अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा

अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा, दर्द हद से गुज़रता है तो अश्क अब्सारों में सूख जाते हैं| हँसते चेहरे से ख़ुशी का अंदाजा लगाना मुनासिब नहीं, कई मर्तबा तो ग़मों को छुपाने के लिए लोग मुस्कुराते हैं| मेरी नज़र में मुफ़लिस तो वो अहसान फरामोश लोग हैं, देखो फ़कीरों की अमीरी मुफ़्त लाखों दुआएं दे जाते हैं| ज़िन्दगी में सामना होता है सबका अक्सर परेशानियों से, बुलंद इरादों वाले टिकते हैं कमज़ोर अक्सर टूट जाते हैं | मुसीबतों का सैलाब आता है तो कुछ ज़रूर सिखाता है, तमाम सबक लेते हैं गुमान में अंधे अक्सर डूब Continue reading अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का, हमने भी कभी न देखे पैरों में पड़े हुए थे जो फूटे छाले | मुख़्तलिफ सी हो जाती है उनकी ज़िन्दगी दूसरों से, जब ज़ेहन में कोई खुद के ही ज़ुनून की लौ जला ले | यूँ अफ़सुर्दा चेहरा लेकर उससे मुख़ातिब नहीं होते हैं, जब कोई तुम्हारी सूरत को ही अपना आईना बना ले| सुना है आज़माईशों से तो मुक़द्दर भी बदल जाता है, ज़ाहिल हैं वो जिनके ख़्वाबों को आब-ए-चश्म बहा ले | इब्तिला है मेरा कि अक्सर खुद से ज़फा किया है हमने, मुक़द्दर ने तो दस्तक Continue reading सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर, यूँ ही ना पीठ पीछे हमें अक्सर बदनाम किया करो | आसान नहीं किसी की फितरत जाहिरा समझ पाना, शक्ल देखकर किसी को अज़ीम ना बना दिया करो | बहुत बुलंद तामीरों की सिर्फ खूबसूरती पर मत जाओ, कसीदे पढ़ने से पहले नीव की गहराई जान लिया करो | कोई कितना ही अज़ीज़ क्यों ना हो किसी का यहाँ, ग़म-ए ज़िन्दगी का जिक्र यूँ हर किसी से ना किया करो | बड़े नाज़ुक हो चुके हैं त-अल्लुक़ भी अब समाज में, रिश्ते संजोने को सिलसिले माफ़ी के बना लिया करो | मुफ़लिसी Continue reading हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए, तब मंज़िल का पता उसे भला कौन बताए ? समंदर के गिर्दाब में फंसी हो जब कभी कश्ती, इस तूफां में माँझी तब कैसे उसे पार लगाए? जरूरी नहीं कि हर मुसाफ़िर को सही रास्ता मिले, तमाम हैं जो भटके तो फिर कभी लौट के ना आए | गुमान भी शागिर्द बन बैठा है कामयाबी का , बहुत कम लोग हैं यहाँ जो इससे हैं बच पाए | गर मज़बूत हो इरादा और यकीं खुद पर तो, किसकी है जुर्रत यहाँ जो उसे राह से डिगाए ? मेरी शायरी से –

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी खुशी की बहार लाती है हवायें भी। यह पहले भी सुना था देर नहीं है जमीं पर बिखरेंगी रब की दुआयें भी। मेरी आँखें ढूँढ रही उसी चाँद को जिसे छिपाये है सावन की घटायें भी। ‘भूख लगी है’ बच्चे आते ही कहेंगे थाल परोसे रखती हैं मातायें भी। कैद हो या जमाने की कालकोठरी सभी को सहन करनी होगी सतायें भी। बच्चों की हर खुशी में महक होती है महक नहीं रखती है बूढ़ी अदायें भी।                       … भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था मेरा मुकद्दर सहसा बदलने यहाँ आया था।   कितना खामोश, तन्हा, उदास दिख रहा है वो ना मालूम किस-किससे मिलके यहाँ आया था।   कितना अजीब चिराग है बुझाये बुझता नहीं वो किस अँधेरे से गुजरके यहाँ आया था।   इस राह की धूल पावों को जलाने लगी है किसका दहकता जिगर टहलने यहाँ आया था।   मेरी ही आवाज का झोंका मुझे रुला गया है ना जाने किस दर्द को छूके यहाँ आया था।           ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।   नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है गौर से तो देख, साकी की नजरों में।   हादसा था वोह नाजुक से प्यार का पर दहला गया है सारे शहरों को।   कातिल न था वो बस रखने आया था मेरे सीने में अपने खंजरों को।   लजा जाता है अक्स भी आईने का झुका लेता है वो अपनी नजरों को।   लौट आने की चाहत में अपने घर खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।   उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर जलाती गई Continue reading महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।   ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।   इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।   ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।   बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।   गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं। ……    भूपेन्द्र Continue reading लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

मुहब्बत करने वाले

*मुहब्बत करने वाले * खैर तुझसे मुहब्बत करने वाले तो हरदम निकले , पर तुझ पर मर मिटने वाले ही बहुत कम निकले || संभाला था सदा तेरे आब-ए-तल्ख़ को जिसने , अफ़सोस उसके हिस्से में सिर्फ गम ही गम निकले || सौपी थी कोरा कागज जिनको लिखने को तकदीर , ऐन वक्त पर वे सब बिन स्याही के कलम निकले || तेरे चाहने वालो की लम्बी थी कतार जगत में पर , सही मायने में तुझे चाहने वाले तो सिर्फ हम निकले ||

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे पिला इतनी कि मैखाना इक पैमाना लगे।   बैठ तेरे आगोश में ताउम्र ऐ साकी जिन्दगी हर सूरत अक्स-ए-मैखाना1 लगे।   वक्त अब क्यूँ इस तरह खुद-इंतशारी2 का हो दर्द हो भी तो गमे-दिल3 का दीवाना लगे।   सिर्फ छूकर ही जाम तिरा नशा आने लगा हरेक बूँद अब इक छलकता पैमाना लगे।   मुश्किल अब मैखाने से उठ घर जाना लगे मैकदे की दर भी दीवारे-मैखाना लगे।   इस कदर पिला कि हमें जमाना मदहोश कहे और हमें भी मदहोश सारा जमाना लगे।   तिरी दहलीज पर जब भी आऊँ तो, ए Continue reading पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा रात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।   पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहा फिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।   आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहा उड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।   अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहा फिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।   मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैं उलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।   अपने होने का अब क्यूँ अहसास हो खोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।                  ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000