तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

बेवफाई की सोहबत रास आयी, तो मैं क्या करूँ? देखा अंजाम अगर सारे शहर ने, तो मैं क्या करूँ? लाख किया था मना, कभी ना करना मोहब्बत, जब दिल के टुकड़े हुए हज़ार, तो मैं क्या करूँ? मोहब्बत की राहों में, काँटों के सिवा कुछ नहीं फूलों की चाहत रखोगी दिल में, तो मैं क्या करूँ? मैंने तो की थी इबादत, तुझे खुदा समझ कर, तू ही अपना फ़र्ज़ भूल जाए, तो मैं क्या करूँ? आये थे तेरी महफ़िल में, तेरे दिदार को हम, मेहताब छुपा था नक़ाब में, तो मैं क्या करूँ? अब्र को भेजा था पैयाम, खूब बरसना Continue reading तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

चहकने लगी शराब (ग़ज़ल)

जब से मिली तेरी सोहबत, चहकने लगी शराब, देख तेरी परवाज़ अब्र में, चहकने लगी शराब। फ़लक से जो उतरा शबाब, चमन-ए-दहर में, पाकीज़ा खुशबु से उसकी, महकने लगी शराब। तेरी शोखियाँ से मुत्तासिर, पैमाने छलक गए, जाम ने जो छुआ होठों को, बहकने लगी शराब। जल रही थी चिंगारियां जब, दो दिलों के दरमियाँ, चिंगारी एक यहाँ भी गिरी, दहकने लगी शराब। बड़े बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से जो निकले, सितारों को देख गर्दिश में, सिसकने लगी शराब। महताब की तबस्सुम पे, इतना मत इतरा ‘ एकांत, गुफ्तगू जो हुई आफ़ताब से, मचलने लगी शराब। (किशन नेगी ‘एकांत’)

ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)

नज़ाकत देख तेरी शोखियाँ की , मचलता है दिल यहाँ नादान्स्तिा में करके मोहब्बत, मचलता है दिल यहाँ मेरे इख़्तियार में ना था, चाँद हो मेरे आगोश में, तड़पता है महताब वहां, तड़पता है दिल यहां। एक आशना की जुस्तुजू में, गुजर गई एक हयात, बिजली कड़की आकाश में, कड़कता है दिल यहां। ख़लिश है दिल में आज भी, खामोश क्यों रहा, तू धड़कती है वहां, और धड़कता है दिल यहां। क़ासिद बना इख्लास का, ये मुहाजिर तेरे शहर में, फड़कती है तू वहां, और फड़कता है दिल यहां। इन्तिक़ाम की आग में, उठता है धुआं ‘एकांत‘, वो दहकती है Continue reading ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)

भूल गया (ग़ज़ल)

पैमाना खा गया धोखा, अब्र शराब गिराना भूल गया, जमीं तड़पती रही प्यासी, अब्र शराब गिराना भूल गया। शायर ने ग़ज़ल से कहा, कभी ख्वाब में भी आया करो, सारी रात ग़ज़ल लिखी, ग़ज़ल ख्वाब में आना भूल गया। हुस्न ने शायर से कहा, कभी नजरें मिला लिया करो, देखा जब हुस्न को, शायर नज़र मिलाना भूल गया। कहकशाँ की महफ़िल में, मसरूफ था महताब भी, रात उतर आई जमीन पर, चाँद निकलना भूल गया। तुझसे रक़ाबत कैसे हो, जब तू ही मेरी तसव्वुर है, तेरी परवाज़ देख कोहसार में, सांस लेना भूल गया। हाथ में मशाल लिए, आई जलाने Continue reading भूल गया (ग़ज़ल)

आँखें

तुम हो मेरे बता गयी आँखें। चुप रहके भी जता गयी आँखें।। छू गयी किस मासूम अदा से, मोम बना पिघला गयी आँखें। रात के ख़्वाब से हासिल लाली, लब पे बिखर लजा गयी आँखें। बोल चुभे जब काँटे बन के, गम़ में डूबी नहा गयी आँखें। पढ़ एहसास की सारी चिट्ठियाँ, मन ही मन बौरा गयी आँखें। कुछ न भाये तुम बिन साजन, कैसा रोग लगा गयी आँखें।      #श्वेता🍁

ग़ज़ल

वक्त करवट बदल रहा कद्र कर मुलाकात अब आंधियों से कर जिंदगी घुट घट के जी लिया तू कर बात खिड़कियां खोल कर अब नहीं आता कोई हरकारा अब न तू चिठियों की बात कर बाग बगीचे सुने सुने दिख रहे अब तितलियों की बात न कर तालाब की हालात देख ली वहाँ मछलियों की बात न कर सारे शजर कट रहे साथियों अब टहनियों की फिक्र न कर मुल्क में सुरक्षित नहीं कोई तू बेटियों की बात न कर कवि राजेश पुरोहित श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी पिन 326502 जिला झालावाड़ Mob.7073318074 Email 123rkpurohit@,gmail.com

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे दे सके तो अपनी मुस्कान की कतरन दे।   इक बहाना चाहिये था मंदिर आने का शुक्र है तूने दर्द दिया दवा अब न दे।   मौत तो सबको दी है ये मैं जानता हूँ पर मुझ गरीब को लाकर कहीं से कफन दे।   अंधे सभी हैं जिन्हें दिखाई नहीं देता पर मुझे ले चल जहाँ तू दिखाई न दे।   ये जख्मो-दाग मुझे तोहफे में मिले हैं अब मुझे खुश रखने ये सजाऐं और न दे।                            Continue reading ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर, सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना, वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती, अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक, शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। गरीबों के सदा हक़ में, उठा आवाज़ जीता हूँ, सदा मेरी अगर जो हो, तो Continue reading लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल इधर मुझको अपना बताते रहे हैं उधर उम्र भर आज़माते रहे हैं किसे ख़्वाब ये मखमली से लगे हैं हमें ख़्वाब अब तक डराते रहे हैं जिन्हें दोस्तों का दिया नाम हमने वो ताज़िन्दगी काम आते रहे हैं सुकूँ पा रही हैं जिन्हें देख नज़रें वही मेरे दिल को सताते रहे हैं अदावत निभाते रहे चुपके चुपके मगर दावतों में बुलाते रहे हैं

कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है मधुर मीठी बातें भी करो तो बेहतर है।   खोजने सकून चले हो अँधरी बस्ती में चिराग जलाकर साथ रखो तो बेहतर है।   पहले कभी जो हौले से गुदगुदाती थी मुस्कराहट वही बिखराओ तो बेहतर है।   प्यास बुझाना अब पनघट के बस में नहीं है कुछ अश्कों को थिरकने दो तो बेहतर है।   कहानी अधूरी है कविता पूरी नहीं होती ढाई अक्षर प्रेम के गुनगुनाओ तो बेहतर है।   स्तब्ध मौन की सी ये थमती हुई साँसें हैं कुछ धड़कनों के साथ भी लो तो बेहतर है। …भूपेन्द्र Continue reading कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

जो तुमसे मुलाकात हो गई

जो तुमसे मुलाकात हो गई गए थे मयख़ाने हम, ज़िन्दगी के ग़म भुलाने को, भूले ग़म सारे जहाँ के, जो तुमसे मुलाकात हो गई! रात के अँधेरे में देखा जब, तेरा चाँद-सा मुखड़ा, मेरी वीरान ज़िन्दगी में, फिर से चांदनी रात हो गई! झील-सी नीली आँखों से, जब बरसने लगे मोती, बादल तो गरजे नहीं, मगर क्यों बरसात हो गई! तेरी जुल्फों के साये में, खुद को भूल गए थे हम, तू खोई थी तन्हाई में और हमें हवालात हो गई! तन्हाई में तेरे बिन, करवटें लेकर गुजरी है रातें, जिंदगी के खेल में, ज़िन्दगी ही शह-मात हो गई! कवी Continue reading जो तुमसे मुलाकात हो गई

ग़ज़ल- बयां करता हूँ

ग़ज़ल- बयां करता हूँ मैं मेरी ग़जल अपने सल्तनत के नाम बयां करता हूँ मैं इस चमन,देश से बेइंतिहा मोहब्बत करता हूँ मिला मुझको आंगन खुद को ख़ुशनसीब समझता हूं मेरा हर पल,हर कतरा इस देश के नाम बयां करता हूँ देखी नही मैने आजादी,खुदको मैने आजाद पाया गांधी,नेहरू,भगत,सुभाष, की भूमि को सलाम करता हूँ पूछते हैं मुझे मेरे यार कोनसा जहां है तेरे दिल में सीने को तान अपने नाम हिंदुस्तान बतलाता हूँ कभी न थामा इन हाथों ने कोई और पताका अरे हिंदुस्तान वासी हूं हर वक्त तिरंगा लहराता हूं टेके फिरंगियों ने घुटने इन पर्वत रूपी शीशो Continue reading ग़ज़ल- बयां करता हूँ

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार

मुक्तक-खुश्बू

 मुक्तक — खुश्बू कलियों को कुछ और सँवर जाने दो फूलों को कुछ और निखर जाने दो। अभी कुछ चाह बाकी है जीने की खुश्बू को कुछ और बिखर जाने दो। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

पीने की आदत

पीने की आदत बेवजह रूसवाई सहने की आदत हो गई मुझ को तो यों दर्द छुपाने की आदत हो गई लोग न समझे बेवफ़ाई के दर्द की खराबी मुझे तो अब इल्जाम सुनने की आदत हो गई दिन- रात जब बेचैन होने की आदत हो गई तभी तो मयखाने में जाने की आदत हो गई लोग कहते पागल या कोई जानते शराबी ग़म को भुलाने ज़ाम छलकाने की आदत हो गई मुझे तो यों बदनाम होने की आदत हो गई कैसे कहे सजन को पीने की आदत हो गई सजन