ग़ज़ल- बयां करता हूँ

ग़ज़ल- बयां करता हूँ मैं मेरी ग़जल अपने सल्तनत के नाम बयां करता हूँ मैं इस चमन,देश से बेइंतिहा मोहब्बत करता हूँ मिला मुझको आंगन खुद को ख़ुशनसीब समझता हूं मेरा हर पल,हर कतरा इस देश के नाम बयां करता हूँ देखी नही मैने आजादी,खुदको मैने आजाद पाया गांधी,नेहरू,भगत,सुभाष, की भूमि को सलाम करता हूँ पूछते हैं मुझे मेरे यार कोनसा जहां है तेरे दिल में सीने को तान अपने नाम हिंदुस्तान बतलाता हूँ कभी न थामा इन हाथों ने कोई और पताका अरे हिंदुस्तान वासी हूं हर वक्त तिरंगा लहराता हूं टेके फिरंगियों ने घुटने इन पर्वत रूपी शीशो Continue reading ग़ज़ल- बयां करता हूँ

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार

मुक्तक-खुश्बू

 मुक्तक — खुश्बू कलियों को कुछ और सँवर जाने दो फूलों को कुछ और निखर जाने दो। अभी कुछ चाह बाकी है जीने की खुश्बू को कुछ और बिखर जाने दो। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

पीने की आदत

पीने की आदत बेवजह रूसवाई सहने की आदत हो गई मुझ को तो यों दर्द छुपाने की आदत हो गई लोग न समझे बेवफ़ाई के दर्द की खराबी मुझे तो अब इल्जाम सुनने की आदत हो गई दिन- रात जब बेचैन होने की आदत हो गई तभी तो मयखाने में जाने की आदत हो गई लोग कहते पागल या कोई जानते शराबी ग़म को भुलाने ज़ाम छलकाने की आदत हो गई मुझे तो यों बदनाम होने की आदत हो गई कैसे कहे सजन को पीने की आदत हो गई सजन

दिल की बात

दिल की बात दिल की बात कहने को अभी न दिल ही चाहता मतलबी दिलों को दर्द सुनाना नहीं चाहता या खुदा ये दुनिया में अपना ही मुँह चुप रखें मुश्किल जो है दुसरों को देना नहीं चाहता परेशानी खुद की उन्हे कितनी उलझा रखे उन को आवाजे दे पछताना नहीं चाहता बदलते जमाने के साथ अब बदलना होगा न कोई पूछता, ना ढूँढे और नहीं चाहता ग़म बटोर संवारने लगा गया अब अकेला जज्बात बज़ार में मज़ाक बने नहीं चाहता लिख-लिख कर ‘कलम’ खूद आंसुओं से धो लेता हालात पे कुछ लिखने का बहाना ही चाहता कलम उठाइ मैंने Continue reading दिल की बात

बेवफ़ाई

बेवफ़ाई कुछ ग़म-ए-अब्र का हिसाब आए बेवफ़ाई में दर्द गज़ब आए जलते जख़्म में तड़पन भर आए तन्हा हुवे जाम- ए-शराब आए रगो मे तेज़ाब सा दौड़ जाए नशे में ग़म के माहताब आए तिरी बेवफ़ाई के अब्र छाए गोया हर सितम से रिसाव आए के तभी होश-व-हवास गंवाए साक़ी ज़ाम में आफ़ताब आए क़हर-ए-बेवफ़ा से घाव पाये सामने दस्तुर बेनक़ाब आए मन में उम्मीदों के अब्र छाए या अल्लाह हाँ में जवाब आए मेहेर- ओ- वफ़ा को तरस जाए तु सजन को याद बेहिसाब आए सजन

जज़्बात

जज़्बात उदासी में दिल को आँसु से राहत कहाँ मिले जुगनुओं से रोशन रात को रौशनी ना मिले आंखों से बरस पीड़ा का सैलाब उमड़ पड़े जज़्बातों को मिटा दे वो हमदर्द कहाँ मिले रखता दिल में महफूज़ अपने अरमान सारे कोई हमसफ़र या हमदर्द जब मुझे ना मिले हर वक़्त सभी बदगुमानी दिल पे भारी पड़े अब दर्द नहीं होता मुझे जब खूशी ना मिले आँसू को कितना समझाया बेवक्त ना झरे सजन सभी एहसासों का कभी जवाब ना मिले सजन

प्यार का मसौदा

प्यार का मसौदा तेरी चाल में बिजली की अदा है तेरी लटों का लहराना जुदा है नज़र के नशीले तीर जो चलाये गुलाबी लब पर ये दिल भी फ़िदा है देखा जो तो देखते ही रह गये चेहरा कमल फूल सा संजीदा है मुस्कुरा के तुम बर्क़ गिराते गये दिल मीठे सा दर्द से ग़मजदा है ख़ुशबू बिखेर यों आँचल फहराये चलने में किया मस्त मस्त अदा है नभ में बर्क़ जैसे चमकती जाये आशिकी में हर दिल तुम पे फिदा है हुस्न की मार ने मारा सजन तुझे ज्यों शोला भड़कता वो मसौदा है सजन

जुस्तज़ू

जुस्तज़ू प्यार से महकाए ज़िंदगी ये जुस्तजू सदा रहे दुआ करे हर दिल अज़ीज़ हो पाए इरादा रहे दिल में ये तमन्ना रहे हर किसी से प्यार मिले दर्द का समंदर पी मुस्कुराए ऐसा वादा रहे इन्सान बने जैसे इन्सानियत का नतीज़ा मिले ज़रूरी है जो कमी रही मिटाने संजीदा रहे जुस्तजू है तनहाई की क़ैद से रिहाई मिले भरना है हर दिल का जख़्म कोई न ग़मजदा रहे मुमकिन कर के सारे रिश्तों को भी रोशन कर ले बच्चों से प्यार करे और बड़ों को सजदा रहे दुनिया की भीड़ में अकसर चेहरे गुम होते मिले रखनी अगर पहचान Continue reading जुस्तज़ू

चाहत

चाहत बड़ी मुश्किल शरारत हो गयी है न पूछो यह बगावत हो गयी है नज़ाक़त तेरी रास आये नही ग़म से अब मोहब्बत हो गयी है अँधेरा जैसा लगता है यों ही दिल की कंही तिज़ारत हो गयी है फ़रेब व जालसाजी के हुनर से बेवफ़ाई कि आदत हो गयी है माना नाउम्मीदी की घडी़ में एक उम्मीद की चाहत हो गयी है हालात ऐसे से हो गए मेरे तु मेरे लिए इबादत हो गयी है सच तो यह है न कोई अफ़साना सजन तुझे मोहब्बत हो गयी है सजन

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे हैं हम।   खुली जिल्द की सी किताब रही जिन्दगी खुले पन्नों तरह बिखरते रहे हैं हम।   पूछा सच्चे दिल से तो दिल ने कहा सुलझते सुलझते उलझते रहे हैं हम।   ख्याल में होती रही हर साँस की हार शुष्क पत्तों तरह बिखरते रहे हैं हम।   कभी तो आयेंगे वो मेरी कब्र पर यही सोच के बस मचलतेे रहे हैं हम। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो अपने करीब उजाला मन रखो।   जलने बुझने का खेल अजब है जिन्दगी को इसी में मगन रखो।   दुआ होती है बूँद नूर की जिगर में उम्मीद की किरन रखो।   सीखना तो परिंदों से सीखो उड़ान जितना, ऊँचा गगन रखो।   आखरी साँस तक ही जीना है जीवन में जीने की तपन रखो।   चलो तो बस खुदा की राह चलो चिराग उसी के दम रोशन रखो।   ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जिन्दगी क्या है यह तो वक्त बताता है इसका मकसद भी वक्त बदलता जाता है।   जो मुहब्बत जताता है मुकर जाता है जो मुहब्बत करता है हरदम निभाता है।   तूफाँ का उठाकर किनारे फेंक देना जिन्दगी का अजीब नजारा दिखाता है।   जिन्दगी उम्मीद का एक पैमाना है जब दरक जाता है तो अश्क बहाता है।   जिन्दगी जब भी मौत से डरने लगती है डर हर इक साँस को रोककर डराता है।               ——    भूपेन्द्र कुमार दवे                00000

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं गम आगोश लिया मस्त मैखाना हूँ मैं। तू अक्स और तेरा आईना हूँ मैं तेरे फेंके पत्थर का निशाना हूँ मैं। तू ही गम है मेरी मस्ती भी है तू इन्हीं बातों का हुआ दीवाना हूँ मैं। अब क्यूँ धुँआँ देती है तू ए शमा तूने जिसे जलाया वो परवाना हूँ मैं। गम भुलाने जो हरसू याद किया जावे वो ही जश्ने-गम का अफसाना हूँ मैं। बस पा सका हूँ कुछ ऐसी जिन्दगी मौत का बना हुआ इक नजराना हूँ मैं। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000