चन्द शेर

चन्द शेर कर चुका है प्यार कोई ज्यादा अपनी जान से, बस चाहिए कोई “मैकश”, उसे संवार देने को। ———————————————————– भुला बैठे हम तुझे भी ऐ खुदा, जब कह दिया उन्होंने “मैकश”। सब कुछ रह गया अधूरा, “तुम हमे भूल जाना”। ————————————————————- कोई तो समझ जाए “मैकश”, और बता दे ये सुलझन मेरी। कोई है जो “कुछ” भी नहीं, “कोई” है जो कुछ भी नहीं। श्रेयस अपूर्व “मैकश” Advertisements

Advertisements

श़ायर

श़ायर लिखने वाला खुद कभी, वैसा नहीं होता, फिर भी वो दुनिया से, ऐसी आस रखता है, खुद़ वो गल्तियों से, निज़ात हो नहीं पाता, पर दूसरों के लिए, वो राहें साफ रखता है ॥ ‘विराज’

अनकहे लफ्ज

अनकहे लफ्ज कोई जो पूछे कल तुमसे, हाल तुम्हारा कैसा है। कह देना जैसा है “मैकश”, हाल हमारा वैसा है। श्रेयस अपूर्व”मैकश”

मान लेना

मान लेना कल जो अश्को से रोये आँखे मेरी, मान लेना की डूबा समन्दर हैं वो। कल जो खेलो मेरे दिल से तुम खेल सब, मान लेना की रूठा कलन्दर हैं वो। दिल मगर सोच लेना हर एक जंग के वास्ते,कि हां कर दिया जो मुबारक वो बाजी तुम्हे, मान लेना की टूटा सिकन्दर है वो। श्रेयस अपूर्व भोपाल

उसकी यादो का मोल

उसकी यादो का मोल समन्दर ना भर पाया अश्को को अपने अंदर में, जब कल हम उसकी यादो का पिटारा फिर से खोल बैठे ना बिका मेरा दर्द सरेआम उस बाजार में “मगरिब”, जहा हम उसकी यादो का मोल कर बैठे वो खुद आये और हमसे पुछा क्यों, कितने की हैं ये याद, तुम्हारी ही हैं आओ ले जाओ,हम बोल बैठे। श्रेयस अपूर्व “मगरिब” भोपाल

मुक्तक

मुक्तक अगर सीने मे ये कम्बख्त…….. दिल न होता, न रातों की नींद उडती, न दिन का चेन खोता। ये करिशमा है…………………..कुदरत का, ना तू मुझमें होता…………… ना मैं तुझमे होता॥ संजय नेगी ‘सजल’

मुक्तक

ये भूकंप नहीं, क्रोध है प्रकृति का प्रकृति से छेडछाड, दोष है मानव प्रवृति का प्रकृति करे पुकार…संभल जाओ सभी वरना मिट जायेगा मानव, वजूद तेरी आकृति का। संजय नेगी ‘सजल’