यूपी दुर्घटना विशेष

यूपी दुर्घटना विशेष यूपी दुर्घटना पर (जहाँ 30 मासूम बच्चों ने आक्सीजन के अभाव में दम तोड़ दिया).. . बच्चों के जीवन मृत्यु पर थोड़ा-सा तो गौर करते पैसे ही लेने थे जब तो काम कोई तुम और करते . ये मत सोंचो तुमने केवल आक्सीजन ही बंद किया बल्कि तुमने 30 मासूम धड़कनों को बंद किया . आक्सीजन तो तुम्हारी थी,रक्खो तुम ही पीयो तुम मरने वाले कौन सगे थे? खूब मस्ती में जीयो तुम . माना कि घटनास्थल पर फूटा बम नही है लेकिन किसी आतंकी हमला से यह कम नही है . तुमने मानवता को बिलकुल शर्मसार Continue reading यूपी दुर्घटना विशेष

कटते जंगल – उजडते वन

कटते वन ….उजड़ते जंगल हो रहा, कुदरत संग खिलवाड़ ! माँ धरती की छाती पर होते वार !….. देते छाया और श्र्वास सभी को ये वृक्ष तो फिर भी सहेते वार ……. मीट्टी बन जायेगी रण समान , होंगे वन प्राणी सब बेहाल …… सृष्टि पुकारे होकर त्राहिमाम, ये कोन्क्रिट के जंगलों से हो रहा.. मनुष्य जीवन बेजार ….. लायेंगे कहाँ से जडीबूटीयां जीने की, कुठाराघात है ये तो, मूल-जीवन पर ही अपार….. विशाल धरा ये नहीं सिफँ मनुष्यो की , पेड-पौधे- जीव -जंतु प्राणी का भी अधिकार….. समा रख्खा है वृक्षो ने दिल में ओकसीजन, प्यार से ये सींचते Continue reading कटते जंगल – उजडते वन

कृष्णा फिर चले आओ

कृष्णा फिर चले आओ, गीता का ज्ञान सुनाने। हज़ारो अर्जुन बेबस है, किसी एक कि नैय्या पार लगाने। कृष्णा फिर चले आओ, गीता का ज्ञान सुनाने।। क्रोध, अहंकार रूपी कौरव भरे पड़े है, द्रोपती की अस्मिता खतरे में है, पांडव फिर लाचार खड़े है। जीवन के धर्म युद्ध मे मार्ग दिखाने, कृष्णा फिर चले आओ, गीता का ज्ञान सुनाने।। सिहांसन पर धृतराष्ट्र का राज है, भीष्म अपनी ही सौगंध के दास है। अधर्मियों को सबक सिखाने, फिर से इस महाभारत का शंखनाद करने, कृष्णा फिर चले आओ, गीता का ज्ञान सुनाने।। ©नितिन

कलपता सागर

हैं सब, बस उफनती सी उन लहरों के दीवाने, पर, कलपते सागर के हृदय की व्यथा शायद कोई ना जाने! पल-पल विलखती है वो … सर पटक-पटक कर तट पर, शायद कहती है वो…. अपने मन की पीड़ा बार-बार रो रो कर, लहर नहीं है ये…. है ये अनवरत बहते आँसू के सैलाब, विवश सा है ये है फिर किन अनुबंधों में बंधकर…. कोई पीड़ दबी है शायद इसकी मन के अन्दर, शांत गंभीर सा ये दिखता है फिर क्युँ, मन उसका ही जाने? बोझ हो चुके संबंधों के अनुबंध है ये शायद! धोए कितने ही कलेश इसने, सारा का Continue reading कलपता सागर

नवव्याहिता

रिवाजों में घिरी, नव व्याहिता की बेसब्र सी वो घड़ी! उत्सुकता भड़ी, चहलकदमी करती बेसब्र सी वो परी! नव ड्योड़ी पर, उत्सुक सा वो हृदय! मानो ढूंढ़ती हो आँखें, जीवन का कोई आशय! प्रश्न कई अनुत्तरित, मन में कितने ही संशय! थोड़ी सी घबड़ाहट, थोड़ा सा भय! दुविधा भड़ी, नजरों से कुछ टटोलती बेसब्र सी वो परी! कैसी है ये दीवारें, है कैसा यह निलय? कैसे जीत पाऊँगी, यहाँ इन अंजानों के हृदय? अंजानी सी ये नगरी, जहाँ पाना है प्रश्रय! क्या बींध पाऊँगी, मैं साजन का हिय? दहलीज खड़ी,  मन ही मन सोचती बेसब्र सी वो परी! छूटे स्नेह Continue reading नवव्याहिता

स्वमुल्यांकण

सब कुछ तो है यहाँ, मेरा नहीं कुछ भी मगर! ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर, बंद थी हथेलियों में कई चाहतें मगर! घुटन भरे इस माहौल में ऊँगलियां खुलती गईं, मरती गईं चाहतें, कुंठाएं जन्म लेती रहीं! यहाँ पलते रहे हम इक बिखरते समाज में? कुलीन संस्कारों के घोर अभाव में, मद, लोभ, काम, द्वेष, तृष्णा के फैलाव में, मुल्य खोते रहे हम, स्वमुल्यांकण के अभाव में! जाना है वापस हमें ऊँगलियों को खोलकर, संस्कारों की बस इक छाप छोड़कर, ये हथेलियाँ मेरी बस यूँ खुली रह जाएंगी, कहता हूँ मैं मेरा जिसे, वो भी न साथ Continue reading स्वमुल्यांकण

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। जो उलझे वीणा तारों में गुमसुम गुमसुम सिसक रहे हों जो आँसू के अंदर छिपकर अपनी कुछ पहचान रखे हों इन आँसू के दुखमय गीतों को कुछ अपनी पलकों में रचने दो। जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। ममता की प्यारी गोदी में जो जो मेरे अश्क बहे हों चूम चूम गीले गालों को माँ के आँसू उमड़ पड़े हों उस आँचल के कुछ आँसू मोती मेरे इन Continue reading उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

अनुरोध

अनुरोध मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. कूउउ-कूउउ करती तेरी मिश्री सी बोली, हवाओं में कंपण भरती जैसे स्वर की टोली, प्रकृति में प्रेमर॔ग घोलती जैसे ये रंगोली, मन में हूक उठाती कूउउ-कूउउ की ये आरोहित बोली! मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. सीखा है पंछी ने कलरव करना तुमसे ही, पनघट पे गाती रमणी के बोलों में स्वर तेरी ही, कू कू की ये बोली प्रथम रश्मि है गाती, स्वर लहरी में डुबोती कूउउ-कूउउ की ये विस्मित बोली! मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. निष्प्राणों मे जीवन भरती है तेरी Continue reading अनुरोध

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

जंग लगी मेरी वीणा को

 जंग लगी मेरी वीणा को  सूखी डाली हरियाने को तुम आँसू मेरे बहने दो जंग लगी मेरी वीणा को अपनी धुन में बजने दो।   फूल नहीं तो शूल समझकर दामन में  अपने उलझा लो प्रतिकूल लगे बंधन फिर भी तुम मुक्त न मुझको होने दो।   बनकर मैं दीपक की बाती जलता हूँ तो जल जाने दो धुआँ बने मँडराते मन को काजल-सा ही बन जाने दो।   हर आँधी  में  पाल बिंधाकर तुम मुझको  आहत  होने दो जीवन-जल का  कीच छिपाने तुम कमलरूप बस बन जावो।   कुंठाओं के  नीड़  बनाकर बस उसमें मुझको पलने दो टूटे बिखरे  Continue reading जंग लगी मेरी वीणा को

मेरा जीवन पूरा तूने

मेरा जीवन पूरा तूने मेरे पुण्य कर्म को तूने पापों की श्रेणी में रखकर और मधुरवाणी को मेरी कटुता का ही भेद बताकर मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला अब साँसें ही मचल रही हैं तज पंखों को उड़ जाने को और नीड़ में बैठी श्रद्वा बस व्याकुल है कुछ पाने को पर तूने श्रद्वा सुमनों को भक्ति विमुख ही कर डाला मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला तन ही मेरा शेष बचा है ज्यों इक सीपी रेत पड़ी हो और लहर के आते-जाते लुढ़क लुढ़ककर टूट पड़ी हो तूने तो जीवन आशा को Continue reading मेरा जीवन पूरा तूने

सूनी सूनी साँसों के सुर में

सूनी सूनी साँसों के सुर में सूनी सूनी  साँसों के सुर में ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे। कभी कहीं  ये आवाज थमेगी अब जग में ना आँसू बरसेंगे।   ये साँसें  हैं  दीप  सरीखी इक जलती है, इक बुझती है धुँआ बाती-सी जीवन ज्योति जलती     है,  ना  बुझती है।   दिव्य ज्योति जब आँखों में हो तो आँसू   मोती  से   ही  चमकेंगे सूनी  सूनी   साँसों  के  सुर में ये   आँसू  कब  तक   थिरकेंगे।   तरस रहे हैं बूँद बूँद को पनघट पनघट  खाली है साँसों का भंडार  भरा है जीवन  गागर  खाली है।   दरक उठी जब माटी की गागर हर Continue reading सूनी सूनी साँसों के सुर में

उम्र की दोपहरी

उम्र की दोपहरी उम्र की दोपहरी, अब छूने लगी हलके से तन को… सुरमई सांझ सा धुँधलाता हुआ मंजर, तन को सहलाता हुआ ये समय का खंजर, पल पल उतरता हुआ ये यौवन का ज्वर, दबे कदमों यहीं कहीं, ऊम्र हौले से रही है गुजर। पड़ने लगी चेहरों पर वक्त की सिलवटें, धूप सी सुनहरी, होने लगी ये काली सी लटें, वक्त यूँ ही लेता रहा अनथक करवटें, हाथ मलती रह गई हैं,  जाने कितनी ही हसरतें। याद आने लगी, कई भूली-बिसरी बातें, वक्त बेवक्त सताती हैं, गुजरी सी कई लम्हातें, ढलते हुए पलों में कटती नहीं हैं रातें, ये Continue reading उम्र की दोपहरी

श्रापमुक्त

श्रापमुक्त कुछ बूँदे! … जाने क्या जादू कर गई थी? लहलहा उठी थी खुशी से फिर वो सूखी सी डाली…. झेल रहा था वो तन श्रापित सा जीवन, अंग-अंग टूट कर बिखरे थे सूखी टहनी में ढलकर, तन से अपनों का भी छूटा था ऐतबार, हर तरफ थी टूटी सी डाली और सूखे पत्तों का अंबार.. कांतिहीन आँखों में यौवन थी मुरझाई, एकांत सा खड़ा अकेला दूर तक थी इक तन्हाई, मुँह फेरकर दूर जा चुकी थी हरियाली, अब दामन में थे बस सूखी कलियों का टूटता ऐतबार… कुछ बूँदे कहीं से ओस बन कर आई, सूखी सी वो डाली Continue reading श्रापमुक्त

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

जिन्दगी चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये गरीब की झोपड़ी में झाँक के देखा जाये यहीं पे ईश्वर और उसकी आस्था बसती है चलो, गरीब के आँसू तैर के देखा जाये।   कल ही रात में बड़ी जोर की बारिश हुई थी झोपड़ी ढह गई होगी जाके देखा जाये मुआवजा माँगती वहाँ कई लाश तो होंगी उनकी मुस्कराहट को पास से देखा जाये।   चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये इक चमचमाती कार में चल के देखा जाये बहुत सुखद लगता है गरीब का दर्द देखना चलो, भूखे बच्चे को तड़पते देखा जाये।   बहुत ऊब Continue reading चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये