तेरा गर साथ नहीं तो

तेरा गर साथ नहीं तो  तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं सैकड़ों कारवाँ का होना साथ कुछ भी नहीं।   अनंत-शून्य में है फासला खास कुछ नहीं खुदा! तेरे आगे ये कायनात कुछ भी नहीं।   सच कहेगा सच, सच के सिवाय औ कुछ नहीं झूठ सुनेगा झूठ, उसके सिवा कुछ भी नहीं।   न्याय की अवमानना अब मैं भला क्यूँकर करूँ सजा तो खूब मिली पर था गुनाह कुछ भी नहीं।   खामोशी न खुद कहती है, न कहने देती है सन्नाटों में खुसफुसाहट है, आवाज कुछ भी नहीं।   ए शोले! तू ऐसा न Continue reading तेरा गर साथ नहीं तो

Advertisements

विरह के पल

विरह के पल सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं….. आया था जीवन में वो जुगनू सी मुस्कान लिए, निहारती थी मैं उनको, नैनों में श्रृंगार लिए, खोई हैं पलको से नींदें, अब असह्य सा इन्तजार लिए, कलाई की चूरी भी मेरी, अब करती शोर नहीं, सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं…. इक खेवनहार वही, मेरी इस टूटी सी नैया का, तारणहार वही मेरी छोटी सी नैय्या का, मझधार फसी अब नैय्या, धक-धक से धड़के है जिए, खेवैय्या अब कोई मेरा नदी के उस ओर नही, सखी री! विरह की इस Continue reading विरह के पल

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

प्यार की कशिश

प्यार की कशिश अजीब तोहमत लगाये थे हमने प्यार से नज़र चुराये थे हमने मिरा दामन थामा था बिश्वास में बेवफ़ाई में छुड़ाये थे हमने दोस्ती के लिये तिरे एहसास थे न निभा अफसोश जताये थे हमने रिश्तों के हर चिराग रौशन करके उसी को राह में बुझाये थे हमने मोहब्बत को तमाशा बनाया है बेवफ़ा हस्र अजमाये थे हमने मोहब्बत या दोस्ती का सवाल था बेतुके जवाब बताये थे हमने सजन

विरह की व्यथा

विरह की व्यथा फांस सी खटकती अंतस मन में चंचल सी मुस्कान अब कैसे रास आये पैजनिया जब गुनगुनाये ओठों के सहज सहगान पनघट की डग़र लगे सुनसान सी बेजान टूटी पट्टी पे आतुर है संगम स्नान अंतस में अटक गई दिल की धड़कन बेचैन है मन सुनने पायल की तान सूरज की पहली किरण जगाती संदेश मचलता तन दौड़ पड़े, खोजने तेरे पांव के निशान रो रो कर बेहाल उलझ गई सांसें धड़कन हुई बेजान जैसे की थम गया समय का चक्र घूमें सारा जहान ओंठों के अनबोले सुनना चाहे कान फांस सी खटकती अंतस मन में विरह की Continue reading विरह की व्यथा

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई, सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई, खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के, चंद बूंदे मोतियों के,आ छलक पड़ते हैं इन नैनों में… क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? ऐ अभ्र की वादियाँ, न शहनाईयों से तू यूँ रिझा, तन्हाईयों में ही कैद रख, यूँ न सोए से अरमाँ जगा, गा न पाएंगे गीत कोई, टूटी सी वीणा हृदय के, अश्रु की अविरल धार कोई, Continue reading गूंजे है क्युँ शहनाई

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद क्या रहस्य है यह आखिर क्यों हो जाता है बेमानी और नागफनी-सा दिन तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हो जाती है उदास मेरी तरह घर की दीवारें-सोफा मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर… क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से  तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता रह जाता हँ मैं तुमसे तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी… क्यों महसूसने लगता हूँ मैं Continue reading तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

विरहन का विरह

विरहन का विरह पूछे उस विरहन से कोई! क्या है विरह? क्या है इन्तजार की पीड़ा? क्षण भर को उस विरहन का हृदय खिल उठता, जब अपने प्रिय की आवाज वो सुनती फोन पर, उसकी सिमटी विरान दुनियाँ मे हरितिमा छा जाती, बुझी आँखों की पुतलियाँ में चमक सी आ जाती, सुध-बुध खो देती उसकी बेमतलब सी बातों मे वो, बस सुनती रह जाती मन मे बसी उस आवाज को , फिर कह पाती बस एक ही बात “कब आओगे”! पूछे उस विरहन से कोई! कैसे गिनती वो विरह के इन्तजार की घड़ियाँ? आकुल हृदय की धड़कनें अगले ही क्षण Continue reading विरहन का विरह

पुकारता मन का आकाश

पुकारता मन का आकाश पुकारता है आकाश, ऐ बादल! तू फिर गगन पे छा जा! बार बार चंचल बादल सा कोई, आकर लहराता है मन के विस्तृत आकाश पर, एक-एक क्षण में जाने कितनी ही बार, क्युँ बरस आता है मन की शान्त तड़ाग पर। घन जैसी चपल नटखट वनिता वो, झकझोरती मन को जैसे हो सौदामिनी वो, क्षणप्रभा वो मन को छल जाती जो, रुचिर रमणी वो मन को मनसिज कर जाती जो। झांकती वो जब अनन्त की ओट से, सिहर उठता भूमिधर सा मेरा अवधूत मन, अभिलाषा के अंकुर फूटते तब मन में, जल जाता है यह तन Continue reading पुकारता मन का आकाश

फिर मिलेंगे हम

फिर मिलेंगे हम फिर मिलेंगे हम समुंद्र की लहरों पर समर्पण की नाव पर सवार अपने अपने आसुओं को विसर्जित करेंगे सदा के लिए विरहा की अग्नि से पिघला सूरज यादों के घनीभूत जलवाष्प बन कर बादल सा बरसेंगे होगी धरा सिंचित बीज होगा अंकुरित प्रेम पुष्प खिलेंगे सुगन्धित पवन उड़ा ले जायेंगे प्रेम का सन्देश फूलों और तितलियों के रंगों में घुल मिल मनोरम छटाएँ बिखेरेंगे गायेंगे झूम-झूम कर मिलन के गीत एक दूजे से जो पाया था पूनम की रातों में चांदनी बन बाटेंगे और एक दिन चमकते सितारे बन अपनी ही धुरी पर घूमते प्रेम धुन में Continue reading फिर मिलेंगे हम

धुँधला साया

धुँधला साया आँखों मे इक धुंधला सा साया, स्मृतिपटल पर अंकित यादों की रेखा, सागर में उफनती असंख्य लहरों सी, आती जाती मन में हूक उठाती। वक्त की गहरी खाई मे दबकर, साए जो पड़ चुके थे मद्धिम, यादें जो लगती थी तिलिस्म सी, इनको फिर किसने छेड़ा है? यादों के उद्वेग भाव होते प्रबल, असह्य पीड़ा देते ये हंदय को, पर यादों पर है किसके पहरे, वश किसका इस पर चलता है। स्मृतिपटल को किसने झकझोरा, बुझते अंगारों को किसने सुलगाया, थमी पानी में किसने पतवार चलाया, क्युँकर फिर इन यादों को तूने छेड़ा ?

बेकरारियाँ

बेकरारियाँ अब कहाँ दिखते हैं वो बेकरारियाें के पल, जाम हसरतों के लिए कभी दूर वो जाते थे निकल, क्या रंग बदले हैं मौसम ने, अब वो भी गए हैं बदल? पल वो मचलता था उन बेकरारियों के संग, अंगड़ाईयाँ लेती थी करवटें उनकी यादों के संग, अब बिखरा है वो पल कहीं, क्या वो भी रहे हैं बिखर? सुलग रही चिंगारियाँ, हसरतों के लगे हैं पर, जल रही आज बेकरारियाँ, पर वो तो हैं बेखबर, हम तो वो मौसम नहीं, यहाँ रोज ही जाते है जो बदल! क्या अब भी है वहाँ बेकरारियाें के बादल? सोंचता है ये बेकरार Continue reading बेकरारियाँ

बिन तेरे

बिन तेरे यादों की माचिस जली अरमानों की लकड़ी गीली विरहा की तपन से हुआ मन का आँगन धुँआ-धुँआ बिन तेरे फीके लगते मौसम सुहाने नींद चुराई रातों ने सपनों के टूटे सपने बेगाने हुए सभी अपने बिन तेरे उमड़-घुमड़ दुःख के बादल आसमान में बुँदे घायल आशाओं के चीथड़े आँचल सिसकियों की बजती पायल बिन तेरे आँखों में झील समाई इन्तजार की नाव डगमगाई असमंजस की लहरों में खोई बनी बाबरी जागी सोई बिन तेरे तक़दीर ने ली जम्हाई खुशियों को हिचकी आई कैसी यह उदासी छाई उम्मीदों को नींद आई रोती फफक-फफक तन्हाई बिन तेरे !

अधूरी पूजा उसकी

अधूरी पूजा उसकी उजड़ गया संसार उसका, बिछड़ गया एतबार जीवन का, छूट गई हाथों से आशा की पतवार, मन की गहराई के पार दफन हो गया, वो छोटा सा मोहक संसार। छोड़ गई दामन वो उसका, देवतुल्य था जो उसके जीवन में, टूट चुका है आज वो देव भी, वर्जनाओं को तोड़ हाथ जिसने थामा था, शायद वो निष्ठुर स्वार्थी ही थी, क्षितिज पार जाने की उसको जल्दी थी, रह गई अब शेष यादें ही। पर उस दुखिया का भी दोष क्या, शायद भाग्य उस देवता का ही खोटा था, दामन उस दुखिया का भी तो लूटा था, प्राणों Continue reading अधूरी पूजा उसकी

काश

काश काश! यादों के उस तट से गुजरे न होते हम…. रंग घोलती उन फिजाओं में, शिकवे हजार लिए अपनी अदाओं में, हाँ, पहली बार यूँ मिले थे तुम….. कशिश बला की उन बातों में, भरी थी शरारत उन शरमाई सी आँखों में, हाँ, वादे हजार कर गए थे तुम….. नदी का वो सूना सा किनारा, वो राह जिनपर हम संग फिरे थे आवारा, हाँ, उन्हें तन्हा यूँ कर गए थे तुम….. ढली सुरमई सांझ कभी रंगों में, कभी रातें शबनमीं तुझको पुकारती रहीं, हाँ, मुद्दतों अनसुनी कर गए थे तुम…. बातें वो अब बन चुकी हैं यादें, रह रह Continue reading काश