चन्द शेर-3

# बस दो ही जिन्दा हैं मुझमे, तेरे जाने के बाद। एक तो मेरी रूह है “मैकश”, दूजी तेरी याद। #जो लगे जायज बस वही कर लेना तुम “मैकश”। कुर्बान है हमारी इल्तिज़ा तेरी हर जरूरत पर। #मैं नाव बनूँ, तू चल साथ मेरे पतवार ही सही। आ थाम ले हमे, छूटा घर परिवार ही सही। #हर दिन एक साल सा लगा जुदाई में तेरी। पर उम्र भी तो हुई रहते मेरी शायरी में तेरी। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

चन्द शेर-2

चन्द शेर-2 — पूरी जागीर लगी थी हमारी तेरा प्यार पाने में “मैकश”। गिला नहीं जो तूने आज हमे “दिवालिया” कह दिया। — बाँध देंगे हम अपनी दुआओ की पोटली साथ में तेरे “मैकश”। बस बता देना जरूर “अलविदा” कह देने से पहले। — दे जाना कुछ याद अपनी जाते जाते ऐसे “मैकश”। दवा-ऐ-खुराक जो होगी वो तेरी बेवफाई के मर्ज की। — साँसे हो या पूरी जिंदगी, हमने सब कुछ लूटा दिया “मैकश”। पर महसूस हुआ कि मैं कुछ भी ना दे सका। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

दुश्मनी

तेरे चन्द अल्फाज़ों ने, मुझे रोक रखा है, वरना! प्यार से मेरी, गहरी दुश्मनी थी कभी ॥ ————————————– “दर्द “ मत पूछों की कैसा हूं मैं,– उजड़ कर फिर बसना, आसान नहीं होता ॥

चन्द शेर

चन्द शेर कर चुका है प्यार कोई ज्यादा अपनी जान से, बस चाहिए कोई “मैकश”, उसे संवार देने को। ———————————————————– भुला बैठे हम तुझे भी ऐ खुदा, जब कह दिया उन्होंने “मैकश”। सब कुछ रह गया अधूरा, “तुम हमे भूल जाना”। ————————————————————- कोई तो समझ जाए “मैकश”, और बता दे ये सुलझन मेरी। कोई है जो “कुछ” भी नहीं, “कोई” है जो कुछ भी नहीं। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

श़ायर

श़ायर लिखने वाला खुद कभी, वैसा नहीं होता, फिर भी वो दुनिया से, ऐसी आस रखता है, खुद़ वो गल्तियों से, निज़ात हो नहीं पाता, पर दूसरों के लिए, वो राहें साफ रखता है ॥ ‘विराज’

अनकहे लफ्ज

अनकहे लफ्ज कोई जो पूछे कल तुमसे, हाल तुम्हारा कैसा है। कह देना जैसा है “मैकश”, हाल हमारा वैसा है। श्रेयस अपूर्व”मैकश”

मान लेना

मान लेना कल जो अश्को से रोये आँखे मेरी, मान लेना की डूबा समन्दर हैं वो। कल जो खेलो मेरे दिल से तुम खेल सब, मान लेना की रूठा कलन्दर हैं वो। दिल मगर सोच लेना हर एक जंग के वास्ते,कि हां कर दिया जो मुबारक वो बाजी तुम्हे, मान लेना की टूटा सिकन्दर है वो। श्रेयस अपूर्व भोपाल

उसकी यादो का मोल

उसकी यादो का मोल समन्दर ना भर पाया अश्को को अपने अंदर में, जब कल हम उसकी यादो का पिटारा फिर से खोल बैठे ना बिका मेरा दर्द सरेआम उस बाजार में “मगरिब”, जहा हम उसकी यादो का मोल कर बैठे वो खुद आये और हमसे पुछा क्यों, कितने की हैं ये याद, तुम्हारी ही हैं आओ ले जाओ,हम बोल बैठे। श्रेयस अपूर्व “मगरिब” भोपाल

मुक्तक

मुक्तक अगर सीने मे ये कम्बख्त…….. दिल न होता, न रातों की नींद उडती, न दिन का चेन खोता। ये करिशमा है…………………..कुदरत का, ना तू मुझमें होता…………… ना मैं तुझमे होता॥ संजय नेगी ‘सजल’

मुक्तक

ये भूकंप नहीं, क्रोध है प्रकृति का प्रकृति से छेडछाड, दोष है मानव प्रवृति का प्रकृति करे पुकार…संभल जाओ सभी वरना मिट जायेगा मानव, वजूद तेरी आकृति का। संजय नेगी ‘सजल’