चहकने लगी शराब (ग़ज़ल)

जब से मिली तेरी सोहबत, चहकने लगी शराब, देख तेरी परवाज़ अब्र में, चहकने लगी शराब। फ़लक से जो उतरा शबाब, चमन-ए-दहर में, पाकीज़ा खुशबु से उसकी, महकने लगी शराब। तेरी शोखियाँ से मुत्तासिर, पैमाने छलक गए, जाम ने जो छुआ होठों को, बहकने लगी शराब। जल रही थी चिंगारियां जब, दो दिलों के दरमियाँ, चिंगारी एक यहाँ भी गिरी, दहकने लगी शराब। बड़े बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से जो निकले, सितारों को देख गर्दिश में, सिसकने लगी शराब। महताब की तबस्सुम पे, इतना मत इतरा ‘ एकांत, गुफ्तगू जो हुई आफ़ताब से, मचलने लगी शराब। (किशन नेगी ‘एकांत’)

कौन हो तुम

हाथ की धुंधली लकीरों में देखा है मैंने मुस्कुराता प्रतिबिम्ब तुम्हारा कहीं तुम मेरी करवट लेती किस्मत तो नहीं शीतल चांदनी रात में तुम्हें चुपके से मेरी निंदिया चुराते देखा है कहीं तुम मेरा अदृश्य ख्वाब तो नहीं तेरी साँसों को जिया है पल-पल पंत, निराला व प्रसाद की नायिकाओं में कहीं तुम मेरी कविता की नायिका तो नहीं अभिलाषाओं के सुनहरे पंख लगाकर तुम्हें उड़ते देखा हैं नीले अम्बर की उंचाईयों में कहीं तुम मेरी नायाब उड़ान तो नहीं क्षितिज के केसरी आँचल तले इंद्रधनुष संग तुम्हें ठुमकते देखा है मैंने कहीं तुम मेरी तेजोमय मंज़िल तो नहीं नीले Continue reading कौन हो तुम

ग़ज़ल

रिश्तों के टूटे हुए धागों को, जोड़ने की कोई बात करें, दर्पण के बिखरे टुकड़ों को ,जोड़ने की कोई बात करें | जिन जंजीरों में होकर क़ैद, तड़पे थे दो दिल कभी, उन जंग लगी जंजीरों को, तोड़ने की कोई बात करें | सागर की तूफानी लहरों ने, डुबाई थी कश्ती हमारी, आज उन लहरों के रुख को, मोड़ने की कोई बात करें | माँ के जिस आँचल का साया, रहा सदा सर पर हमारे, आओ उस पवित्र आँचल को, ओढ़ने की कोई बात करें | भीड़ में जिन यारों ने, छोड़ा था साथ हमारा ‘एकांत’, ऐसे मतलबी भेड़ियों को, Continue reading ग़ज़ल

ख्वाब जो टूट कर बिखर गए

तुझसे मिलने के बाद मेरे दिल की धड़कनों में सपनों के नन्हे बीज अंकुरित होने लगे हर क्षण इन हसीन सपनों में कुछ नए सपने जन्म लेने लगे, इन सपनों को सदा अपने दिल से लगाए रखता सपने खिलने लगे, कोपलें आने लगी मैं उनकी खिलने की छटपटाहट महसूस करता उन सपनों में मुझे बस तेरी ही तस्वीर दिखती जैसे हर सपना तेरे ही दिल की धड़कन हो जब कोई सपना रोता, जैसे तू रो रही हो जब कोई सपना मुस्कुराता, जैसे तू मुस्कुरा रही हो जब कोई सपना सिसकता, जैसे तू सिसक रही हो जब कोई सपना अंगड़ाई लेता, Continue reading ख्वाब जो टूट कर बिखर गए

कुछ बात तो है तेरी हर बात में।

सहमा-सहमा ये नीला आसमां, सिसकती है क्यों ये मासूम जमीं। घिर आती है जब श्यामल घटा, उतरती है क्यों तेरी आँखों में नमीं। देख मासूमियत तेरे चेहरे की, हिमालय भी हुआ जाता घायल। बहकती है जब मादक पुरवाई, झनकती क्यों नहीं तेरी पायल। सावन की मधुशाला से झरता जब, नाजुक यौवन बन कर बूँद-बूँद। मदहोशी में बेक़रार कुदरत भी, करती रसपान आंखें मूँद-मूँद। ठिठुरता है बावला सन्नाटा भी, थिरकती जब तू चांदनी रात में। गति थम जाती है चाँद-सूरज की, कुछ बात तो है तेरी हर बात में। (किशन नेगी)

ख्वाब का एक टुकड़ा

ख्वाब एक देखा मैंने बनकर जब एक ख्वाब मेरे ख्वाबों में आई तुम चुराकर गुलाबी निंदिया मोरी उड़ चली ख्वाबों के नीले आसमां में दफनाकर अधूरे ख्वाबों को संवेदन-शून्य निंदिया के सिरहाने मैं भी उड़ चला करके अनुसरण तेरी धुंधली परछाई का देखा मैंने कि तुम थी सवार ख्वाबों के चांदनी रथ पर सजाकर सुनहले पंख अपनी बाहों में और उड़ रही थी उन्मुक्त गगन में संग तेरे खवाबों की बारात थी कुछ ख्वाब गुलाबी, कुछ नीले कुछ असमानी, कुछ बैंगनी अचानक टुकड़ा एक ख्वाब का गिरा जमीं पर टकराकर मुझसे और खुल गई मेरी व्याकुल आंखें टूट गई थी Continue reading ख्वाब का एक टुकड़ा

क्यों उजाड़ी ख्वाबों की दुनियां

ख्वाबों में जब तुम आई गोरी बिजली चमक कर गिर पड़ी ख्वाब सारे दफ़न हुए जल कर बरसने लगी अंगारों की झड़ी कुछ ख्वाब जो जिन्दा थे अभी टूट गई उनकी नाजुक कड़ी जलकर ख़ाक हुए अरमान सभी ख्वाबों ने देखी वह अशुभ घड़ी दहकी थी ज्वाला तेरे हुस्न की तुम मुस्कुरा रही थी वहीं खड़ी यौवन के गुमान में भटकी थी थामे हाथ में अहंकार की छड़ी जिन ख्वाबों ने था तराशा तुझे उन्हीं ख्वाबों से क्यों तू लड़ी हुस्न की आग में जलाया उनको जिन ख्वाबों संग तू पली बड़ी उतरेगी जब यौवन की ख़ुमारी याद करोगी तब Continue reading क्यों उजाड़ी ख्वाबों की दुनियां

क्या नाम दूँ में उस ख्वाब को

मेरे ख्वाबों में ख्वाब बनकर क्यों ख्वाब मुझे दिखाती हो फिर टूटे ख्वाबों को जोड़कर एक नया ख्वाब रचाती हो रंगीन ख्वाबों की दुनियां से कुछ ख्वाब चुन कर लाती हो आँचल में समेट इन ख्वाबों को फिर गीत कोई नया गाती हो असमानी ख्वाबों के झुरमुट से अजनबी ख्वाब बन शरमाती हो फिर दिखाकर कोई नया ख्वाब मासूम ख़्वाबों को भरमाती हो बटोरकर तिनके टूटे ख़्वाबों के ख्वाब बन कर कहाँ उड़ जाती हो देख बेचैनी इन कोमल खवाबों की फिर टूटे ख़्वाबों से जुड़ जाती हो कभी ख़्वाबों के नाजुक दिलों की धड़कन बन कर बहकती हो कभी Continue reading क्या नाम दूँ में उस ख्वाब को

मुसाफिर! ख्वाब कोई नया चुन

जिन्दगी के लम्बे सफर में मुसाफिर, फिर से ख्वाब कोई रुपहला चुन। संवार कर अपने ख्वाबों के टूटे तार, रच ले ख्वाबों की कोई सुरीली धुन। मंडराए जब अँधेरा तेरे कर्मपथ पर, रुक कर मासूम ख्वाबों की भी सुन। जोड़ कर टूटे धागे बिखरे ख्वाबों के, रेशमी धागों से ख्वाब कोई नया बुन। दुर्गम डगर में ललकारे जब शत्रु तुझे, कर्मों के अग्निकुंड में तू उसको भुन। दीमक बन जो करे धीमी तेरी चाल, उमंग के पसीने से मिटादे सारे घुन। मुसाफिर! मंज़िल तेरी राह ताकती, ख्वाबों में से कोई ख्वाब दिव्य चुन। (किशन नेगी ‘एकांत’)

नववर्ष! तेरा अभिनंदन

🙈🙉🙊 2018 की हार्दिक शुभकामनाएं… . कल पुराना साल डूबा था, कल किसी का मन ऊबा था, कल रुदन-सा चेहरा था। धूप से मौसम जला क्या? कष्ट जो भी था टला क्या? आज हँसकर चाँद चला क्या? बदली में विलुप्त क्रंदन नववर्ष! तेरा अभिनंदन . रंग-बिरंगी दुनिया लिखें, आप भी सीखो हम भी सीखें, जीने के कुछ तौर-तरीकें। खट्टी-मिठी यादें लेकर, हाथों में कुछ प्यादें लेकर, झूठे-सच्चे वादें लेकर। सपने बुन रहे हैं नूतन नववर्ष! तेरा अभिनंदन 👏👏👏👏👏… @सत्येन्द्र गोविन्द :-8051804177

एक अजनबी मुसाफिर

ख्वाब एक अजनबी चलता है कभी-कभी मेरी परछाई संग मगर देखा नहीं उसे आज तक ना ही छुवा है उसे कभी मगर अहसास अक्सर होता है जैसे मेरे आस-पास ही है ना कोई आकार उसका ना कोई स्वरुप उसका उसका कोमल स्पर्श अक्सर गुदगुदाता है कभी मेरे दिल की धड़कनों को कभी मेरी गर्म साँसों को अनजान होते हुए भी ये अजनबी ख्वाब जैसे ढूंढ रहा अपने अतीत की यादों को मेरे बावले मन केअल्हड़पन में कभी थाम लेता हाथ मेरा कभी चूम लेता माथा मेरा फिर चुपके से भाप बनकर छुप जाता है नील गगन के आँचल में कभी Continue reading एक अजनबी मुसाफिर

नववर्ष 2018 की शुभकामनाये

गया दिसंबर आई जनवरी l लेकर फिर एक नया साल ll खुशियों से भर जाये झोली l ना रहे कोई भी फटे-हाल ll ना सोये कभी कोई भूखा l ना किसी को दुःख सताये ll आने वाला ये नया साल l चेहरों पर मुस्कान लाये ll सपने हो जाये सभी के पूरे l मंजिल सभी को मिल जाये ll भूल जाये सब नफ़रत करना l चहुँ और प्यार ही प्यार छायेll ईश्वर करे जीवन में तुम्हारे l आशा की किरण जगमगाये ll आपको व आपके परिवार को l नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये ll —————-

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ….. जाने…. कितने ही पलों का… उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ…. तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध हूँ मैं हर उस पल से, चाहूँ भी तो मैं …. खुद को… परित्यक्त नहीं कर सकता, बीते उस पल से। उपांतसाक्षी हूँ मैं…. जाने…. कितने ही दस्तावेजों का… उकेरे हैं जिनपर… अनमने से एकाकी पलों के, कितने ही अभिलेख…. बिखेरे हैं मन के अनगढ़े से आलेख, परिहृत नही मैं पल भर भी… बीते उस पल से। आच्छादित है… ये पल घन बनकर मुझ पर, आवृत है…. ये मेरे मन पर, परिहित हूँ हर पल, जीवन के उपांत Continue reading उपांतसाक्षी

बेसुध सन्नाटा

रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी बचपन का खोया सपना सहमे-सहमे थे सभी पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा धड़कनें भी थक गई थी और दिल भी था टुटा-टूटा सितारे भी डूबे उदासी में चाँद भी था खोया-खोया चांदनी धुंधली पड़ी थी देवदार भी था सोया-सोया मगर पग मेरे रुके नहीं डिगा नहीं कर्म-पथ पर विचलित न हुआ अंगारों से चलता रहा अग्नि-पथ पर क्योंकि छूनी थी मंज़िल चंचल भोर होने से पहले ज्वालामुखी को ललकारा तूफान के रोने से पहले रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी Continue reading बेसुध सन्नाटा

स्मरण

स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारे संग किसी सिक्त क्षण में, न ही, तुम्हारे रिक्त मन में, न ही, तुम्हारे उजाड़ से सूनेपन में, न ही, तुम्हारे व्यस्त जीवन में, कहीं भी तो न था मैं तुम्हारे तन-बदन में …. स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारी बदन से आती हवाओं में, न ही, तुम्हारी सदाओं में, न ही, तुम्हारी जुल्फ सी घटाओं में, न ही, तुम्हारी मोहक अदाओं Continue reading स्मरण