निशा प्रहर में

निशा प्रहर में क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। बुझती साँसों सी संकुचित निशा प्रहर में, मिले थे भाग्य से, तुम उस भटकी सी दिशा प्रहर में, संजोये थे अरमान कई, हमने उस प्रात प्रहर में, बीत रही थी निशा, एकाकी मन प्रांगण में… क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। कहनी है बातें कई तुमसे अपने मन की! संकुचित निशा प्रहर अब रोक रही राहें मन की! चंद Continue reading निशा प्रहर में

कित -कित खेलवाली बचपन

कित -कित खेलवाली बचपन ———————————- नगर की कंक्रीट जंगल में खो गई है मेरी कित -कित खेलवाली बचपन आंगन,जंहा लेटकर दादाजी से कहानी सुनता था अब वह सिकुड़ गया है और घर के भीतर घुस गया है कुल्हि पिण्डा और मांझी छाटका भी अब नहीं है वह अब कॉलोनी गया है कथा बाँचना -गप्पे हाँकना और नाच -गान अब टेलीविजन पर ही दिखाई देता है बड़ी -बड़ी मैदान जहाँ खेलती रहती थी तितलियों के पीछे भगति थी वह अब नहीं है वहाँ अब ऊँची -ऊँची गगनचुम्बी घर बानी है जंगल,जहाँ से मुझे केन्दु-चार खाने को मिलता था छत्तू ,पुटका छात्तु Continue reading कित -कित खेलवाली बचपन

पुरवा

पुरवा स्वर्णिम आलोक से मण्डित तरुवर रश्मियों ने सँवारा अनुराग से भर प्रशस्ति गा उठे चारण पखेरू सस्वर चपला पुरवा गई क्षण को ठहर।। पुरवा ने कोंपल से की फिर ठिठोली लगी खेलने लतिका से आँख -मिचौली कौतुक से भर ज्यों कोकिला बोली गुलमोहर ने धरा पर बिखरा दी रोली ।। दृश्य अपूर्व लगे सराहने मेघ चंचल पुरवा ने बढ़ाया वेग घन घर्षण कर उठे भर आवेश अतिथि बन पहुँचे गिरिराज के देश ।। नटखट पुरवा बढ़ी सागर की ओर त्वरित गति भागी पकड़ने को छोर लहरों से मिल हुई भाव -विभोर अर्णव का ह्रदय भी ले हिलोर ।। निश्शंक, Continue reading पुरवा

उस पत्थर को मैंने तराशा

उस पत्थर को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया और  तराशकर उसे बनाया जिसने पथ से मुझे उठाया।   जिसके कारण नाव बिचारी टूट  किनारे  जा  टकराई उसे  देकर  पतवार हमारी हमने  मंजिल  पार लगाई।   औ किनारा जब उसने पाया बोल उठा वह अति शरमाया उस पत्थर को  मैंने  तराशा जिसने पथ पर  मुझे गिराया।   जिनने चिंतन के पंख हमारे नोंच-नाचकर सब बिखराये मैंने  ले उनके  मन बौराये पतझर में भी फूल खिलाये।   यूँ  तराशकर  उन्हें  बनाया प्रभु की  वाणी का रखवाला उस पत्थर  को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया।   जिसने  द्वेष, घृणा, Continue reading उस पत्थर को मैंने तराशा

शोर मचाती आँखें

शोर मचाती आँखें शोर बहुत करती है तेरी चुप सी ये दो आँखें! जाने ये क्या बक-बक करती है तेरी ये दो आँखें! भींचकर शब्दों को भिगोती है ये पहले, दर्द की सुई फिर डूबकर पिरोती है इनमें, फिर छिड़ककर नमक हँसती है तेरी ये दो आँखें….. खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें! कभी चुपचाप युँ ही मचाती है शोर ये, जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में, कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें…. दरिया नहीं, इक बाँध में बंधी झील है ये दो आँखें! करुण नाद लिए कभी करती है शोर Continue reading शोर मचाती आँखें

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है रात ने भी पसंदीदा जेवर जुदाकर रखा है। जुगनूओं की बारात भी चुपचाप चल रही है रात ने गहन सन्नाटा जो सजाकर रखा है। रातरानी ने बगिया को महकाकर रखा है रात ने लेकिन द्वार अपना सटाकर रखा है। जलाकर रखा दीप भी किस आस में जगता रहे उजाले को अंधेरे ने खूब डराकर रखा है। बेशुमार यादों ने भी करवटें बदल बदलकर इंतिजार की कसक को महज जगाकर रखा है। आपके वादे भी गुमसुम हुए से बैठे हैं स्याह रात ने उनको बंदी Continue reading आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

उजड़ा हुआ पुल

उजड़ा हुआ पुल यूँ तो बिसार ही चुके हो अब तुम मुझे! देख आया हूँ मैं भी वादों के वो उजरे से पुल, जर्जर सी हो चुकी इरादों के तिनके, टूट सी चुकी वो झूलती टहनियों सी शाखें, यूँ ही भूल जाना चाहता है अब मेरा ये मन भी तुझे! पर इक धुन! जो बस सुनाई देती है मुझे! खीचती है बार बार उजरे से उस पुल की तरफ, टूटे से तिनकों से ये जोड़ती है आशियाँ, रोकती है ये राहें, इस मन की गिरह टटोलकर , बांधकर यादों की गिरह से, खींचती है तेरी तरफ ये! कौंधती हैं बिजलियाँ Continue reading उजड़ा हुआ पुल

रक्तधार

रक्तधार अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू, अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू….. चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को, मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई, सतत प्रयत्न कर भी पाप धरा के न धो पाई, व्यथित हृदय ले यह रोती अब, जा सागर में समाई। व्यर्थ हुए हैं प्रयत्न सारे, पीड़ित है इसके हृदय, अन्तस्थ तक मन है क्षुब्ध, सागर हुआ लवणमय, भीग चुकी वसुन्धरा, भीगा न मानव हृदय, हत भागी सी सरिता, अब रोती भाग्य को कोसती। व्यथा के आँसू, कभी बहते व्यग्र लहर बनकर, तट पर Continue reading रक्तधार

ख्वाब जरा सा

ख्वाब जरा सा तब!……….ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! कभी चुपके से बिन बोले तुम आना, इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना, वो राह जो आती है मेरे घर तक, उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना, उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा, तेरी पग से की होंगी जों उसने बातें, उनकी जज्बातों को मैं चुपके से सुन लूंगा, तब ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! मृदुल बसन्त सी चुपके से तुम आना, किल्लोलों पर गूँजती रागिणी सी कोई गीत गाना, वो गगन जो सूना-सूना है अब तक, Continue reading ख्वाब जरा सा

अतृप्ति

अतृप्ति अतृप्त से हैं कुछ, व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न! अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक, समय के ढ़ेर पर…… सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण, अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन! अनगिनत मथु के प्याले, पी पीकर तृप्त हुआ था ये मन, शायद कहीं शेष रह गई थी कोई तृष्णा! या है जन्मी फिर……. इक नई सी मृगतृष्णा इस अन्तःमन! क्युँ इन इच्छाओं के हाथों विवश होता फिर ये मन? अगाध प्रेम पाकर भी, इतना अतृप्त क्युँ है यह जीवन? जग पड़ती है बार-बार फिर क्युँ ये तृष्णा? क्युँ जग Continue reading अतृप्ति

परखा हुआ सत्य

परखा हुआ सत्य फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य, किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य, आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य! अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? गंगोत्री की धार सा सतत बहा है वो सत्य, गुलमोहर की फूल सा सतत खिला है वो सत्य, झूठ को इक शूल सा सतत चुभा है वो सत्य! बन के बिजली बादलों में चमक रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते Continue reading परखा हुआ सत्य

खिलौना

खिलौना तूने खेल लिया बहुत इस तन से, अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना? माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण, माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना। बहलाया मन को तूने इस तन से, जीर्ण खिलौने से अब, क्या लेना और क्या देना? बदलेंगे ये मौसम रंग बदलेगा ये तन, बदलते मौसम में तू चुन लेना इक नया खिलौना। है प्रेम तुझे क्यूँ इतना इस तन से, बीते उस क्षण से अब, क्या लेना और क्या देना? क्युँ रोए है तू पगले जब छूटा ये तन, खिलौना है बस ये इक, तू कहीं खुद Continue reading खिलौना

ओ मेरे पुज्य पिताजी

ओ मेरे पुज्य पिताजी [दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ठाकुर ईश्वर सिंह इस भू लोक को त्याग कर चले गये… जीवन में उनकी कठिन तपस्या से ही आज हम सुखद जीवन जी पा रहे हैं….] “हे ईश्वर मेरे पूजनीय पिता जी को….अपने पावन चरणों में स्थान देना….” ओ मेरे पूज्य पिता जी, कल तक मैं खुद को दुनिया का सब से बड़ा आदमी समझता था क्यों कि मेरे सिर पर तुम्हारा हाथ था…. हम नहीं जानते हम कौन हैं, पर तुम भिष्म थे, जिन्होंने हमारे घर रूपी हस्तिनापुर को चारों ओर से सुर्क्षित कर के Continue reading ओ मेरे पुज्य पिताजी

एहसास प्यार का

एहसास प्यार का बहार छाई तेरे इकरार में हसीन लगते नज़ारे प्यार में भूला गए लाखों गम संसार के तेरे ही प्यार के इज़हार में सपने देखते रहते मिलन के वक्त नागवार है इन्तजार में गुज़ारे जिंदगी यों हँस खेल के टुटे न अपना रिश्ता मझधार में ख्वाब है छोटी सी ज़िन्दगी के ना जा पाये ग़म के अधिकार में हक़ीकत पाए सपने बिश्वास के समय ना बीते किसी तक़रार में साथ जीए मरे सभी को जता के सजन सदा ही इतराय प्यार में सजन