मुहब्बत करने वाले

*मुहब्बत करने वाले * खैर तुझसे मुहब्बत करने वाले तो हरदम निकले , पर तुझ पर मर मिटने वाले ही बहुत कम निकले || संभाला था सदा तेरे आब-ए-तल्ख़ को जिसने , अफ़सोस उसके हिस्से में सिर्फ गम ही गम निकले || सौपी थी कोरा कागज जिनको लिखने को तकदीर , ऐन वक्त पर वे सब बिन स्याही के कलम निकले || तेरे चाहने वालो की लम्बी थी कतार जगत में पर , सही मायने में तुझे चाहने वाले तो सिर्फ हम निकले ||

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे पिला इतनी कि मैखाना इक पैमाना लगे।   बैठ तेरे आगोश में ताउम्र ऐ साकी जिन्दगी हर सूरत अक्स-ए-मैखाना1 लगे।   वक्त अब क्यूँ इस तरह खुद-इंतशारी2 का हो दर्द हो भी तो गमे-दिल3 का दीवाना लगे।   सिर्फ छूकर ही जाम तिरा नशा आने लगा हरेक बूँद अब इक छलकता पैमाना लगे।   मुश्किल अब मैखाने से उठ घर जाना लगे मैकदे की दर भी दीवारे-मैखाना लगे।   इस कदर पिला कि हमें जमाना मदहोश कहे और हमें भी मदहोश सारा जमाना लगे।   तिरी दहलीज पर जब भी आऊँ तो, ए Continue reading पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा रात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।   पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहा फिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।   आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहा उड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।   अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहा फिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।   मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैं उलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।   अपने होने का अब क्यूँ अहसास हो खोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।                  ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे मेरी किस्मत की कतरनें भी तमाम भेज दे। ए डूबते सूरज, बस इक मेहरबानी कर जा अपनी तपस बटोरकर सुलगती शाम भेज दे। ना पानी है, ना शराब का इक कतरा बचा है तू अपने लबों से चूमकर इक जाम भेज दे। कच्ची गागर है, मालूम है, फूट जावेगी बस आखरी दरार का लिखा पैगाम भेज दे। मैं कब से आँख मूँदे यूँ बेजान पड़ा हूँ अब ख्वाब में साकी दरका एक जाम भेज दे। अब की हवा का झोंका पतझर ही लावेगा हर जर्जर पत्ते पे लिख मेरा नाम भेज दे। Continue reading इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती कहीं चिन्गारी नहीं दिखती, कहीं जिन्दगी नहीं दिखती।   हरइक आवाज ऊँची थी, दूर तक गूँजती गई थी इस सन्नाटे के आगोश में खामोशी नहीं दिखती।   मौत हर रोज दिखती है, लेकिन जिन्दगी नहीं दिखती गुनाह की फेरिश्त में तड़पती जिन्दगी नहीं दिखती।   इस कफस में बैठकर देखो ए सैयाद, मेरे दोस्त! तेरे कारनामों में रहम की निशानी नहीं दिखती।   गुनहगारों में तू भी था, हर इक गुनाह करता हुआ पर तेरे चेहरे पर खुदा! परेशानी नहीं दिखती।   मुझे इस कदर रोता देखकर, तू बस हँसता रहा क्या Continue reading आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो कभी आगे इन्हें हकीकत भी बनने दो।   तमाम रात मैकदों को खुला रहने दो तमाम उम्र यूँ ही बस मदहोश रहने दो।   ये बहार आके चली भी जावे तो क्या मौसमे-मैकदा साकी, बने रहने दो।   भूख मिट जावेगी जरा इंतजार करो उसे बासी रोटी तो इधर फैंकने दो।   संभलकर चलना भी मैं सीख जाऊँगा अभी गिर-उठने का मजा जरा चखने दो।   दिल को मायूस कर देनेवाली यादें तुम भूले सभी, कुछ मुझे भी भूलने दो।   कफस में वो परकटा पंछी कैद ना रख उसे आजाद होकर बाहर Continue reading अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो

यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे

यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे मंदिर से बाहर आकर साथ चलो तो अच्छा लगे।   पत्थर की मूरत हो तराशी मुस्कान से सजे हो असली मुस्कानों से कभी निहारो तो अच्छा लगे।   माना कि बहुत पाप किये होंगे अनजाने में मगर कुछ मेरे पुण्य का भी हिसाब रखो तो अच्छा लगे।   हिम्मत से जूझता रहा हूँ तूफान की लहरों से अब मेरी किश्ती तुम्हीं बचा सको तो अच्छा लगे।   यूँ रह रह कर खींच तलवार मुझे डराया ना करो इक बार कातिल की तरह वार करो तो अच्छा लगे।   तुमको Continue reading यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे

हाथ तेरा थाम लेंगे (ग़ज़ल )

तू हाथ बढ़ाकर तो देख, हाथ तेरा थाम लेंगे, अजनबी हो कर भी हम, हाथ तेरा थाम लेंगे। भूल जाये अगर फ़र्ज़ तू, हाथ अपना छुड़ा कर, मगर हम यारों के यार हैं, हाथ तेरा थाम लेंगे। ख़ुदा को आजमाया, आजमाया तक़दीर को भी, आजमा कभी इस यार को, हाथ तेरा थाम लेंगे। गिर्दाब में फंस जाये जब, कस्ती मेरे यार की, इशारा बस एक कर देना, हाथ तेरा थाम लेंगे। इज़्तिराब हो दिल में कभी, ज़िन्दगी के सफर में, तेरे साँसों की डोर थामकर, हाथ तेरा थाम लेंगे। ये लम्हे ये तन्हाईयाँ भी, छोड़ देंगे साथ तेरा, हम बनकर Continue reading हाथ तेरा थाम लेंगे (ग़ज़ल )

तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

बेवफाई की सोहबत रास आयी, तो मैं क्या करूँ? देखा अंजाम अगर सारे शहर ने, तो मैं क्या करूँ? लाख किया था मना, कभी ना करना मोहब्बत, जब दिल के टुकड़े हुए हज़ार, तो मैं क्या करूँ? मोहब्बत की राहों में, काँटों के सिवा कुछ नहीं फूलों की चाहत रखोगी दिल में, तो मैं क्या करूँ? मैंने तो की थी इबादत, तुझे खुदा समझ कर, तू ही अपना फ़र्ज़ भूल जाए, तो मैं क्या करूँ? आये थे तेरी महफ़िल में, तेरे दिदार को हम, मेहताब छुपा था नक़ाब में, तो मैं क्या करूँ? अब्र को भेजा था पैयाम, खूब बरसना Continue reading तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

चहकने लगी शराब (ग़ज़ल)

जब से मिली तेरी सोहबत, चहकने लगी शराब, देख तेरी परवाज़ अब्र में, चहकने लगी शराब। फ़लक से जो उतरा शबाब, चमन-ए-दहर में, पाकीज़ा खुशबु से उसकी, महकने लगी शराब। तेरी शोखियाँ से मुत्तासिर, पैमाने छलक गए, जाम ने जो छुआ होठों को, बहकने लगी शराब। जल रही थी चिंगारियां जब, दो दिलों के दरमियाँ, चिंगारी एक यहाँ भी गिरी, दहकने लगी शराब। बड़े बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से जो निकले, सितारों को देख गर्दिश में, सिसकने लगी शराब। महताब की तबस्सुम पे, इतना मत इतरा ‘ एकांत, गुफ्तगू जो हुई आफ़ताब से, मचलने लगी शराब। (किशन नेगी ‘एकांत’)

ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)

नज़ाकत देख तेरी शोखियाँ की , मचलता है दिल यहाँ नादान्स्तिा में करके मोहब्बत, मचलता है दिल यहाँ मेरे इख़्तियार में ना था, चाँद हो मेरे आगोश में, तड़पता है महताब वहां, तड़पता है दिल यहां। एक आशना की जुस्तुजू में, गुजर गई एक हयात, बिजली कड़की आकाश में, कड़कता है दिल यहां। ख़लिश है दिल में आज भी, खामोश क्यों रहा, तू धड़कती है वहां, और धड़कता है दिल यहां। क़ासिद बना इख्लास का, ये मुहाजिर तेरे शहर में, फड़कती है तू वहां, और फड़कता है दिल यहां। इन्तिक़ाम की आग में, उठता है धुआं ‘एकांत‘, वो दहकती है Continue reading ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)

भूल गया (ग़ज़ल)

पैमाना खा गया धोखा, अब्र शराब गिराना भूल गया, जमीं तड़पती रही प्यासी, अब्र शराब गिराना भूल गया। शायर ने ग़ज़ल से कहा, कभी ख्वाब में भी आया करो, सारी रात ग़ज़ल लिखी, ग़ज़ल ख्वाब में आना भूल गया। हुस्न ने शायर से कहा, कभी नजरें मिला लिया करो, देखा जब हुस्न को, शायर नज़र मिलाना भूल गया। कहकशाँ की महफ़िल में, मसरूफ था महताब भी, रात उतर आई जमीन पर, चाँद निकलना भूल गया। तुझसे रक़ाबत कैसे हो, जब तू ही मेरी तसव्वुर है, तेरी परवाज़ देख कोहसार में, सांस लेना भूल गया। हाथ में मशाल लिए, आई जलाने Continue reading भूल गया (ग़ज़ल)