तुम और मच्छरदानी

तुम और मच्छरदानी रात की नीरवता में तुम्हारा तन विश्रामावस्था में शांत और शिथिल बिस्तर पर पड़ा आहिस्ते-आहिस्ते गहन निद्रा में लीन तुम्हारे भीतर दबी वासनाएं/कुंठाए/कामनाएं उभरती, आकार लेती अवचेतन मन में रचती स्वप्न संसार का माया जाल वास्तविक से लगते सुख-दुःख में डूबती, उपलाती लौट जाती तृप्ति पाकर अंतरिक्ष में मेरे ही अनगिनत छिद्रों से फिर कोई इच्छाओं के कीट-पतंगे प्रवेश न कर सके दंश न चुभो सके रात भर चौकीदारी करता अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष के चार स्तंभों पर टिका चार दिशाओं में तना, खड़ा साक्षी बनता तुम्हारे उस स्वरुप का जिस पल तुम अन्दर-बाहर से होते Continue reading तुम और मच्छरदानी

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मनसिज सा मन

मनसिज सा मन मन गुम सुम मृसा जग के कांतार में, सघन बड़ी ये कांतार कानन जीवन की, कहुकिनी मन की हुई अब चुप चुप सी, तकती मुकुर पुलोजमा इस जीवन के प्रांगण में। धुंधलाई लोचन इस दीप्ति मरीचि मे, स्वातिभक्त सा मन तकता रहता नभ में, चाहत उस पियूष का सोम रस जीवन में, आरसी देखती रहती इन्द्रबधु मन के आंगण में। मनसिज सा मन मन्मथ अनंता जग में, परमधाम अपवर्ग ढूढ़ता रहता जीवन में, विवश प्राण प्रारब्ध नियति विधि भँवर में, इन्द्रव्रज चपला दामिनी का भय मन प्रांगण में।

शायद गीतों को ध्यान नहीं है

शायद गीतों को ध्यान नहीं है शायद गीतों को ध्यान नहीं है या जग को तेरा ज्ञान नहीं है। गूँगे शब्दों का कोलाहल खामोशी बन गूँज रहा है जनम-जनम के विविध कुँजों में तन प्राणों को ढूँढ रहा है नश्वर जीव यह अस्थिपंजर-सा नग्न देह है, नादान नहीं है शायद गीतों को ध्यान नहीं है या जग को तेरा ज्ञान नहीं है। मानव हर आँसू का बदला लेता है नित हिंसा द्वारा औ प्रचार मिथ्या-भाषा का करता झूठी कसमों द्वारा इस बहरे-गूँगे जग में क्योंकि शब्द अर्थ का सम्मान नहीं है शायद गीतों को ध्यान नहीं है या जग को Continue reading शायद गीतों को ध्यान नहीं है

मूक जेहन

मूक जेहन मूक जेहन वाणी विहीन, भाषा जेहन की आज अक्षरहीन, परछाईयों मे घिरा, परछाईयों से होता व्याकुल। परछाईं एक सदियों से जेहन में, अंगड़़ाई लेती मृदुल पंखुड़ी बन। मिला जीवन मे बस दो पल वो, यादें जीवन भर की दे गया वो। मृदुल स्नेह की चंद बातो में ही, सौदा उम्र भर का कर गया वो। जेहन की गहराई मे शामिल वो, स्मृति की छाँव पाकर रहता वो। अंकित स्मृति पटल पर अब वो, मन उपवन की वादी मे अब वो, जेहन की स्मृतिगृह मे रहता वो, मंद-मंद सासों में मदमाता। वो। यादों की परछाईयों मे घिरा जेहन, स्मृति स्नेह Continue reading मूक जेहन

पूछे जो कोई तुमसे

पूछे जो कोई तुमसे पूछे जो कोई तुमसे कौन हूँ मैं? तुम कह देना, एक बेगाना पागल दीवाना, जो अनकही बातें कई कह जाता है..! एक धुंधला चेहरा,  जो यादों में बस रह जाता है…!! एक बेगाना अन्जाना, जो जीवन दर्शन दे जाता है…!! एक जाना पहचाना, जो कभी-कभी बात पते की कह जाता है…!! यूँ तो उसके होने, या फिर, ना होने से, कुछ फर्क नही पड़ता जीवन पर..!!! पूछे जो कोई तुमसे, तुम कह देना!!!! पर क्या अपने दिल से तुम यही कह सकोगी?????? शायद नही……..!!! कभी नही…….!!!

जर-जर नाव

जर-जर नाव जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है मुझे सहारा देने तिनका ढूँढ़ती है   दया की भीख माँगती हुई लहरों के चरण चूमती है भंवर में फँसी जिन्दगी संग तड़पती, बिखलती घूमती है   जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है शिथिल काया में अपनी स्मृति ढूँढ़ती है   गर्म रेत में बिखरे आँसू न जाने क्यूँकर ढूँढ़ती है और कणों को छूकर हरपल खुद के आँसू से झुलसती है   जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है बीते क्षणों की मरीचिकायें ढूँढ़ती है   सुनामी को यादकर अब भी डरती हुई डगमगाती है अपने आँसुओं की कहानी खुद के जिगर Continue reading जर-जर नाव

मेरे गीतों की मृदु बोली

मेरे गीतों की मृदु बोली पतझर में कोयल-सी होती डाल डाल पर वाणी तेरी इन गीतों से महकी होती । हर साँसों का लेखा-जोखा तूफानों में मिट मिट जाता जन्म-मरण का लेना-देना कोरा कागज-सा बन जाता तब अक्षर से बातें करती पीड़ा मेरी हँसती गाती मेरे गीतों की मृदु बोली पतझर में कोयल-सी होती । सूने पथ पर थकित बिचारे प्यासे पनघट जब पा जाते प्यासे जग के प्यासे प्राणी इन गीतों को गाते जाते तुझे खोजती तेरी वाणी इन गीतों की अपनी होती मेरे गीतों की मृदु बोली पतझर में कोयल-सी होती । निर्जल बदली, निष्ठुर बदली, बूँद बूँद Continue reading मेरे गीतों की मृदु बोली

माँ, तुम्हारी बिटिया

माँ, तुम्हारी बिटिया मैं जन्मी हूँ तुम्हारी बिटिया कहलाने के लिये जिन्दगी भर तुम्हारा असीम प्यार पाने के लिये।   मेरी मुस्कराहटें जरा गोदी में खिलने तो दो तुम्हें भी जिन्दगी मिलेगी यूँ मुस्कराने के लिये।   चहकती, फुदकती दिखेगी यह तुम्हारे आँगन में तुम्हारे आँगन की माटी यह महकाने के लिये।   अभी तो एक कली ही हूँ मैं शबनम से धुली हुई छिपी हूँ तिरे आँचल में, माँ, तुझे रिझाने के लिये।   खिल उठूँगी फुलवारी में थोड़ा सब्र तो करो, माँ तुम भी कहोगी बेटी है ही घर सजाने के लिये।   घर की रौनक हूँ, रोशन Continue reading माँ, तुम्हारी बिटिया

अस्तित्व

अस्तित्व मैंने जब भी सूना है की ईश्वर है, मन की आशाओ ने कुछ और जिया है, हर एक इंसान में महसूस किया है किसी अनजान अस्तित्वको, बातो में निकलती दुवाओ में ,कभी माँ की हथेलियों में, पापा के मश्वरो में, भाई के राखी बंधे हाथो मे, बहन की जप्पियो में, भाभी की बातो में दोस्तों की महफ़िलो में  ,प्यारभरे उन लम्हो में किसी की मुस्कानों में, किसी की आँखों के दर्द में… कुदरत की बनायी सभी रचनाये कर रही हे प्रेरित ,उस अस्तित्व की उष्मा को  अपने अंदर सहेजकर एक ओर.. नया जीवन जीने की तमन्ना को जीवित कर लेती हूंँ। Continue reading अस्तित्व

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है अपनी ही जिन्दगी का अंतिम वसंत देखा है। हमने झुर्रियों में छिप बढ़ती उम्र निहारी है हमने शून्य में विलीन होता अनंत देखा है। दरके प्याले में थिरकता इक मधुकण देखा है मयखाने के अंदर बैठा इक संत देखा है। हमने बगिया में गुनगुनाता पतझर देखा है वसंत ऋतु में भी कुनमुनाता वसंत देखा है। कहती है आँधियों से जूझती दिये की बाती हमने भी रोशनी से दमकता दिगंत देखा है। हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है अपनी ही जिन्दगी का अंतिम वसंत देखा है। ……..भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

अतीत हूँ मैं

अतीत हूँ मैं अतीत हूँ मैं बस इक तेरा, हूँ कोई वर्तमान नहीं… तुमको याद रहूँ भी तो मैं कैसे, मेरी चाहत का तुझको, है कोई गुमान नहीं, झकझोरेंगी मेरी बातें तुम्हें कैसे, बातें ही थी वो, आकर्षण का कोई सामान नहीं। मेरी आँखों के मोती बन-बनकर टूटे हैं सभी, सच कहता हूँ उन सपनों में था मुझको विश्वास कभी, सजल नयन हुए थे तेरे, देखकर पागलपन मेरा, अब हँसता हूँ मैं यह कहकर “लो टूट चुका बन्धन मेरा!” अतीत के वो क्षण, अब मुझको हैं याद नहीं। क्या जानो तुम कि एक विवशता से है प्रेरित… जीवन सबका, जीवन Continue reading अतीत हूँ मैं

तराना प्रणय का

तराना प्रणय का सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का…. गाएँ कैसे इसे हम, अब तुम ही हमें ये बताना, ढ़ल रही है शाम, तुम सुरमई इसे बनाना, अभी सहने दो मुझको, असह्य पीड़ा प्रणय का, निकलेगी आह जब, इसे धुन अपनी बनाना। सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना प्रणय का…. अभी गाऊँ भी कैसै, मैं ये तराना प्रणय का, आह मेरी अब तक, सुरीली हुई है कहाँ, बढ़ने दो वेदना जरा, फूटेगा ये तब बन के तराना, तार टूटेंगे मन के, बज उठेगा तराना प्रणय का। सोचा था मैंने, गाऊँगा मैं भी कभी तराना Continue reading तराना प्रणय का

अतीत

अतीत तट पे आज खड़ा ये जीवन, ताकता उस तट को, छोड़ आया अतीत वो जिस तट, फिर ये नाव बही क्यूँ उस तट को। कह रहा है अब अतीत मेरा, मेरे वर्तमान से आकर, हो न सका जो तेरा, क्यूँ रह गया तू उसका ही होकर। अतीत में तब खोया था तू ने, खुद से ही खुद को, हो न सका हासिल लेकिन, कुछ भी तो जीवन-भर तुझको। अब सामने खड़ा अतीत तेरा, वर्तमान की राहों को घेरे, कच्चे धागों से मन को ये फेरे, क्या तोड़ पाएगा तू इस बंधन को?

दूर वहाँ

दूर वहाँ न है कोई, इक मेरे सिवा उस भूल-भुलैया के उस पार.. हाथों से जैसे छिटकी थी वो रश्मि-किरण सी, ज्युँ दूर गगन में वापस जाता हो पाखी, दूर होता रहा मैं उससे जितना, उसकी यादें सिमटती रही उतनी ही पास भी….. उस अंतिम छोर में अब कोई प्रतीक्षारत नहीं, ना ही इस मोड़ में भी है कोई, मैं रहा सदैव एकाकी, बूढ़ा बरगद, सिमटती नदी, विलीन हुए सब सांध्य कोलाहल, उड़ गए सुदूर जैसे सारे प्रवासी पाखी। पिघली है बर्फ़ फिर इन वादियों में, या फिर दिल में जगी है कोई आस पुरानी, गोधूलि बेला,सिंदूरी आकाश, तुलसी तले Continue reading दूर वहाँ

आहत संवेदना

आहत संवेदना घड़ी सांझ की सन्निकट है खड़ी, लग रहा यूँ हर शै यहाँ बिखरी हुई है पड़ी, अपना हम जिसे अबतक कहते रहे, दूर हाथों से अब अपनी ही वो परछाई हुई। विरक्त सा अब हो चला है मन, पराया सा लग रहा अब अपना ही ये तन, बुझ चुकी वो प्यास जो थी कभी जगी, अपूरित सी कुछ आस मन में ही रही दबी। थक चुकी हैं साँसे, आँखें हैं भरी, धूमिल सी हो चली हैं यादों की वो गली, राहें वो हमें मुड़कर पुकारती नही, गुमनामियों में ही कहीं पहचान है खोई हुई। संवेदनाएँ मन की तड़पती Continue reading आहत संवेदना