हमेशा की तरह

हमेशा की तरह हकीकत है ये कोई या है ये दिवास्वप्न, हमेशा की तरह!हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता, ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा, कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा……. हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे, कुछ बनते बिगरते, कुछ टूट के बिखरे, सपने हों ये जैसे, किसी हकीकत से परे…… हमेशा की तरह,किसी झील में जैसे पानी हो ठहरा, मन की झील में, चुपके से कोई हो आ उतरा, वो मासूम सी, पर छुपाए राज कोई गहरा….. हमेशा की तरह, खामोशियों के ये पहरे, रुमानियत हों ये जैसे, किसी हकीकत Continue reading हमेशा की तरह

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रे पथिक तनिक तू सुनता जा

रे पथिक तनिक तू सुनता जा मैं नीलकंठ हलाहल हूँ पी मुझको शिवपद पाता जा जब मन- धरा-गगन प्रदुषित हों तू जटा जूट प्रलयंकर बन जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा….. मैं पाच्जन्य सा महाशंख हूँ सत्य-असत्य के महासमर मे मुझको तू गूँजाता जा मन सारथि कृष्ण बनाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा……. मैं चक्रों में सहत्रचक्र हूँ तु कमलदल खिलाता जा शिव शक्ति के मिलन क्षण में तू स्वयं का परिचय पाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा…….

आदमी

आदमी आदमी सोचता है, कुछ लिखे…… जिंदगी के अव्यावहारिक होते जा रहे समस्त शब्द से सार्थक वाक्य बना दे मुक्त हो जाए उन आरोप से जिसे स्वयं पर आरोपित कर थक चुका है, उब चुका है आदमी सोचता है,कुछ करे….. सतत मरते हुए कुछ पल जी ले जीवन के मसानी भूमि पर चंद उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर जला डाले उदासीनता के कफ़न अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को आदमी सोचता है, कुछ कहे ……. जो कह न पाया कभी किसी से और न जाने क्या क्या कहता रहा तमाम उम्र कि बस एक बार अपनी बात कह Continue reading आदमी

लाख मशक्कत के बाद

लाख मशक्कत के बाद वो रूप रंग उसका, वो हँसना मुस्कुराना उसका, वो चेहरे की रंगत, वो आँखों को मिचकाना उसका। गजलों में कैसे ये सब लिख पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो वक़्त बेवक्त साथ उसके सहेलियों का जमावड़ा रहता था, मैं कहना बहुत कुछ चाहता, लेकिन बस मुस्कुराकर रह जाता था। महोब्बत की बातें कैसे उससे बयाँ कर पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो आती थी जब भी मिलने बस उसे देखता रहता था, लबों तक आयी हुई बात भी बोल नही Continue reading लाख मशक्कत के बाद

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं।   रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर देखो कोमल सबका तन मन है।   चुन चुनकर सुन्दर फूलों को जब कर्म हमारे गुँथते हैं कर्म हमारे अंतर्मन का सृजन हमेशा करते हैं।   धर्म कर्म के इन फूलों से माला मोहक बनती है इसे समर्पित तुझको करके श्रद्धा प्यारी जगती है। तुझे नमन करने हम सब जन हृदय सजाया करते हैं और स्मरण जब तेरा करते अवगुण सत्गुण बनते हैं।   तेरी मूरत Continue reading हृदय हमारा फुलवारी है

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी सुबह अलसायी अधखुली पंखुरियों सी चूमकर उड़ती हुई कुछ तितलियों सी   सभी हैं याद मधुमास को सहलाती हुई अंगड़ाईयाँ लेती कुछ अलसायी हुई आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई।   सिराहने बैठ मृदु स्पर्श करती हुई चेतना का श्रंगार बस करती हुई हर बात प्रणय का मुखरित करती हुई कुलबुलाती याद उर में भरती हुई   आ रही प्रेम बंधन में कसमसाती हुई बात Continue reading आ रही हैं याद सारी

तेरा बदन

तेरा बदन तेरा बदन मुझ में समा जाता है। यु रात के दुझे पहर तक जब नींद नही आती है, करवट बदल-बदल कर जब थकावट सी छा जाती है। जब घडी की टिक-टिक से भी आवाज छन-छन की आती है, जब रोजाना के उसी बासी कम्बल से खुशबु इत्र की आती है।। जब पलकें भारी होने लगती है, और नींद आँखों में बसने लगती है। ऐसे में प्रियतमा तेरा ख्याल मुझे आता है, और कोई ख्वाब तुझे मेरे करीब ले आता है।। तेरा फितूर फिर मुझ पर हावी हो जाता है, और निःस्वार्थ प्रेम का पूरा ज्ञान धरा रह जाता Continue reading तेरा बदन

फासलों में माधूर्य

फासलों में माधूर्य इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग…. बोझिल सा होता है जब ये मन, थककर जब चूर हो जाता है ये बदन, बहती हुई रक्त शिराओं में, छोड़ जाती है कितने ही अवसाद के कण, तब आती है फासलों से चलकर यादें, मन को देती हैं माधूर्य के कितने ही एहसास, हाँ, तब उस पल तुम होती हो मेरे कितने ही पास…. इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग….. अनियंत्रित जब होती है ये धड़कन, उलझती जाती है जब हृदय की कम्पन, बेवश करती है कितनी ही बातें, राहों में हर तरफ बिखरे से दिखते Continue reading फासलों में माधूर्य

लगन

लगन आच्छादित तुम हृदय पर होते, गर लगन तुझ में भी होती ! मन की इस मंदिर में मूरत उनकी ही, आराधना के उस प्रथम पल से, मूरत मेरी ही उनके मन में भी होती, तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी। स्थापित तुम ही मंदिर में होते, गर लगन तुझ में भी होती ! नाम लबों पर एक बस उनका ही, समर्पण के उस प्रथम पल से, लबों पर उनके भी नाम मेरा ही होता, तो पूजा पूर्ण हो जाती मेरी। प्लावित तुम ही लब पर होते, गर लगन तुझ में भी होती ! हृदय के धड़कन समर्पित उनको ही, Continue reading लगन

वैलेंटाइन

वैलेंटाइन हर साल 14th  फरवरी जो दिवस आता है l प्यार भरा ये दिवस वैलेंटाइन कहलाता है ll प्रेम व  स्नेह  की  बारिश ये लेकर आता हैl हर कोई, किसी का वैलेंटाइन कहलाता है ll किसी  ना  किसी  का  कोई खास होता है l जिससे मिलकर मन नहीं उदास होता  है ll इस प्यार का अलग-अलग अंदाज होता है l कही आदर कही दिल का आगाज़ होता है ll कही बच्चों के लिए माँ- बाप वैलेंटाइन है l कही  शिष्यों  के लिए  गुरु वैलेंटाइन  है ll कही प्रेमी एक दूजे के लिए  वैलेंटाइन है l हर कोई ना कोई किसी Continue reading वैलेंटाइन

दिल के दरिया में

दिल के दरिया में जब भी बरसता है आसमांसे पानी , साथ में बह जाता है आँखों का पानी… यादों के गुलिस्ता जब बिखर जाते है उन लम्हो से ही , दिलके दरिया में उमड़ती है यादों की मछलियां और …….. चूपचाप रोती है उन लम्हों की सिसकिया… उमड़ आते है  चहेरों के निशां…….. और…. रो देता है आँख पर तैरता पानी ……… -मनीषा ‘जोबन ‘

प्यार क्या है?

” प्यार क्या है..?  “ प्यार तपस्या और साधना की अनुभूति है, प्यार समंदर से मिलने वाला मोती है, प्यार राधा है, रुकमणी है, शेषनाग है, प्यार गोकुल की गलियों में कान्हा का रास है, प्यार शबरी के बैर और मीरा का विश्वास है, प्यार केकई के कह देने पर राम का वनवास है, प्यार  माँ का बेटे से दुलार है, प्यार पिता का दिया अतुलित संसार है, प्यार भाई की कलाई पर बहिन की राखी है, प्यार गलती न होने पर भी मांगी गई माफ़ी है, प्यार दादी का बनाया मक्के की रोटी, सरसों का साग है, प्यार बड़े Continue reading प्यार क्या है?

वृतांत

वृतांत अटूट लड़ी हो इस जीवन वृत्तान्त की तुम, अर्धांग सर्वदा ही जन्म-जन्मातर रही हो तुम, न होते कंपन इस हृदय के गलियारों में, उभर कर न आती तस्वीर कोई इन आखों में, न लिख पाता वृत्तान्त मैं जीवन की राहों के, मेरे पिछले जीवन की ही कोई अटूट कड़ी हो तुम…. लिख जाता हूँ मैं कितने ही पन्ने तेरी लय पर, अनलिखे कितने ही कोरे पन्ने, फिर होते हैं मुखर, विह्वल हो उठते हैं शब्दों के भाव इन पन्नों पर, शक्ल फिर तेरी ही उभर आती है लहराकर, अर्धांग मेरी, तुम सिमट जाती हो वृत्तान्त बनकर, मेरे अगले जन्म Continue reading वृतांत

चाहत के सिलसिले

चाहत के सिलसिले ये जादू है कोई! या जुड़ रहे हैं कोई सिलसिले?….बेखुदी में खुद को कहीं, अब खोने सा लगा हूँ मैं, खुद से हीं जुदा कहीं रहने लगा हूँ मैं, कुछ अपने आप से ही अलग होने लगा हूँ मैं, काश! धड़कता न ये मन, खोती न कही दिल की ये राहे, काश! देखकर मुझको झुकती न वो पलकें…..ये कैसा है असर! क्या है ये चाहत के सिलसिले?…अंजान राहों पे कहीं, भटकने सा लगा हूँ मैं, भीड़ में तन्हा सा रहने लगा हूँ मैं, या ले गया मन कोई, अंजान अब तक हूँ मैं, काश! पिघलता न ये Continue reading चाहत के सिलसिले