जीवन हाला

जीवन हाला यों ही एक प्रयास:- टुटे हुवे प्यालो में जीवन- हाला बेबस पीने कोे बैठ गया मधुशाला बुदं बुंद तड़पाये पीने की ज्वाला अद्दाओं से भरमाये साकीवाला किस डगर जाऊं,भरूं मद प्याला बंद होने आई जीवन- मधुशाला कोई जतन बतायें,कोई मतवाला रिस रहा मधु-रस टुटा है प्याला राम नाम का रस पीले मतवाला दर दर क्यों भटके लेकर ज्वाला   Advertisements

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माँ

माँ माँ शब्द है जिन दिलो में यहाँ, पार हूॅआ है जग जूलो में यहाँ। दुःख की परछाईयों में जो घिरा , छलकते थे दर्द आंखो में वहाँ। माफ़ किया है उसी माँ ने सदा , हम सभी गुनाहगारो है यहाँ। बरसती उस ह्रदय से दुआ सभी , कामयाबी आज ढेरो है यहाँ। नींद लेते सुख सपने देखते, जागती वो रात हजारो है यहाँ। साथ में वो रोई थी हमारे कभी , राह में खाई ठोकरों में यहाँ। बात से उनकी कहानी निकले, फिरते थे फूल तारों में यहाँ। देखती थी मूरते मंदिर में , फिरभी माँ को हूँ प्यारो Continue reading माँ

वक्त

वक्त वक्त से सीखा की वक्त किसी के लिये रूकता नहीं वक्त ने ही जताया, वक्त सब का एक सा चलता नहीं बदलते वक्त के साथ जो बदल गये,उन्हें परेशानी नहीं जो बदल नहीं पाये,उनकी निशानी वक्त ने छोड़ी नहीं वक्त से पहचान,वक्त के आगे किसी की चली नहीं जब वक्त आये, पतन का कारण,अभिमानी जाने नहीं अहम अपने ग़रूर का,वहम से असर को माने नहीं वक्त बनाता,वक्त ही मिटाता,यह बात अनजानी नहीं सजन

नवगीत

नवगीत अनकहे, अनसुलझे जज्बातों से मन मचलता है जैसे रोता बच्चा खिलौना पाने चाहे सम्भाल पाये या नहीं ढंग से ……! उमंग हैं अपनी जाने कैसे अनजानी पहचान से जैसे होते सपने, जब तक उम्मीद दिल में खूब ललचाता है जज्बातों के खेल में मन गिरगिट सा रंग बदलता है जैसे रोता बच्चा पाने को हर चीज नासमझे कोई बंधन बेफिक्र दिल से रोता न मिलने पर । या फिर मिलने पर खुब खेलता कुछ वक्त और फिर तोड़कर न समझ सका देख देख कर पर जोड़ने की कोशिश, हारकर झट पट बहुत पलटता है खेल खेल में नये जज्बातों Continue reading नवगीत

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ माँ बेटो को जन्म देकर पछताती है। लड़की रात को घर से बाहर निकलने से घबराती है, और निर्भया की आत्मा आज तक लज्जाति है।। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ राजपद की आस रोज कोई दंगा करवाती है। भारत माँ जहाँ रोज आसूं बहाती है, शहीद स्मारक की आग जहां शर्मिंदगी से बुझ जाती है। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी।। ***नि-3***

बेचैन खग

बेचैन खग तट के तीरे खग ये प्यासा, प्रीत की नीर का जरा सा, नीर प्रीत का तो मिलता दोनो तट ही! कलकल सा वो बहता, इस तट भी! उस तट भी! पर उभरती कैसी ये प्यास, सिमटती हर क्षण ये आश, यह कैसी है विडम्बना? या शायद है यह इक अमिट पिपास….? या है अचेतन मन के चेतना की इक अधूरी यात्रा, या भीगे तन की अंतस्थ प्यास की इक अधूरी ख्वाहिश! उस डाली खग ढूंढे बसेरा, चैन जहाँ पर हो जरा सा, छाँव प्रीत का तो मिलता हर डाली पर! रैन बसेरा तो रमता, इस डाली भी! उस Continue reading बेचैन खग

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी दिखने में नायाब! मगर किसी भी क्षण ढहने को बेताब! बेमिसाल, मगर टूटती हुई ख्वाहिशों की जिन्दगी! अकस्मात् ही, रुक से गए जैसे जिन्दगी के रास्ते, मोहलत भी न मिली हो ख्वाहिशों के परिंदों को ऊड़ने की जैसे! रूठ जो गई थी खुद उसकी ही सांसे उससे! मोह के धागे सब टूट चुके थे उसके…. जैसे सरकती हुई बर्फ की पहाड़ी ढह गई हो कोई, पत्तियों के कोर पर शबनमी बूंदों की सूखती सी लड़ी, रेगिस्तान में बनता बिगरता रेत का टीला कोई! कभी थे कितने प्रभावशाली, जीवन्त, गतिशीलताओं से भरे ये जिन्दगी के रास्ते, निर्बाध Continue reading टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ मैंने जग देखा है जगजीवन देखा है? मैंने तो बस महलों के अंदर देखा है सबकी आँखों अश्क नहीं शबनम देखा है। परदों के पीछे परदों का मंजर देखा है मधुकलशों में यौवन का दमखम देखा है। कैसे कह दूँ मैंने सुख का दुख का आलिंगन देखा है? चमन फूल कलियों की बस खुश्बू समझी है काँटों बिंधी तितली की तड़प नहीं देखी है। चहकती चिड़िया की भी गुफ्तगू समझी है हर पिजरे में पलती कसक नहीं देखी है। कैसे कह दूँ मैंने कोलाहल में सूनापन देखा है? मैंने बस पायल की थिरकन देखी है थककर थमते Continue reading कैसे कह दूँ

वक्त के सिमटते दायरे

वक्त के सिमटते दायरे हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? अंजान सा ये मुसाफिर है कोई, फिर भी ईशारों से अपनी ओर बुलाए रे, अजीब सा आकर्षण है आँखो में उसकी, बहके से मेरे कदम उस ओर खीचा जाए रे, भींचकर सबको बाहों में अपनी, रंगीन सी बड़ी दिलकश सपने ये दिखाए रे! हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? छीनकर मुझसे मेरा ही बचपन, मेरी मासूमियत दूर मुझसे लिए जाए रे, अनमने से लड़कपन के वो बेपरवाह पल, मेरे दामन Continue reading वक्त के सिमटते दायरे

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो लहरों का कंपन स्पंदन भी सागर में जा मिलने दो।   हो प्रभात भी सुखकर ऐसा कलरव करते खगगण जैसा और किरण की मादकता भी ओस कणों में छा जाने दो।   निर्जन वन में कूक रहे जो उनकी गुंजन मिल जाने दो मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो   ओम् शब्द की प्रतिध्वनि प्रखर करे शब्द का उद्घोष अमर और गीत जब जब गूँजे तो जग जीवन मुखरित होने दो।   माटी के नश्वर पुतलों को मानवता से Continue reading मेरे गीतों के आँचल में

सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं। इसको सुनने जो कतराते उनको होती है लाज नहीं।   इस कारण जब ठोकर खायी इस पीड़ा ने तब उफ् न किया पथ के पत्थर चूम चूमकर घायल पथ का श्रंगार किया।   कहने को थी आगे मंजिल पर रुकने का साहस न मिला। नम पलकों से आँखों ने भी हर आँसू का संहार किया।   अधरों था अंकुश पीड़ा का खोल सका ना मन राज कहीं। सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं।   काँटे हर पीड़ा के चुनके स्वप्न नीड़ Continue reading सन्नाटे में छिप जाती है

संसार

संसार अंधकार की स्वीकृति तेजोमय प्रकाश है भयावहता की विकृति सुन्दरता की अनुकृति है एक दूजे में गुथा हुआ सुख –दुःख का भान है जन्म की किलकारियों में मृत्यु की थपकियाँ है शून्यता में पूर्णता है पूर्णता में शून्यता है असुरत्व का उत्पात भी देवत्व का साम्राज्य भी विराटता की अवधारणा भी लघुता में प्रचंडता भी कर्म की प्रधानता भी दंड का विधान भी शुभता वरदान भी संभावनाए अपार है अद्भुत तेरा संसार है

आँसू

आँसू पलती नयनों में तरल तरल करती अठखेली चपल चपल दुःख संचित गगरी गरल गरल ले साथ चली वह मचल मचल छलकाती, सागर की बेटी नयनों में …… है तृप्त ह्रदय जो दहर दहर हो थिरक रही ज्यों लहर लहर अवसाद मिटाती प्रहर प्रहर दुःख के भँवर में ठहर ठहर लहराती ,सागर की बेटी नयनों में …….. बहती है निर्झर सी कल कल दुःख की तान छेडती पल पल बंद पलकों के निज भार से छल छल पीड़ा के अंबार से विकल उफनाती,, सागर की बेटी नयनो में……… रुदन होठों का सिसक सिसक   व्यथित मन की पीड़ा ले लपक Continue reading आँसू

जिन्दगी

जिन्दगी  कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी। जानी पहचानी दुनिया में नित नव रूप लिये मिलती है जिन्दगी।   बचपन में अनाथ-सी बेबस जवानी में ठगी मिलती है जिन्दगी। बूड़ी साँसों की खाई में लहूलुहान हुई दिखती है जिन्दगी।   चुभती हैं बेरहम साँस तो बड़ी छटपटाती मिलती है जिन्दगी। लड़खड़ाती, डगमगाती-सी बैसाखी थामे चलती है जिन्दगी।   समय सहम जाता है जब भी अंतिम साँस को तरसती है जिन्दगी कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।   मीठी] तीखी कभी कसैली जहर उगलती लगती है जिन्दगी। कभी गरीबी में शर्माती कभी गरीबों पर अकड़ती Continue reading जिन्दगी

औरत

औरत औरत ने सपना देखा चिड़िया उसे पंख दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह चिड़िया बन खुले आसमान में ऊँची उडान भरने लगी औरत ने सपना देखा नदियाँ उसे उफान दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह नदी बन तीव्र वेग से बहने लगी औरत ने सपना देखा – पर्वत उसे दृढ़ता दे गुम हो गए न जाने कहाँ और वह पर्वत बन धरती पर अडिग हो गई औरत ने सपना देखा – वृक्ष उसे अपनी जड़े दे न जाने कहाँ गुम हो गए और वह वृक्ष बन हर मौसम में तन कर खड़ी हो Continue reading औरत