क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रियतमा, झटकती हो जब तुम अपने गीले केशों को छज्जे पर खड़े हो कर तो दिल मेरा करता है त्ताक-झांक तेरी अजनबी दुनिया में, और निहारता है तेरी अनछुई यौवन की अंगड़ाई को समझाने से समझे ना ये दिल क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रेयसी, मध्य-रात्रि को जब तुम सखियों संग चाँद की चांदनी में तलैया किनारे चांदनी-स्नान करती हो तो भीगे वस्त्रों से छन् कर आती तुम्हारी सुंदरता को देख चाँद भी शरमा कर बादलों की ओट में छिप जाता है, और मेरा नादान दिल भी चोरी-चोरी कनखियों से झांककर Continue reading क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई, नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई! कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल, ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल, झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल, डाली पे झूलते हुए ये नव दल, मगर, अब ये सारे न जाने क्यूँ इतने गए हैं बदल? उड़ते है हर तरफ ये बन के यादों के सैकत! ज्यूँ वो पल, यहीं कहीं रहा हो ढल! मुरझाते हों जैसे झील में कमल, सूखते हो डाल पे वो कोमल से दल, हृदय कह रहा धड़क, चल आ तू Continue reading सैकत

निशिगंधा

निशिगंधा घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ, अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें, बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें, महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा? प्रतीक्षा किसकी सजधज कर करती वो वहाँ? मन कहता है जाकर देखूँ, महकी क्युँ ये निशिगंधा? घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? है कोई चाँद खिला, या है वो कोई रजनीचर? या चातक है वो, या और कोई है सहचर! क्युँ निस्तब्ध निशा में खुश्बू बन रही वो बिखर! शायद ये हैं उसकी निमंत्रण के आस्वर! क्या प्रतीक्षा के ये पल Continue reading निशिगंधा

आज भी है।

आँखों मे तेरे दीदार की आस आज भी है, लबों को मेरे तेरे लबों की प्यास आज भी है। पूछे जो कोई किस्सा तेरा, दिल फिर से थम जाता है, पागल दिल को तुझपर ऐतबार आज भी है।। इश्क़ के किस्सों ने तेरे, मुझे शहरभर में मशहूर कर दिया, पूछ तो जमाने से, तेरे नाम के साथ मेरा नाम आज भी है। याद है वो गर्मी की दोपहरी, तेरी झुल्फों की छांव में बिता करती थी। मौसम की तपिश में छुपी हुई सी, वो झुल्फों की याद आज भी है।। आज फिर आसमान रोया, फाल्गुन के महीने में जमकर बारिश Continue reading आज भी है।

भावस्निग्ध

कंपकपाया सा क्युँ है ये, भावस्निग्ध सा मेरा मन? मन की ये उर्वर जमीं, थोड़ी रिक्त है कहीं न कहीं! सीचता हूँ मैं इसे, आँखों में भरकर नमीं, फिर चुभोता हूँ इनमें मैं, बीज भावों के कई, कि कभी तो लहलहाएगी, रिक्त सी मन की ये जमीं! पलकों में यूँ नीर भरकर, सोचते है मेरे ये नयन? रिक्त क्युँ है ये जमीं, जब सिक्त है ये कहीं न कहीं? भिगोते हैं जब इसे, भावों की भीगी नमी, इस हृदय के ताल में, भँवर लिए आते हैं ये कई, गीत स्नेह के अब गाएगी,  रिक्त सी मन की ये जमीं! भावों Continue reading भावस्निग्ध

तेरा गर साथ नहीं तो

तेरा गर साथ नहीं तो  तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं सैकड़ों कारवाँ का होना साथ कुछ भी नहीं।   अनंत-शून्य में है फासला खास कुछ नहीं खुदा! तेरे आगे ये कायनात कुछ भी नहीं।   सच कहेगा सच, सच के सिवाय औ कुछ नहीं झूठ सुनेगा झूठ, उसके सिवा कुछ भी नहीं।   न्याय की अवमानना अब मैं भला क्यूँकर करूँ सजा तो खूब मिली पर था गुनाह कुछ भी नहीं।   खामोशी न खुद कहती है, न कहने देती है सन्नाटों में खुसफुसाहट है, आवाज कुछ भी नहीं।   ए शोले! तू ऐसा न Continue reading तेरा गर साथ नहीं तो

विरह के पल

विरह के पल सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं….. आया था जीवन में वो जुगनू सी मुस्कान लिए, निहारती थी मैं उनको, नैनों में श्रृंगार लिए, खोई हैं पलको से नींदें, अब असह्य सा इन्तजार लिए, कलाई की चूरी भी मेरी, अब करती शोर नहीं, सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं…. इक खेवनहार वही, मेरी इस टूटी सी नैया का, तारणहार वही मेरी छोटी सी नैय्या का, मझधार फसी अब नैय्या, धक-धक से धड़के है जिए, खेवैय्या अब कोई मेरा नदी के उस ओर नही, सखी री! विरह की इस Continue reading विरह के पल

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

प्यार की कशिश

प्यार की कशिश अजीब तोहमत लगाये थे हमने प्यार से नज़र चुराये थे हमने मिरा दामन थामा था बिश्वास में बेवफ़ाई में छुड़ाये थे हमने दोस्ती के लिये तिरे एहसास थे न निभा अफसोश जताये थे हमने रिश्तों के हर चिराग रौशन करके उसी को राह में बुझाये थे हमने मोहब्बत को तमाशा बनाया है बेवफ़ा हस्र अजमाये थे हमने मोहब्बत या दोस्ती का सवाल था बेतुके जवाब बताये थे हमने सजन

विरह की व्यथा

विरह की व्यथा फांस सी खटकती अंतस मन में चंचल सी मुस्कान अब कैसे रास आये पैजनिया जब गुनगुनाये ओठों के सहज सहगान पनघट की डग़र लगे सुनसान सी बेजान टूटी पट्टी पे आतुर है संगम स्नान अंतस में अटक गई दिल की धड़कन बेचैन है मन सुनने पायल की तान सूरज की पहली किरण जगाती संदेश मचलता तन दौड़ पड़े, खोजने तेरे पांव के निशान रो रो कर बेहाल उलझ गई सांसें धड़कन हुई बेजान जैसे की थम गया समय का चक्र घूमें सारा जहान ओंठों के अनबोले सुनना चाहे कान फांस सी खटकती अंतस मन में विरह की Continue reading विरह की व्यथा

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई, सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई, खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के, चंद बूंदे मोतियों के,आ छलक पड़ते हैं इन नैनों में… क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? ऐ अभ्र की वादियाँ, न शहनाईयों से तू यूँ रिझा, तन्हाईयों में ही कैद रख, यूँ न सोए से अरमाँ जगा, गा न पाएंगे गीत कोई, टूटी सी वीणा हृदय के, अश्रु की अविरल धार कोई, Continue reading गूंजे है क्युँ शहनाई

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद क्या रहस्य है यह आखिर क्यों हो जाता है बेमानी और नागफनी-सा दिन तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हो जाती है उदास मेरी तरह घर की दीवारें-सोफा मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर… क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से  तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता रह जाता हँ मैं तुमसे तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी… क्यों महसूसने लगता हूँ मैं Continue reading तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

विरहन का विरह

विरहन का विरह पूछे उस विरहन से कोई! क्या है विरह? क्या है इन्तजार की पीड़ा? क्षण भर को उस विरहन का हृदय खिल उठता, जब अपने प्रिय की आवाज वो सुनती फोन पर, उसकी सिमटी विरान दुनियाँ मे हरितिमा छा जाती, बुझी आँखों की पुतलियाँ में चमक सी आ जाती, सुध-बुध खो देती उसकी बेमतलब सी बातों मे वो, बस सुनती रह जाती मन मे बसी उस आवाज को , फिर कह पाती बस एक ही बात “कब आओगे”! पूछे उस विरहन से कोई! कैसे गिनती वो विरह के इन्तजार की घड़ियाँ? आकुल हृदय की धड़कनें अगले ही क्षण Continue reading विरहन का विरह

पुकारता मन का आकाश

पुकारता मन का आकाश पुकारता है आकाश, ऐ बादल! तू फिर गगन पे छा जा! बार बार चंचल बादल सा कोई, आकर लहराता है मन के विस्तृत आकाश पर, एक-एक क्षण में जाने कितनी ही बार, क्युँ बरस आता है मन की शान्त तड़ाग पर। घन जैसी चपल नटखट वनिता वो, झकझोरती मन को जैसे हो सौदामिनी वो, क्षणप्रभा वो मन को छल जाती जो, रुचिर रमणी वो मन को मनसिज कर जाती जो। झांकती वो जब अनन्त की ओट से, सिहर उठता भूमिधर सा मेरा अवधूत मन, अभिलाषा के अंकुर फूटते तब मन में, जल जाता है यह तन Continue reading पुकारता मन का आकाश

फिर मिलेंगे हम

फिर मिलेंगे हम फिर मिलेंगे हम समुंद्र की लहरों पर समर्पण की नाव पर सवार अपने अपने आसुओं को विसर्जित करेंगे सदा के लिए विरहा की अग्नि से पिघला सूरज यादों के घनीभूत जलवाष्प बन कर बादल सा बरसेंगे होगी धरा सिंचित बीज होगा अंकुरित प्रेम पुष्प खिलेंगे सुगन्धित पवन उड़ा ले जायेंगे प्रेम का सन्देश फूलों और तितलियों के रंगों में घुल मिल मनोरम छटाएँ बिखेरेंगे गायेंगे झूम-झूम कर मिलन के गीत एक दूजे से जो पाया था पूनम की रातों में चांदनी बन बाटेंगे और एक दिन चमकते सितारे बन अपनी ही धुरी पर घूमते प्रेम धुन में Continue reading फिर मिलेंगे हम