वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

घट पीयूष

घट पीयूष मिल जाता, गर तेरे पनघट पर मै जाता! अंजुरी भर-भर छक कर मै पी लेता, दो चार घड़ी क्या,मैं सदियों पल भर में जी लेता, क्यूँ कर मैं उस सागर तट जाता? गर पीयूष घट मेरी ही हाथों में होता! लहरों के पीछे क्यूँ जीवन मैं अपना खोता? लेकिन था सच से मैं अंजान, मैं कितना था नादान! हृदय सागर के उकेर आया मैं, उत्कीर्ण कर गया लकीर पत्थर के सीने पर, बस दो घूँट पीयूष पाने को, मन की अतृप्त क्षुधा मिटाने को, भटका रहा मैं इस अवनी से उस अंबर तक! अब आया मैं तेरे पनघट, Continue reading घट पीयूष

दोहे

दोहे 1.सप्ताह का दिन रविवार,काम होते है हज़ार। घर परिवार में गुज़ार, खुशियां मिले अपार।। 2.मौज सभी मिलकर करो,आया फिर रविवार। अपनो से बातें करो,खुशी गम की हज़ार।। 3.नारे झूठे लगा रहे,राजनीति में आज। वादे जनता से किये,नेता जी ने आज।। 4.धर्म जात में बंट गया,देखो अब इंसान। आरक्षण की आग में, जल रहा हिंदुस्थान।। 5.राजनीति की नाव में ,बैठे सारे चोर। लगी डूबने नाव जब,चोर मचाये शोर।। 6.ज्ञान किवानी खोल दे, मिटे मन का अज्ञान। हो गुरुवर ऐसी कृपा,पाये हम सत ज्ञान।। 7.पढ़ते लाखो लोग है,ये गीता का ज्ञान। गीता ज्ञान महान है,कोई बिरला जान।। **राजेश पुरोहित** श्री राम Continue reading दोहे

जीवन के कल ही तो आज हो

जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के कल ही तो आज हो , जो सोचा था जो विचारा था उस काव्य के तुम चिराग हो उन रंग बिरंगी यादों के पल हो जीवन के कल ही तो आज हो जीवन के दुखों की दवा प्यार हो नाव को पार लगाने वाला पतवार हो ऐसा लगता है की तुम ज्ञान का भंडार हो इन आदतों को सवार के रखना है जीवन के कल ही तो आज हो … इन चमकीले तारों से जितना लगाव  हो किसीको जिनसे किसी का इन्तजार हो एक दूसरे को समझकर रहना ही प्यार हो Continue reading जीवन के कल ही तो आज हो

बिन पटाखे दिवाली सून

प्रदूषण की आड़ में बंद कर दी आतिशबाज़ी l बोले ना होगा धुआँ ना होती पैसो की बर्बादी ll समझ नहीं आता क्या प्रदूषण यही फैलता है l सिगरेट का धुआँ, पर्यावरण स्वच्छ बनता है ? एक तरफ आतिशबाज़ी का निर्माण करवाते हो l उससे टेक्स वसूल कर अपना राजस्व बढ़ाते हो ll फिर कहते है इसकी कोई भी बिक्री नहीं करेगा l जो खरीद चुका है ,उनकी भरपाई कौन करेगा ll करना है तो आतिशबाज़ी का निर्माण बंद करो l करना है तो बीड़ी,सिगरेट का बनाना बंद करो ll करना है तो ईद पर, कोई बकरे न काटे जाये l करना है Continue reading बिन पटाखे दिवाली सून

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार रे मुसाफिर तनिक ढांढस धार न हो चिन्तातुर इन पथरीली राहों में न कर मन को उद्विग्न कंटीले पथ पर चला-चल चला-चल निर्विराम निस्संदेह मंजिल पायेगा तू अवश्य विराजते हैं वह ही विजय-सिंहासन पर ललकारता जो बाधाओं को रण-भूमि पर चीर दे सीना उस दुश्मन का, करे जो घृष्टता उसके विजयरथ को रोकने का रे मुसाफिर तू चला-चल अविरल और बन जा कर्मनिष्ठ बटोही अपने कर्मपथ पर धनुर्धारी कर्ण ने जैसे था ललकारा पांडवों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर और देख उसका अदम्य साहस थर्रा गए थे देवता भी बनकर वीर कर्ण, कर दे धराशायी Continue reading रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

ऐ ज़िन्दगी तूने कहा चल और मैं चला उन राहों में बिछाए थे तूने जहाँ अनगिनित चट्टानी पत्थर मैंने ठोकर खाई, गिरा और फिर सम्भला अपने ही पावों पर जिंदगी तूने कहा कर्म कर उन पगडंडियों पर चल कर काँटों के जंगल जहाँ बिछाए थे तूने मैं चला, पावं हुए रक्तरंजित पर मैं रुका नहीं, डिगा नहीं, चलता रहा निरन्तर अपने कर्मपथ पर बनकर कर्मठ कर्मयोगी बनकर कर्मशील बटोही जिंदगी तूने कहा उड़ नील गगन में उन पंखों के सहारे लहूलुहान कर दिया था जिन्हें तूने मगर मैं उड़ा, गिरा, फिर उड़ा बैठकर उत्साह के चांदनी मंगल रथ पर लगा Continue reading जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी जिसे चूम तू इतराता था ,सो गयी वो कलियों की रानी जिस ताल किनारे तू उड़ता था, सूख गया उसका पानी वीरान हुआ तेरा आशियाना, लिखनी है इक नई कहानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी सूरज ढल जाए इससे पहले, तुझको अब है जाना बना ले कोई नया बसेरा, और ढूंढ ले नया ठिकाना यहां न कोई अब तेरा अपना, हर कोई हुआ बेगाना याद आएंगी वो गलियां, जहाँ बीती तेरी जवानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ Continue reading चल उड़ जा रे भँवरे

अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

अभियंता-एक ब्रम्ह पुरुष हे ब्रम्हा पुरुष अभियंता तूने जगत का उद्धार किया । महाकाल बनकर हर विनाश का प्रतिकार किया ।। तेरी परीकल्पना से भुत भविष्य सब निर्भर है । हे विश्वकर्मा के मानस अक्श तेरी सिंचन से जग निर्झर है ।। पत्थर तोड़ लोहा बनाते पारस बन कुंदन । खुशबु बन जग को महकाते घिसकर तुम चन्दन ।। माटी बन कुम्हार का तूने हर मूरत को गढ़ा है । शिलालेख पर आलेख बनकर पंचतत्व को पढ़ा है।। बनकर ऊर्जा पुंज तूने किया राष्ट्र का विकास । मंगल पर पद चिन्ह बनाया । पहुचकर दूर आकाश ।। कर्तव्यनिष्ठा पर संकल्पित Continue reading अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

मेरी प्यारी हिंदी

मेरी प्यारी हिंदी लिखने में हैं सबसे सरल दिखने में दुल्हन सी सुंदर माथे पर हैं प्यारी बिंदी सबकी सखी हैं मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी शब्दों में हैं मधु सी मिठास अलंकारों से रहती अलंकृत शृंगारों से रहती श्रृंगारित दुल्हन सी लगती मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी देवनागरी हैं इसकी लिपि संस्कृत हैं इसकी जननी साहित्य हैं इसका निराला कवियों की हैं जान हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी

चिंता और चिंतन

चिंता और चिंतन ना दिल को सुकून है,ना दिमाग को आराम है l हर कोई चिंतित है, हर कोई यहाँ परेशान है ll चिंता इंसान के दिलो दिमाग पर छा रही है l चिंता की ये लकीरे, साफ नज़र आ रही है ll चिंता स्वयं नहीं आती,  हम ही उसे बुलाते है l जब जरूरत से ज्यादा अपनी इच्छा जताते है ll बुरा नहीं अपनी इन इच्छाओ को पंख लगाना l बुरा है इसे पूरा करने में दूजे को हानि पहुंचना ll करना  है तो चिंता नहीं,  चिंतन  करो मेरे  भाई l चिंता से अशांति जन्मे,चिंतन से आत्मबुद्धि आई ll Continue reading चिंता और चिंतन

गाओ फिर गीत वही

गाओ फिर गीत वही   गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था मेघों की पलकों जो भादों भर लाया था   मेरे मन को बहलाने की घावों को भी झुटलाने की छन्दों से मत कोशिश करना बिखरे शब्दों को मत तजना गाओ बस गीत सदा जो दिल तेरा गाता था गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था   पीड़ा की आँधी से डरकर लहरों की टक्कर से बचकर नाव नहीं तुम खेना ऐसे यम से डरता मानव जैसे खंड़ित वीणा मैं ही ले उस दिन आया था गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था Continue reading गाओ फिर गीत वही

कठपुतली

कठपुतली जिंदगी में अनेको उतार-चढ़ाव आते है l जीतता है वही जो ये सब सह जाते है ll हर किसी का अच्छा समय आता है l धैर्य रखो बुरा समय भी काट जाता हैll मत करो घमंड, कभी अपने पैसो का l ये पैसा तो चलती फिरती धूप-छाँव है l आज अगर किसी ओर के पास है ये l तो कल ये किसी ओर का गुलाम है ll अहम् की आग में, ना जला करो l ना जाने कब ये, तुम्हे ही जला देगी l जिंदगी छोटी है,प्रेम प्यार से रहा करो l ना जाने कब मौत , गोद में Continue reading कठपुतली

गिरगिट और इंसान

गिरगिट और इंसान पल में अक्सर बदल जाता है मौसम l पल में अक्सर बदल जाता है इंसान ll यू ही बदनाम है गिरगिट रंग बदलने मे l रंग तो अक्सर बदलता है , ये इंसान ll जो दिखता है,  वो वैसा होता नही l जो होता है ,  वो हमे दिखता नही ll मन में क्या छुपा हैं,ये हमे पता नही l जो सोचे वैसा हो,ये ज़रूरी तो नही ll पल में माशा और पल में तोला l पल में सब कुछ बदल जाता हैं ll मानते हो जिसको दिल से अपना l कभी-कभी वो भी बदल जाता हैं Continue reading गिरगिट और इंसान

मेरे गीतों की आवाज

मेरे गीतों की आवाज मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है। सन्नाटों में  प्रतिध्वनित हो जाने कहाँ बिखर जाती है।   ढूँढ़  रहे हैं  वाद्यवृन्द भी कंपित  कोमल  कलियों में ढूँढ़ रहे हैं  महक सलोनी खिलती नाजुक पंखुरियों में   पूछें भ्रमरों से उनकी गुंजन जाने कहाँ सिमट  जाती है। मेरे  गीतों   की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है।   दूर गगन में  उड़ते  पंछी अपनी साँसों थाम सकें तो रंग-बिरंगी  पंख  खुले  से उड़ान अपनी थाम सकें तो   बैठ डाल पर उनसे  पूछें जाने कहाँ बिखर जाती है। मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती Continue reading मेरे गीतों की आवाज