आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… यादों के कितने ही लम्हे देकर, अनुभव के कितने ही किस्से कहकर, पल कितने ही अवसर के देकर, थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर, कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल… प्रगति के पथ प्रशस्त देकर, रोड़े-बाधाओं को कुछ समतल कर, काम अधूरे से बहुतेरे रखकर, निरंतर बढ़ने को कहकर, युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… अपनों से अपनों को छीनकर, साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर, पीढी की नई श्रृंखला रचकर, जन्म नए से युग को देकर, सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल…. नव ऊर्जा बाहुओं Continue reading बदल रहा ये साल

आइए आ जाइए

आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हँसिए-हँसाइए, रूठीए मनाइए, गाँठ सब खोलकर, जरा सा मुस्कुराइए, गुदगुदाइए जरा खुद को भूल जाइए, भरसक यूँ ही कभी, मन को भी सहलाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हैं जो अपने, दूर उनसे न जाइए, रिश्तों की महक को यूँ न बिसर जाइए, मन की साँचे में इनको बस ढ़ालिए, जीते जी न कभी, इन रिश्तों को मिटाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… भूल जो हुई, मन में न बिठाइए, खता भूलकर, Continue reading आइए आ जाइए

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

चूल्हे चौके

चूल्हे चौके चूल्हे चौके संभालती है बेटियाँ परिवार की आन बान है बेटियाँ तगारी फावड़े चलती है बेटियाँ नरेगा में काम करती है बेटियाँ घर की देहरी छोड़ती है बेटियाँ देश की प्रहरी बनती है बेटियाँ सीमा की रक्षा करती है बेटियाँ वतन की शान ये प्यारी बेटियाँ ओलंपिक में जीतती है बेटियाँ स्वर्ण पदक लाती है बेटियाँ कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

घट पीयूष

घट पीयूष मिल जाता, गर तेरे पनघट पर मै जाता! अंजुरी भर-भर छक कर मै पी लेता, दो चार घड़ी क्या,मैं सदियों पल भर में जी लेता, क्यूँ कर मैं उस सागर तट जाता? गर पीयूष घट मेरी ही हाथों में होता! लहरों के पीछे क्यूँ जीवन मैं अपना खोता? लेकिन था सच से मैं अंजान, मैं कितना था नादान! हृदय सागर के उकेर आया मैं, उत्कीर्ण कर गया लकीर पत्थर के सीने पर, बस दो घूँट पीयूष पाने को, मन की अतृप्त क्षुधा मिटाने को, भटका रहा मैं इस अवनी से उस अंबर तक! अब आया मैं तेरे पनघट, Continue reading घट पीयूष

दोहे

दोहे 1.सप्ताह का दिन रविवार,काम होते है हज़ार। घर परिवार में गुज़ार, खुशियां मिले अपार।। 2.मौज सभी मिलकर करो,आया फिर रविवार। अपनो से बातें करो,खुशी गम की हज़ार।। 3.नारे झूठे लगा रहे,राजनीति में आज। वादे जनता से किये,नेता जी ने आज।। 4.धर्म जात में बंट गया,देखो अब इंसान। आरक्षण की आग में, जल रहा हिंदुस्थान।। 5.राजनीति की नाव में ,बैठे सारे चोर। लगी डूबने नाव जब,चोर मचाये शोर।। 6.ज्ञान किवानी खोल दे, मिटे मन का अज्ञान। हो गुरुवर ऐसी कृपा,पाये हम सत ज्ञान।। 7.पढ़ते लाखो लोग है,ये गीता का ज्ञान। गीता ज्ञान महान है,कोई बिरला जान।। **राजेश पुरोहित** श्री राम Continue reading दोहे

जीवन के कल ही तो आज हो

जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के कल ही तो आज हो , जो सोचा था जो विचारा था उस काव्य के तुम चिराग हो उन रंग बिरंगी यादों के पल हो जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के दुखों की दवा प्यार हो नाव को पार लगाने वाला पतवार हो ऐसा लगता है की तुम ज्ञान का भंडार हो इन आदतों को सवार के रखना है जीवन के कल ही तो आज हो … इन चमकीले तारों से जितना लगाव  हो किसीको जिनसे किसी का इन्तजार हो एक दूसरे को समझकर रहना ही प्यार हो Continue reading जीवन के कल ही तो आज हो

बिन पटाखे दिवाली सून

प्रदूषण की आड़ में बंद कर दी आतिशबाज़ी l बोले ना होगा धुआँ ना होती पैसो की बर्बादी ll समझ नहीं आता क्या प्रदूषण यही फैलता है l सिगरेट का धुआँ, पर्यावरण स्वच्छ बनता है ? एक तरफ आतिशबाज़ी का निर्माण करवाते हो l उससे टेक्स वसूल कर अपना राजस्व बढ़ाते हो ll फिर कहते है इसकी कोई भी बिक्री नहीं करेगा l जो खरीद चुका है ,उनकी भरपाई कौन करेगा ll करना है तो आतिशबाज़ी का निर्माण बंद करो l करना है तो बीड़ी,सिगरेट का बनाना बंद करो ll करना है तो ईद पर, कोई बकरे न काटे जाये l करना है Continue reading बिन पटाखे दिवाली सून

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार रे मुसाफिर तनिक ढांढस धार न हो चिन्तातुर इन पथरीली राहों में न कर मन को उद्विग्न कंटीले पथ पर चला-चल चला-चल निर्विराम निस्संदेह मंजिल पायेगा तू अवश्य विराजते हैं वह ही विजय-सिंहासन पर ललकारता जो बाधाओं को रण-भूमि पर चीर दे सीना उस दुश्मन का, करे जो घृष्टता उसके विजयरथ को रोकने का रे मुसाफिर तू चला-चल अविरल और बन जा कर्मनिष्ठ बटोही अपने कर्मपथ पर धनुर्धारी कर्ण ने जैसे था ललकारा पांडवों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर और देख उसका अदम्य साहस थर्रा गए थे देवता भी बनकर वीर कर्ण, कर दे धराशायी Continue reading रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

ऐ ज़िन्दगी तूने कहा चल और मैं चला उन राहों में बिछाए थे तूने जहाँ अनगिनित चट्टानी पत्थर मैंने ठोकर खाई, गिरा और फिर सम्भला अपने ही पावों पर जिंदगी तूने कहा कर्म कर उन पगडंडियों पर चल कर काँटों के जंगल जहाँ बिछाए थे तूने मैं चला, पावं हुए रक्तरंजित पर मैं रुका नहीं, डिगा नहीं, चलता रहा निरन्तर अपने कर्मपथ पर बनकर कर्मठ कर्मयोगी बनकर कर्मशील बटोही जिंदगी तूने कहा उड़ नील गगन में उन पंखों के सहारे लहूलुहान कर दिया था जिन्हें तूने मगर मैं उड़ा, गिरा, फिर उड़ा बैठकर उत्साह के चांदनी मंगल रथ पर लगा Continue reading जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी जिसे चूम तू इतराता था ,सो गयी वो कलियों की रानी जिस ताल किनारे तू उड़ता था, सूख गया उसका पानी वीरान हुआ तेरा आशियाना, लिखनी है इक नई कहानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी सूरज ढल जाए इससे पहले, तुझको अब है जाना बना ले कोई नया बसेरा, और ढूंढ ले नया ठिकाना यहां न कोई अब तेरा अपना, हर कोई हुआ बेगाना याद आएंगी वो गलियां, जहाँ बीती तेरी जवानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ Continue reading चल उड़ जा रे भँवरे

अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

अभियंता-एक ब्रम्ह पुरुष हे ब्रम्हा पुरुष अभियंता तूने जगत का उद्धार किया । महाकाल बनकर हर विनाश का प्रतिकार किया ।। तेरी परीकल्पना से भुत भविष्य सब निर्भर है । हे विश्वकर्मा के मानस अक्श तेरी सिंचन से जग निर्झर है ।। पत्थर तोड़ लोहा बनाते पारस बन कुंदन । खुशबु बन जग को महकाते घिसकर तुम चन्दन ।। माटी बन कुम्हार का तूने हर मूरत को गढ़ा है । शिलालेख पर आलेख बनकर पंचतत्व को पढ़ा है।। बनकर ऊर्जा पुंज तूने किया राष्ट्र का विकास । मंगल पर पद चिन्ह बनाया । पहुचकर दूर आकाश ।। कर्तव्यनिष्ठा पर संकल्पित Continue reading अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

मेरी प्यारी हिंदी

मेरी प्यारी हिंदी लिखने में हैं सबसे सरल दिखने में दुल्हन सी सुंदर माथे पर हैं प्यारी बिंदी सबकी सखी हैं मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी शब्दों में हैं मधु सी मिठास अलंकारों से रहती अलंकृत शृंगारों से रहती श्रृंगारित दुल्हन सी लगती मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी देवनागरी हैं इसकी लिपि संस्कृत हैं इसकी जननी साहित्य हैं इसका निराला कवियों की हैं जान हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी