यार बचपन तू कहाँ खो गया

घनन-घनन गरजते मेघ काली घटाओं की मस्ती वो रिमझिम वर्षा का पानी वो कागज की टूटी कश्ती बचपन यार तू कहाँ खो गया मुझे जगाकर तू क्यों सो गया  वह कटी पतंग को झपटना वो छीना-झपटी में उलझना यारों की पतंग को काटना फिर झगड़ों का सुलझना बचपन यार तू कहाँ खो गया न जाने कहाँ तू गुम हो गया लुका-छिपी की वह दोपहर वो होली का महकता रंग वो शिकायतों का अनंत दौर अपने रूठे हुए यारों के संग बचपन यार तू कहाँ खो गया आज तू याद आया तो रो गया ताल कटोरा गार्डन जाकर वो कच्ची अमिया Continue reading यार बचपन तू कहाँ खो गया

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। पोंछ पोंछकर सब अश्रूकणों को नव सपनों का निर्माण करें पलकों के आँगन में फिर से हम मुस्कानों का सुन्दर रास रचें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। गीतों में अमृत का संचार कर स्वप्न गीत का यूँ श्रंगार करें। युग युग से पीड़ित अपने मन की पीड़ा कंठों की सब दूर करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। तेरी गोदी में सोकर हम सब फिर से सुखद सपन उपजायें जब जागें तो हम सब मिलकर दिव्य स्वप्न सब साकार करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। सपनों में दर्शन तेरा पाकर जग क्रंदन Continue reading आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको  मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ इतना भी निर्धन मत करना मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ। इतनी पीड़ा मत पनपाना मैं काँटों का पलना बन जाऊँ फूलों का गर स्पर्श मिले तो आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ। भूखी इतनी रात न देना मैं करवट करवट चीख न पाऊँ और सुबह की प्रथम किरण में अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ। इतना नाजुक भी मत करना मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ Continue reading ऐसा दर्द न देना मुझको

शरद ऋतु मेरे बगियन की

शरद ऋतु मेरे बगियन की स्वेत चांदनी बिखरी पड़ी है ठंडी आहें भरे बावरी बयार मेरी कांच की बगियन में झूमे अमलतास झूमे मैगनोलिया कांच की चादर ओढ़े झूमती धरा मेरी स्वेत बगियन में कांच की बालियाँ पहने थिरकती गुलाब की कोमल पाँखुरी मेरी चांदनी बगियन में कांच के कंगन पहनकर खनखनाता पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा मेरी उज्ज्वल बगिया में शीतल पौन चूमती पत्तियों के ठन्डे कपोलों को मेरी दमकती बगियन में उत्तरी ध्रुव से झूमती आयी शरद की मादक पावन बेला मेरी हर्षाती बगियन में (किशन नेगी ‘ऐकांत’ )

अविरल यात्रा

अविरल यात्रा चलते चलतेउबड़-खाबड़ राहों मेंमुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकरदेखता मुड़कर पीछेअपने ही पांवो के निशाँदबे थे जिनके नीचे कुछ दर्दकुछ वेदनाओं के असहनीय घावअतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँकुछ भूली-बिसरी यादेंजिन्हें वह भूल जाना चाहता हैमगर कुछ जख्म जो अभी हरे थेरुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूलअतीत के बंद काले पन्नेकभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसकोसिंदूरी आँचल तले ढलती सांझसूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज मेंभोर के चले पंछी थकान समेटेलौट चले रात्रि विश्राम कोअचानक दे कर तिलांजलिअसमंजस के क्षणों कोबढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर केशायद अहसास हो चला था उसे किकर्मयोगी ही रहता है सदाअग्रसर अपने कर्मपथ पर(किशन नेगी ‘एकांत’ )

पड़ोसी लौट आ

पड़ोसी लौट आ एक वक्त वह भी देखा था मैंने बचपन मेंजब पड़ोसी भी हुआ करता था मेरे परिवार का एक अहम् सदस्य घर के अनेक निर्णयों में होती उसकी अनूठी भागीदारी सुख-दुःख का परम मित्र फुर्सत के क्षणों का अद्भुत साथी तन्हाई भरे लम्हों में झरते आंसुओं की भाषा समझता और आज उम्र के इस पड़ाव में देखता हूँ कि मेरे ही परिवार के सदस्य बन गए हैं एक दूजे के पडोसी और धूल की परतों में लिपटा हुआ मैं उनका पडोसी (किशन नेगी ‘एकांत’ )  

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है। गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है। याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है। मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है। पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है। पंख फैलाये Continue reading मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग) चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में Continue reading लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) मन्नत मांगने सुबह-सुबह पति-पत्नी गए शिव मंदिर मन्नत का धागा बाँधने पत्नी ने जैसे ही हाथ उठाया अचानक मन में उसके आया कोई ख्याल पुराना मन्नत का धागा बांधे बिना उसने नीचे हाथ झुकाया हक्का-बक्का बेचारा पति बोला अपनी सुहागन से हे भागवान, क्यों नहीं बाँधा तुमने धागा मन्नत का किस ख्याल में डूबी हो, न करो कोई सोच-विचार बाँध दो धागा अगर भोगना है सुख तुमने जन्नत का पत्नी मुस्कुराकर बोली मन्नत मांगने ही वाली थी मैं कि ईश्वर दूर कर दे मेरे सुहाग की मुश्किलें तमाम फिर मन में विचार आया Continue reading कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले निभाकर धर्म कड़वा चौथ का पति-वता पत्नी सो रही थी चैन से सितारों की झिलमिल बारात को निहार रहा था चाँद अपने नैन से अधीर पति ने देखा पत्नी के पास कुंडली लगाए बैठी थी एक नागिन सोलह शृंगार में दुल्हन-सी सजी जैसे हो किसी नाग की सुहागिन ख़ुशी से पागल पति धीरे से बोला डस ले, डस ले, अच्छा अवसर है कोटि-कोटि नमन करता हूँ तुझे हे नागिन तुझे भला किसका डर है चुप कमीने, फुँकार कर बोली नागिन दीदी को चरण वंदना करने आयी हूँ कभी लगे न इसको तेरी बुरी नज़र नाग देवता Continue reading डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

कल वक्त मेरा भी होगा

कल वक्त मेरा भी होगा वक्त, मैंने किताबों में पढ़ा है करता नहीं तू किसी का इंतज़ार माँ की कहानियों में सुना है अक्सर फुर्सत के पल होते नहीं तेरे पास फिर क्यों तू टुकुर-टुकुर देखता मरता है जब कोइ निर्धन भूख से क्यों नहीं है तुझे कोई खबर लुटती है अस्मत जब बेटी की तूफान बनकर आया चोरी-चोरी बुझा दी रोशनी टूटी झोपडी की टपका बारिश बनकर उसकी छत से भीगा दिया कम्बल फिर गरीब का है बस औकात तेरी इतनी कि तू फिसल जाता है हर बार हाथ से जिस दिन होगा वक्त लाचार का शायद रफ़्तार तेरी Continue reading कल वक्त मेरा भी होगा

वक़्त

वक़्त वक्त तू रहता कहाँ है कहाँ बनाया है तूने बसेरा हो अगर कोई पता ठिकाना मुझे भी इक दिन बतलाना होगी वह कौन-सी डगर जिधर से अक्सर गुजरता है फुर्सत मिले जब कभी तुझे यार मुझे भी साथ ले चलना जब भी बाँधना चाहा तुझे पलों की रेशम की डोर से जाने कहाँ गुम हो जाता फिसली हो जैसे रेत मुट्ठी से थकान भी थक गयी है राह तेरी देखते देखते दिनकर भी हुआ ओझल तेरे ही मिलन की आस में कब होती है तेरी सुबह होती है कब तेरी रात क्या कोई रंग-रूप है है क्या कोई आकार Continue reading वक़्त

सावन के जख्म

  सावन के जख्म घनन घनन-घनन घनन देखो कैसे गरजे हैं मेघा फिर से झूम-झूम कर रिझाती काली बदरिया अपने रूठे साजन को नन्ही-नन्ही जल की बूंदें फिर से लेकर आया है बादल बादलों में छिपकर जैसे विरह राग छेड़ा है किसीने सोलह शृंगार के रथ पर सवार फिर से थिरका है पागल सावन सावन के भीगे आँचल तले है पुकारती संतप्त सजना अब तो लौट आओ बेदर्दी प्रियतम इधर सहा ना जाये दर्द विरह का और उधर काली घटा देती जख्म हज़ार क्यों तड़पाते अपनी विरहन को चौमास की रिमझिम बौछारों में मर्म की छटपटाहट तुम क्या जानो बाट Continue reading सावन के जख्म