मुक्तक- तू और मैं

मुक्तक — तू  और मैं  तू आगे आगे था तूने पलटकर नहीं देखा तेरे पीछे मैं था तूने पलटकर नहीं देखा। तेरे पीछे किसका लहूलुहान नक्शे-कदम था तेरा था या मेरा तूने पलटकर नहीं देखा।               ——   भूपेन्द्र कुमार दवे              00000 Advertisements

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रिश्तों की क़द्र

रिश्तों की क़द्र अपने रिश्तों की कद्र करें…. अक्सर गुस्से में, जल्दबाज़ी में नई उम्र में, हम ऐसी गलती कर बैठते है, तन्हा रहना किसी को शोभा नहीं देता, इसलिए रिश्तों का आदर-सम्मान करें, और उसे खण्डित होने से बचायें… दीवानेख़ास में मेरे, दरारें हो गई इतनी, कि… अब मैं फूल भी फैंकता हूँ, तो किनारे टूट जाते है… #विराज़

चाँद बना कर

बहुत कर ली ये शैतानी, लो अब मासूम हो जाते है समन्दर की ऱवानी के, दरम्यांगुम हो जाते है जमीं के एक हिस्से को फलक का चाँद बना कर के जमाने से कहीं ओझल, चलो हम-तुम हो जाते है

एकतरफा इश्क

एकतरफा इश्क नज़र में एक ही चेहरा, जो लाजवाब हो जाता है चमन में गुल खिले कोई, मगर गुलाब हो जाता है जला देता है दिल की शक्लो-सूरत को बेरहमी से अगर हो एकतरफा तो, इश्क तेजाब हो जाता है

क्यूँ छोड़ चला खुद का साया

हर ख्वाहिश थी दफन हुई, कोई सपना पलकों तक था ना आया, जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया………. कुछ कागज़ है, कुछ स्याही है, कुछ वक़्त की मोहलत पास ज़रा, कुछ कहना था, कुछ कह भी चुका…. जो छुट रहा वो लिख डाला……….. जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया……… ✍ मुरारी सिंह ( बेगूसराय )

चन्द शेर-3

# बस दो ही जिन्दा हैं मुझमे, तेरे जाने के बाद। एक तो मेरी रूह है “मैकश”, दूजी तेरी याद। #जो लगे जायज बस वही कर लेना तुम “मैकश”। कुर्बान है हमारी इल्तिज़ा तेरी हर जरूरत पर। #मैं नाव बनूँ, तू चल साथ मेरे पतवार ही सही। आ थाम ले हमे, छूटा घर परिवार ही सही। #हर दिन एक साल सा लगा जुदाई में तेरी। पर उम्र भी तो हुई रहते मेरी शायरी में तेरी। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

चन्द शेर-2

चन्द शेर-2 — पूरी जागीर लगी थी हमारी तेरा प्यार पाने में “मैकश”। गिला नहीं जो तूने आज हमे “दिवालिया” कह दिया। — बाँध देंगे हम अपनी दुआओ की पोटली साथ में तेरे “मैकश”। बस बता देना जरूर “अलविदा” कह देने से पहले। — दे जाना कुछ याद अपनी जाते जाते ऐसे “मैकश”। दवा-ऐ-खुराक जो होगी वो तेरी बेवफाई के मर्ज की। — साँसे हो या पूरी जिंदगी, हमने सब कुछ लूटा दिया “मैकश”। पर महसूस हुआ कि मैं कुछ भी ना दे सका। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

दुश्मनी

तेरे चन्द अल्फाज़ों ने, मुझे रोक रखा है, वरना! प्यार से मेरी, गहरी दुश्मनी थी कभी ॥ ————————————– “दर्द “ मत पूछों की कैसा हूं मैं,– उजड़ कर फिर बसना, आसान नहीं होता ॥