तो ख़ुदा ख़ैर करे

तो ख़ुदा ख़ैर करे तेरे सपनों को सजाया मैंने, अपने अहसासों के रंगो से, मगर ख्वाबों में तू किसी गैर के आये, तो खुदा खैर करे कफ़न ओढ़े लेटा हूँ मज़ार में, तुझे पाने की हसरत में कब्र पर मेरी आंसू कोई गैर बहाये, तो खुदा खैर करे तराशा है जिस पत्थर को मैंने, रात-रात भर जाग कर बन जाये वह किसी गैर की मूरत, तो खुदा खैर करे जिस दामन को बचाया मैंने, हर बार जमाने की नज़रों से, वो लहराए किसी गैर की चाहत को, तो खुदा खैर करे जब-जब ठोकरें खोई तूने, मेरी बाहों ने संभाला हर Continue reading तो ख़ुदा ख़ैर करे

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना हे बटोही ! जिस राह पर तू बढ़ चला है उस राह पर आंधी और तूफ़ान विचरते हैं अक्सर निर्भीक होकर चट्टान बन ललकारेंगे तेरे साहस को डटे रहना-मत डिगाना बढ़ते क़दमों को मगर तू संभल कर चलना हे पथिक ! कांटे हैं असंख्य इस पथ पर जिस पथ पर तू चल पड़ा है हर काँटा है इंतज़ार में कि कदम तेरे रक्तरंजित हों निरंतर चलना होगा तुझे हर हाल मैं मगर तू संभल कर चलना हे राही ! जिस मार्ग पर तू निकल पड़ा है असीम बाधाएं होंगी उस मार्ग पर ठोकर Continue reading हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे जब-जब सावन में गुजरता था तेरी आम की बगिया से होकर शरमाकर ढक लेती थी तू तब धानी चूनर से चेहरा सकुचाकर तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे पीली सरसों की पगडण्डी पर तेरा मटक-मटक कर चलना पानी का गागर उठाये इतराना फिर पीछे मुड़-मुड़ कर देखना तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे सखियों संग बैठ सावन के झूले में टुकुर-टुकुर कर मुझे निहारना फिर झटककर घने बालों को तेरा छुप-छुप कर Continue reading सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

एक नई दोस्त 

एक नई दोस्त एक अजनबी चेहरे से आज हुई मुलाकात एक सूंदर उपवन में शायद एक नई दोस्त चेहरा अनजान ज़रूर था मगर दिल से मुलाकात जैसे सदियों पुरानी थी मासूम चेहरा, माथे पर गंभीर रेखाएँ, झील-सी गहरी नीली आंखें उत्सुकता से भरी थी गुलाबी होंठो पर एक अजीब चुप्पी शायद दिल की पीड़ा कहना चाहती हो मासूमियत उसके चेहरे पर जैसे बचपन झांक रहा हो जो उसकी उदासी बयां करती थी मगर दिल से बहुत चंचल, चपल, मधुर न जाने क्यों मुझे प्रतीत हुआ जैसे दिल में अनगिनित जख्म छिपाये हो रेशमी काले केश जिन्हें निशा प्रहरी बनकर सहला Continue reading एक नई दोस्त 

पापों की तिलांजलि

पापों की तिलांजलि जिंदगी की भाग दौड़ में कब भोर हुई, और कब सूरज ढल गया पता ही न चला कब रात का सन्नाटा पसरा, और कब सूर्योदय की अरुणिमा ने आंखें खोली मालूम न हुआ कब चाँद-सितारे चमके आकाश में, और कब सूरज की किरणों ने जगाया अलसाई कलियों को ज्ञात न हुआ कब काले मेघों ने बरसाए मोती धरा पर, और कब बसंत ने किया शृंगार सावन के झूलों संग मालूम न पड़ा कब बचपन बीता, और कब यौवन ने ली अंगड़ाई पता ही न चला बेचारी ज़िन्दगी उलझी रही क्रोध के अंगारो में लालच के शोलों में Continue reading पापों की तिलांजलि

तेरा पागल दीवाना

तेरा पागल दीवाना हवा के एक नटखट झोंके ने तेरे गालों को छूकर किया अपने प्यार का इजहार हवा का नटखट झोंका सहलाता रहा बार-बार तेरे कोमल गालों को और करता रहा इन्तजार कि तू सिर्फ एक बार अपनी नशीली आँखों से उस प्यासी कशिश के अनमोल क्षणों को उतार ले अपनी गर्म साँसों की गहराई में मगर डूबी हुई थी तू अपने ही ख्यालों में इतना कि हो न सका अहसास तुझे किसी के पागलपन का था दीवाना कितना वो तेरी रेशम सी मुलायम कपोलों का छूना चाहा जब-जब उसने तेरे नरम गालों को फिसल गए अरमान उसके बार-बार Continue reading तेरा पागल दीवाना

मेरे शहर में

मेरे शहर में बेगुनाहों की लाशों पर, बेखौफ चलते हैं लोग यहाँ फिर क्यों रिश्तों को, बिलखते हैं लोग मेरे शहर में खबर है कि मेघा, खूब बरसे हैं इस बार सावन में फिर क्यों बूँद-बूँद को, तरसते हैं लोग मेरे शहर में हर गली सरकारी चर्चा है, कि भरे हैं भंडार अनाजों के फिर क्यों भूख से तड़पते हैं, मासूम बच्चे मेरे शहर में काली घटा छाई, तो मेघ गरजने लगे हैं आकाश में गरजते हैं तो फिर क्योँ बरसते हैं मेघ मेरे शहर में सूरज की रोशनी में, रात का ख़ौफ़नाक सन्नाटा देखा है मैंने फिर क्यों दिन Continue reading मेरे शहर में

पीड़ा के पलने पर पलता

पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। आँसू भी आँखों में आकर नहीं सिसकने अकुलाता। मुस्कानें मुस्काती दिखती जब मिलती थीं मुस्कानों से यादों की झुरमुट में छिपकर मिलते थे प्रियजन अपनों से। पर पलकों के पीछे आँसू कुछ भी कह नहीं था पाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। जाने कितनी मीठी बातें प्यार प्यार से बतियाता था हँसता था, मुस्काता रहता पर मन ही मन शर्माता था। प्यारी छवि तब प्रेमभाव की देख हृदय था हर्षाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। हम थे और सफर था अपना पथ के Continue reading पीड़ा के पलने पर पलता

निशा प्रहर में

निशा प्रहर में क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। बुझती साँसों सी संकुचित निशा प्रहर में, मिले थे भाग्य से, तुम उस भटकी सी दिशा प्रहर में, संजोये थे अरमान कई, हमने उस प्रात प्रहर में, बीत रही थी निशा, एकाकी मन प्रांगण में… क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। कहनी है बातें कई तुमसे अपने मन की! संकुचित निशा प्रहर अब रोक रही राहें मन की! चंद Continue reading निशा प्रहर में

कित -कित खेलवाली बचपन

कित -कित खेलवाली बचपन ———————————- नगर की कंक्रीट जंगल में खो गई है मेरी कित -कित खेलवाली बचपन आंगन,जंहा लेटकर दादाजी से कहानी सुनता था अब वह सिकुड़ गया है और घर के भीतर घुस गया है कुल्हि पिण्डा और मांझी छाटका भी अब नहीं है वह अब कॉलोनी गया है कथा बाँचना -गप्पे हाँकना और नाच -गान अब टेलीविजन पर ही दिखाई देता है बड़ी -बड़ी मैदान जहाँ खेलती रहती थी तितलियों के पीछे भगति थी वह अब नहीं है वहाँ अब ऊँची -ऊँची गगनचुम्बी घर बानी है जंगल,जहाँ से मुझे केन्दु-चार खाने को मिलता था छत्तू ,पुटका छात्तु Continue reading कित -कित खेलवाली बचपन

पुरवा

पुरवा स्वर्णिम आलोक से मण्डित तरुवर रश्मियों ने सँवारा अनुराग से भर प्रशस्ति गा उठे चारण पखेरू सस्वर चपला पुरवा गई क्षण को ठहर।। पुरवा ने कोंपल से की फिर ठिठोली लगी खेलने लतिका से आँख -मिचौली कौतुक से भर ज्यों कोकिला बोली गुलमोहर ने धरा पर बिखरा दी रोली ।। दृश्य अपूर्व लगे सराहने मेघ चंचल पुरवा ने बढ़ाया वेग घन घर्षण कर उठे भर आवेश अतिथि बन पहुँचे गिरिराज के देश ।। नटखट पुरवा बढ़ी सागर की ओर त्वरित गति भागी पकड़ने को छोर लहरों से मिल हुई भाव -विभोर अर्णव का ह्रदय भी ले हिलोर ।। निश्शंक, Continue reading पुरवा

उस पत्थर को मैंने तराशा

उस पत्थर को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया और  तराशकर उसे बनाया जिसने पथ से मुझे उठाया।   जिसके कारण नाव बिचारी टूट  किनारे  जा  टकराई उसे  देकर  पतवार हमारी हमने  मंजिल  पार लगाई।   औ किनारा जब उसने पाया बोल उठा वह अति शरमाया उस पत्थर को  मैंने  तराशा जिसने पथ पर  मुझे गिराया।   जिनने चिंतन के पंख हमारे नोंच-नाचकर सब बिखराये मैंने  ले उनके  मन बौराये पतझर में भी फूल खिलाये।   यूँ  तराशकर  उन्हें  बनाया प्रभु की  वाणी का रखवाला उस पत्थर  को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया।   जिसने  द्वेष, घृणा, Continue reading उस पत्थर को मैंने तराशा

शोर मचाती आँखें

शोर मचाती आँखें शोर बहुत करती है तेरी चुप सी ये दो आँखें! जाने ये क्या बक-बक करती है तेरी ये दो आँखें! भींचकर शब्दों को भिगोती है ये पहले, दर्द की सुई फिर डूबकर पिरोती है इनमें, फिर छिड़ककर नमक हँसती है तेरी ये दो आँखें….. खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें! कभी चुपचाप युँ ही मचाती है शोर ये, जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में, कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें…. दरिया नहीं, इक बाँध में बंधी झील है ये दो आँखें! करुण नाद लिए कभी करती है शोर Continue reading शोर मचाती आँखें

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है रात ने भी पसंदीदा जेवर जुदाकर रखा है। जुगनूओं की बारात भी चुपचाप चल रही है रात ने गहन सन्नाटा जो सजाकर रखा है। रातरानी ने बगिया को महकाकर रखा है रात ने लेकिन द्वार अपना सटाकर रखा है। जलाकर रखा दीप भी किस आस में जगता रहे उजाले को अंधेरे ने खूब डराकर रखा है। बेशुमार यादों ने भी करवटें बदल बदलकर इंतिजार की कसक को महज जगाकर रखा है। आपके वादे भी गुमसुम हुए से बैठे हैं स्याह रात ने उनको बंदी Continue reading आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है