क्या महज कल्पना

क्या महज कल्पना क्युँ मैं हर पल सोचता हूँ बस तुमको ही, यह जानकर भी कि तुम महज इक कल्पना नहीं, इक स्वर, इक रूप साकार सी हो तुम, जागृत सपनों में रची बसी मूर्त स्वरूप हो तुम, विचरती हो कहीं न कहीं इन्ही हवाओं में, गाती हो धुन कोई इन्ही फिजाओं में, फिर भी, न जाने क्यूँ ढूंढता हूँ मैं तुम्हें ख्यालों में! क्यूँ ये मन सोचता है हर पल तुझको ही सवालों में? लगता है कभी, जैसे बिखरे से होंगे बाल तेरे, रख न पाती होगी खुद अपना ख्याल तुम, गुम सी हो चुकी हो, उलझनों में जिंदगी Continue reading क्या महज कल्पना

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नादान बेचारी

नादान बेचारी सोच रही वो बेचारी, आखिर भूल हुई क्या मेरी? यूँ ही घर से निकल गया था वो अन्तर्मुखी, दर्द कोई असह्य सी, सुलग रही थी उस मन में छुपी! बिंध चुका था शायद, निश्छल सा वो अन्तर्मन, अप्रत्याशित सी कोई बात, कर गई थी उसे दुखी! स्नेह भरा दामन, फैलाया तो था उस अबला ने, रखकर कांधे पे सर, हाथों से सहलाया भी था उसने, नादान मगर पढ पाई ना, उसके अन्तर्मन की बातें, दामन में छोड़ गया वो, बस विरहा की सौगातें! मन में चोट लगे जो, वो घाव बड़ी दुखदायी, तन सहलाते मिटे न पीड़ा, नादान Continue reading नादान बेचारी

एक और इंतजार

एक और इंतजार रहा इस जनम भी, एक और अंतहीन इंतजार….! बस इंतजार, इंतजार और सदियों का अनथक इंतजार! इंतजार करते ही रहे हम सदियों तुम्हारा, कब जाने धमनियों के रक्त सूख गए, पलकें जो खुली थी अंतिम साँसों तक मेरी, जाने कब अधखुले ही मूँद गए, इंतहा इंतजार की है ये अब, तुमसे मिलने को पाया हमने ये जन्म दोबारा… रहा इस जनम भी लेकिन एक और अंतहीन इंतजार…! गिन न सके अनंत इंतजार की घड़ियों को हम, चुन न सके वो चंद खुशियाँ उन राहों से हम, दामन में आई मेरी बस इक तन्हाई, और मिला मुझको मरुभूमि Continue reading एक और इंतजार

पत्थर दिल

पत्थर दिल न जाने कब पत्थर हुआ, मासूम सा ये दिल मेरा….. हैरान हूँ मैं, न जाने कहां खोई है मेरी संवेदना? आहत ये दिल जग की वेदनाओं से अब क्यूँ न होता? देखकर व्यथा किसी कि अब ये बेजार क्यूँ न रोता? व्यथित खुद भी कभी अपने दुखों से अब न होता! बन चुका है ये दिल, अब पत्थर का शायद! न तो रोता ही है ये अब, न ही ये है अब धड़कता! न जाने कब पत्थर हुआ, मासूम सा ये दिल मेरा….. हैरान हूँ मै, न जाने कहां खोई दिल की मासूमियत? महसूस क्यूँ न अब ये Continue reading पत्थर दिल

अधूरी कहानी

अधूरी कहानी लौटाने थे आये, वो मेरे खत मुझे पूछा कि कैसे जिओगे, तो अल्फाज़ जैसे जल गये।। लिया जो हमनें हथेलियों में, मुखङा उनका आंखे रहीं गुमसुम, पर इकबारगी वो भी मचल गये।। पलकों में छुपा रहे थे, तसव्वुफ़-ए-शबनम हमसे इस कोशिश में वो मेरे ताउम्र के जज्बात कुचल गये।। पूछा जो हमनें बिखरी हुई जुल्फों का सबब दिखा किसी और के नाम की मेंहदी, वो सरे राह बदल गये।। कहते थे कि उनके वादे हैं, अबद-ऐ-आलम-अज़ीम हल्की सी धूप क्या पङी, बर्फ से भी जल्दी पिघल गये।। की जो हमने तस्दीक, कैसे थामा दामन-ए-गैर बङी मासूमियत से बोले, Continue reading अधूरी कहानी

तेरी याद

तेरी याद कहि किताबो में छुपे गुलाब, तो ग़ज़लो में तेरा नाम, मैंने शिद्दत से संभाली हुई है तेरी हर याद।।1।। तुम्हे याद तो होगा वो बाग़ जहां हम साथ वक़्त गुजारते थे। घंटो बैठ कर पास हम भविष्य के सपने बुना करते थे। मैंने उस बाग़ की कुछ मिट्टी अपने आँगन में सजाए रखी है, जिसके निचे दफ़न है मेरे सारे जज़्बात। मैंने शिद्दत से संभाली हुई है तेरी हर याद।।2।। तुम्हे तो याद ही होंगे जब लोगो में चर्चे तेरी खूबसूरती के होते थे, हम वहां से चिढ़ कर निकल जाते थे।। ऐसा भी नही था की हम Continue reading तेरी याद

वेदना

मेरी तनहा सी रातों में हज़ारों गम के साये में कुछ लगते हैं अपने से तो कुछ लगते पराये से मुझे भी दिल के इस फन पे बहुत ही नाज़ होता है जहाँ भर के थपेड़ों को ये जैसे छुपाये है हमारी डूबी आँखों में ना अश्कों का सुराग होगा कहाँ गैरों में ये दम था हम अपनों के सताये हैं किसी दिन खाक के मानिन्द फ़ना होंगे हवाओं में अभी तो लाश हम अपनी यूँ मुश्किल से उठाये हैं संकेत मुरारका

बीते पल

बीते पल यादो के झुरमुट से कोई पत्ता, आया उड़ते हुवे ; उस पर कुछ धुल जमी थी, मन है कि मचल पड़ा, पुरानी स्मृतिया, आतुर आँख देखे बरसे न जाने कैसी कैसी यादें घुमे नज़र मे दिन पुराने, एक दुसरे का साथ निभाना, जीने-मरने की कसम, घर बसाने का सपना, जानना चाहता हूं कि- बिछड़ने के बाद, क्या था जो जोड़े रखा हमे, मन आज भी तड़पता, अकेले होकर कभी कभी, सब के बीच तलाश करता, पुराने दिन कि – अटखेलियाँ करती नादानीयां रिमझिम बारिस मे भीगना, कानो मे गुनगुनाये पैजनीया, खिलखिलाना,हँसना-हंसाना, और कितनी कितनी बातें, लिपट पड़ती बांहों Continue reading बीते पल

गम के साये में

गम के साये में मेरी तनहा सी रातों में हज़ारों गम के साये में कुछ लगते हैं अपने से तो कुछ लगते पराये से मुझे भी दिल के इस फन पे बहुत ही नाज़ होता है जहाँ भर के थपेड़ों को ये जैसे छुपाये है हमारी डूबी आँखों में ना अश्कों का सुराग होगा कहाँ गैरों में ये दम था हम अपनों के सताये हैं किसी दिन खाक के मानिन्द फ़ना होंगे हवाओं में अभी तो लाश हम अपनी यूँ मुश्किल से उठाये हैं संकेत मुरारका

बेवफ़ा

बेवफ़ा ना बारिस है न बहार है पर ख़िज़ाँ तो है रूठी मौसम सी बेवजह बेवफ़ा तो है जिस रास्ते में तेरे लिए बिछाए थे फूल उस रास्ते पर फाँक रहे धूल ख़फ़ा तो है चाहत बना ना पाए तेरे दिल में अज़ीज़ लेकिन दिल में इतंजार का हौसला तो है हर रात तिरी गली में गुजरे ग़र हाँ कहे मन्जिल इक है पर अभी भी फ़ासला तो है खुदा तुझे बख्शे तिरी बेवफ़ाई के लिए तुझे भूलाने ग़म को कंही लगाना तो है कहते हैं सब के ख़िज़ाँ में पत्ते झर जाते फिर भी बहार का आने का वादा Continue reading बेवफ़ा

आँसु

आँसु उदासी में दिल को आँसु से राहत कहां मिले जुगनुओं से रोशन रात को रौशनी ना मिले आंखों से बरस पीड़ा का सैलाब उमड़ पड़े जज़्बातों को मिटा दे वो हमदर्द कहां मिले रखता दिल में महफूज़ अपने अरमान सारे कोई हमसफ़र या हमदर्द जब मुझे ना मिले हर वक़्त सभी बदगुमानी दिल पे भारी पड़े अब दर्द नहीं होता मुझे जब खूशी ना मिले आँसू को कितना समझाया बेवक्त ना झरे सजन सभी एहसासों का कभी जवाब ना मिले सजन

माँ का पुत्र विछोह

माँ का पुत्र विछोह रुकी हुई सांसें उसकी फिर से कब चल पड़ी पता नहीं? जीर्ण हो चुकी थी वो जर्जर सी काया, झुर्रियाँ की कतारें उभर आईं थी चेहरे पर, एकटक ताकती कहीं वो पथराई सी आँखें, संग्याहीन हो चुकी थी उसकी संवेदनाएँ, साँसों के ज्वार अब थमने से लगे थे उसके, जम सी रही थी रक्त धमनियों मे रुककर। ऐसा हो भी तो क्युँ न………….! नन्हा सा पुत्र बिछड़ चुका था गोद से उस माता की! सहन कहाँ कर पाई विछोह अपने पुत्र की, विछोह की पीड़ा हृदय मे जलती रही ज्वाला सी, इंतजार में उसके बस खुली Continue reading माँ का पुत्र विछोह

वो बेपरवाह

वो बेपरवाह, सासों की लय जुड़ी है जिन संग, गुजरती है उनकी यादें, हर पल आती जाती इन सासों के संग। वो बेपरवाह, बस छूकर निकल जाते है वो, हृदय की बेजार तारों को, समझा है कब उसने हृदय की धड़कनो को। वो बेपरवाह, अपनी ही धुन मे रहता है बस वो, परवाह नही तनिक भर उसको, पर कहते है वो प्यार तुम्ही से है मुझको। वो बेपरवाह, हृदय की जर्जर तारो से खेले वो, मन की अनसूनी कर दे वो, भावनाओं के कोमल धागों को छेड़े वो। वो बेपरवाह, टूट टूट कर बिखरा है अब ये मन, बेपरवाह वो Continue reading वो बेपरवाह

कितना जिया हूँ

कितना जिया हूँ कुछ तो था जिसके इंतज़ार में इतना जिया हूँ, वरना तू ही सोच तेरे बाद भी कितना जिया हूँ। तेरी महोब्बत को अपनी जिंदगी कहता था न, शायद बेवफा हो गया मैं भी जो तेरे बिना इतना जिया हूँ।।1।। खुदगर्ज कह दे तू मुझे मैं बुरा नही मानता, पर सच कहूँ आज भी अपने हक़ में कोई दुआ नही मांगता। मौत तो रोज आती है मुझे संग ले जाने को, मैं तेरे लौट आने का बहाना दे देकर जिया हूँ।।2।। हर रात बिस्तर पर आँखे भिगो कर सोता था, कोई जान न ले आँसुओ की वजह मैं Continue reading कितना जिया हूँ