जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जिन्दगी क्या है यह तो वक्त बताता है इसका मकसद भी वक्त बदलता जाता है।   जो मुहब्बत जताता है मुकर जाता है जो मुहब्बत करता है हरदम निभाता है।   तूफाँ का उठाकर किनारे फेंक देना जिन्दगी का अजीब नजारा दिखाता है।   जिन्दगी उम्मीद का एक पैमाना है जब दरक जाता है तो अश्क बहाता है।   जिन्दगी जब भी मौत से डरने लगती है डर हर इक साँस को रोककर डराता है।               ——    भूपेन्द्र कुमार दवे                00000 Advertisements

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तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं गम आगोश लिया मस्त मैखाना हूँ मैं। तू अक्स और तेरा आईना हूँ मैं तेरे फेंके पत्थर का निशाना हूँ मैं। तू ही गम है मेरी मस्ती भी है तू इन्हीं बातों का हुआ दीवाना हूँ मैं। अब क्यूँ धुँआँ देती है तू ए शमा तूने जिसे जलाया वो परवाना हूँ मैं। गम भुलाने जो हरसू याद किया जावे वो ही जश्ने-गम का अफसाना हूँ मैं। बस पा सका हूँ कुछ ऐसी जिन्दगी मौत का बना हुआ इक नजराना हूँ मैं। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

है सफर में

है सफर में है सभी तो सफर में इस जिंदगी में जो यहाँ, फिरते है अक्सर उदास ज़िंदगी मे जो यहाँ। पलभर भी कभी ये लम्हें पाते खुशी के कहाँ? खुदको बस आ गए है रास ज़ीन्दगी मे जो यहाँ। जो कभी मिली इजात गमें -हयात से राह में, तो वहीँ जी ले कुछ यूँ ख़ास ज़िंदगी में जो यहाँ। ढूंढते क्यूँ फिरते रहते सब अपने आप को, कोइ प्यारा ओर भी है पास जिंदगी में जो यहाँ। राह खुदा की यहाँ सबको न अक्सर मिलती, सब यहाँ भूले उसे है आसपास जिंदगी में जो यहाँ। -मनीषा जोबन देसाई

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो मेरे चेहरे पर मेरा ही चेहरा रहने दो जब तक खुद वो अपने गुनाह ना कबूल करे तुम इन गवाहों को गूंगा बहरा रहने दो कितनी मिन्नतों के बाद ये बहार आयी है अब मौसम न बदले हवा का पहरा रहने दो वो बूढ़ा शजर चिड़ियों का बड़ा प्यारा है अब के खिजां में कुछ पत्तों को हरा रहने दो गूंगे बहरे का एहसास जरा न होने दो होठों पर सन्नाटा तुम भी गहरा रहने दो मेरी मां के आंसू अब और न बहने दो मेरी फोटो पर गुनाह का कुहरा रहने दो Continue reading मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे चलो आज फिर दिल को मनाया जावे यादों की  किश्ती को  सजाया  जावे।   यूँ  नंगे बदन  कब तक  चलोगे, यारों चलो फिर किसी का कफन चुराया जावे।   इस शहर को और भी सजाया जाये हर लाश को चौक पे  बिठाया जाये।   यह गुजरात है यहाँ क्या किया जाये मैकदा  अब घर को ही बनाया जाये।   जला दिया जाता है हर घोंसला यहाँ क्यूँ  न इस चमन को जलाया जाये।   पढ़कर गजल बहुत जो रोना आ गया क्यूँ  ना  इसे अश्क से  मिटाया जाये।   पर- शिकस्ता हूँ  यह Continue reading चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था जिसपे नाज था मुझको वो गुलिस्तां यहीं था   ना हो यकीं तो उठती लहरों से पूछ लो मेरी किश्ती यहीं थी और तूफां यहीं था   खुशबू मेरे अश्क की आती है यहीं से मैं पीता था जहां बैठ वो मैकदां यहीं था   ये अंधेरा नहीं  नूर-ए-मजार-ए-उजाला है बुझे थे चिराग यहीं पे उठा धुआं यहीं था   गुल खिले अदा के यहीं वफा की खुशबू लिये इश्क बागवां यहीं था हुस्न शादवां यहीं था   फुटपाथ पर पड़ी लावारिश लाश मेरी थी ये Continue reading तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

याद है

याद है आपका वो मिलना तो याद है दिलका वो खिलना तो याद है। जिस तरहा बिछड़े थे मोड़ पर और तुम्हें ही गवाँना तो याद है। देखते है सब नज़ारे  राह  पर आपका ही गुज़रना तो याद है। हँसकर हम टाल देते है  सदा, दिलमें गम पालना तो याद है। आँख से बहती तन्हाई जो कभी बेवजह ही चाहना तो याद है। -मनीषा “जोबन “

वक्त हीं कितना लगता है

वक्त हीं कितना लगता है ख़ुद ही जलकर नूर होने में सबके बीच मशहूर होने में . वक्त ही कितना लगता है सपने चकनाचूर होने में . शब्दभर का फासला है मिल जाने व दूर होने में . पहलू में खतरा ही खतरा एक बहादुर शूर होने में . दुनिया अब दुनिया लगती है तेरा एक सुरूर होने में . ©सत्येन्द्र गोविन्द 8051804177

इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

इक बार इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो हर इक दिल में खुदा है इसका अहसास करो।   इनसे ही घोंसला मेरा घर भी आबाद है ये चिड़ियाँ चहकती हैं इन्हें न उदास करो।   नन्हीं सी ख्वाईश है इक तुम्हें पाने की पर तुम्हीं कह रहे ये आस बेलिबास करो।   कहते हैं तुम कैद हो हर इक बुतखाने में मैं तो तुममें हूँ,  खत्म ये कारावास करो।   तुम्हें भूलकर अब मैं और किसका नाम जपूँ तुम भी नाम बदलकर लब न बेमिठास करो।   कच्ची गागर समझ इस दिल को न खाली रखो जनम Continue reading इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

26 जनवरी

ग़ज़ल (जनवरी के मास की) 2122 2122 2122 212 जनवरी के मास की छब्बीस तारिख आज है, आज दिन भारत बना गणतन्त्र सबको नाज़ है। ईशवीं उन्नीस सौ पंचास की थी शुभ घड़ी, तब से गूँजी देश में गणतन्त्र की आवाज़ है। आज के दिन देश का लागू हुआ था संविधान, है टिका जनतन्त्र इस पे ये हमारी लाज है। हक़ सभी को प्राप्त हैं संपत्ति रखने के यहाँ, सब रहें आज़ाद हो ये एकता का राज़ है। राजपथ पर आज के दिन फ़ौज़ की छोटी झलक, दुश्मनों की छातियाँ दहलाए ऐसी गाज़ है। संविधान_इस देश की अस्मत, सुरक्षा का Continue reading 26 जनवरी

कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने

कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने उतार मुझे सूली से खुद को चढ़ा लिया है खुदा ने। कितनी अनोखी सौगात वो देता रहा है मुझको अपने अश्क मेरी आँखों अब केे दिया है खुदा ने। अब के साल गिरह में देखना वो तोहफा न लाये हर बार इक बरस देने का वादा किया है खुदा ने। आखरी साँस तलक तो सबको जीना ही होता है मेरी हर साँस को आखरी बना दिया है खुदा ने। मेरी बंद मुठ्ठी में रख कहा इसे मत खोलना कैसे अब बताऊँ कि मुझे क्या क्या दिया है खुदा ने। पकड़कर हाथ Continue reading कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने

ये ही तेरे मैकदे का राज खोलते हैं

ये ही तेरे मैकदे का राज खोलते हैं तेरे हाथ कँपते हैं जब जहर घोलते हैं। जहराबे-गम को अमृतकणों से जोड़ते हैं ये सोचनेवाले भी क्या खूब सोचते हैं। तन्हा रहूँ या भीड़ में खामोश रहता हूँ इधर सब चुप रहते हैं उधर सब बोलते हैं। ये कैसी अजब गली में तुम जाके बसे हो मैं एक खटखटाता हूँ सब दर खोलते हैं। मैं तो शाखे-जर्द का एक बर्गे-खुश्क हूँ ये तो फूल हैं जो दिल की तरह काँपते हैं। हमने दुआ का असर देखा भी तो इस तरह अश्क मुस्कराते हुए अब जख्म खोलते हैं। ये वोह फूल नहीं Continue reading ये ही तेरे मैकदे का राज खोलते हैं

ढूँढ़नेवालों को मेरे कई निशान मिले

ढूँढ़नेवालों को मेरे कई निशान मिले मुझी से टकराये पत्थर लहूलुहान मिले। मुझे भी मेरे गुनाहों के कई निशान मिले मुझे माफ करने वाले कई इंसान मिले। हाल मत पूछो मेरे इस रोशन शहर का आग में सुलगते यहाँ कई इक मकान मिले। यहाँ चप्पे चप्पे कई मंदिर मस्जिदें मिली पर सड़क पे आते-जाते सब शैतान मिले। छोड़ दूँ मैं अपनी इस खुदकुशी की सोच को अगर कोई कातिल मुझे भी मेहरबान मिले। सुना था कि तुम्हारी जुबान ही नहीं चलती हर कब्र पे तिरी बदजुबान के निशान मिले। मुझे काँधा देनेवाले जो भी लोग मिले वे सभी मेरी तरह Continue reading ढूँढ़नेवालों को मेरे कई निशान मिले

जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा

जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा होगी कब इक मुलाकात मैं सोचता रहा। सुना था तू मेरे दर आके लौट गया था क्या थी कमी मुझमें मैं बस यही सोचता रहा। तुम इक आवाज बन फलक में गूँजते रहे मैं बहरों की भीड़ में बहरा बन छिपता रहा। तू मिला भी तो इक गरीब अजनबी की तरह मैं अमीरों की तरह तिजोरी खंगालता रहा। रात इधर ढलती रही दिन उधर निकलता रहा मैं कंपित लौ का दिया धुँआ धुँआ जलता रहा। चिरागे-हयात तूने ही जलाके बुझा दिया मैं नाहक ही Continue reading जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा

आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना

आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना सीखा नहीं हौसलों ने भी बिखर जाना। काँटों को भाता है चुभकर टूट जाना फूलों की शान है महककर बिखर जाना। हमें अब भी आता है बच्चों की तरह उछलते कूदते मुस्कराते घर जाना। पंख फैलाये उड़ान लेने के पहले चिड़िया जान लेती है कि है किधर जाना। मैं भी इक आदमी हूँ ठीक खुदा की तरह हर पल कुछ करते हुए और निखर जाना। सीने से निकल लब तक आती ये पुकार ये भी मेरी इबादत का है सँवर जाना। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे 00000