बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा…. न जाने वो कौन सा, जादू था भला, न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला, कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला, आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला। आईना था वही, बस बदला सा था अक्श मेरा… इस दफा, जादू किसी का था चला, दुआ किसी की, कबूल कर गया खुदा, नई राह थी, नया था कोई सिलसिला, नूर लेकर यूँ, अक्श फूल सा खिला। इस दफा आईने में, यूँ बदला सा था अक्श मेरा…. धूंध छँट चुकी, इक शख्स था मिला, नूर-ए-खुदा शख्स के चेहरे पे Continue reading बदला सा अक्श

व्यथा वृक्ष की।

क्यो काटते हो मुझे मैं तो जीवन देता हूं स्वयं ना लेकर अपना कुछ भी फल तुमको दे देता हूं।। चोट तुम्हारी कुल्हाड़ी का हर पल सहता रहता हूँ जब तक अंतिम स्वास चलती है मेरी प्राणवायु ही देता रहता हूँ।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं तो हर सुख दुख में काम आता हूं कभी द्वार बन कभी बन खिड़की घर की लाज बचाता हूँ।। पल पल ऐ मनुष्य तू हमको कितने घाव देता है गर्मी के मौसम में शीतल छाँव हम्हीं से लेता है।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं भी तो तुम्हारी तरह इसी धरती माँ की Continue reading व्यथा वृक्ष की।

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात, विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात, पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ, धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… चुपचाप कालिमा घोलती ये रात, स्वप्नातीत, रूपातीत नैनों में ऊँघती सी उथलाती नींद, अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब, मींचती आँखों में तल्खी मन में बेचैनियाँ, बस है इक उम्मीद और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… Continue reading रात और तुम

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल

जलता दिल

राख! सभी हो जाते हैं जलकर यहाँ, दिल ये है कि जला… और उठा न कहीं भी धुँआ! है जलने में क्या? बैरी जग हुआ दिल जला! चित्त चिढा, मन को छला, दिल जला! कहीं आग न कहीं दिया, दिल यूँ ही बस जला! ये धुआँ? दिल में ही घुटता रहा, घुट-घुट दिल जला, बैरी खुद से हुआ, दिल को छला, उठता कैसे फिर धुआँ, दिल के अन्दर ये घुला! राख ही सही! पश्चाताप की भट्ठी पर चढा, बस इक बार ही जला, अंतःकरण खिला…… स्वरूप बदल निखरा, धुआँ सा गगन में उड़ा, पुनर्जन्म लेकर खिला।

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

साहस अभाव

साहस अभाव साहस अभाव में सुजनों के दुष्टों का साहस पलता है हों असुर अधर्मी धरनी पर उनका दुःशासन छलता है आदर्श धर्म में बिंधकर हम क्यों दानवता को झेल रहे ? आतंक व्याप्त कर रक्त पात वे मानवता से खेल रहे धर छद्म रूप भर अहंकार निर्मम निर्दयी किलकता है । साहस अभाव ……………..।। क्यों चीख रहे कर त्राहि माम ? तुम स्वयं नहीं कुछ कर पाये . बन मूक बधिर क्यों सोच रहे ? वह कृष्ण ! पुनः भू पर आये अपमानित होकर बैठे हो क्यों भुज बल नहीं मचलता है ? साहस अभाव ………………..।। जीवित रखनी यदि Continue reading साहस अभाव

बेखबर

काश! मिल पाता मुझे मेरी ही तमन्नाओं का शहर! चल पड़े थे कदम उन हसरतों के डगर, बस फासले थे जहाँ, न थी मंजिल की खबर, गुम अंधेरों में कहीं, था वो चाहतों का सफर, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! बरबस खींचती रहीं जिन्दगी मुझे कहीं, हाथ बस दो पल मिले, दिल कभी मिले नहीं, शख्स कई मिले, पर वो बंदगी मिली नही, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! साहिल था सामने, बस पावों में थे भँवर, बहती हुई इस धार में, बहते रहे हम बेखबर, बांध टूटते रहे, टूटता रहा मेरा सबर, Continue reading बेखबर

नेपथ्य

मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। जब मौन हो ये मंच, तो बोलता है नेपथ्य, यूँ टूटती है खामोशी, ज्यूँ खुल रहा हो रहस्य, गूँजती है इक आवाज, हुंकारता है सत्य, मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। पार क्षितिज के कहीं, प्रबल हो रहा नेपथ्य, नजर के सामने नहीं, पर यहीं खड़ा है नेपथ्य, गर्जनाओं के संग, वर्जनाओं में रहा नेपथ्य, क्षितिज के मौन से, आतुर है कहने को अकथ्य। जब सत्य हो पराश्त, असत्य की हो विजय, चूर हो जब आकांक्षाएँ, सत्यकर्म की हो पराजय, लड़ने को असत्य से, पुनः आएगा Continue reading नेपथ्य

क्यों?

क्यों? तेरे धुंधली स्वप्नों की विस्मृति में, मन का उन्माद निखरता क्यों? सुरभित लहरों की उमंगों में, सागर का वैभव बिखरता क्यों? रुपहली रातों की शीतल छाया में, तारों की तरूणाई बहकती क्यों? माना मेरा भाग्य गगन धुंधला-सा, पर तुम उस पर थिरकती क्यों? किरणें बन तू दे उज्ज्वल आभा, नटखट दिनकर दमकता क्यों? मैं नित्य अतृप्त प्रेम भिखारी तेरा, त्रिषित दिल फिर तड़पता क्यों? कोमल ह्रदय के उष्ण अंचल में, आत्मोत्सर्ग की अतृप्ति क्यों? गोधूलि के धूमिल रजत पट पर, चांदनी रात की दिव्य दीप्ति क्यों? मेरी तीव्र पीड़ा पर छिड़केगी तू, कुसुम-धूलि मकरंद घोल क्यों? असह्य विरह की Continue reading क्यों?

इधर सांझ भी अलसाई है

इधर सांझ भी अलसाई है लौट चले है पंछी नीड़ में, तिमिर जो गहराई है, क्षितिज है मुस्कुराता, इधर सांझ भी अलसाई है| बयार पग धरे मंद-मंद, डूबती लालिमा मुस्कुराई है, क्लांति छाई नील गगन में, इधर सांझ भी अलसाई है। खोई-खोई-सी निशा है, खोई-सी उसकी तनहाई है, बेक़रार वह पिया मिलन को, इधर सांझ भी अलसाई है। मध्यम हुई बेचैन किरणें, धुंधली दिनकर की परछाई है, अधीर मुस्कान लिए लताऐं, इधर सांझ भी अलसाई है। आकुल मेघा चली परदेश को, पूरब दिशा भी शरमाई है, बेक़रार क्यों है हर दिल यहाँ, इधर सांझ भी अलसाई है। प्रचण्ड अहसासों के Continue reading इधर सांझ भी अलसाई है

कोलाहल

कोलाहल क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? काँप उठी ये वसुन्धरा, उठी है सागर में लहरें हजार, चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार, दुर्बल सा ये मानव, कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? कोलाहल के है ये स्वर, कण से कण अब रहे बिछर, स्रष्टा ने तोड़ी खामोशी, टूट पड़े हैं मौन के ज्वर, त्राहिमाम करते ये मानव, तज अहंकार, ईश्वर का अब कर रहे पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? या है छलनी उस रचयिता का Continue reading कोलाहल