ये शाम कितनी मदहोश है

मखमली धुमिल चादर लपेटे ये शाम कितनी मस्तानी है मंथर गति से ढलता सूरज दस्तक देती रात की रानी है उन्माद में डूबा है नभमण्डल जैसे फैलाकर पंख असमानी धीमे पग धर बटोही चला है गठरी में बांधे ख्वाब अरमानी ले चुम्बन धान की बालियों का हवा गीत कोई गुनगुनाती है खेत किनारे थिरकती पीपल बांसुरी लिए राग एक सुनाती है ढलते सूरज की चंचल किरणें कुछ उदास, कुछ ग़मगीन हैं थकी-सी अनजान परछाईयाँ कदमों की आहट नमकीन हैं मंदिर की घंटी की धुन संग शाम ठुमक-ठुमक ढलती है पायल की झंकार थिरक कर ठंडी आहें भर कर चलती है Continue reading ये शाम कितनी मदहोश है

इश्क के बाज़ार में

इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार   अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों धोता है नादानी में जिसे तू, मुहब्बत समझ बैठा था है ये वही गुनाह, जिसे आज तू ढोता है   गुनाह नहीं था कोई, हाथ की लकीरों का नतीजा तो वही होता है, जो कर्म होता है काँटों से खुशबू की, चाहत न रखना कभी कल वही उगेगा फिर, जो आज तू बोता है दस्तक देने आयी थी, किस्मत तेरे द्वार पर रुठ कर चली गयी, चादर ताने क्यों सोता है इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों Continue reading इश्क के बाज़ार में

कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अपने सुहाग से चंचल सुहागन बोली आज पड़ोसन के यहाँ राम कथा थी पंडित पांडे जी ने कहा रामराज्य में ना कोई दुःख था, ना कोई व्यथा थी  रामराज्य में शेर-बकरी भी जानू बेफिक्र पीते पानी एक ही घाट पर संभव ये कैसे, हमने तो नहीं काटी अब तक कोई रात एक ही खाट पर  व्यंग-वाणों से घायल पति बोला संभव ये कैसे नहीं हो सकता है जब मैंने काटी ज़िन्दगी बन बकरी तो यह किस्सा भी सच हो सकता है  ये सुनकर पत्नी फूली ना समायी फिर खो गयी अपने ही साम्राज्य में जब यह घटित हो सकता है Continue reading कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )

आधी जिंदगी

आधी जिंदगी जिंदगी कुछ नहीं है और, ये तो है एक कच्ची डोर | कोई साथी नहीं साथ का , इस आने और जाने की राह का | जिंदगी से तुम करो न प्यार , क्यूकी ये तो है एक बेवफा यार |

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा? सच में सच का साथ न दोगे कमजोरो को हाथ न दोगे । दोष सिद्ध निर्बल पर होता। सबल पाप करता और सोता। नीर क्षीर सा कौन चुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । सदय भाव अब हृदय न आते। बदले की भावनाए पाले। काम करते रहते काले। पश्चाताप से कौन धुलेगा । सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । घबराहट सच्चाई से , जैसे तीखी दवाई से, दूरी है अच्छाई से । हितकारी पर कौन गुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । दीवारों के कान सुना है । जेलों के मेहमान Continue reading सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

अरुणोदय

अरूणोदय की बेला आयी कली कली डाली मुस्काई ओस विन्दु मिट गए धरा के प्रातःकाल सुखद सुहाई काली रात दूर है दुख सी फिर सुख सी बेला आई प्राची में प्रकाश दिख रहा चिड़ियो मे कोलाहल सुनाई। भौरे मुदित मना है देखो पल्लव मे स्मित है आई। धरा शस्यश्यामला पूरित फूल फूले नही समाई। उदय सूर्य का होता है तब बीती रात प्रात जब आई। विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

बेटियाँ

बेटियाँ पढाओ जनजन से आह्वान है । ये काम महान है ये काम महान है । किससे कम है मेरी बेटी चढती है हिमालय की चोटी । करो सदा सम्मान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । पढ़कर बेटी दो घरों को रोशन करती देती शिक्षा भेद न करो बेटे बेटी में दो समान शिक्षा दिक्षा। दहेज मुक्त हो सब समाज जब समझे बहू को बेटी समान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । आधी आबादी की जिससे होती है भागीदारी । एक नहीं दो दो मात्राएं नर से भारी नारी हम Continue reading बेटियाँ

आज सुर गा न सकेंगे संगीत

आज सुर गा न सकेंगे संगीत आज सुर गा न सकेंगे संगीत अथ में अदभुत अंत में भरम अनोखा परिचय निशीथ की विकल साँसों की नहीं प्रात: से प्रेम आर्द्र आँचल निर्जल व्योम-जल कितना सत्य शस्य गीत की नहीं सहेगी प्रभंजन,शीत प्रिय सरस सौरभ कोमल अनुबंध बाकी सभी शेष दीप की लौ के हर कॅपकँपी में सुर मेरे होंगे संगीत । ————- डॉ छेदी साह

समाचार

कवि सम्मेलन में “हिन्दवीर सम्मान” से समान्नित झालावाड़ जिले के कवि राजेश पुरोहित को साहित्य संगम संस्थान,दिल्ली द्वारा “हिन्दवीर सम्मान” से सम्मानित किया गया। भारतीय नववर्ष पर आयोजित ऑनलाइन कवि सम्मेलन में पुरोहित को उत्कृष्ट काव्य प्रस्तुति हेतु प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान संस्थान के अध्यक्ष राजवीर सिंह मंत्र,सचिव कविराज तरुण सक्षम, उपाध्यक्ष सौम्या मिश्रा अनु श्री, एवम संयोजक आशीष पांडे जिद्दी ने प्रदान किया। पुरोहित कवि, ग़ज़लकार, गीतकार एवम श्रेष्ठ मंच संचालक के रूप में जाने जाते हैं।

प्रकृति-प्रणय गीत

प्रकृति-प्रणय गीत  संध्या की स्वर्णिम किरणों से आलिंगनों का ले उपहार सजी सँवारी संध्या-सी तब करती प्रकृति सोलह श्रंगार।   पश्चिम की लाली में बिंधकर शर्माती सकुचाती जाती क्षितिज पार झुरमुट के पीछे दुल्हन-सी वह लुक छिप जाती।   खगवृन्दों के सुर गुंजन से निखर रही नुपुर की झंकार। डाल डाल पर झूम झूम कर प्रणय स्वरूप दिखता संसार।   शीतल झोंकों का स्पर्श मधुर जब सिरहन-सा उपजाता है पलकों के अंदर नयनों में चाँद रूप सा खिल जाता है।   छिलमिल तारों की सेज चढ़ी चपल चांदनी इतराती है ओढ़ पंखुड़ी की सी चुनरी रजनी रमती खिल जाती है। Continue reading प्रकृति-प्रणय गीत

जगत जननी हो तुम (महिला दिवस विशेषांक)

नारी तुम कभी अबला नहीं थी, त्याग तपस्या की दिव्य मूरत हो, सृष्टि का अंकुर बोया हो जिसने, तुम उसकी एक विचित्र सूरत हो। ममता का तुम शीतल आँचल हो, नयनों से करुणा का सागर हो, हिमालय शीश झुकाता तुमको, तुम अनुराग से भरा गागर हो। उत्साह तुम्हारा अम्बर को चूमता, दिल महासागर की गहराई है, हिमालय से अंतरिक्ष तक तुमने, अपनी विजय पताका फहराई है। तुम्हारे पलकों की निर्मल छाँव में, चाँद और सूरज निर्भीक सोते हैं, स्नेह के आँचल तले पुचकारती, जब-जब लाडले तुम्हारे रोते हैं। क्यों कहते तुमको अबला नारी, तुम तो जगत की तारणहार हो, मूर्ख Continue reading जगत जननी हो तुम (महिला दिवस विशेषांक)

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस महिला की हर जगह दिख रही, है समान भागीदारी । जिसकी शक्ति का लोहा। मान चुकी है दुनिया सारी। क्यों कहता नारी पीछे है। नही रही अब अबला बेचारी। कंधा मिलाकर चल पडी है प्रगतिशील है आज की नारी। आधी दुनिया जिसके बल पर जिससे बनती सृष्टि हमारी। ममता की मूरति है कामिनी भामिनी दारा आदि नामधारी। एक नहीं दो दो मात्राएं। नर से भारी नारी । अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र 9198989831

ग़ज़ल (एक ख्याल)

गफलत में था कि तू, फ़क़त मेरी दुलारी है, किस्मत पलटी उसकी, जिसकी तू दुलारी है। महताब खोया-खोया सा, रहता है आजकल, उसकी आँखों ने तस्वीर, तेरी जो उतारी है। गुजरे हैं कई पल, अपनी ही साँसों के बगैर, याद आती नहीं कोई रात, बिन तेरे गुजारी है। खेला था जुआ कभी, तुझे हासिल कैसे करूँ, तुझसे ज़्यादा कौन जाने, ये दिल तो जुवारी है। तारों की बारात निकली, कहकशां के रास्ते, चांदनी की चादर लपेटे, रात अभी कुंवारी है। बहकते हैं कदम, गुजरता हूँ जब तेरी गली से, नशा शराब का नहीं, तेरी आखों की खुमारी है। तू बेशक Continue reading ग़ज़ल (एक ख्याल)

कान्हा संग खेलू आज होली (होली विशेषांक)

आयी बृज में रंगबिरंगी होली रे केसरिया रंग रंगी मोरी चोली रे गुलाल उड़ावे कान्हा की टोली रे आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल हाथ जोड़ पडूँ तोरी पावन पैंया चल हट छोड़ मोरी नाजुक बैंया मोहे रंग दे आज मोरे भोले सैंया आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल कान्हा अब तो दिखा दे झलक तुझ बिन कैसे झपकाऊँ पलक अल्हड यौवन मोरा जाये छलक  आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल मादक फागुन भी होरी रंग में चहके फ़ाग गावत Continue reading कान्हा संग खेलू आज होली (होली विशेषांक)