परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर, उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर, बह जाते हों, आँखो से पिघलकर, रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर….. सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर, मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर, कूक जाते हों, कोयल के आस्वर, गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर…… प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर, विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर, रह Continue reading परिवेश

मन की नमी

मन की नमी दूब के कोरों पर, जमी बूँदें शबनमी। सुनहरी धूप ने, चख ली सारी नमी। कतरा-कतरा पीकर मद भरी बूँदें, संग किरणों के, मचाये पुरवा सनसनी। सर्द हवाओं की छुअन से पत्ते मुस्काये, चिड़ियों की हँसी से, कलियाँ हैं खिलीं, गुलों के रुख़सारों पर इंद्रधनुष उतरा, महक से बौरायी, हुईं तितलियाँ मनचली। अंजुरीभर धूप तोड़कर बोतलों में बंद कर लूँ, सुखानी है सीले-सीले, मन की सारी नमी। #श्वेता🍁

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

जीवन नदिया, मन है कश्ती

” जीवन नदिया, मन है कश्ती “ ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! कभी शांत तो कभी चंचल , कभी उजला तो कभी अनमिट अँधेरा-सा ! ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! जीवन की इस नदिया पर , तैरती मानव मन की ये कश्ती , कभी ख़ुशी की लहरों संग इठलाती-मुस्कुराती हुई , शांति और सुकून से बहती , तो कभी दुःख की लहरों से टकराती-डगमगाती हुई , निराशा के गर्त में डूबती ये कश्ती ! दिग्भ्रमित मानव मन की ये कश्ती , न दिशा का है कोई ज्ञान , Continue reading जीवन नदिया, मन है कश्ती

बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा…. न जाने वो कौन सा, जादू था भला, न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला, कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला, आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला। आईना था वही, बस बदला सा था अक्श मेरा… इस दफा, जादू किसी का था चला, दुआ किसी की, कबूल कर गया खुदा, नई राह थी, नया था कोई सिलसिला, नूर लेकर यूँ, अक्श फूल सा खिला। इस दफा आईने में, यूँ बदला सा था अक्श मेरा…. धूंध छँट चुकी, इक शख्स था मिला, नूर-ए-खुदा शख्स के चेहरे पे Continue reading बदला सा अक्श

कुँवर नारायण की एक कविता

प्रिय दोस्त, मैं सबको प्रणाम करता हूँ । मैं विदेशी हूँ और मुझे हिंदी कविता में रुचि है । यह भी कह सकता हूँ कि मैं हिंदी भाषा का एक प्रेमी हूँ । अभी मैं एक कवि का अनुवाद कर रहा हूँ कुँवर नारायण । कभी कभी इनका अनुवाद करना अत्यंत मुश्किल है तो मैं यहाँ आया हूँ क्योंकि मैं आपकी मदद निवेदन करना चाहूँगा । आप कर सकते हैं क्या ? जैसे इस कविता में जो रेखांकित किया गया आप कैसे समझते हैं ? विदेशी होने की बावजूद मैं सब कुछ नहीं समझ सकता हूँ.. हिंदी भाषा अधिक रहस्यात्मक Continue reading कुँवर नारायण की एक कविता

व्यथा वृक्ष की।

क्यो काटते हो मुझे मैं तो जीवन देता हूं स्वयं ना लेकर अपना कुछ भी फल तुमको दे देता हूं।। चोट तुम्हारी कुल्हाड़ी का हर पल सहता रहता हूँ जब तक अंतिम स्वास चलती है मेरी प्राणवायु ही देता रहता हूँ।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं तो हर सुख दुख में काम आता हूं कभी द्वार बन कभी बन खिड़की घर की लाज बचाता हूँ।। पल पल ऐ मनुष्य तू हमको कितने घाव देता है गर्मी के मौसम में शीतल छाँव हम्हीं से लेता है।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं भी तो तुम्हारी तरह इसी धरती माँ की Continue reading व्यथा वृक्ष की।

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात, विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात, पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ, धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… चुपचाप कालिमा घोलती ये रात, स्वप्नातीत, रूपातीत नैनों में ऊँघती सी उथलाती नींद, अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब, मींचती आँखों में तल्खी मन में बेचैनियाँ, बस है इक उम्मीद और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… Continue reading रात और तुम

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल

जलता दिल

राख! सभी हो जाते हैं जलकर यहाँ, दिल ये है कि जला… और उठा न कहीं भी धुँआ! है जलने में क्या? बैरी जग हुआ दिल जला! चित्त चिढा, मन को छला, दिल जला! कहीं आग न कहीं दिया, दिल यूँ ही बस जला! ये धुआँ? दिल में ही घुटता रहा, घुट-घुट दिल जला, बैरी खुद से हुआ, दिल को छला, उठता कैसे फिर धुआँ, दिल के अन्दर ये घुला! राख ही सही! पश्चाताप की भट्ठी पर चढा, बस इक बार ही जला, अंतःकरण खिला…… स्वरूप बदल निखरा, धुआँ सा गगन में उड़ा, पुनर्जन्म लेकर खिला।

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

साहस अभाव

साहस अभाव साहस अभाव में सुजनों के दुष्टों का साहस पलता है हों असुर अधर्मी धरनी पर उनका दुःशासन छलता है आदर्श धर्म में बिंधकर हम क्यों दानवता को झेल रहे ? आतंक व्याप्त कर रक्त पात वे मानवता से खेल रहे धर छद्म रूप भर अहंकार निर्मम निर्दयी किलकता है । साहस अभाव ……………..।। क्यों चीख रहे कर त्राहि माम ? तुम स्वयं नहीं कुछ कर पाये . बन मूक बधिर क्यों सोच रहे ? वह कृष्ण ! पुनः भू पर आये अपमानित होकर बैठे हो क्यों भुज बल नहीं मचलता है ? साहस अभाव ………………..।। जीवित रखनी यदि Continue reading साहस अभाव