ओ मेरे पुज्य पिताजी

ओ मेरे पुज्य पिताजी [दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ठाकुर ईश्वर सिंह इस भू लोक को त्याग कर चले गये… जीवन में उनकी कठिन तपस्या से ही आज हम सुखद जीवन जी पा रहे हैं….] “हे ईश्वर मेरे पूजनीय पिता जी को….अपने पावन चरणों में स्थान देना….” ओ मेरे पूज्य पिता जी, कल तक मैं खुद को दुनिया का सब से बड़ा आदमी समझता था क्यों कि मेरे सिर पर तुम्हारा हाथ था…. हम नहीं जानते हम कौन हैं, पर तुम भिष्म थे, जिन्होंने हमारे घर रूपी हस्तिनापुर को चारों ओर से सुर्क्षित कर के Continue reading ओ मेरे पुज्य पिताजी

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एहसास प्यार का

एहसास प्यार का बहार छाई तेरे इकरार में हसीन लगते नज़ारे प्यार में भूला गए लाखों गम संसार के तेरे ही प्यार के इज़हार में सपने देखते रहते मिलन के वक्त नागवार है इन्तजार में गुज़ारे जिंदगी यों हँस खेल के टुटे न अपना रिश्ता मझधार में ख्वाब है छोटी सी ज़िन्दगी के ना जा पाये ग़म के अधिकार में हक़ीकत पाए सपने बिश्वास के समय ना बीते किसी तक़रार में साथ जीए मरे सभी को जता के सजन सदा ही इतराय प्यार में सजन

अब तो तू आजा प्रिये

अब तो तू आजा प्रिये अब आया समझ में,मैं ना समझ नहीं प्यार हैं,चाहत हैं,उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं,जीवन में तैर सिवा कोई और नहीं अब इस दिल को कोई स्वीकार नहीं दिल मेरा हर बार तड़पता, तुझे चाहता अब तो तू आजा प्रिये .. जिंदगी मुझसे रुठ चुकी तेरी चाहत बढ़ चुकी तेरे लिए भटका हर दर-दर मैं गलियां मेरे हाथों से टूट चुकी कोमल-कोमल कलियाँ खो बैठा अपनी नादानी से प्यार भरा अपार कोष प्रिये फिर कर लेने दो प्यार प्रिये .. तेरे बिन अब ये दिल ना जियें अब तो तू आजा प्रिये…

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

श्वेताक्षर

श्वेताक्षर यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर, तप्त शिलाओं के मध्य, सूखी सी बंजर जमीन पर, आशाओं के सपने मन में संजोए, धीरे-धीरे पनप रहा, कोमल सा इक श्वेत तृण………… क्या सपने बुन रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वो श्वेत तृण, इक्षाओं से परिपूर्ण, जैसे हो दृढसंकल्प किए, जड़ों में प्राण का आवेग लिए, मन में भीष्म प्रण किए, अवगुंठन मन में लिए, निश्छल लहराता वो श्वेत तृण………….. क्या तप कर रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वियावान सी उजड़ी मन की पहाड़ी पर, इक क्षण को हो जैसे Continue reading श्वेताक्षर

मैं अकेला

मैं अकेला आया हूँ मैंअकेला,रहना अकेला चाहता हूँ इस दुनियादारी के झमेले में नहीं उलझना चाहता हूँ अपने दिल का गुणगान औरों से नहीं चाहता हूँ इसलिए शायद खुदको मैं अकेला ही पाता हूँ चाहता हूँ अकेला रहकर कुछ लिखा करूँ अपने मन की व्यथा का मैं खुद ही गुणगान करूँ देख कर प्रकृति की सुंदरता मैं खामोश रहता हूँ इसका मधु अपार, शायद इसको ही पिया करूँ आते हैं जीवन में सुख और दुःख अपार मैं उस अड़िग, कठोर, पेड़ की तरह खड़ा रहूं ना सुख मुझे बहलाएगा,ना दुःख मुझे सतायेगा युवा हूँ,पलट कर वायु मैं बन जाऊँगा जानता Continue reading मैं अकेला

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

तेरी याद

तेरी याद जब याद आएगी तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते, एक बार फिर शाम-ए-गज़ल बन जाएंगी, जब तेरे-मेरे मिलन की याद हमें आयेगी, छलक उठेगा हर एक जाम महखाने में, जब तेरी याद हमे ख़लिश सी सताएंगी, ना रुकेंगी कलम आज गज़ल लिखते-लिखते, जब तक दर्द बयां ना हो जाता कोरे कागजों पर, उभर कर आएंगे लफ़्ज इन बेगुनाह पन्नों पर, जब इन आँखों से नीर की धार बहेंगी, पलट जायेगा हवा का रुख़, थम जायेगी लहरें, जब दीदार होगा तेरा तो खिल जाएंगे दो चेहरे, जब आएगी याद तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते।

हमेशा की तरह

हमेशा की तरह हकीकत है ये कोई या है ये दिवास्वप्न, हमेशा की तरह!हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता, ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा, कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा……. हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे, कुछ बनते बिगरते, कुछ टूट के बिखरे, सपने हों ये जैसे, किसी हकीकत से परे…… हमेशा की तरह,किसी झील में जैसे पानी हो ठहरा, मन की झील में, चुपके से कोई हो आ उतरा, वो मासूम सी, पर छुपाए राज कोई गहरा….. हमेशा की तरह, खामोशियों के ये पहरे, रुमानियत हों ये जैसे, किसी हकीकत Continue reading हमेशा की तरह

रे पथिक तनिक तू सुनता जा

रे पथिक तनिक तू सुनता जा मैं नीलकंठ हलाहल हूँ पी मुझको शिवपद पाता जा जब मन- धरा-गगन प्रदुषित हों तू जटा जूट प्रलयंकर बन जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा….. मैं पाच्जन्य सा महाशंख हूँ सत्य-असत्य के महासमर मे मुझको तू गूँजाता जा मन सारथि कृष्ण बनाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा……. मैं चक्रों में सहत्रचक्र हूँ तु कमलदल खिलाता जा शिव शक्ति के मिलन क्षण में तू स्वयं का परिचय पाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा…….

आदमी

आदमी आदमी सोचता है, कुछ लिखे…… जिंदगी के अव्यावहारिक होते जा रहे समस्त शब्द से सार्थक वाक्य बना दे मुक्त हो जाए उन आरोप से जिसे स्वयं पर आरोपित कर थक चुका है, उब चुका है आदमी सोचता है,कुछ करे….. सतत मरते हुए कुछ पल जी ले जीवन के मसानी भूमि पर चंद उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर जला डाले उदासीनता के कफ़न अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को आदमी सोचता है, कुछ कहे ……. जो कह न पाया कभी किसी से और न जाने क्या क्या कहता रहा तमाम उम्र कि बस एक बार अपनी बात कह Continue reading आदमी

लाख मशक्कत के बाद

लाख मशक्कत के बाद वो रूप रंग उसका, वो हँसना मुस्कुराना उसका, वो चेहरे की रंगत, वो आँखों को मिचकाना उसका। गजलों में कैसे ये सब लिख पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो वक़्त बेवक्त साथ उसके सहेलियों का जमावड़ा रहता था, मैं कहना बहुत कुछ चाहता, लेकिन बस मुस्कुराकर रह जाता था। महोब्बत की बातें कैसे उससे बयाँ कर पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो आती थी जब भी मिलने बस उसे देखता रहता था, लबों तक आयी हुई बात भी बोल नही Continue reading लाख मशक्कत के बाद

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं।   रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर देखो कोमल सबका तन मन है।   चुन चुनकर सुन्दर फूलों को जब कर्म हमारे गुँथते हैं कर्म हमारे अंतर्मन का सृजन हमेशा करते हैं।   धर्म कर्म के इन फूलों से माला मोहक बनती है इसे समर्पित तुझको करके श्रद्धा प्यारी जगती है। तुझे नमन करने हम सब जन हृदय सजाया करते हैं और स्मरण जब तेरा करते अवगुण सत्गुण बनते हैं।   तेरी मूरत Continue reading हृदय हमारा फुलवारी है

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी सुबह अलसायी अधखुली पंखुरियों सी चूमकर उड़ती हुई कुछ तितलियों सी   सभी हैं याद मधुमास को सहलाती हुई अंगड़ाईयाँ लेती कुछ अलसायी हुई आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई।   सिराहने बैठ मृदु स्पर्श करती हुई चेतना का श्रंगार बस करती हुई हर बात प्रणय का मुखरित करती हुई कुलबुलाती याद उर में भरती हुई   आ रही प्रेम बंधन में कसमसाती हुई बात Continue reading आ रही हैं याद सारी