किसी को चाहता तो हूँ

किसी को चाहता तो हूँ किसी को चाहता तो हूँ मगर बतला नही सकता, कोई किमत्त अदा कर दूँ उसे मै पा नही सकता। कि तुमने ही तो पैदा की है ये मजबूरियाँ मौला, वो पास आ नही सकती मै दूर जा नही सकता।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज, पश्चिमी चम्पारण,बिहार :-8051804177 Advertisements

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पारो जैसी लगती हो

पारो जैसी लगती हो तुम तो पतझड़ मे भी बहारों जैसी लगती हो, किसी झरने की मीठी धारों जैसी लगती हो। मै तड़पता हुआ देवदास बन गया देखो, तुम मुझे बिछड़ी हुई पारो जैसी लगती हो।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज पश्चिमी चम्पारण :-8051804177

मुक्तक- तू और मैं

मुक्तक — तू  और मैं  तू आगे आगे था तूने पलटकर नहीं देखा तेरे पीछे मैं था तूने पलटकर नहीं देखा। तेरे पीछे किसका लहूलुहान नक्शे-कदम था तेरा था या मेरा तूने पलटकर नहीं देखा।               ——   भूपेन्द्र कुमार दवे              00000

रिश्तों की क़द्र

रिश्तों की क़द्र अपने रिश्तों की कद्र करें…. अक्सर गुस्से में, जल्दबाज़ी में नई उम्र में, हम ऐसी गलती कर बैठते है, तन्हा रहना किसी को शोभा नहीं देता, इसलिए रिश्तों का आदर-सम्मान करें, और उसे खण्डित होने से बचायें… दीवानेख़ास में मेरे, दरारें हो गई इतनी, कि… अब मैं फूल भी फैंकता हूँ, तो किनारे टूट जाते है… #विराज़

चाँद बना कर

बहुत कर ली ये शैतानी, लो अब मासूम हो जाते है समन्दर की ऱवानी के, दरम्यांगुम हो जाते है जमीं के एक हिस्से को फलक का चाँद बना कर के जमाने से कहीं ओझल, चलो हम-तुम हो जाते है

एकतरफा इश्क

एकतरफा इश्क नज़र में एक ही चेहरा, जो लाजवाब हो जाता है चमन में गुल खिले कोई, मगर गुलाब हो जाता है जला देता है दिल की शक्लो-सूरत को बेरहमी से अगर हो एकतरफा तो, इश्क तेजाब हो जाता है

क्यूँ छोड़ चला खुद का साया

हर ख्वाहिश थी दफन हुई, कोई सपना पलकों तक था ना आया, जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया………. कुछ कागज़ है, कुछ स्याही है, कुछ वक़्त की मोहलत पास ज़रा, कुछ कहना था, कुछ कह भी चुका…. जो छुट रहा वो लिख डाला……….. जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया……… ✍ मुरारी सिंह ( बेगूसराय )

चन्द शेर-3

# बस दो ही जिन्दा हैं मुझमे, तेरे जाने के बाद। एक तो मेरी रूह है “मैकश”, दूजी तेरी याद। #जो लगे जायज बस वही कर लेना तुम “मैकश”। कुर्बान है हमारी इल्तिज़ा तेरी हर जरूरत पर। #मैं नाव बनूँ, तू चल साथ मेरे पतवार ही सही। आ थाम ले हमे, छूटा घर परिवार ही सही। #हर दिन एक साल सा लगा जुदाई में तेरी। पर उम्र भी तो हुई रहते मेरी शायरी में तेरी। श्रेयस अपूर्व “मैकश”