टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी दिखने में नायाब! मगर किसी भी क्षण ढहने को बेताब! बेमिसाल, मगर टूटती हुई ख्वाहिशों की जिन्दगी! अकस्मात् ही, रुक से गए जैसे जिन्दगी के रास्ते, मोहलत भी न मिली हो ख्वाहिशों के परिंदों को ऊड़ने की जैसे! रूठ जो गई थी खुद उसकी ही सांसे उससे! मोह के धागे सब टूट चुके थे उसके…. जैसे सरकती हुई बर्फ की पहाड़ी ढह गई हो कोई, पत्तियों के कोर पर शबनमी बूंदों की सूखती सी लड़ी, रेगिस्तान में बनता बिगरता रेत का टीला कोई! कभी थे कितने प्रभावशाली, जीवन्त, गतिशीलताओं से भरे ये जिन्दगी के रास्ते, निर्बाध Continue reading टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

Advertisements

कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ मैंने जग देखा है जगजीवन देखा है? मैंने तो बस महलों के अंदर देखा है सबकी आँखों अश्क नहीं शबनम देखा है। परदों के पीछे परदों का मंजर देखा है मधुकलशों में यौवन का दमखम देखा है। कैसे कह दूँ मैंने सुख का दुख का आलिंगन देखा है? चमन फूल कलियों की बस खुश्बू समझी है काँटों बिंधी तितली की तड़प नहीं देखी है। चहकती चिड़िया की भी गुफ्तगू समझी है हर पिजरे में पलती कसक नहीं देखी है। कैसे कह दूँ मैंने कोलाहल में सूनापन देखा है? मैंने बस पायल की थिरकन देखी है थककर थमते Continue reading कैसे कह दूँ

वक्त के सिमटते दायरे

वक्त के सिमटते दायरे हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? अंजान सा ये मुसाफिर है कोई, फिर भी ईशारों से अपनी ओर बुलाए रे, अजीब सा आकर्षण है आँखो में उसकी, बहके से मेरे कदम उस ओर खीचा जाए रे, भींचकर सबको बाहों में अपनी, रंगीन सी बड़ी दिलकश सपने ये दिखाए रे! हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? छीनकर मुझसे मेरा ही बचपन, मेरी मासूमियत दूर मुझसे लिए जाए रे, अनमने से लड़कपन के वो बेपरवाह पल, मेरे दामन Continue reading वक्त के सिमटते दायरे

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो लहरों का कंपन स्पंदन भी सागर में जा मिलने दो।   हो प्रभात भी सुखकर ऐसा कलरव करते खगगण जैसा और किरण की मादकता भी ओस कणों में छा जाने दो।   निर्जन वन में कूक रहे जो उनकी गुंजन मिल जाने दो मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो   ओम् शब्द की प्रतिध्वनि प्रखर करे शब्द का उद्घोष अमर और गीत जब जब गूँजे तो जग जीवन मुखरित होने दो।   माटी के नश्वर पुतलों को मानवता से Continue reading मेरे गीतों के आँचल में

सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं। इसको सुनने जो कतराते उनको होती है लाज नहीं।   इस कारण जब ठोकर खायी इस पीड़ा ने तब उफ् न किया पथ के पत्थर चूम चूमकर घायल पथ का श्रंगार किया।   कहने को थी आगे मंजिल पर रुकने का साहस न मिला। नम पलकों से आँखों ने भी हर आँसू का संहार किया।   अधरों था अंकुश पीड़ा का खोल सका ना मन राज कहीं। सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं।   काँटे हर पीड़ा के चुनके स्वप्न नीड़ Continue reading सन्नाटे में छिप जाती है

संसार

संसार अंधकार की स्वीकृति तेजोमय प्रकाश है भयावहता की विकृति सुन्दरता की अनुकृति है एक दूजे में गुथा हुआ सुख –दुःख का भान है जन्म की किलकारियों में मृत्यु की थपकियाँ है शून्यता में पूर्णता है पूर्णता में शून्यता है असुरत्व का उत्पात भी देवत्व का साम्राज्य भी विराटता की अवधारणा भी लघुता में प्रचंडता भी कर्म की प्रधानता भी दंड का विधान भी शुभता वरदान भी संभावनाए अपार है अद्भुत तेरा संसार है

आँसू

आँसू पलती नयनों में तरल तरल करती अठखेली चपल चपल दुःख संचित गगरी गरल गरल ले साथ चली वह मचल मचल छलकाती, सागर की बेटी नयनों में …… है तृप्त ह्रदय जो दहर दहर हो थिरक रही ज्यों लहर लहर अवसाद मिटाती प्रहर प्रहर दुःख के भँवर में ठहर ठहर लहराती ,सागर की बेटी नयनों में …….. बहती है निर्झर सी कल कल दुःख की तान छेडती पल पल बंद पलकों के निज भार से छल छल पीड़ा के अंबार से विकल उफनाती,, सागर की बेटी नयनो में……… रुदन होठों का सिसक सिसक   व्यथित मन की पीड़ा ले लपक Continue reading आँसू

जिन्दगी

जिन्दगी  कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी। जानी पहचानी दुनिया में नित नव रूप लिये मिलती है जिन्दगी।   बचपन में अनाथ-सी बेबस जवानी में ठगी मिलती है जिन्दगी। बूड़ी साँसों की खाई में लहूलुहान हुई दिखती है जिन्दगी।   चुभती हैं बेरहम साँस तो बड़ी छटपटाती मिलती है जिन्दगी। लड़खड़ाती, डगमगाती-सी बैसाखी थामे चलती है जिन्दगी।   समय सहम जाता है जब भी अंतिम साँस को तरसती है जिन्दगी कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।   मीठी] तीखी कभी कसैली जहर उगलती लगती है जिन्दगी। कभी गरीबी में शर्माती कभी गरीबों पर अकड़ती Continue reading जिन्दगी

औरत

औरत औरत ने सपना देखा चिड़िया उसे पंख दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह चिड़िया बन खुले आसमान में ऊँची उडान भरने लगी औरत ने सपना देखा नदियाँ उसे उफान दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह नदी बन तीव्र वेग से बहने लगी औरत ने सपना देखा – पर्वत उसे दृढ़ता दे गुम हो गए न जाने कहाँ और वह पर्वत बन धरती पर अडिग हो गई औरत ने सपना देखा – वृक्ष उसे अपनी जड़े दे न जाने कहाँ गुम हो गए और वह वृक्ष बन हर मौसम में तन कर खड़ी हो Continue reading औरत

जिंदगी तो है

जिंदगी तो है ज़िंदगी तो है पर यहाँ साथ में ही ये गम क्यो है , हरपल यहाँ खुश,तो आँख उसकी नम क्यों है। हार जाता है अक्सर यहाँ सच रहेके तन्हा यूँ, जूठ के ही पाँव में इस तरहा संग दम क्यों है। जिसने भी यूँ कभी जो है निभाई ता-उम्र वफ़ा, और उससे ही रहेता दूर उसका सनम क्यों है। भूल जाते है अगर वो ही हमसे दूर जा कर, तो, यहाँ गमे -इंतज़ार में ही खड़े हम क्यों है। सोच तो वो भी कुछ अलग रहा है हम से, दिल फिर उसी शख्स का हूँआ हमदम क्यों Continue reading जिंदगी तो है

उत्कंठा और एकाकीपन

उत्कंठा और एकाकीपन दिशाहीन सी बेतरतीब जीवन की आपाधापी में, तड़प उठता मन की उत्कंठा का ये पंछी, कल्पना के पंख पसारे कभी सोचता छू लूँ ये आकाश, विवश हो उठती मन की खोई सी रचनात्मकता, दिशाहीन गतिशीलताओं से विलग ढूंढता तब ये मन, चंद पलों की नीरवता और पर्वत सा एकाकीपन… जीवन खोई सी आपधापी के अंतहीन पलों में, क्षण नीरव के तलाशता उत्कंठा का ये पंछी, घुँट-घुँट जीता, पल-पल ढूंढता अपना खोया आकाश, मन की कँवल पर भ्रमर सी डोलती सृजनशीलता, तब अपूर्ण रचना का अधूरा ऋँगार लिए ढूंढता ये मन, थोड़ी सी भावुकता और गहरा सा एकाकीपन….. Continue reading उत्कंठा और एकाकीपन

गांधी तेरे देश को

गांधी तेरे देश को ग़ांधी तेरे देश को कोडियो के मोल बिकते देखा है, सत्यपथ का सबब भुलाकर झूठ के लिये सत्याग्रह करते देखा है। भुला ये भगतसिंह और आजाद की कुर्बानी, आज एक-एक को मैंने गुलामी की नींव रखते देखा है।।1।। ठिठुरती औलाद को जो अपनी कम्बल ओढती है, बाजार में उसी माँ को नंगा करते देखा है। खून के रिश्तों की रासलीला भी खूब देखी मैंने, भाई को भाई के खून का प्यासा देखा है।।2।। समाज की सतायी औरत को तिल-तिल कर मरना पड़ता है, बलात्कारियो को इज़्ज़त की जिंदगी जीते देखा है।। खूबसूरती पर ग़ज़ल पढ़ते शायरों Continue reading गांधी तेरे देश को

पर्वत का दुःख

पर्वत का दुःख सोचों जरा कैसा हादसा हुआ होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत बना होगा जड़ ज़मीन पर शिखर आसमान पर कितना बँटा–बँटा किसी का न हो सका होगा सोचों जरा कितना हैरान हुआ होगा उसके सीने से दर्द का सोता फूट पड़ा होगा कहीं नदियाँ कहीं झरने बन कर आसुओं की धार न जाने कितनी घाटियों में गिरा होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत हुआ होगा सोचों जरा कितना फूट फूट कर रोया होगा एक ही वक्त में कहीं ठिठुरता कहीं सुलगता कहीं चटकता कहीं खिसकता कितना परेशान हुआ होगा माटी यूँ ही नहीँ पर्वत बना होगा सोचों Continue reading पर्वत का दुःख

ईश्वर और शैतान

ईश्वर और शैतान मै अपूज्य तमाधिपति मेरे अधीन अन्धकार का राज्य मेरा असुरत्व काम ,क्रोध ,लोभ , मद ,मोह में समाहित तुमने ही अपनी भावनाओं  से किया हैं सिंचित फलता ,आकर्षण में बांधता कपट से छलता बहुरूपिये बन छुपा लेता अपने सींग , नुकीले दांत विशालकाय देह रक्तरंजित पंजे दबाता रहता सदा आत्मा की आवाज़ रक्तबीज सा कायम रहता मेरा वजूद हाँ ,तुम्हीं ने तो अमरता का पान कराया खड़ा हूँ तुम्हारे ईश्वर के  समकक्ष ईश्वर हैं तो शैतान हैं शैतान हैं तो ईश्वर हैं कि पाप की गहराइयों  से पुण्य का पहाड़ हैं प्रकाश रहित योजना ही अंधकार की Continue reading ईश्वर और शैतान

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार वरना तेरी वीणा पर मेरा क्या अधिकार।   मौन कंठ है, मौन अश्रू हैं गुमसुम है सब सूनापन भी गीत अधूरा, बोल अछूता बुझा-बुझा-सा है तन मन भी।   मधु की बूँदें बनकर जब बरसें अश्रू अपार अधरों पर तब खिलता है शब्दों का श्रंगार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार   तूफानों में चलने आतुर बोल गीत के मचला करते लहरों से भी टकराने की अर्थ गीत में उछला करते।   नैया दुख की हो जिसकी हो पीड़ा पतवार सुन सकता Continue reading गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार