प्रेम सेतु

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। मगर मैंने तो थामा है हाथ तुम्हारा, जिसे मैं कभी छोड़ नहीं सकता। प्रेम बनेगा सेतु हम दो तटों के बीच, जिसे सैलाब भी तोड़ नहीं सकता। तटों के बीच बहती प्रेम धारा को, प्रचंड तूफ़ान भी मोड़ नहीं सकता। मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। (किशन नेगी)

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो चेहरे को आँचल से ढक कर, यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो। मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम, यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो। मेरे दिल की धड़कन हो तुम, अजनबी बनकर न धड़का करो। दिल की बात ग़ज़ल में कहती हो, यूँ हर बात पर ना भड़का करो। बनकर हसीं सावन की घटा, यूँ बादलों को ना सताया करो। प्यासे दिलों की धड़कन हो तुम, यूँ गीत विरह का ना गाया करो। दिल की खिड़कियाँ तोड़ कर, यूँ मेरे ख़्वाबों में ना आया करो। दिल की बात दिल को बताकर, यूँ तड़पाकर Continue reading यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

गज़ल

भरोसा किया था जिन पर, वही आज पराये हो गए, अपने ही क़दमों के निशान, न जाने कहाँ खो गए | मिटाने चले थे हस्ती हमारी, मगर खुद ही मिट गए, अपनी ही सजाई महफिल में, ज़नाब खुद ही पिट गए| कदम जो पड़े उनके मयखाने में, शराब बरसने लगी, आँखों से उनकी पीने को, आज ग़ज़ल भी तरसने लगी। चल कर तेरी महफ़िल में, आज खुद शबाब आया है, एक हाथ में ग़ज़ल और एक हाथ में शराब लाया है। वो आयी जब मेरी मज़ार पर, मुर्दे भी मचलने लगे, बिजली लगी चमकने, दीवाने बादल भी गरजने लगे। दीवानों Continue reading गज़ल

कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ

🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे पता नहीं वाग्जाल आ-आकर रुक जाते क्यों लबों पर मेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। इस गुफ़्तगू की निशा में जाने क्यों गुमसुम रहा हूँ ? इस दरमियान में कितना क़हर भरा दरवेश रहा हूँ ऊँघते नैनों में कबतक विकल हुए कल्प धनेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। मिले तार ह्रदय- बीन के तो सुर संसार में द्यतिमय हो जाँय हर्ष- विषाद का मानस लिखकर उसमें हम लीन हो जाँय सुरभित हों जीवन तुम्हारे, पराये बनें संगी तेरे। क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो Continue reading 🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

मुख्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे, देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से, इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे, सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों में मेरी! सिंदूरी ख्वाब लिए, फिर सो जाती है रात… मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. झांकती है सुबह, उन खिड़कियों से मुझे, रंग वही सिंदूरी, जैसे सांझ मिली हो भोर से, मींचती आँखों में, सिन्दूरी सा रंग घोल के, रंगमई सी सुबह, बस जाती है फिर आँखों में मेरी! दिन ढ़ले फिर, Continue reading मुख्तसर सी कोई बात

जैसे कल ही की बात हो

पल थे कितने सुहावने वह जिए जो हमने साथ-साथ हर पल एक नया अहसास था हर पल था नई उमंग से भरा क्यों पल-पल याद आते हैं वह बीते पल जैसे कल ही की बात हो कितना ख़ुशगवार था वह चंचल मौसम मदहोश झोंके जब उन्मुक्त पवन के सहलाते थे हमारे रंगीन ख़्वाबों को अपने शीतल अहसासों से आज भी वह मौसम भुला नहीं ये दिल जैसे कल ही की बात हो पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा कैसे छिपकर सुनते थे हमारी मन की बातें पंखुड़ियां तरुण गुलाब की खिलती थी हमारी अबोध शरारत देख कर क्यों हर याद रच-बस गई मेरी आखों Continue reading जैसे कल ही की बात हो

ऋतुराज

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई, संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई, जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई, ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी….. नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा, जीर्ण काया को सँवार, निहार रही खुद को जरा, हरियाली ऊतार, तन को निखार रही ये जरा, शिशिर की ये पुकार, सँवार खुद को जरा….. कण-कण में संसृति के, यह कैसा स्पंदन, ओस झरे हैं झर-झर, लताओं में कैसी ये कंपन, बह चली है ठंढ बयार, कलियों के झूमे हैं मन, शिशिर ऋतु का ये, मनमोहक है आगमन….. कोयल ने छेड़े है धुन, Continue reading ऋतुराज

व्यथित मन की वेदना

कहूँ किससे अस्थिर मन की वेदना, नहीं किसी चेहरे को फुर्सत यहाँ। अपरिचित राहों में भागता हर कोई, मुठ्ठी में समेट लेने को सारा जहाँ। चाँद देख क्यों सकुचाता है ये मन, क्यों भरता ठंडी-सांसे ये हर पल। है त्रिषित सदियों से तन्हाइयों में, बुझे प्यास कैसे बिन शीतल जल। निर्जनता की अजनबी परछाई भी, लगी है मुरझाने देख इस मन को। शीतल बयार की चंचल झोंके अब, नहीं छूते इसके कुम्हलाये तन को। टूटे तार इसकी घायल वीणा के, अपने मीठे सुरों से संवारेगा कौन। चहकते थे जो कल तक संग इसके, फेर कर नज़रें क्यों हो गए हैं Continue reading व्यथित मन की वेदना

रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात, विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात, पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ, धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… चुपचाप कालिमा घोलती ये रात, स्वप्नातीत, रूपातीत नैनों में ऊँघती सी उथलाती नींद, अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब, मींचती आँखों में तल्खी मन में बेचैनियाँ, बस है इक उम्मीद और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… Continue reading रात और तुम

वो मैं ही था

वो मैं ही था जब कभी चांदनी रात में बैठ गाँव के तल्लैया किनारे निहारा करती थी तुम प्रीतिबिम्ब चाँद का तो कोई चुपके से फेंक कर कंकड़ कर देता धुंधली तस्वीर चाँद की वो कोई और नहीं, मैं ही था बदल-बदल कर करवटें पूर्णिमा की रात को जब तुम बुना करती थी सुनहले खवाब अपनी कल्पनाओं के राजकुमार संग तो कोई चुपके से चुरा लेता ख्वाब तुम्हारे देकर दस्तक तुम्हारे दिल की खिड़की पर वो कोई और नहीं, मैं ही था क्या तुम्हें याद है जब तुम सो जाया करती थी बेसुध हो कर पलटते-पलटते किताब के पन्ने तो Continue reading वो मैं ही था

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल

स्नेह वृक्ष

बरस बीते, बीते अनगिनत पल कितने ही तेरे संग, सदियाँ बीती, मौसम बदले…….. अनदेखा सा कुछ अनवरत पाया है तुमसे, हाँ ! … हाँ! वो स्नेह ही है….. बदला नही वो आज भी, बस बदला है स्नेह का रंग। कभी चेहरे की शिकन से झलकता, कभी नैनों की कोर से छलकता, कभी मन की तड़प और संताप बन उभरता, सुख में हँसी, दुख में विलाप करता, मौसम बदले! पौध स्नेह का सदैव ही दिखा इक रंग । छूकर या फिर दूर ही रहकर! अन्तर्मन के घेरे में मूक सायों सी सिमटकर, हवाओं में इक एहसास सा बिखरकर, साँसों मे खुश्बू Continue reading स्नेह वृक्ष

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

कुछ कहो ना

प्रिय, कुछ कहो ना! यूँ चुप सी खामोश तुम रहो ना! संतप्त हूँ, तुम बिन संसृति से विरक्त हूँ, पतझड़ में पात बिन, मैं डाल सा रिक्त हूँ… हूँ चकोर, छटा चाँदनी सी तुम बिखेरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! सो रही हो रात कोई, गम से सिक्त हो जब आँख कोई, सपनों के सबल प्रवाह बिन, नैन नींद से रिक्त हो… आवेग धड़कनों के मेरी सुनो ना, मन टटोल कर तुम, संतप्त मन में ख्वाब मीठे भरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! चुप हो तुम यूँ! जैसे चुप हो Continue reading कुछ कहो ना