रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात, विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात, पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ, धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… चुपचाप कालिमा घोलती ये रात, स्वप्नातीत, रूपातीत नैनों में ऊँघती सी उथलाती नींद, अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब, मींचती आँखों में तल्खी मन में बेचैनियाँ, बस है इक उम्मीद और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… Continue reading रात और तुम

वो मैं ही था

वो मैं ही था जब कभी चांदनी रात में बैठ गाँव के तल्लैया किनारे निहारा करती थी तुम प्रीतिबिम्ब चाँद का तो कोई चुपके से फेंक कर कंकड़ कर देता धुंधली तस्वीर चाँद की वो कोई और नहीं, मैं ही था बदल-बदल कर करवटें पूर्णिमा की रात को जब तुम बुना करती थी सुनहले खवाब अपनी कल्पनाओं के राजकुमार संग तो कोई चुपके से चुरा लेता ख्वाब तुम्हारे देकर दस्तक तुम्हारे दिल की खिड़की पर वो कोई और नहीं, मैं ही था क्या तुम्हें याद है जब तुम सो जाया करती थी बेसुध हो कर पलटते-पलटते किताब के पन्ने तो Continue reading वो मैं ही था

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल

स्नेह वृक्ष

बरस बीते, बीते अनगिनत पल कितने ही तेरे संग, सदियाँ बीती, मौसम बदले…….. अनदेखा सा कुछ अनवरत पाया है तुमसे, हाँ ! … हाँ! वो स्नेह ही है….. बदला नही वो आज भी, बस बदला है स्नेह का रंग। कभी चेहरे की शिकन से झलकता, कभी नैनों की कोर से छलकता, कभी मन की तड़प और संताप बन उभरता, सुख में हँसी, दुख में विलाप करता, मौसम बदले! पौध स्नेह का सदैव ही दिखा इक रंग । छूकर या फिर दूर ही रहकर! अन्तर्मन के घेरे में मूक सायों सी सिमटकर, हवाओं में इक एहसास सा बिखरकर, साँसों मे खुश्बू Continue reading स्नेह वृक्ष

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

कुछ कहो ना

प्रिय, कुछ कहो ना! यूँ चुप सी खामोश तुम रहो ना! संतप्त हूँ, तुम बिन संसृति से विरक्त हूँ, पतझड़ में पात बिन, मैं डाल सा रिक्त हूँ… हूँ चकोर, छटा चाँदनी सी तुम बिखेरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! सो रही हो रात कोई, गम से सिक्त हो जब आँख कोई, सपनों के सबल प्रवाह बिन, नैन नींद से रिक्त हो… आवेग धड़कनों के मेरी सुनो ना, मन टटोल कर तुम, संतप्त मन में ख्वाब मीठे भरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! चुप हो तुम यूँ! जैसे चुप हो Continue reading कुछ कहो ना

दिनकर की गरिमा

शैल शिखर पर तेजस्वी दिनकर लगा उंडेलने अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्णराशि भानु की स्वर्णिम आभा से ओत-प्रोत होने लगा सारा परिसर अनायास ही शांतचित्त झील का शीतल, निर्मल जल भी लगा समेटने उस स्वर्णिण आभा को अपने मार्मिक आगोश में जल में तैरते कमलपुष्पों के दल झूम उठे आनंदमय होकर पाकर सूर्य-रश्मियों के स्पर्श उनका सिकुड़न एवं संकुचन हो गए विलीन आनंद के सागर में और खुलने लगे उसके बंद मुँह उनकी कलियाँ थी आतुर भास्कर की अरुणिमा के अवलोकन को शीतल समीर के मंद-मंद झोंके भी टकराकर इन कमलपुष्पों से सुगंध-सुरभि फैला रहा था वातावरण में हिमगिरि जो Continue reading दिनकर की गरिमा

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)   गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो मोहब्बत के गजरे सजाती मिली हो।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो शरारत के जल्वे दिखाते मिले हो।“ गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो सभी सपने सुहाने सजाती मिली हो। अब सृजन प्यार का कुछ होने लगेगा बिन पिये नशा सा भी छाने लगेगा।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो तुम भ्रमरों के गुंजन सुनाते मिले हो। अब बगिया में बहार आती मिलेगी महक फूलों की गुदगुदाती मिलेगी।“ गायक “इजाजत मिली है अब तुमसे हमी को महकते मिलन की मुस्काती हमी को।“ गायिका “अब Continue reading मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

मैं और मेरा साया

मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि अगर तू न होता तो कौन होता मेरा हमसफ़र इस टेडी-मेढ़ी राहों में कौन लगाता लेप अनुराग का मेरे रक्तमय जख्मों पर और अगर मैं न होता तो क्या होता तेरे अस्तित्व का कौन सुनता तेरी मन की वेदना और कौन पोंछता पसीना तेरा चिलचिलाती दोपहर में मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि निभाए वचन हम दोनों ने अपने-अपने रहे प्रतिबद्ध अविरत एक दूजे के लिए मगर ज़िन्दगी की सांझ में आएगा पल एक ऐसा भी बिछुड़ना होगा जब सदा के लिए और कहना होगा अलविदा Continue reading मैं और मेरा साया

कुछ कर!

कुछ कर ! । उम्मीदों के घरोंदे, गिरा मुँह औंधे। घर आँख लगाए छतपर, कहता है कुछ कर ! छत पर बैठा है कागा , बांधे  सिर पर कोई पागा। घर में न रोटी है न धागा, कुछ उम्मीदे है बाकि , जीने को आधा आधा। गिरती दीवारे टूटकर, कहता है कुछ कर ! त्योहारो से भरा वो आँगन , दीवारों पे वो रंग रोंगन , घर में बैठी वो जोगन , ढूंढती है निशान , कहाँ गया वो साजन , वो गया  रूठकर , कहता है कुछ कर! रिश्ते थे रिश्तो  में प्यार था , प्यार से भरा परिवार था Continue reading कुछ कर!

अद्वितीय प्रयोजन

हे मानव!  तराशा जिसने तुझे भेजा है उसीने तुझे अपना दूत बनाकर इस विलक्षण धरा पर एक अनूठे प्रयोजन के लिए है जितना महान व कुलीन यह कार्य उतना ही संकटपूर्ण एवं चुनौतियों से है भरा हुआ इस भावी कार्य के लिए तपना होगा तुझे अभी से कर्मों के प्रचंड अग्नि-कुंड में जिसकी ज्वाला की तपन से निखरेगा  तेरा शरीर, मन एवं आत्मा मगर हे मनुष्य! रहे ध्यान कि शरीर तेरा हो इतना ठोस सहन कर सके जो असंख्य वारों को, असीम रक्त-रंजित घावों को मन तेरा ऐसा फौलादी हो छू न सके जिसे मान-अपमान निंदा-स्तुति गला न सके भस्म Continue reading अद्वितीय प्रयोजन

बचपन की वह अक्षुण्ण यादें

बचपन की वह अनछुई यादें तड़पाती हैं जो व्याकुल मन को आज भी तेरा वह चपल अल्हड़पन वो नादानी और वो चंचल लड़कपन क्या भूल पाऊंगा कभी पनघट की पगडंडियों पर धानी चुनरिया लहरा के इठलाना अधजल गगरी कमर में लटकाये मटक-मटक कर तेरा वह पग धरना रिम-झिम बूंदों संग तेरा वह राग मेघ गुनगुनाना भूल पाऊँगा कैसे तेरी वह मंद-मंद शरारत भरी मुस्कान घायल किया जिसने न जाने कितने पथिकों को कितने मुसाफिरों को घायल है आज भी मेरा नादान दिल उन तीखे बाणों से चलाये थे तूने जो अपनी उन्मत आँखों से काश! भूल पाता उन पुरानी यादों Continue reading बचपन की वह अक्षुण्ण यादें

मैं पथिक अज़नबी

इन अनजानी राहों में देखो कोई आ रहा है देखो कोई जा रहा है मन में कोई गीत गुनगुना रहा है कुछ विरह के, कुछ तड़पन के इन दुर्गम पगडंडियों में देखो कोई गिर रहा है देखो कोई चल रहा है मन में कोई गीत गा रहा है कुछ मायूसी के, कुछ उमंग के इन अज़नबी हवाओं में देखो कोई बहक रहा है देखो कोई महक रहा है मन में कोई गीत छेड़ रहा है कुछ मिलन के, कुछ बिछुड़न के इन अँधेरी गलियारों में देखो कोई भटक रहा है देखो कोई संभल रहा है मन में कोई गीत बुन Continue reading मैं पथिक अज़नबी

रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

रे मुसाफ़िर चलना तेरा काम रुकना तेरी नियति नहीं तू स्वयं अपना भाग्यविधाता कर्मठ कर्मयोगी बनकर करले धारण कर्मशील कवच उमंग तेरा खड्ग उत्साह तेरा चांदनी रथ बनाकर ढाल अपने प्रचंड पराक्रम को बन स्वयं सारथी इस आलोकित रथ का और झोंक दे स्वयं को कर्मों के इस अग्नि-कुंड में पसीना बहेगा-बहने दे लहू बहेगा-बहने दे शैल शिखर बनकर ललकारना उस आंधी और तूफान को जो करे दुस्‍साहस तेरे कर्मपथ पर बनकर निर्भीक सिपाही पायेगा अवश्य तू अपनी मंज़िल गायेंगे मंगल गीत चाँद और सूरज और गूंजेगी हर्षध्वनि तेरे विजयपथ पर हिमगिरि के उतुंग शिखर बैठ आज भाग्य भी तुझे Continue reading रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

शरद हंसिनी

नील नभ पर वियावान में, है भटक रही….. क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी? व्योम के वियावान में, स्वप्नसुंदरी सी शरद हंसिनी, संसृति के कण-कण में, दे रही इक मृदु स्पंदन, हैं चुप से ये हृदय, साँसों में संसृति के स्तब्ध समीरण, फिर क्युँ है वो निःस्तब्ध सी, ये कैसा है एकाकीपन! यह जानता हूँ मैं… क्षणिक तुम्हारा है यह स्वप्न स्नेह, बिसारोगे फिर तुम निभाना नेह, टिमटिमाते से रह जाएंगे, नभ पर बस ये असंख्य तारे, एकाकी से गगन झांकते रह जाएंगे हम बेचारे! व्योम के वियावान में, शायद इसीलिए…! भटक रही एकाकी सी वो शरद हंसिनी!