एक उम्मीद

एक उम्मीद जग ऐसा कोई बनाई दे सबको दोस्त से मिलाई दे रिश्तों से जो परेशान ना हों वो नूर आँखं पे चढा़ई दे गंगा-जमुना तहजीब में दिखे भाईचारे का जग बनाई दे मन्दिर मस्जिद में भेद काहे शंख अजा़ं साथ सुनाई दे ईद दिवाली एक सी मनाये आदाब मिले या बधाई दे होली हुड़दगं की मस्ती हो हर कोई अपना दिखाई दे सजन Advertisements

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सोचो, समझो और परखो

सोचो, समझो और परखो दिल में कुछ, जबान पर कुछ नज़र आता है l कौन अपना, कौन पराया समझ नहीं पाता हैl कब कौन पीठ में, छूरा घोप दे कुछ नहीं पता l कभी-कभी विश्वास-पात्र भी धोखा दे जाता है ll चंद पलो की मुलाकात से, पहचान नहीं सकते l किसी के दिल में क्या छिपा है जान नहीं सकते ll मन की भवरों को आसानी से यूँ अगर पढ़ पाते l शायद दोस्त कम यहाँ दुश्मन ज्यादा नज़र आते ll रूप -रंग से सुंदरता आक सकते हो  व्यक्तित्व नहीं l बंद जबान से चुप्पी आक सकते हो कडवडाहट नहीं Continue reading सोचो, समझो और परखो

उल्लास

उल्लास इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन! पलक्षिण नृत्य कर रहा आज जीवन, बज उठे नव ताल बज उठा प्राणों का कंपन, थिरक रहे कण-कण थिरक रहा धड़कन, वो कौन बिखेर गया उल्लास इस मन के आंगन! नयनों से वो कौन भर लाया मधुकण आज इस उपवन! पल्लव की खुशबु से बौराया है चितवन, मधुकण थोड़ी सी पी गया मेरा भी यह जीवन, झंकृत हुआ झूमकर सुबासित सा मधुबन, जीर्ण कण उल्लासित चहुंदिस हँसता उपवन! इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन!

सोचो ! अगर ये ना होता…

सोचो अगर ये रात ना होती, तो क्या होता l इंसा हर पल दो के चार, में ही लगा होता ll दिल को सुकून, ना दिमाग को आराम होता l इंसा परेशा है जितना और ज्यादा परेशा होताll सोचो अगर ये सूरज ना होता, तो क्या होता l बिन सूरज धरती पर जीवन संभव ना होता ll बिन सूरज पेड़-पौधे अपना भोजन न कर पातेl बिन पेड़-पौधों के फिर हम साँस भी न ले पाते ll सोचो अगर ये पेट ना होता, तो फिर क्या होता l ना कुछ खाना होता ना फिर कुछ कमाना होता ll ना इंसान दिन-रात Continue reading सोचो ! अगर ये ना होता…

दर्द

दर्द दूसरो का दर्द सिर्फ वो ही समझ पाता है l जो उस दर्द से कभी होकर गुजर जाता है ll जो उस दर्द को महसूस ना कर पाया हो l वो क्या खाक दूसरो का दर्द समझ पाता हैll दर्द यूँ हर किसी को बताया नहीं जाता है l बताया जाता है उसे जो दर्द समझ पाता हैll वर्ना आपका दर्द एक मज़ाक बन जायेगा l हल नहीं निकलेगा सिर्फ बवाल बन जायेगा ll अगर ना मिले दर्द सुनने वाला कोई अपना l ईश्वर से कहो मन हो जायेगा हल्का अपना l कम से कम ये बातें आगे नहीं Continue reading दर्द

होली आई रे

होली आई रे रंग बिरंगी लो आई होली l बिखरे चहु ओर रंग हज़ारl प्रेम प्यार का रंग लगाओ l आया फिर होली त्यौहार ll भेदभाव की दीवार गिराके l दुश्मनी भुला दो, मेरे यार l आओ मिलजुल कर खेलेl रंगों भरा होली त्यौहार ll रंगों भरी पिचकारी से हम l धो दे मन के मैल हज़ार l प्रेम प्यार से गले लगाकर l मनाये होली का त्यौहार ll रंग लगाये, ऐसे हम यूँ l ना रूठे कोई , इस बार l चेहरे पर मुस्कान आये l मुबारक  होली त्यौहार ll ————–  

चाह

यदि जो चाहे, वो आसानी से मिल जाये l तो पत्थर रुपी भगवान यूँ पूजा ना जाये ll और यदि इंसान, जीवन में कुछ ना चाहे l तो इंसान, इंसान नहीं भगवान बन जाये ll हर किसी की कोई  ना कोई चाह  होती है l क्योकि जहाँ चाह होती है वहीँ राह होती है ll राह के मिलने से मंज़िले नज़र आ जाती है l मेहनत करने से हर चाह पूरी हो जाती है ll चाह हो ऐसी,  जो दूजे को भी ख़ुशी दे पाए l चाह की चाहत में ना गलत  कदम उठाये ll चाह हमें जिंदगी में आगे Continue reading चाह

सवाल

सवाल सवाल यह नहीं कि हर सवाल का जबाब ढूढ़ ही लिया जाय सवाल यह भी नहीं कि सवाल किन-किन हालातों से पैदा हुए हों सवाल यह है कि कील की तरह सवाल आखों में जब चुभने लगे सपने लहूलुहान हो जाय तब कोई तो हो जो अनगिनत हाथों की ताकत बन जाय धक्के मार कर बंद दरवाजों को तोड़ दे जबाब बाहर निकालें सपनों को मरने से बचा ले

खेल का मैदान

खेल का मैदान रचा जा रहा षड्यंत्र मासूम बच्चों के खिलाफ़ कच्चे घड़ों को बंदूक की शक्ल में ढाला जा रहा हैं खिलौनों में भरे हैं विस्फोटक पदार्थ सिरफिरे कर रहे ऐलान माँ की लोरियाँ गाई न जाए सुनो, धमाके का शोर घर-बाहर ,हर ओर सुरक्षित  नहीं बचपन किन्तु ,बच्चे मानते कहाँ होते हैं बड़े शरारती किसी भी हालात में चुप नहीं बैठ सकते घरों में दुबकने को कतई नहीं तैयार किसी न किसी दिन ढूढ़ ही लेंगे खेल का मैदान जहां – लहू के कतरे नहीं मजहब की पाबंदियाँ नहीं नस्ल का भेदभाव नहीं बस केवल गूंजेगी खिलखिलाने की Continue reading खेल का मैदान

मिथ्या अहंकार

मिथ्या अहंकार बिखरे पड़े हैं कण शिलाओं के उधर एकान्त में, कभी रहते थे शीष पर जो इन शिलाओं के वक्त की छेनी चली कुछ ऐसी उन पर, टूट टूटकर बिखरे हैं ये, एकान्त में अब भूमि पर । टूट जाती हैं ये कठोर शिलाएँ भी घिस-घिसकर, हवाओं के मंद झौकों में पिस-पिसकर, पिघल जाती हैं ये चट्टान भी रच-रचकर, बहती पानी के संग, नर्म आगोश मे रिस-रिसकर। शिलाओं के ये कण, इनकी अहंकार के हैं टुकड़े, वक्त की कदमों में अब आकर ये हैं बिखरे, वक्त सदा ही किसी का, एक सा कब तक रहता, सहृदय विनम्र भाव ने Continue reading मिथ्या अहंकार

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल, प्रखर भास्कर ने पट हैं खोले, लहराया गगण ने फिर आँचल, दृष्टि मानस पटल तू खोल, सृष्टि तू भी संग इसके होले। कणक शिखर भी निखर रहे है, हिमगिरि के स्वर प्रखर हुए हैं, कलियों ने खोले हैं घूंघट, भँवरे निकसे मादक सुरों संग, छटा धरा का हुआ मनमोहक। प्रखरता मे इसकी शीतलता, रोम-रोम मे भर देती मादकता, विहंगम दृष्टि फिर रवि ने फैलाया, प्रकृति के कण-कण ने छेड़े गीत, तज अहम् संग इनके तू भी तो रीत।

शांति ! ॐ शांति !!

शांति ! ॐ शांति !! किसी रोते हुए चेहरे को  हँसा कर तो देखो l किसी भूखे को खाना खिला  कर तो  देखो ll किसी  बेसहारे को  गले  लगाकर तो  देखो l किसी भटके हुए को राह दिखाकर तो देखो ll वो मिल जायेगा जिसके लिए  भटकते हो l वो मिल जायेगा जिसके  लिए तड़पते  हो ll वो मिल जायेगा जिसकी कामना करते हो l वो मिल जायेगा जिसकी साधना करते हो ll आखिर वो क्या है  जिसकी  हर को चाह है l जिसके बिना जिंदगी एक नरक सी राह है ll उसके बिना तो जिंदगी में रहती है अशांति Continue reading शांति ! ॐ शांति !!

मेरी कविता

मेरी कविता पीढ़ियों की बन गई गहरी जो खाईयाँ दूरियां पाट देती है मेरी कविता बुझ रहे जहाँ उम्मीद के दीये तेल में डूबी लौ है मेरी कविता भूलें अपनों को व्यस्तता की दौर में याद दिलाती है उन्हें मेरी कविता सो रहा है ज़मीर जिनका झकझोर कर उठाती है मेरी कविता खो गए जो गुमनामियों की गलियों में ढूढ़ कर सामने लाती है मेरी कविता कह नहीं पाते जो जमाने के सामने बुलंद आवाज उनकी बनाती है मेरी कविता लड़खड़ाते हैं जिनके पाँव चंद क़दमों में हाथ थाम कर सहारा देती है मेरी कविता कोई बच्चे तरसे न खिलौने Continue reading मेरी कविता

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

गीत अपाहिज-सा यह मेरा अधरों तक ही चल पाता है बन प्रार्थना विकल्प रूप-सा आँसू बनकर ढ़ल जाता है ।   शब्दों की बैसाखी पाकर बात अधूरी कह पाता है और भिखारी-सा बेचारा ठोकर ही हर पल खाता है   अर्थ ढूँढ़ता अंधे युग में अक्षर मन को छल जाता है गीत अपाहिज-सा यह मेरा अधरों तक ही चल पाता है ।   मन में, उर में पीड़ा के स्वर बिखर बिखरकर रह जााते हैं कहने को ज्यों बादल आते गरज गरजकर उड़ जाते हैं   प्यासे चातक-सा तब हारा गीत बिचारा छल जाता है गीत अपाहिज-सा यह मेरा अधरों Continue reading गीत अपाहिज-सा यह मेरा