कयामत के रंग भर देता है

कयामत के रंग भर देता है खुदा खुबसूरती में कयामत के रंग भर देता है, रुखसार पर एक काला तिल रख देता है। आँखे वेसे ही उसकी कातिलाना है, वो सुरमे से सजाकर उन्हें कतार कर देता है।।1।। कौन कम्बखत कहता है कि कुदरत में फेरबदल नही होते, वो झरोखे में आए तो खुद खुदा ईद की तारीखों में बदलाव कर देता है। खूबसूरती पर उसकी हर एक फ़िदा है, आसमां भी उनके सजदे में अमावस को पूनम की रात कर देता है।।2।। ये तो मुकद्दर है हमारा की वो हमारे हिस्से आयी है, वरना पूरा शहर उन्हें पाने को Continue reading कयामत के रंग भर देता है

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रंगमई ऋतुराज

रंगमई ऋतुराज आहट पाकर त्रृतुराज की, सजाई है सेज वसुन्धरा ने…. हो रहा पुनरागमन, जैसे किसी नवदुल्हन का, पीले से रंगों की चादर फैलाई हैं सरसों ने, लाल रंग फूलों से लेकर मांग सजाई है उस दुल्हन ने, स्वर में कंपन, कंठ में राग, आँखों में सतर॔गे सपने…. जीवन का अक्षयदान लेकर, दस्तक दी है त्रृतुराज ने…. हो रहा पुनरागमन, जैसे सतरंगी जीवन का, सात रंगों को तुम भी भर लेना आँखों में, उगने देना मन की जमीन पर, दरख्त रंगीन लम्हों के, खिला लेना नव कोपल दिल की कोरी जमीन पे…. विहँस रहा ऋतुराज, बसन्ती अनुराग घोलकर रंगों में…. Continue reading रंगमई ऋतुराज

सर्द सुबह

सर्द सुबह कहीं धूँध में लिपटकर, खोई हुई सी हैं सुबह, धुँधलाए कोहरों में कहीं, सर्द से सिमटी हुई सी है सुबह, सिमटकर चादरों में कहीं, अलसाई हुई सी है सुबह, फिर क्युँ न मूँद लूँ, कुछ देर मैं भी अपनी आँखें? आ न जाए आँखों में, कुछ ओस की बूंदें! ओस में भींगकर भी, सोई हुई सी है सुबह, कँपकपाती ठंढ में कोहरों में डूबी, खोई हुई सी है सुबह, खिड़कियों से झांकती, उन आँखों में खोई है सुबह, फिर क्युँ न इस पल में, खुद को मैं भी खो दूँ? जी लूँ डूब कर, कुछ देर और इस Continue reading सर्द सुबह

अफसाना

अफसाना लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना…. रुक गया था कुछ देर मैं, छाॅव देखकर कहीं, छू गई मन को मेरे, कुछ हवा ऐसी चली, सिहरन जगाती रही, अमलतास की वो कली, बंद पलकें लिए, खोया र5हा मैं यूॅ ही वही, लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा तब वो अफसाना…. कुछ अधलिखा सा वो अफसाना, दिल की गहराईयों से, उठ रहा बनकर धुआॅ सा, लकीर सी खिंच गई है, जमीं से आसमां तक, ख्वाबों संग यादों की धुंधली तस्वीर लेकर, गाने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना….. कह रहा मन मेरा बार-बार मुझसे यही, उसी Continue reading अफसाना

अदा

अदा तेरी चाल में बिजली की अदा है तेरी लटों का लहराना जुदा है नज़र के नशीले तीर जो चलाये गुलाबी लब पर ये दिल भी फ़िदा है देखा जो तो देखते ही रह गये चेहरा गुलाब जैसा संजीदा है मुस्कुरा के तुम बर्क़ गिराते गये दिल मीठे सा दर्द से ग़मजदा है ख़ुशबू बिखेर यों आँचल फहराये चलने में किया मस्त मस्त अदा है गगन में बिजली सी चमकती जाये आशिकी में हर दिल तुम पे फिदा है हुस्न की बर्क़ ने मारा सजन तुझे ज्यों शोला भड़कता वो मसौदा है सजन

जुल्फ़ें

जुल्फ़ें चेहरे पे आई आवारा ज़ुल्फ़ को संवारा कीजिए ज़ुल्फ़ के पीछे छीपेे हुस्न-ए-चांद को निखारा कीजिए लहराती ये ज़ुल्फ़ नागीन सी की दिल है मचल उठे बांध के ये ज़रा कायदे से हुस्न का इशारा कीजिए रुखसार के लिये हों परेशान ऐसा ना क़हर कीजिए ज़ुल्फ़ के साये में शाम-ए-सकून गुजरे आसरा कीजिए कुडंली बना कर इन ज़ुल्फ़ों को चोटी सजाया कीजिये बेणी सजाके फूलों की इन ज़ुल्फ़ों को संवारा कीजिए ये ज़ुल्फ़ें यूँ गिराई चेहरे पर दिल दीदार को मचल उठा यों झटका के ज़ुल्फ़ मेरे दिल पे खंजर न मारा कीजिए बाँध ज़ुल्फ़ें ज़रा दीदार-ए- हुस्न का Continue reading जुल्फ़ें

मेंहदी लगे हाथ

मेंहदी लगे हाथ अंकुरा है फिर स्नेह, आज मेंहदी लगी उन हाथों में…. खुश हो रहा मन….. उपजी है नेह की फसल मेंहदी संग उनकी यादों में, मलय के झौंकों में आज मेहदी की है खुश्बु, रंग बस मेंहदी का ही अब इन आँखों मे, गहराया है रंग मेंहदी का खिलकर उनकी हाथों में… कहते हैं वो….., रंग मेहदी का गहराता है स्नेहिल आँखों से, मेंहदी हँस पड़ती है खुलकर तब इन हाथों में, बोल पड़ते हैं ये रंग स्नेहिल भाषा तब यौवन के, रंग जाता है यह मन बोझिल से तन मन के…., मेंहदी यह कैसी…! खुद पििस जाती Continue reading मेंहदी लगे हाथ

तुम रति सी सुन्दर

तुम रति सी सुन्दर तुम रति सी सुन्दर मैं कामदेव तुम्हारा हूँ, तुम स्नेह की मूरत में प्रेम तुम्हारा हूँ। तुम आभूषण कोई महंगा मैं देह तुम्हारा हूँ, तुम चाँद पूर्णिमा का मैं रैन तुम्हारा हूँ।।1।। तुम विष देकर मुझे वैरी हो जाओगी, मैं विषपान करूँ और अमी हो जाए। अश्रु है नैन में की तुम गैर हो जाओगी, कुछ तू दुआ दो की मेरे जीवन में रस्मी हो जाए।।2।। तुम राधा हो मेरी मैं किशन तुम्हारा हूँ, तुम परछाई उजालो की मैं दर्पण तुम्हारा हूँ। तुम नींद कोई गहरी मैं ख्वाब तुम्हारा हूँ, तुम गजल महोब्बत की मैं शब्दकोश तुम्हारा हूँ।।3।। तुम रति सी सुन्दर मैं कामदेव तुम्हारा हूँ। तुम स्नेह की मूरत मैं प्रेम तुम्हारा हूँ।।4।।

अनबुझी प्यास

अनबुझी प्यास अंकुरित अभिलाषा पलते एहसास, अनुत्तिरत अनुभूतियाँ ये कैसी प्यास? अन्तर्द्वन्द अन्तर्मन अंतहीन विश्वास, क्षणभंगूर निमंत्रण क्षणिक क्या प्यास? पिघलते दरमियाँ छलकते आकाश, अनकहे निःस्तब्ध जज्बात कैसी मौन प्यास? अमरत्व अभिलाषा स्मृति अविनाश, अंकुरित अनुभूति अनुत्तरित अनबुझी प्यास?

ओ मेरे साजन

ओ मेरे साजन फुहारें रिमझिम की लेकर आई फिर साजन की यादें………. घटाओं ने आँचल को बिखेरे हैं यूँ झूम-झूमकर, बिखरी हैं बूंदें सावन की तन पर टूट-टूटकर, वो कहते हैं इसको, है यह सावन की पहली फुहार, मन कहता है, साजन ने फिर आज बरसाया हैं मुझ पर प्यार। साजन मेरा साँवला सा, है सावन का वो संगी, साथ-साथ रहते हैं दोनो, उन घटाओं के उपर ही, वो कहते है, बावला है प्रियतम तेरा बरसाता है फुहार, मन कहता है, दीवाना है साजन मेरा करता वो मुझसे गुहार। ओ काले बादल जाकर मेरे साजन से तुम ये कहना, छुप-छुपकर Continue reading ओ मेरे साजन

लम्हों के विस्तार

निश्छल लम्हा, निष्ठुर लम्हा, यौवन लम्हों के साथ में… हर लम्हा बीत रहा, इक लम्हे के इंतजार में, हर लम्हा डूब रहा, उन लम्हों के ही विस्तार में, आता लम्हा, जाता लम्हा, हर लम्हे के साथ में। साँसे लेती ये लम्हा, बीते लम्हों की फरियाद में, आह निकलती हर लम्हे से, उन लम्हों की याद में, बीता लम्हा, खोया लम्हा, उन लम्हों के साथ में। जीवन है हर लम्हा, बीता है जीवन इन लम्हों में, हर पल बीतता लम्हा, खोया अपनों को इन लम्हों में, रिश्ता लम्हा, नाता लम्हा, गुजरे लम्हों के साथ में। हाथों से छूटा है लम्हा, लम्हे Continue reading लम्हों के विस्तार

वो चाय जो आदत बन गई

वो लजीज एक प्याली चाय जो अब आदत बन गई….. सुबह की मंद बयार तन को सहलती जब, अलसाई नींद संग बदन हाथ पाँव फैलाते तब, अधखुले पलकों में उभरती तभी एक छवि, चाय की प्याली हाथों में ले जैसे सामने कोई परी, स्नेहमई मूरत चाय संग प्यार छलकाती रही, वो लजीज एक प्याली चाय जो अब आदत बन गई….. चाय की वो चंद बूँदें लगते अमृत की धार से, एहसास दिलाते जैसे छलके हो मदिरा उन आँखों से, सिंदुरी मांग सी प्यारी रंग दमकती उन प्यालों में, चूड़ियों की खनखन के संग चाय लिए उन हाथों में, अलबेली मूरत Continue reading वो चाय जो आदत बन गई

अनसुना गीत कोई

अनसुना गीत कोई अनकहा कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी! यूँ तो आपने सुने होंगे गीत कई, मिल जाएंगे आपको राहों में मीत कई, कोई मिलता है कहाँ जो सुनाए अनकहा गीत कोई, धड़कनों ने छेड़ी है मेरी इक संगीत नई, आ सुना दूँ वो गजल तुझको, ओ मन मीत मेरी। अनसुना कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी! तेरी धड़कनों में बजे होंगे संगीत कई, कहने वालों ने कहे होंगे गजल-गीत कई, दिल धड़कता है मेरा गा रहा अनसुना गीत कोई, गुनगना लूँ मैं आपके सामने संगीत वही, आ सुना दूँ वो गजल तुझको, Continue reading अनसुना गीत कोई

आँचल तले खग का नीर

आँचल तले बना लेता नीर, खग एक सुन्दर सा….! आँचल की कोर बंधी प्रीत की डोर, मन विह्ववल, चंचल चित, चितवन चितचोर, लहराता आँचल जिया उठता हिलकोर, उस ओर उड़ चला मन साजन रहता जिस ओर। नीले पीले रंग बिरंगे आँचल सजनी के, डोर डोर अति मन भावन उस गहरे आँचल के, सुखद छाँव घनेरी उस पर तेरी जुल्फों के, बंध रहा मन अाँचल में प्रीत के मधुर बंधन से। हो तुम कौन? अंजान मैं अब तक तुमसे, लिपटा है मन अब तक धूंध मे इस आँचल के, लहराता मैं भी नभ में संग तेरे आँचल के, प्रीत का आँचल Continue reading आँचल तले खग का नीर

मै प्रकृति होना चाहती हु

मै प्रकृति होना चाहती हु नीले आसमान तले ढ़ेर सारी बदलियों के धुंधलके मे छिपी हुई पहाड़ियों को दूर तलक देखना चाह्ती हुं पर्वत की चोटी से घाटी की तली तक श्वेत भुरभुरी बर्फ को पिघलते बूंद-२ बहते देखना चाहती हुं पर्वत के शिखर पर गिरती सुनहली किरण को अपनी आंखो की चमक मे बदलते देखना चाहती हुं जहां तक नजर जाये उस हर एक ऊंचाई को अपने कदमो तले झुका कर फतेह पाना चाहती हुं पहाड़ के उदार सीने मे छिप कर, उसके आलिंगन मे उसकी विशालता को महसूस करना चाहती हु पवन की पुछल्ली बन ,दूर-2 तक अपने Continue reading मै प्रकृति होना चाहती हु