उजड़ा हुआ पुल

उजड़ा हुआ पुल यूँ तो बिसार ही चुके हो अब तुम मुझे! देख आया हूँ मैं भी वादों के वो उजरे से पुल, जर्जर सी हो चुकी इरादों के तिनके, टूट सी चुकी वो झूलती टहनियों सी शाखें, यूँ ही भूल जाना चाहता है अब मेरा ये मन भी तुझे! पर इक धुन! जो बस सुनाई देती है मुझे! खीचती है बार बार उजरे से उस पुल की तरफ, टूटे से तिनकों से ये जोड़ती है आशियाँ, रोकती है ये राहें, इस मन की गिरह टटोलकर , बांधकर यादों की गिरह से, खींचती है तेरी तरफ ये! कौंधती हैं बिजलियाँ Continue reading उजड़ा हुआ पुल

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रक्तधार

रक्तधार अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू, अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू….. चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को, मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई, सतत प्रयत्न कर भी पाप धरा के न धो पाई, व्यथित हृदय ले यह रोती अब, जा सागर में समाई। व्यर्थ हुए हैं प्रयत्न सारे, पीड़ित है इसके हृदय, अन्तस्थ तक मन है क्षुब्ध, सागर हुआ लवणमय, भीग चुकी वसुन्धरा, भीगा न मानव हृदय, हत भागी सी सरिता, अब रोती भाग्य को कोसती। व्यथा के आँसू, कभी बहते व्यग्र लहर बनकर, तट पर Continue reading रक्तधार

ख्वाब जरा सा

ख्वाब जरा सा तब!……….ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! कभी चुपके से बिन बोले तुम आना, इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना, वो राह जो आती है मेरे घर तक, उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना, उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा, तेरी पग से की होंगी जों उसने बातें, उनकी जज्बातों को मैं चुपके से सुन लूंगा, तब ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! मृदुल बसन्त सी चुपके से तुम आना, किल्लोलों पर गूँजती रागिणी सी कोई गीत गाना, वो गगन जो सूना-सूना है अब तक, Continue reading ख्वाब जरा सा

अतृप्ति

अतृप्ति अतृप्त से हैं कुछ, व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न! अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक, समय के ढ़ेर पर…… सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण, अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन! अनगिनत मथु के प्याले, पी पीकर तृप्त हुआ था ये मन, शायद कहीं शेष रह गई थी कोई तृष्णा! या है जन्मी फिर……. इक नई सी मृगतृष्णा इस अन्तःमन! क्युँ इन इच्छाओं के हाथों विवश होता फिर ये मन? अगाध प्रेम पाकर भी, इतना अतृप्त क्युँ है यह जीवन? जग पड़ती है बार-बार फिर क्युँ ये तृष्णा? क्युँ जग Continue reading अतृप्ति

परखा हुआ सत्य

परखा हुआ सत्य फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य, किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य, आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य! अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? गंगोत्री की धार सा सतत बहा है वो सत्य, गुलमोहर की फूल सा सतत खिला है वो सत्य, झूठ को इक शूल सा सतत चुभा है वो सत्य! बन के बिजली बादलों में चमक रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते Continue reading परखा हुआ सत्य

खिलौना

खिलौना तूने खेल लिया बहुत इस तन से, अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना? माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण, माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना। बहलाया मन को तूने इस तन से, जीर्ण खिलौने से अब, क्या लेना और क्या देना? बदलेंगे ये मौसम रंग बदलेगा ये तन, बदलते मौसम में तू चुन लेना इक नया खिलौना। है प्रेम तुझे क्यूँ इतना इस तन से, बीते उस क्षण से अब, क्या लेना और क्या देना? क्युँ रोए है तू पगले जब छूटा ये तन, खिलौना है बस ये इक, तू कहीं खुद Continue reading खिलौना

ओ मेरे पुज्य पिताजी

ओ मेरे पुज्य पिताजी [दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ठाकुर ईश्वर सिंह इस भू लोक को त्याग कर चले गये… जीवन में उनकी कठिन तपस्या से ही आज हम सुखद जीवन जी पा रहे हैं….] “हे ईश्वर मेरे पूजनीय पिता जी को….अपने पावन चरणों में स्थान देना….” ओ मेरे पूज्य पिता जी, कल तक मैं खुद को दुनिया का सब से बड़ा आदमी समझता था क्यों कि मेरे सिर पर तुम्हारा हाथ था…. हम नहीं जानते हम कौन हैं, पर तुम भिष्म थे, जिन्होंने हमारे घर रूपी हस्तिनापुर को चारों ओर से सुर्क्षित कर के Continue reading ओ मेरे पुज्य पिताजी

एहसास प्यार का

एहसास प्यार का बहार छाई तेरे इकरार में हसीन लगते नज़ारे प्यार में भूला गए लाखों गम संसार के तेरे ही प्यार के इज़हार में सपने देखते रहते मिलन के वक्त नागवार है इन्तजार में गुज़ारे जिंदगी यों हँस खेल के टुटे न अपना रिश्ता मझधार में ख्वाब है छोटी सी ज़िन्दगी के ना जा पाये ग़म के अधिकार में हक़ीकत पाए सपने बिश्वास के समय ना बीते किसी तक़रार में साथ जीए मरे सभी को जता के सजन सदा ही इतराय प्यार में सजन

अब तो तू आजा प्रिये

अब तो तू आजा प्रिये अब आया समझ में,मैं ना समझ नहीं प्यार हैं,चाहत हैं,उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं,जीवन में तैर सिवा कोई और नहीं अब इस दिल को कोई स्वीकार नहीं दिल मेरा हर बार तड़पता, तुझे चाहता अब तो तू आजा प्रिये .. जिंदगी मुझसे रुठ चुकी तेरी चाहत बढ़ चुकी तेरे लिए भटका हर दर-दर मैं गलियां मेरे हाथों से टूट चुकी कोमल-कोमल कलियाँ खो बैठा अपनी नादानी से प्यार भरा अपार कोष प्रिये फिर कर लेने दो प्यार प्रिये .. तेरे बिन अब ये दिल ना जियें अब तो तू आजा प्रिये…

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

श्वेताक्षर

श्वेताक्षर यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर, तप्त शिलाओं के मध्य, सूखी सी बंजर जमीन पर, आशाओं के सपने मन में संजोए, धीरे-धीरे पनप रहा, कोमल सा इक श्वेत तृण………… क्या सपने बुन रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वो श्वेत तृण, इक्षाओं से परिपूर्ण, जैसे हो दृढसंकल्प किए, जड़ों में प्राण का आवेग लिए, मन में भीष्म प्रण किए, अवगुंठन मन में लिए, निश्छल लहराता वो श्वेत तृण………….. क्या तप कर रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वियावान सी उजड़ी मन की पहाड़ी पर, इक क्षण को हो जैसे Continue reading श्वेताक्षर

मैं अकेला

मैं अकेला आया हूँ मैंअकेला,रहना अकेला चाहता हूँ इस दुनियादारी के झमेले में नहीं उलझना चाहता हूँ अपने दिल का गुणगान औरों से नहीं चाहता हूँ इसलिए शायद खुदको मैं अकेला ही पाता हूँ चाहता हूँ अकेला रहकर कुछ लिखा करूँ अपने मन की व्यथा का मैं खुद ही गुणगान करूँ देख कर प्रकृति की सुंदरता मैं खामोश रहता हूँ इसका मधु अपार, शायद इसको ही पिया करूँ आते हैं जीवन में सुख और दुःख अपार मैं उस अड़िग, कठोर, पेड़ की तरह खड़ा रहूं ना सुख मुझे बहलाएगा,ना दुःख मुझे सतायेगा युवा हूँ,पलट कर वायु मैं बन जाऊँगा जानता Continue reading मैं अकेला

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

तेरी याद

तेरी याद जब याद आएगी तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते, एक बार फिर शाम-ए-गज़ल बन जाएंगी, जब तेरे-मेरे मिलन की याद हमें आयेगी, छलक उठेगा हर एक जाम महखाने में, जब तेरी याद हमे ख़लिश सी सताएंगी, ना रुकेंगी कलम आज गज़ल लिखते-लिखते, जब तक दर्द बयां ना हो जाता कोरे कागजों पर, उभर कर आएंगे लफ़्ज इन बेगुनाह पन्नों पर, जब इन आँखों से नीर की धार बहेंगी, पलट जायेगा हवा का रुख़, थम जायेगी लहरें, जब दीदार होगा तेरा तो खिल जाएंगे दो चेहरे, जब आएगी याद तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते।

हमेशा की तरह

हमेशा की तरह हकीकत है ये कोई या है ये दिवास्वप्न, हमेशा की तरह!हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता, ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा, कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा……. हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे, कुछ बनते बिगरते, कुछ टूट के बिखरे, सपने हों ये जैसे, किसी हकीकत से परे…… हमेशा की तरह,किसी झील में जैसे पानी हो ठहरा, मन की झील में, चुपके से कोई हो आ उतरा, वो मासूम सी, पर छुपाए राज कोई गहरा….. हमेशा की तरह, खामोशियों के ये पहरे, रुमानियत हों ये जैसे, किसी हकीकत Continue reading हमेशा की तरह