आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

घर में खुशहाली लाने का कोई उपाय पूछने चिंतातुर पत्नी पहुंची पांडे पंडितजी के पास शरणागत होकर बताई अपने दिल की वेदना नहीं है सुख शांति घर में उपाय बताओ खास नैनों में देख झरते अश्क इक अबला नारी के पंडित जी के ख्वाब आसमान में टहलने लगे सोलह शृंगार संपन्न मोहिनी से मिलते ही नज़र दिल में दबे अरमान आज फिर से मचलने लगे प्रेम सागर में लगाकर डुबकी पंडित जी बोले सुंदरी, चाहती हो अगर घर में खुशहाली लाना बताता हूँ अचूक उपाय, पहली रोटी गाय को आखिरी रोटी किसी भिखारी को ही खिलाना प्रेम सिंधु की लहरों Continue reading आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

बिगड़े पति की हरकतों से परेशान बीवी बोली सपने में भी मत सोचना मैं कभी तुमसे डरूंगी ये वादा है मेरा जानू अगर तुम ठीक से रहोगे भाजपा के चुनाव चिह्न से आपका स्वागत करुँगी लेकिन बावला पति रहता सदा अपनी धुन में किसी कली ने नहीं डाली इस भँवरे को घास पत्नी ने किया आगाह ज़्यादा चतुराई दिखाई तो फिर कांग्रेस का चुनाव चिह्न है सदैव मेरे पास दीवाने आशिक की हरकतें होती गयी हद पार भवंरा मंडराता कभी इस डाल, कभी उस डाल हर महफ़िल से बेआबरू हो कर निकला भवंरा मगर फर्क नहीं पड़ा उसे जैसे हो Continue reading बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

वो कभी वक्त का मारा तो कभी हुआ परेशान सिंधु लहरों में बह गए हैं उसके सभी अरमान कभी वह बंजर जमीं तो कभी खोखला आसमान रहम करो ऐसे पति पर आखिर वह भी है इंसान नहीं है कोई ठौर ठिकाना ना उसका कोई गाँव नसीब में नहीं है शायद पीपल की शीतल छाँव कंटीली डगर चलते रक्तरंजित हुए उसके पाँव खोटी तक़दीर पर कौवे भी मंडराते कांव-कांव गीता पढता वह ताकि मिल जाए उसे आज़ादी ग्रन्थ साहिब भी सुनता ताकि रुक जाए बर्बादी नित्य क़ुरान वह पढता बन कर उसका फरियादी जिसने ऐसा हाल किया वह थी उसकी शहज़ादी Continue reading परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

पति-पत्नी दोनों गए एक कॉकटेल पार्टी में जहाँ ग़मों के जाम पर जाम छलक रहे थे मदहोश मनचले जोड़े डाल बाहों में बाहें उन्मत हो मदिरा के समुन्द्र में बहक रहे थे चढ़ा कर एक जाम लड़खड़ाती पत्नी बोली डार्लिंग, टल्ली हो कर वह जो मटक रहा है ठुकराया था रिश्ता उसका मैंने एक दिन मुझे न पाकर अब देखो कैसे भटक रहा है पति बोला, नशे में वह नहीं तुम हो कामिनी ख़ुमारी में दिमाग तो तुम्हारा ही घूम रहा है तुम्हें ही न पाकर खुशनसीब है वह कितना, लगाकर जाम ख़ुशी के जश्न में झूम रहा है हाथ Continue reading डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

  थका चेहरा लटकाये पति घर लौटा जैसे पतझड़ में सावन की झड़ी हो झल्लाकर बोला खाना लगा दो जानू पत्नी जैसे छप्पन व्यंजन लिए खड़ी हो   भूखे ने जैसे ही खाया पहला निवाला उड़ गयी बेचारे की चेहरे की चमक आक्रोशित हो लगा पत्नी को कोसने क्या सब्जी में नहीं डाला था नमक   घबराई, फिर मुस्कुराकर बोली पत्नी जानू, भूखे पेट इतना नहीं बिगड़ते सब्जी जल गयी थी, माँ मेरी कहती है जले पर कभी नमक नहीं छिड़कते   जले-भुने पति ने निकाली दबी भड़ास मेरे जले पर नमक ही तो छिड़कती हो  तुम्हारे बाप ने बाँधा Continue reading जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

रसोई में बजाकर बर्तन सुबह-सुबह पत्नी झल्लाई अपने वफ़ादार दुल्हे पर चादर ताने देखते हो ख़्वाब पड़ोसन के और जलते हैं इधर ख़्वाब मेरे चूल्हे पर होती अर्धांगिनी अगर किसी राक्षस की शायद कभी ना होती मैं इतनी परेशान किस कर्मजले पंडित ने मिलाई कुंडली जो ढूंढ कर मिला तुम जैसा पति शैतान पति सकुचाया, फिर मुस्कराकर बोला भली हो तुम जैसे कश्मीर की वादी राक्षस को कैसे तुम वरमाला पहनाती जानू, खून के रिश्ते में नहीं होती शादी अगर होती तुम सुहागन राक्षस की सदैव कहलाती तुम उसकी दानवी काश, ये सपना अगर सच हो जाता मेरे ख़्वाबों में Continue reading अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

नेता

मन कहता नेता बन जाऊ। पहनू लम्बा कुर्ता टोपी जोर जोर से मैं चिल्लाऊ। मन कहता नेता बन जाऊँ कोई नहीं पूछेगा पढाई टैक्स नहीं जो होगी कमाई बी आई पी की कुर्सी पाऊ मन कहता नेता बन जाऊँ । कोई कानून न आडे आये जो आये संशोधन करवाये बिना पूँजी धन थोक कमाऊ मन कहता नेता बन जाऊँ । झूठ बोलना सीख ही लूँगा । हर काम में कमीशन लूँगा जिसको तिसको धाक जमाऊ मन कहता नेता बन जाऊँ । वादा मेरा अस्त्र बनेगा झूठ मेरा धर्म बनेगा दाग रहे पर बेदाग दिखाऊ मन कहता नेता बन जाऊँ । Continue reading नेता

क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य) रिमझिम-रिमझिम बारिश की फुहार खूब बरसी इस सावन में हरियाली खिलखिलाती है मेरे गांव के खेत-खलिहानों में प्रकृति ने किया अद्भुत शृंगार इठलाती-इतराती पुरवाई संग पिली सरसों भी लेती अंगड़ाई गुलाबी अहसासों के संग पर न जाने क्यों उदास है मेरे गांव का “बैल समुदाय” उनके विवश आँखों से बहते आंसू और झुर्री पड़े गालों पर गहरी व्याकुलता की रेखाएं बयां करती हैं उनकी लाचारी, बेबसी और ना उम्मीदी की दास्ताँ क्योंकि “बैल समुदाय” है भूखा कई रातों और कई दिनों से शायद खा गया है कोई चारा उनके हिस्से का चारा Continue reading क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

विद्रोह

विद्रोह मनुस्यों के घने जंगल में जानवर से परिवर्तीत परिवर्तनशील मनुस्य रहते डरे डरे से। सब खड़े हैं डरे से आम आदम डरा है, खास चुप है मूक मौन किसी नई सरसराहट से! मानवता का जंगल सड़े पत्ते, गले पत्ते से डका पड़ा है कहीं कहीं हरे लाल पत्ते नोटो से जीवन पथ को ढँक रहे नुकीले पत्थर के बिछाओ से । चलो इन पर चल सको तो, रौदों इनको रौदं सको तो, यह घिनौने, यह कूरूर यह निश्चुप,नींद में डूबे हुए ऊँघते जगे हुए,अटपटे से उलझे से ! इन्हे अचानक खींचके पकड़ के क्यों जगाया कुम्भकर्ण की नीदं से! Continue reading विद्रोह

शनि की दशा

शनि की दशा देख कर मेरी कुंडली, फेकी पंडित ने अजीब गुगली। बोला यझमान तेरी कुंडली तो उल्टी है, माफ़ करना भाई पर तेरी किस्मत ही फूटी है।। कल से शनि की महादशा है, तेरी हर कदम परीक्षा है। घर में मातम छाएगा, बाहरी तनाव भी बढ़ता जाएगा।। भला जब भी लोगो का करने जाएगा, याद रख की पीठ पीछे सिर्फ धोखा पाऐगा।।1।।   मैंने बोला पंडित कोई तो उपाय होगा, यूँ डराओ न मुझको, मेरे कष्टो का निवारण दो न।।2।।   अब पंडित फिर कुंडली पढता है, हाथो की अंगुलियो पर सारे तारे गिनता है। कुछ देर गहन चिंतन में खो जाता है, फिर नींद से जाग कर एक समाधान बताता है।। पुत्र शनि की समस्या है तो शनिवार का व्रत करो, अन्न जल त्याग कर प्रभु को प्रसन्न करो। फिर किलो भर घी-तेल मुझे भी दो, इक्कीस शनिवार तक ये उपाय दोहराते रहो।।3।।   मैंने उत्सुकतावश पूछा इस उपाय से मेरे कष्ट तो मिट जाएंगे? पंडित मन्द मन्द मुस्कुराया, तेरे कष्टो का पता नही मेरे घर जरूर भर जाएंगे।।4।। ***नि-3***

मैं मेरे जैसा

मैं मेरे जैसा मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो? पत्नी देवी ताने देती मुझको रोज-रोज ही……. कवर फिसल जाती है जब सोफे पे बैठो तो, चादर मुड़ जाती है जब बिस्तर पे लेटो तो, बस पूछो मत, बिगर जाती है तकिए की हालत तो… मैं कहता हूँ, देवी जी, थोड़ा मुझको मेरे जैसा तो रहने दो? गिन-गिन कर ताना देती फिर आदतों पर…… बिस्तर पर ही रख छोड़ेंगे, गीले तौलिए को, कपड़े गंदे कर ही लेंगे जब खाना खाए तो, लेटे-लेटे ही बस फरमाएंगे, ए जी चाय पिलाओ तो… मैं कहता हूँ, देवी जी, Continue reading मैं मेरे जैसा

वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता….!

वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता….! रंग साँवला मेरा, है प्यारा उनको, वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता……! शायद!…..शायद क्या? सही में….. पल पल वो तिल तिल मरती, अन्दर ही अन्दर जीवन भर घुटती, मन पर पत्थर रखकर वो जीती, विरक्ति जीवन से ही हो जाती, या शायद वो घुट घुट दम तोड़ देती! शायद!…..शायद क्या? सही में….. पलकें अपलक उनकी ना खुलती, भीगी चाँदनी में रंग साँवला कहाँ देेखती, पुकारती कैसे फिर अपने साँवरे को, विरहन सी छंदहीन हालत होती, शायद जीवन ही सारी पीड़ा मय होती! शायद!…..शायद क्या? सही में….. नैनों से Continue reading वो करती क्या? गर साँवला रंग न मेरा होता….!

विवाहित की पहचान (व्यंग)

हम पर ही क्यों इतनी बंदिश लगाई जाती है l माँग में सिन्दूर और चुटकी पहनाई जाती है ll हम तो दूर से ही शादीशुदा नज़र आते है l पुरुष शादीशुदा होकर भी कुंवारा बताते है ll कोर्ट ने महिलाओ के फरमान पर किया ऐलान l शादीशुदा पुरुषों पर लगेगा “सूरज” का निशान ll जिससे ये निशान पुरुषों में दूर से नज़र आएगा l और पुरुष अपने को कुंवारा नहीं बता पाएगा ll एक पुरुष के दिमाग में खुरापाती ख्याल आया l उसने माथे से “सूरज” के निशान को मिटाया ll पराई नारी को बिना किसी डर के छेड़ने लगा Continue reading विवाहित की पहचान (व्यंग)