जिंदगी तो है

जिंदगी तो है ज़िंदगी तो है पर यहाँ साथ में ही ये गम क्यो है , हरपल यहाँ खुश,तो आँख उसकी नम क्यों है। हार जाता है अक्सर यहाँ सच रहेके तन्हा यूँ, जूठ के ही पाँव में इस तरहा संग दम क्यों है। जिसने भी यूँ कभी जो है निभाई ता-उम्र वफ़ा, और उससे ही रहेता दूर उसका सनम क्यों है। भूल जाते है अगर वो ही हमसे दूर जा कर, तो, यहाँ गमे -इंतज़ार में ही खड़े हम क्यों है। सोच तो वो भी कुछ अलग रहा है हम से, दिल फिर उसी शख्स का हूँआ हमदम क्यों Continue reading जिंदगी तो है

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उत्कंठा और एकाकीपन

उत्कंठा और एकाकीपन दिशाहीन सी बेतरतीब जीवन की आपाधापी में, तड़प उठता मन की उत्कंठा का ये पंछी, कल्पना के पंख पसारे कभी सोचता छू लूँ ये आकाश, विवश हो उठती मन की खोई सी रचनात्मकता, दिशाहीन गतिशीलताओं से विलग ढूंढता तब ये मन, चंद पलों की नीरवता और पर्वत सा एकाकीपन… जीवन खोई सी आपधापी के अंतहीन पलों में, क्षण नीरव के तलाशता उत्कंठा का ये पंछी, घुँट-घुँट जीता, पल-पल ढूंढता अपना खोया आकाश, मन की कँवल पर भ्रमर सी डोलती सृजनशीलता, तब अपूर्ण रचना का अधूरा ऋँगार लिए ढूंढता ये मन, थोड़ी सी भावुकता और गहरा सा एकाकीपन….. Continue reading उत्कंठा और एकाकीपन

गांधी तेरे देश को

गांधी तेरे देश को ग़ांधी तेरे देश को कोडियो के मोल बिकते देखा है, सत्यपथ का सबब भुलाकर झूठ के लिये सत्याग्रह करते देखा है। भुला ये भगतसिंह और आजाद की कुर्बानी, आज एक-एक को मैंने गुलामी की नींव रखते देखा है।।1।। ठिठुरती औलाद को जो अपनी कम्बल ओढती है, बाजार में उसी माँ को नंगा करते देखा है। खून के रिश्तों की रासलीला भी खूब देखी मैंने, भाई को भाई के खून का प्यासा देखा है।।2।। समाज की सतायी औरत को तिल-तिल कर मरना पड़ता है, बलात्कारियो को इज़्ज़त की जिंदगी जीते देखा है।। खूबसूरती पर ग़ज़ल पढ़ते शायरों Continue reading गांधी तेरे देश को

पर्वत का दुःख

पर्वत का दुःख सोचों जरा कैसा हादसा हुआ होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत बना होगा जड़ ज़मीन पर शिखर आसमान पर कितना बँटा–बँटा किसी का न हो सका होगा सोचों जरा कितना हैरान हुआ होगा उसके सीने से दर्द का सोता फूट पड़ा होगा कहीं नदियाँ कहीं झरने बन कर आसुओं की धार न जाने कितनी घाटियों में गिरा होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत हुआ होगा सोचों जरा कितना फूट फूट कर रोया होगा एक ही वक्त में कहीं ठिठुरता कहीं सुलगता कहीं चटकता कहीं खिसकता कितना परेशान हुआ होगा माटी यूँ ही नहीँ पर्वत बना होगा सोचों Continue reading पर्वत का दुःख

ईश्वर और शैतान

ईश्वर और शैतान मै अपूज्य तमाधिपति मेरे अधीन अन्धकार का राज्य मेरा असुरत्व काम ,क्रोध ,लोभ , मद ,मोह में समाहित तुमने ही अपनी भावनाओं  से किया हैं सिंचित फलता ,आकर्षण में बांधता कपट से छलता बहुरूपिये बन छुपा लेता अपने सींग , नुकीले दांत विशालकाय देह रक्तरंजित पंजे दबाता रहता सदा आत्मा की आवाज़ रक्तबीज सा कायम रहता मेरा वजूद हाँ ,तुम्हीं ने तो अमरता का पान कराया खड़ा हूँ तुम्हारे ईश्वर के  समकक्ष ईश्वर हैं तो शैतान हैं शैतान हैं तो ईश्वर हैं कि पाप की गहराइयों  से पुण्य का पहाड़ हैं प्रकाश रहित योजना ही अंधकार की Continue reading ईश्वर और शैतान

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार वरना तेरी वीणा पर मेरा क्या अधिकार।   मौन कंठ है, मौन अश्रू हैं गुमसुम है सब सूनापन भी गीत अधूरा, बोल अछूता बुझा-बुझा-सा है तन मन भी।   मधु की बूँदें बनकर जब बरसें अश्रू अपार अधरों पर तब खिलता है शब्दों का श्रंगार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार   तूफानों में चलने आतुर बोल गीत के मचला करते लहरों से भी टकराने की अर्थ गीत में उछला करते।   नैया दुख की हो जिसकी हो पीड़ा पतवार सुन सकता Continue reading गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

कहानियाँ

कहानियाँ जीवन के विविध जज्बातों से जन्म लेती हैं कहानियाँ। कहानियाँ लिखी नहीं जाती है यहाँ, बन जाती है खुद ही ये कहानियाँ, हम ढ़ूंढ़ते हैं बस अपने आप को इनमे यहाँ, यही तो है तमाम जिंदगी की कहानियाँ। किरदार ही तो हैं बस हम इन कहानियों के, रंग अलग-अलग से हैं सब किरदारों के, कोई तोड़ता तो कोई बनाता है घर किसी के, नायक या खलनायक बनते हम ही जिन्दगी के। भावनाओं के विविध रूप रंग में ये सजे, संबंधों के कच्चे रेशमी डोर में उलझे, पल मे हसाते तो पल मे आँसुओं मे डुबोते, मिलन और जुदाई तो Continue reading कहानियाँ

जीवन की पोथी

जीवन की पोथी लिखते है हर दिन हम एक-एक पन्ना जिंदगी का, कुछ न कुछ हर रोज,  एक नई कलम हाथों में ले, अपने कर्मों की गाथा से, भरते हैं जीवन की पोथी, ये पन्ने इबारत जीवन की, कुछ खट्टी कुछ मीठी। ये पन्ने सामान्य नही हैं,जीवन की परछाई है ये तेरी, थोड़ा बहुत ही सही, झलक इसमे व्यक्तित्व की तेरी, कर्मों का लेखा जोखा इसमे, भावुकता इसमें है तेरी, ये पन्ने कल जब पढ़े जाएंगे, पहचान बनेगी ये तेरी। हश्र क्या होगा इन पन्नों का, रह रह सोचता प्राणी! क्या इन पन्नों में छपेगी, मेरे सार्थकता की कहानी? पोथी Continue reading जीवन की पोथी

चुप्पी

चुप्पी चुप वह है जो सबकुछ जानता – चुप वह भी जो कुछ नहीं जानता कुछ ऐसे भी -सबकुछ जानने का वहम पालते है- वे कभी चुप नहीं रहते कुछ वे है जो चुप्पी को लबादा की तरह ओढ़ते अजीब सी दुविधा में रहते न बोल सकते न चुप रह सकते कसमसाहट में जीते बेबसी में मर जाते किन्तु उनकी चुप्पी व्यर्थ नहीं जाती चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती आँखों से हाथ के इशारों से पाँव की गतियों से सम्पूर्ण शरीर से गुजरती एक से दूजे में संवहित हो कलम/तुलिका/मुद्राओ से प्रदर्शित होती रहती सृजित कलाएँ बहुआयामी Continue reading चुप्पी

उभरते जख्म

उभरते जख्म शब्दों के सैलाब उमरते हैं अब कलम की नींव से….. जख्मों को कुरेदते है ये शब्दों के सैलाब कलम की नोक से….. अंजान राहों पे शब्दों ने बिखेरे थे ख्वाबों को, हसरतों को पिरोया था इस मन ने शब्दों की सिलवटों से, एहसास सिल चुके थे शब्दों की बुनावट से, शब्दों को तब सहलाया था हमने कलम की नोक से। ठोकर कहीं तभी लगी इक पत्थर की नोक से, करवटें बदल ली उस एहसास ने शब्दो की चिलमनों से, जज्बात बिखर चुके थे शब्दों की बुनावट से, कुचले गए तब मायने शब्दों के इस कलम की नोक से। अंजान Continue reading उभरते जख्म

मैं एक अनछुआ शब्द

मैं एक अनछुआ शब्द मैं अनछुआ शब्द हूँ एक! किताबों में बन्द पड़ा सदियों से, पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के, कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में, एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे। एक शब्द की विशात ही क्या? कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की, शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी, शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी, भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी। एक शब्द ही तो हूँ मैं! पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही, कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की, कौन पूछता है Continue reading मैं एक अनछुआ शब्द

भक्ति का तमाशा

भक्ति का तमाशा दाम लगाकर इंसान को ईमान खरीदते देखा है, जगराते में अक्सर मैंने खुदा को भी बिकते देखा है।। रंजिशों में इंसान इंसानियत भूल जाते है, बेबात-बेवजह अपने अपनों को मार देते है। तुमसे ज्यादा सगा तो वो जल्लाद निकला, मारने से पहले उसे मैंने आखरी ख्वाइश पूछते देखा है।।1।। वो सुनहरा बचपन अब केवल सपना बन कर रह गया, बचपन से ही मैं हुकूमत की लालच में मर गया। सिर्फ शरारते फितरत में होती तो आज जिंदगी कुछ और होती, मैंने बच्चो को भी अब साजिशें करते देखा है।।2।। चंद ग़ज़लें लिख दी हमने तो हम शायर Continue reading भक्ति का तमाशा

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं। जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।   सपने  सुन्दर सहज सलोने आशा की आभा में सजकर नयनों के  पलनों में  भोले ममता की गुदड़ी में छिपकर   लेकर आते सुख  की घड़ियाँ जो  रूप नया  दे  जाती हैं सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं।   कुछ अनुभव की अनुपम आभा जीवन  के  आँगन  में  फैली खेल  खिलाती  सहस्र रश्मियाँ उतरी  हों  तन मन में  जैसी   मीठे मीठे  क्षण  जीवन  के स्वयं साथ वो ले  आती  हैं सुख की घड़ियाँ Continue reading सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

मन क्या है?

मन क्या है? सोचता हूँ कभी! मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ? क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह? सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या? ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने Continue reading मन क्या है?

तुम और मच्छरदानी

तुम और मच्छरदानी रात की नीरवता में तुम्हारा तन विश्रामावस्था में शांत और शिथिल बिस्तर पर पड़ा आहिस्ते-आहिस्ते गहन निद्रा में लीन तुम्हारे भीतर दबी वासनाएं/कुंठाए/कामनाएं उभरती, आकार लेती अवचेतन मन में रचती स्वप्न संसार का माया जाल वास्तविक से लगते सुख-दुःख में डूबती, उपलाती लौट जाती तृप्ति पाकर अंतरिक्ष में मेरे ही अनगिनत छिद्रों से फिर कोई इच्छाओं के कीट-पतंगे प्रवेश न कर सके दंश न चुभो सके रात भर चौकीदारी करता अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष के चार स्तंभों पर टिका चार दिशाओं में तना, खड़ा साक्षी बनता तुम्हारे उस स्वरुप का जिस पल तुम अन्दर-बाहर से होते Continue reading तुम और मच्छरदानी