मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वर्ण पिरामिड

वर्ण पिरामिड रे चन्दा निर्मोही, करता क्यों आंख मिचौली। छिप जा अब तो, किन्ही खूब ठिठौली।।1।। जो बात कह न सकते हैं, हम तुमसे। सोच उसे फिर ये नैना क्यों बरसे।।2।। गा मन मल्हार, मिलन की रुत है आई। मोहे ऋतुराज, मन्द है पुरवाई।।3।। रो मत नादान, छोड़ दे तू सारा अज्ञान। जगत का रहे, धरा यहीं सामान।।4।। तू कर स्वीकार, उसे जो है जग-आधार। व्यर्थ और सारे, तत्व एक वो सार।।5।।

चुप क्यूं हैं सारे?

चुप क्यूं हैं सारे? लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे? जब लुटती है अस्मत अबला की, सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ, बिलखता है नारी सम्मान, तार तार होता है समाज का कोख, अधिकार टंग जाते हैं ताख पर, विस्तृत होती है असमानताएँ… ये सामाजिक विषमताएँ…. बहुप्रचारित बस तब होते हैं ये नारे… वर्ना, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे? जब बेटी चढती हैं बलि दहेज की, बदनाम होते है रिश्तों के कोमल धागे, टूटता है नारी का अभिमान, जार-जार होता है पुरुष का साख, पुरुषत्व लग जाता है दाँव पर, दहेज रुपी ये विसंगतियाँ…. Continue reading चुप क्यूं हैं सारे?

हकीकत

हकीकत अक्सर गरीबों को लड़ते झगड़ते देखा है। रोटी के लिए बच्चों को बिलखते देखा है।। नवयुवकों को बन ठन के संवरते देखा है। नशे में मदमस्त लोगों को बहकते देखा है।। अपने हुनर से लोगों के घर बनते देखा है। उनकी खूबसूरत बगिया को महकते देखा है।। आशिकी में युवाओं को मरते देखा है। माँ बाप को उनके हमने तड़फते देखा है।। फैशन में नई पीढ़ी को तन समेटते देखा है। राजेश हकीकत को ख्वाबों में लपेटते देखा है।। कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर प्रकृति की भी पावन परछाई में खोज रहा हूँ कृति-चिन्ह निरंतर।   किस किसको खोजूँ, किसको पाऊँ क्षीण-शक्ति-स्त्रोत युक्त जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में   मन वीणा तेरे संकेतों से करती साधना का मात्र प्रयास पर खंड़ित तारों में खो जाता हर साध्य स्वर का अटूट विश्वास   कौन गीत मैं किस लय में गाऊँ सरगम के फैले सूनेपन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में     बनने खुद मैं भी तेरी Continue reading मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में

बिखरी साँसें कहती जाती

बिखरी साँसें कहती जाती हर पल को बस खुश रहने दो। अधरों को मुस्कानों से कुछ बिखरे मोती चुन लेने दो।   पीड़ा के पलने से उठकर कुछ कदम जगत में चलने दो गिरकर उठने का साहस ले जीने का सार समझने दो।   डर से डर जाने के भय से मुक्त सभी को हो जाने दो बार बार जीवन में आती मँड़राती मौत हटाने दो।   उसमें साहस की कुछ घड़ियाँ बस पल दो पल तो चलने दो जग में सिर भी ऊँचा करके मानव-सा बन कुछ रहने दो।   उसके अंदर विनम्र भाव खुद शांत चित्त से आ Continue reading बिखरी साँसें कहती जाती

मानव कुल कितना जीता है

मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। मरने के पहले किश्तों में मरते मरते ही जीता है। जन्म समय हर शिशु रोता है फिर हँसता है, मुस्काता है आगे चिन्ता लिये हुए वह हँसता कम, रोता ज्यादा है। मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। मानव सबको ठुकराता है विविध रूप से कलपाता है खुद भी मुरझाया रहता है मुस्कानों से कतराता है। मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। कोलाहल से डर जाता है वीरानों में जा बसता है त्याग सपन जब वह उठता है आगे बढ़ने Continue reading मानव कुल कितना जीता है

गिरने का देखो जमाना हि आया।

गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । समझता था ऊपर चढे वो है गिरते मगर जो है नीचे वही गिर रहे हैं । क्या बात है सच का साथी रहा जो वही घिर रहा है सही घिर रहा है । गिराने की ख्वाहिश रही दिल में जिसके मुझे तो गिराने में खुद गिर रहे है । गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । कहीं पर चढ़ा भाव आलू के देखो कहीं प्याज उछली नभ छू रही है । मगर यह भी देखा भाव भारी Continue reading गिरने का देखो जमाना हि आया।

शब्द ताकत है शब्द दुआ है

*शब्द ताकत है शब्द दुआ है *शब्द घातक है शब्द दवा है *शब्द वेद है शब्द कुरान है *शब्द बाइबिल शब्द पुरान है शब्द अल्लाह शब्द भगवान है शब्द उपदेश शब्द गीत गान है शब्द मे समाहित आस्था महान है शब्द मंत्र शब्द फरमान है शब्द पूजा है शब्द अजान है शब्द बडाई है शब्द सम्मान है शब्द गीत है शब्द तान है शब्द ही अंधे का भान है शब्द अधिगम की जान है शब्द से होता मानव की पहचान है सबको इसका संज्ञान है। शब्द शक्ति है शब्द ही ज्ञान है शब्द कवि लेखक का प्रान है। शब्द से Continue reading शब्द ताकत है शब्द दुआ है

अनछुए सपने

अनछुए सपने मैं भी चाहती हूँ देखना कैसे मुस्कुराता है चाँद मधुर चांदनी रात में, और कैसे खिलखिलाते हैं तारे जब करते है स्नान आकाशगंगा में मैं भी चाहती हूँ देखना उस नीले आसमान को जहाँ हर कोई उड़ना चाहता है, और चूमना चाहती हूँ उसके आसमानी कपोलों को मैं भी चाहती हूँ देखना सागर की उन उतावली लहरों को जो चूमना चाहते हैं हिमगिर को और करना चाहते हैं विश्राम उसकी चांदनी चादर की शीतल छाँव तले मैं भी चाहतीं हूँ देखना कि कितनी आकर्षक दिखती है धरा बसंत की पीली चुनरिया ओढ़े और कितनी मनोहर होगा वह दृश्य Continue reading अनछुए सपने

परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर, उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर, बह जाते हों, आँखो से पिघलकर, रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर….. सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर, मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर, कूक जाते हों, कोयल के आस्वर, गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर…… प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर, विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर, रह Continue reading परिवेश

मन की नमी

मन की नमी दूब के कोरों पर, जमी बूँदें शबनमी। सुनहरी धूप ने, चख ली सारी नमी। कतरा-कतरा पीकर मद भरी बूँदें, संग किरणों के, मचाये पुरवा सनसनी। सर्द हवाओं की छुअन से पत्ते मुस्काये, चिड़ियों की हँसी से, कलियाँ हैं खिलीं, गुलों के रुख़सारों पर इंद्रधनुष उतरा, महक से बौरायी, हुईं तितलियाँ मनचली। अंजुरीभर धूप तोड़कर बोतलों में बंद कर लूँ, सुखानी है सीले-सीले, मन की सारी नमी। #श्वेता🍁

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

जीवन नदिया, मन है कश्ती

” जीवन नदिया, मन है कश्ती “ ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! कभी शांत तो कभी चंचल , कभी उजला तो कभी अनमिट अँधेरा-सा ! ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! जीवन की इस नदिया पर , तैरती मानव मन की ये कश्ती , कभी ख़ुशी की लहरों संग इठलाती-मुस्कुराती हुई , शांति और सुकून से बहती , तो कभी दुःख की लहरों से टकराती-डगमगाती हुई , निराशा के गर्त में डूबती ये कश्ती ! दिग्भ्रमित मानव मन की ये कश्ती , न दिशा का है कोई ज्ञान , Continue reading जीवन नदिया, मन है कश्ती