुर का मैं तो मात्र शून्य था ये तू ही तो था भरे प्राण जिसने इस निष्प्राण में मेरा तो अस्तित्व था नगण्य बनाया क्यों तूने इसे परिपूर्ण कण-कण में सांस तेरी पग-पग पर छाँव तेरी जिस डगर चलूँ पाऊँ तेरा ही प्रतिबिम्ब मैं तो केवल शून्य था रहा सदा इस भ्र्म में जैसे स्वयं को रचा हो मैंने बंद थी Continue reading मैं तो फकत शून्य था

जिम्मेदारी का अहसास

कुछ वर्ष पहले नीम का एक नन्हा पौंधा उगाया था मैंने अपने घर के आँगन में तब वह नन्हे बालक की भांति खेलता था हवा के झोंकों से मतवाली हवा भी सहलाकर उसके कोमल पत्तियों को थी झूमती खिलखिलाकर रिमझिम बरसात की बूंदों से अटखेलियाँ करना उसे भाता था उन बूंदों के कोमल स्पर्श से खिल उठता था, भीग कर उन बूंदों में अबोध बालक की तरह किलकारियाँ मारता मैं उसका बहुत ध्यान रखता था समय पर पानी देना समय पर खाद देना जैसे मेरी दिनचर्या थी उसके मासूम गालों को सहलाकर असीम आनंद अनंत हर्ष की अनुभूति होती थी Continue reading जिम्मेदारी का अहसास

वो कोई और नहीं

वो तूफानी रात मचलती शीत लहर धुंधली चादर लपेटे चेतनाशून्य में डूबा रात का सन्नाटा ख़ामोशी करती पहरेदारी ऐसी संवेदन-शून्य वीरानी रात में चला जा रहा था कोई अपनी डगर जैसे भूल गया हो मंज़िल अपनी फकत किसी परछाई का अहसाह था अकस्मात गुजरा एक वाहन उसी पथ से जिस पथ थी वह सहमी परछाई अनजान चेहरा कोई उतरा उस वाहन से, देख उस परछाई को शायद इरादे भी नेक नहीं लगा करने कुछ इशारे भद्दे, हरकतें अश्लील चेहरा कामातुर भाव लिए परछाई डरी-डरी, सहमी-सी क़दमों की रफ़्तार तेज कर दौड़ी जा रही थी, ढूंढने कोना कोई सुरक्षित कभी चिल्लाती Continue reading वो कोई और नहीं

कल मैं रहूँ ना रहूँ

(यह कविता शिक्षक दिवस की पावन बेला पर एक शिक्षक, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है, की ओर से अपने मासूम शिष्यों को समर्पित) कल मैं रहूँ ना रहूँ मगर रहेंगी वो मधुर यादें, वो सुनहरे पल जो बिताये थे मैंने संग तुम्हारे चाँद सितारों से भी आगे तुमको अभी और जाना है लक्ष्य छुपा हो कहीं भी तुम्हारा हर हाल में उसे पाना है रुकना नहीं, भटकना नहीं तुम यूँ हीं निरंतर पग धरते रहना कल मैं रहूँ ना रहूँ फिसलती है जैसे रेत मुट्ठी से वक्त को ना कभी फिसलने देना ख्वाबों को अपने रखना संजोकर Continue reading कल मैं रहूँ ना रहूँ

फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

२ दिनों का देश प्रेम फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. २६ जनवरी की शाम को बंद कर के जहा रखा था झंडा, उन डब्बो से धूल हटाया जाएगा .. साल में २ दिन ही सही पर वो तिरंगा फिर से बाहर निकाला जाएगा.. जब हर चौक चौराहे पर तिरंगा फेहराया जाएगा फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. बड़-चढ़ कर फेसबुक-व्हाट्सप्प पर पोस्ट लगाया जाएगा.. फिर से एक दिन देश के नाम राष्ट्रगान गया Continue reading फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

एक बेनाम रिश्ता

एक बेनाम रिश्ता : हमारी लाइफ में कुछ ऐसी stories होती है, जिसे हम किसी से कह नहीं पाते, लेकिन उनका हमारी लाइफ में एक impact होता है.. कुछ ऐसे गुमनाम से रिश्ते जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते और ना उनके साथ आगे बड़ सकते है, वही सब कुछ बयां करती कुछ पंक्तिया : ” एक बेनाम रिश्ता “ एक अजनबी अनजाना सा रिश्ता होता है, जिसे हम हर किसी को चंद शब्दों में बता नहीं सकते, हम तो समझते है पर किसी को समझा नहीं सकते, लगता है कौन समझेगा हमारी इन बातो को, रात के अँधेरे में सबसे Continue reading एक बेनाम रिश्ता

मेने वक़्त बदलते देखा है !!

मेने वक़्त बदलते देखा है ! मेने तूफानों को साहिलो पर ठहरते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने दिन के उजालो को, रात के अँधेरे में बदलते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने हर दिल अजीज़ लोगो को भी, एक पलभर में बिछड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. चंद रुपयों के लालच में, अपनों को अपनों से झगड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखे है.. एक सत्ता की कुर्सी के आगे, अच्छे अच्छों का ईमान सड़क पर बिकते हुए देखा Continue reading मेने वक़्त बदलते देखा है !!

विषैली हवा

*विषैली हवा* हर कोई शहर में आकर बस रहा। नित नई समस्याओं से घिर रहा।। बीमार रहते है शहर वाले अक्सर। विषैली हवा का असर दिख रहा।। काट दिये शहरों में सब पेड़ो को। इमारतों में घुट घुट कर पिस रहा।। धूल , धुँआ इस कदर फैला देखो। जिंदगी के दिन आदमी गिन रहा।। गरीबी देखी नही जाती इंसान की। तन ढँकने को वह पैबन्द सिल रहा।। शूल सारे राह के अब कौन उठाता। पुरोहित सब मतलबपरस्त मिल रहा।। कवि राजेश पुरोहित 98,पुरोहित कुटी श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वर्ण पिरामिड

वर्ण पिरामिड रे चन्दा निर्मोही, करता क्यों आंख मिचौली। छिप जा अब तो, किन्ही खूब ठिठौली।।1।। जो बात कह न सकते हैं, हम तुमसे। सोच उसे फिर ये नैना क्यों बरसे।।2।। गा मन मल्हार, मिलन की रुत है आई। मोहे ऋतुराज, मन्द है पुरवाई।।3।। रो मत नादान, छोड़ दे तू सारा अज्ञान। जगत का रहे, धरा यहीं सामान।।4।। तू कर स्वीकार, उसे जो है जग-आधार। व्यर्थ और सारे, तत्व एक वो सार।।5।।

चुप क्यूं हैं सारे?

चुप क्यूं हैं सारे? लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे? जब लुटती है अस्मत अबला की, सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ, बिलखता है नारी सम्मान, तार तार होता है समाज का कोख, अधिकार टंग जाते हैं ताख पर, विस्तृत होती है असमानताएँ… ये सामाजिक विषमताएँ…. बहुप्रचारित बस तब होते हैं ये नारे… वर्ना, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे? जब बेटी चढती हैं बलि दहेज की, बदनाम होते है रिश्तों के कोमल धागे, टूटता है नारी का अभिमान, जार-जार होता है पुरुष का साख, पुरुषत्व लग जाता है दाँव पर, दहेज रुपी ये विसंगतियाँ…. Continue reading चुप क्यूं हैं सारे?

हकीकत

हकीकत अक्सर गरीबों को लड़ते झगड़ते देखा है। रोटी के लिए बच्चों को बिलखते देखा है।। नवयुवकों को बन ठन के संवरते देखा है। नशे में मदमस्त लोगों को बहकते देखा है।। अपने हुनर से लोगों के घर बनते देखा है। उनकी खूबसूरत बगिया को महकते देखा है।। आशिकी में युवाओं को मरते देखा है। माँ बाप को उनके हमने तड़फते देखा है।। फैशन में नई पीढ़ी को तन समेटते देखा है। राजेश हकीकत को ख्वाबों में लपेटते देखा है।। कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर प्रकृति की भी पावन परछाई में खोज रहा हूँ कृति-चिन्ह निरंतर।   किस किसको खोजूँ, किसको पाऊँ क्षीण-शक्ति-स्त्रोत युक्त जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में   मन वीणा तेरे संकेतों से करती साधना का मात्र प्रयास पर खंड़ित तारों में खो जाता हर साध्य स्वर का अटूट विश्वास   कौन गीत मैं किस लय में गाऊँ सरगम के फैले सूनेपन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में     बनने खुद मैं भी तेरी Continue reading मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में