मजाक एक हद तक

हम दूजे का मजाक तो पलभर में बना देते है l किंतु स्वयं वो मजाक सहन नहीं कर पाते है ll मजाक करने से पहले सहने की आदत डाले l मजाक ऐसा हो जो दिल में ना चुभोये भाले ll बाणो से लगे घाव तो कुछ दिन में भर जाते है l किंतु कहे कड़वे शब्द दिल को छलनी कर जाते है ll खुश रहने के लिए थोड़ा बहुत मजाक अच्छा है l किंतु मजाक, मजाक ही रहे बस यही अच्छा है ll मजाक करते समय अपनी जुबान पर लगाम रखे l मजाक में हमेशा दूजे की भावना का ध्यान Continue reading मजाक एक हद तक

म्हारो प्यारो राजस्थान

म्हारो प्यारो राजस्थान ***************** लागे हिवड़ा सूं भी प्यारो ओ रेतां के धोरा वालो ओ उंटा के डेरा वालो रंग रंगीलो राजस्थान घणो रसिलो राजस्थान गोडावण का जोड़ा वालो चिंकारा का जोड़ा वालो जान सूं प्यारो राजस्थान लागे रूपालों राजस्थान ऊंचा ऊंचा परबत वालो डूंगर लागे प्यारो प्यारो यो रजपूता रो राजस्थान यो घूमर वालो राजस्थान खेजड़ली की छाया वालो चम्बल नद के बीहड़ वालो ओ म्हारो न्यारो राजस्थान ओ रंग रंगीलो राजस्थान राणा प्रताप की जय वालो चेतक की यो गाथा वालो चंदन के बलिदान वालो पन्ना की स्वामिभक्ति वालो म्हारो प्यारो राजस्थान ओ रंग रंगीलो राजस्थान तीज और Continue reading म्हारो प्यारो राजस्थान

सत्य का ज्ञान

सत्य का ज्ञान सिर्फ दो ही जग़ह हो पाता है l जब इंसान अस्पताल या श्मशान जाता है ll किसी इंसान का दर्द वो तभी समझ पाता है l जब उसे या उसके अपने को दर्द सताता है ll अपनी बीमारी देख, हम परेशान से हो जाते है l अपने आगे दूजे का दुःख, समझ नहीं पाते है ll किन्तु एक बार जब हम अस्पताल पहुंच जाते है l सभी को दुखी देख, अपना दुःख ही भूल जाते है ll श्मशान घाट जाते ही हमारी सोच बदल जाती है l सुलगती हुए चिता के आगे सच्चाई नज़र आती हैll सोचते Continue reading सत्य का ज्ञान

परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर, उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर, बह जाते हों, आँखो से पिघलकर, रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर….. सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर, मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर, कूक जाते हों, कोयल के आस्वर, गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर…… प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर, विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर, रह Continue reading परिवेश

मौत एक सच्चाई

बेशक विज्ञानं ने हर जगह सफलता हासिल की है l मौत और जिंदगी तो ऊपर वाले ने ही लिखी है ll वही होता है और होगा जो ऊपर वाला चाहता हैl बिना उसकी मर्ज़ी के पत्ता भी नहीं हिल पाता है ll किन्तु किस्मत के भरोसे कभी नहीं बैठना चाहिएl हमें जीतने के लिए कोशिशे करते रहना चाहिए ll इंसान अपने कर्मो से ही अपनी किस्मत बनाता हैl मेहनत से तो किस्मत का लिखा भी बदल जाता हैll जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले की ही गुलाम है l फिर हम अपने पर क्यों करते इतना गुमान है ll गुमान Continue reading मौत एक सच्चाई

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा की आस में, अधरपट कलियों ने खोले, मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा। छूके टोहती चाँदनी तन निष्प्राण से निःश्वास है, सुधियों के अवगुंठन में बस मौन का अधिवास है, प्रीत की बंसी को तरसे, अनुगूंजित हिय की घाटी खोयी दिशा। रहा भींगता अंतर्मन चाँदनी गीली लगी, टिमटिमाती दीप की लौ रोई सी पीली लगी, रात चुप, चुप है हवा स्वप्न ने ओढ़ी चुनर जग गयी निशा। #श्वेता🍁

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… यादों के कितने ही लम्हे देकर, अनुभव के कितने ही किस्से कहकर, पल कितने ही अवसर के देकर, थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर, कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल… प्रगति के पथ प्रशस्त देकर, रोड़े-बाधाओं को कुछ समतल कर, काम अधूरे से बहुतेरे रखकर, निरंतर बढ़ने को कहकर, युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… अपनों से अपनों को छीनकर, साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर, पीढी की नई श्रृंखला रचकर, जन्म नए से युग को देकर, सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल…. नव ऊर्जा बाहुओं Continue reading बदल रहा ये साल

आइए आ जाइए

आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हँसिए-हँसाइए, रूठीए मनाइए, गाँठ सब खोलकर, जरा सा मुस्कुराइए, गुदगुदाइए जरा खुद को भूल जाइए, भरसक यूँ ही कभी, मन को भी सहलाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हैं जो अपने, दूर उनसे न जाइए, रिश्तों की महक को यूँ न बिसर जाइए, मन की साँचे में इनको बस ढ़ालिए, जीते जी न कभी, इन रिश्तों को मिटाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… भूल जो हुई, मन में न बिठाइए, खता भूलकर, Continue reading आइए आ जाइए

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

चूल्हे चौके

चूल्हे चौके चूल्हे चौके संभालती है बेटियाँ परिवार की आन बान है बेटियाँ तगारी फावड़े चलती है बेटियाँ नरेगा में काम करती है बेटियाँ घर की देहरी छोड़ती है बेटियाँ देश की प्रहरी बनती है बेटियाँ सीमा की रक्षा करती है बेटियाँ वतन की शान ये प्यारी बेटियाँ ओलंपिक में जीतती है बेटियाँ स्वर्ण पदक लाती है बेटियाँ कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

घट पीयूष

घट पीयूष मिल जाता, गर तेरे पनघट पर मै जाता! अंजुरी भर-भर छक कर मै पी लेता, दो चार घड़ी क्या,मैं सदियों पल भर में जी लेता, क्यूँ कर मैं उस सागर तट जाता? गर पीयूष घट मेरी ही हाथों में होता! लहरों के पीछे क्यूँ जीवन मैं अपना खोता? लेकिन था सच से मैं अंजान, मैं कितना था नादान! हृदय सागर के उकेर आया मैं, उत्कीर्ण कर गया लकीर पत्थर के सीने पर, बस दो घूँट पीयूष पाने को, मन की अतृप्त क्षुधा मिटाने को, भटका रहा मैं इस अवनी से उस अंबर तक! अब आया मैं तेरे पनघट, Continue reading घट पीयूष

दोहे

दोहे 1.सप्ताह का दिन रविवार,काम होते है हज़ार। घर परिवार में गुज़ार, खुशियां मिले अपार।। 2.मौज सभी मिलकर करो,आया फिर रविवार। अपनो से बातें करो,खुशी गम की हज़ार।। 3.नारे झूठे लगा रहे,राजनीति में आज। वादे जनता से किये,नेता जी ने आज।। 4.धर्म जात में बंट गया,देखो अब इंसान। आरक्षण की आग में, जल रहा हिंदुस्थान।। 5.राजनीति की नाव में ,बैठे सारे चोर। लगी डूबने नाव जब,चोर मचाये शोर।। 6.ज्ञान किवानी खोल दे, मिटे मन का अज्ञान। हो गुरुवर ऐसी कृपा,पाये हम सत ज्ञान।। 7.पढ़ते लाखो लोग है,ये गीता का ज्ञान। गीता ज्ञान महान है,कोई बिरला जान।। **राजेश पुरोहित** श्री राम Continue reading दोहे

जीवन के कल ही तो आज हो

जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के कल ही तो आज हो , जो सोचा था जो विचारा था उस काव्य के तुम चिराग हो उन रंग बिरंगी यादों के पल हो जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के दुखों की दवा प्यार हो नाव को पार लगाने वाला पतवार हो ऐसा लगता है की तुम ज्ञान का भंडार हो इन आदतों को सवार के रखना है जीवन के कल ही तो आज हो … इन चमकीले तारों से जितना लगाव  हो किसीको जिनसे किसी का इन्तजार हो एक दूसरे को समझकर रहना ही प्यार हो Continue reading जीवन के कल ही तो आज हो