बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

बिगड़े पति की हरकतों से परेशान बीवी बोली सपने में भी मत सोचना मैं कभी तुमसे डरूंगी ये वादा है मेरा जानू अगर तुम ठीक से रहोगे भाजपा के चुनाव चिह्न से आपका स्वागत करुँगी लेकिन बावला पति रहता सदा अपनी धुन में किसी कली ने नहीं डाली इस भँवरे को घास पत्नी ने किया आगाह ज़्यादा चतुराई दिखाई तो फिर कांग्रेस का चुनाव चिह्न है सदैव मेरे पास दीवाने आशिक की हरकतें होती गयी हद पार भवंरा मंडराता कभी इस डाल, कभी उस डाल हर महफ़िल से बेआबरू हो कर निकला भवंरा मगर फर्क नहीं पड़ा उसे जैसे हो Continue reading बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

उदास मेहबूबा को देख रसिक पति बोला जानू मैं तुम्हारा कृष्म, तुम हो मेरी राधा चांदनी रात में देखो कैसे झिलमिलाते तारे मगर मेरा पूनम का चाँद क्यों खिला आधा रूठी पत्नी बोली अब नज़र भी नहीं मिलाते यही नज़रें होती थी कभी तुम्हारी मधुशाला पत्नी को मनाने का ये हुनर सीखा कहाँ से मेरे महबूब हमें भी दिखा दो वो पाठशाला राधा को मनाने प्रेमातुर पति ने की ठिठोली हे सखा थक जाती हो अब रख लो इक बाई तुनक मिजाज पत्नी को जैसे सूंघ गया सांप पुरानी चोट शायद आज फिर उभर आयी भावुक हो कर पत्नी बोली Continue reading रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

वो कभी वक्त का मारा तो कभी हुआ परेशान सिंधु लहरों में बह गए हैं उसके सभी अरमान कभी वह बंजर जमीं तो कभी खोखला आसमान रहम करो ऐसे पति पर आखिर वह भी है इंसान नहीं है कोई ठौर ठिकाना ना उसका कोई गाँव नसीब में नहीं है शायद पीपल की शीतल छाँव कंटीली डगर चलते रक्तरंजित हुए उसके पाँव खोटी तक़दीर पर कौवे भी मंडराते कांव-कांव गीता पढता वह ताकि मिल जाए उसे आज़ादी ग्रन्थ साहिब भी सुनता ताकि रुक जाए बर्बादी नित्य क़ुरान वह पढता बन कर उसका फरियादी जिसने ऐसा हाल किया वह थी उसकी शहज़ादी Continue reading परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

पति-पत्नी दोनों गए एक कॉकटेल पार्टी में जहाँ ग़मों के जाम पर जाम छलक रहे थे मदहोश मनचले जोड़े डाल बाहों में बाहें उन्मत हो मदिरा के समुन्द्र में बहक रहे थे चढ़ा कर एक जाम लड़खड़ाती पत्नी बोली डार्लिंग, टल्ली हो कर वह जो मटक रहा है ठुकराया था रिश्ता उसका मैंने एक दिन मुझे न पाकर अब देखो कैसे भटक रहा है पति बोला, नशे में वह नहीं तुम हो कामिनी ख़ुमारी में दिमाग तो तुम्हारा ही घूम रहा है तुम्हें ही न पाकर खुशनसीब है वह कितना, लगाकर जाम ख़ुशी के जश्न में झूम रहा है हाथ Continue reading डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

ये शाम कितनी मदहोश है

मखमली धुमिल चादर लपेटे ये शाम कितनी मस्तानी है मंथर गति से ढलता सूरज दस्तक देती रात की रानी है उन्माद में डूबा है नभमण्डल जैसे फैलाकर पंख असमानी धीमे पग धर बटोही चला है गठरी में बांधे ख्वाब अरमानी ले चुम्बन धान की बालियों का हवा गीत कोई गुनगुनाती है खेत किनारे थिरकती पीपल बांसुरी लिए राग एक सुनाती है ढलते सूरज की चंचल किरणें कुछ उदास, कुछ ग़मगीन हैं थकी-सी अनजान परछाईयाँ कदमों की आहट नमकीन हैं मंदिर की घंटी की धुन संग शाम ठुमक-ठुमक ढलती है पायल की झंकार थिरक कर ठंडी आहें भर कर चलती है Continue reading ये शाम कितनी मदहोश है

इश्क के बाज़ार में

इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार   अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों धोता है नादानी में जिसे तू, मुहब्बत समझ बैठा था है ये वही गुनाह, जिसे आज तू ढोता है   गुनाह नहीं था कोई, हाथ की लकीरों का नतीजा तो वही होता है, जो कर्म होता है काँटों से खुशबू की, चाहत न रखना कभी कल वही उगेगा फिर, जो आज तू बोता है दस्तक देने आयी थी, किस्मत तेरे द्वार पर रुठ कर चली गयी, चादर ताने क्यों सोता है इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों Continue reading इश्क के बाज़ार में

कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अपने सुहाग से चंचल सुहागन बोली आज पड़ोसन के यहाँ राम कथा थी पंडित पांडे जी ने कहा रामराज्य में ना कोई दुःख था, ना कोई व्यथा थी  रामराज्य में शेर-बकरी भी जानू बेफिक्र पीते पानी एक ही घाट पर संभव ये कैसे, हमने तो नहीं काटी अब तक कोई रात एक ही खाट पर  व्यंग-वाणों से घायल पति बोला संभव ये कैसे नहीं हो सकता है जब मैंने काटी ज़िन्दगी बन बकरी तो यह किस्सा भी सच हो सकता है  ये सुनकर पत्नी फूली ना समायी फिर खो गयी अपने ही साम्राज्य में जब यह घटित हो सकता है Continue reading कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )

आधी जिंदगी

आधी जिंदगी जिंदगी कुछ नहीं है और, ये तो है एक कच्ची डोर | कोई साथी नहीं साथ का , इस आने और जाने की राह का | जिंदगी से तुम करो न प्यार , क्यूकी ये तो है एक बेवफा यार |

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा? सच में सच का साथ न दोगे कमजोरो को हाथ न दोगे । दोष सिद्ध निर्बल पर होता। सबल पाप करता और सोता। नीर क्षीर सा कौन चुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । सदय भाव अब हृदय न आते। बदले की भावनाए पाले। काम करते रहते काले। पश्चाताप से कौन धुलेगा । सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । घबराहट सच्चाई से , जैसे तीखी दवाई से, दूरी है अच्छाई से । हितकारी पर कौन गुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । दीवारों के कान सुना है । जेलों के मेहमान Continue reading सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

अरुणोदय

अरूणोदय की बेला आयी कली कली डाली मुस्काई ओस विन्दु मिट गए धरा के प्रातःकाल सुखद सुहाई काली रात दूर है दुख सी फिर सुख सी बेला आई प्राची में प्रकाश दिख रहा चिड़ियो मे कोलाहल सुनाई। भौरे मुदित मना है देखो पल्लव मे स्मित है आई। धरा शस्यश्यामला पूरित फूल फूले नही समाई। उदय सूर्य का होता है तब बीती रात प्रात जब आई। विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

बेटियाँ

बेटियाँ पढाओ जनजन से आह्वान है । ये काम महान है ये काम महान है । किससे कम है मेरी बेटी चढती है हिमालय की चोटी । करो सदा सम्मान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । पढ़कर बेटी दो घरों को रोशन करती देती शिक्षा भेद न करो बेटे बेटी में दो समान शिक्षा दिक्षा। दहेज मुक्त हो सब समाज जब समझे बहू को बेटी समान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । आधी आबादी की जिससे होती है भागीदारी । एक नहीं दो दो मात्राएं नर से भारी नारी हम Continue reading बेटियाँ

आज सुर गा न सकेंगे संगीत

आज सुर गा न सकेंगे संगीत आज सुर गा न सकेंगे संगीत अथ में अदभुत अंत में भरम अनोखा परिचय निशीथ की विकल साँसों की नहीं प्रात: से प्रेम आर्द्र आँचल निर्जल व्योम-जल कितना सत्य शस्य गीत की नहीं सहेगी प्रभंजन,शीत प्रिय सरस सौरभ कोमल अनुबंध बाकी सभी शेष दीप की लौ के हर कॅपकँपी में सुर मेरे होंगे संगीत । ————- डॉ छेदी साह

समाचार

कवि सम्मेलन में “हिन्दवीर सम्मान” से समान्नित झालावाड़ जिले के कवि राजेश पुरोहित को साहित्य संगम संस्थान,दिल्ली द्वारा “हिन्दवीर सम्मान” से सम्मानित किया गया। भारतीय नववर्ष पर आयोजित ऑनलाइन कवि सम्मेलन में पुरोहित को उत्कृष्ट काव्य प्रस्तुति हेतु प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान संस्थान के अध्यक्ष राजवीर सिंह मंत्र,सचिव कविराज तरुण सक्षम, उपाध्यक्ष सौम्या मिश्रा अनु श्री, एवम संयोजक आशीष पांडे जिद्दी ने प्रदान किया। पुरोहित कवि, ग़ज़लकार, गीतकार एवम श्रेष्ठ मंच संचालक के रूप में जाने जाते हैं।