बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं…..   व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी, चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी, देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी, वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी, सनैः सनैः बर्फ के फाहों से ढक चुकी…..   कुछ बर्फ, सुखी डालियों पर थी जमीं, कुछ फाहे, हरी पत्तियों पर भी रुकी, अवसाद कम गए, साँस थोड़े जम गए, किरण धूप की, कही दूर जा छुपी, व्यथित जमीं, परत दर परत जम चुकी….   यूँ ही व्यथा तभी, भाफ बन कर उड़ी, रूप कई बदल, यूँ बादलों में उभरी, कभी धुआँ, Continue reading बर्फ के फाहे

अनन्त प्रणयिनी

कलकल सी वो निर्झरणी, चिर प्रेयसी, चिर अनुगामिणी, दुखहरनी, सुखदायिनी, भूगामिणी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… छमछम सी वो नृत्यकला, चिर यौवन, चिर नवीन कला, मोह आवरण सा अन्तर्मन में रमी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… धवल सी वो चित्रकला, नित नवीन, नित नवरंग ढ़ला, अनन्त काल से, मन को रंग रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… निर्बाध सी वो जलधारा, चिर पावन, नित चित हारा, प्रणय की तृष्णा, तृप्त कर रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… प्रणय काल सीमा से परे, हो प्रेयसी जन्म जन्मान्तर से, निर्बोध कल्पना में निर्बाध बहती, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… अतृप्त तृष्णा अजन्मी सी, तुम में ही समाहित है ये कही, तृप्ति की Continue reading अनन्त प्रणयिनी

पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल, परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश, या प्यार से कहता दरख्तेपल…. दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से, फागुन सी होती ये पवन, होली के रंगों से रंगते उनके गेेसू, अबीर से रंगे होते उनके नयन….. रमते इन त्रिपर्नकों में त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नित दिन कर पाता मैं ब्रम्हपूजन, हो जाती नित ये पूजा विशेष….. दर्शन नित्य ही होते त्रित्व के, होता व्याधियों का अंत, जलते ये अवगुण अग्निज्वाला में, नित दिन होता मौसम बसंत…. काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… —————————- Continue reading पलाश

कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ

मुख्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे, देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से, इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे, सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों में मेरी! सिंदूरी ख्वाब लिए, फिर सो जाती है रात… मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. झांकती है सुबह, उन खिड़कियों से मुझे, रंग वही सिंदूरी, जैसे सांझ मिली हो भोर से, मींचती आँखों में, सिन्दूरी सा रंग घोल के, रंगमई सी सुबह, बस जाती है फिर आँखों में मेरी! दिन ढ़ले फिर, Continue reading मुख्तसर सी कोई बात

ऋतुराज

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई, संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई, जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई, ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी….. नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा, जीर्ण काया को सँवार, निहार रही खुद को जरा, हरियाली ऊतार, तन को निखार रही ये जरा, शिशिर की ये पुकार, सँवार खुद को जरा….. कण-कण में संसृति के, यह कैसा स्पंदन, ओस झरे हैं झर-झर, लताओं में कैसी ये कंपन, बह चली है ठंढ बयार, कलियों के झूमे हैं मन, शिशिर ऋतु का ये, मनमोहक है आगमन….. कोयल ने छेड़े है धुन, Continue reading ऋतुराज

अक्षत यौवन

अक्षत यौवन तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन। खिलती धूप-सी तू चपल यौवना, कितना ज्योतर्मय तेरा लड़कपन। हर दिल की उत्कंठित तृष्णा तू, कितना मार्मिक तेरा अल्हड़पन। सांसें क्यों थम-सी जाती हैं मेरी, देखूं जब तेरा अबोध चंचलपन। अंगड़ाई लेती जब तेरी तरूणाई, बढ़ जाती ब्रह्माण्ड की धड़कन। शुक्रिया करूँ कैसे उस ख़ुदा का, जिसने तराशा तेरा मासूम बचपन। तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन।   (किशन नेगी)

अधर

अधर सुंदर हैं वो अधर, मेरे शब्दों में जो भरते हैं स्वर… ओ संगनिष्ठा, मेरे कोरे स्वर तू होठों पे बिठा, जब ये तेरे रंगरंजित अधरों का आलिंगन ले पाएंगे, अंबर के अतिरंजित रंग इन शब्दों मे भर जाएँगे! शब्दों के मेरे रंगरंजित स्वर, रंग देंगे ये तेरे अधर… ओ बासंती, कोकिल कंठ तू शब्दों को दे जा, प्रखर से ये तेरे स्वर लेकर ही, ये मुखरित हो पाएंगे, सुर के ये सप्तम स्वर मेरे शब्दों में भर जाएँगै। अधरों की सुरीली चहचहाहट में डूबे हैं मेरे स्वर…. ओ अधरश्रेष्ठा, कंपन होठों की इनको दे जा, चंचल से दो अधरों Continue reading अधर

कयामत के रंग भर देता है

कयामत के रंग भर देता है खुदा खुबसूरती में कयामत के रंग भर देता है, रुखसार पर एक काला तिल रख देता है। आँखे वेसे ही उसकी कातिलाना है, वो सुरमे से सजाकर उन्हें कतार कर देता है।।1।। कौन कम्बखत कहता है कि कुदरत में फेरबदल नही होते, वो झरोखे में आए तो खुद खुदा ईद की तारीखों में बदलाव कर देता है। खूबसूरती पर उसकी हर एक फ़िदा है, आसमां भी उनके सजदे में अमावस को पूनम की रात कर देता है।।2।। ये तो मुकद्दर है हमारा की वो हमारे हिस्से आयी है, वरना पूरा शहर उन्हें पाने को Continue reading कयामत के रंग भर देता है

रंगमई ऋतुराज

रंगमई ऋतुराज आहट पाकर त्रृतुराज की, सजाई है सेज वसुन्धरा ने…. हो रहा पुनरागमन, जैसे किसी नवदुल्हन का, पीले से रंगों की चादर फैलाई हैं सरसों ने, लाल रंग फूलों से लेकर मांग सजाई है उस दुल्हन ने, स्वर में कंपन, कंठ में राग, आँखों में सतर॔गे सपने…. जीवन का अक्षयदान लेकर, दस्तक दी है त्रृतुराज ने…. हो रहा पुनरागमन, जैसे सतरंगी जीवन का, सात रंगों को तुम भी भर लेना आँखों में, उगने देना मन की जमीन पर, दरख्त रंगीन लम्हों के, खिला लेना नव कोपल दिल की कोरी जमीन पे…. विहँस रहा ऋतुराज, बसन्ती अनुराग घोलकर रंगों में…. Continue reading रंगमई ऋतुराज

सर्द सुबह

सर्द सुबह कहीं धूँध में लिपटकर, खोई हुई सी हैं सुबह, धुँधलाए कोहरों में कहीं, सर्द से सिमटी हुई सी है सुबह, सिमटकर चादरों में कहीं, अलसाई हुई सी है सुबह, फिर क्युँ न मूँद लूँ, कुछ देर मैं भी अपनी आँखें? आ न जाए आँखों में, कुछ ओस की बूंदें! ओस में भींगकर भी, सोई हुई सी है सुबह, कँपकपाती ठंढ में कोहरों में डूबी, खोई हुई सी है सुबह, खिड़कियों से झांकती, उन आँखों में खोई है सुबह, फिर क्युँ न इस पल में, खुद को मैं भी खो दूँ? जी लूँ डूब कर, कुछ देर और इस Continue reading सर्द सुबह

अफसाना

अफसाना लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना…. रुक गया था कुछ देर मैं, छाॅव देखकर कहीं, छू गई मन को मेरे, कुछ हवा ऐसी चली, सिहरन जगाती रही, अमलतास की वो कली, बंद पलकें लिए, खोया र5हा मैं यूॅ ही वही, लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा तब वो अफसाना…. कुछ अधलिखा सा वो अफसाना, दिल की गहराईयों से, उठ रहा बनकर धुआॅ सा, लकीर सी खिंच गई है, जमीं से आसमां तक, ख्वाबों संग यादों की धुंधली तस्वीर लेकर, गाने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना….. कह रहा मन मेरा बार-बार मुझसे यही, उसी Continue reading अफसाना

अदा

अदा तेरी चाल में बिजली की अदा है तेरी लटों का लहराना जुदा है नज़र के नशीले तीर जो चलाये गुलाबी लब पर ये दिल भी फ़िदा है देखा जो तो देखते ही रह गये चेहरा गुलाब जैसा संजीदा है मुस्कुरा के तुम बर्क़ गिराते गये दिल मीठे सा दर्द से ग़मजदा है ख़ुशबू बिखेर यों आँचल फहराये चलने में किया मस्त मस्त अदा है गगन में बिजली सी चमकती जाये आशिकी में हर दिल तुम पे फिदा है हुस्न की बर्क़ ने मारा सजन तुझे ज्यों शोला भड़कता वो मसौदा है सजन

जुल्फ़ें

जुल्फ़ें चेहरे पे आई आवारा ज़ुल्फ़ को संवारा कीजिए ज़ुल्फ़ के पीछे छीपेे हुस्न-ए-चांद को निखारा कीजिए लहराती ये ज़ुल्फ़ नागीन सी की दिल है मचल उठे बांध के ये ज़रा कायदे से हुस्न का इशारा कीजिए रुखसार के लिये हों परेशान ऐसा ना क़हर कीजिए ज़ुल्फ़ के साये में शाम-ए-सकून गुजरे आसरा कीजिए कुडंली बना कर इन ज़ुल्फ़ों को चोटी सजाया कीजिये बेणी सजाके फूलों की इन ज़ुल्फ़ों को संवारा कीजिए ये ज़ुल्फ़ें यूँ गिराई चेहरे पर दिल दीदार को मचल उठा यों झटका के ज़ुल्फ़ मेरे दिल पे खंजर न मारा कीजिए बाँध ज़ुल्फ़ें ज़रा दीदार-ए- हुस्न का Continue reading जुल्फ़ें

मेंहदी लगे हाथ

मेंहदी लगे हाथ अंकुरा है फिर स्नेह, आज मेंहदी लगी उन हाथों में…. खुश हो रहा मन….. उपजी है नेह की फसल मेंहदी संग उनकी यादों में, मलय के झौंकों में आज मेहदी की है खुश्बु, रंग बस मेंहदी का ही अब इन आँखों मे, गहराया है रंग मेंहदी का खिलकर उनकी हाथों में… कहते हैं वो….., रंग मेहदी का गहराता है स्नेहिल आँखों से, मेंहदी हँस पड़ती है खुलकर तब इन हाथों में, बोल पड़ते हैं ये रंग स्नेहिल भाषा तब यौवन के, रंग जाता है यह मन बोझिल से तन मन के…., मेंहदी यह कैसी…! खुद पििस जाती Continue reading मेंहदी लगे हाथ