मेंहदी लगे हाथ

मेंहदी लगे हाथ अंकुरा है फिर स्नेह, आज मेंहदी लगी उन हाथों में…. खुश हो रहा मन….. उपजी है नेह की फसल मेंहदी संग उनकी यादों में, मलय के झौंकों में आज मेहदी की है खुश्बु, रंग बस मेंहदी का ही अब इन आँखों मे, गहराया है रंग मेंहदी का खिलकर उनकी हाथों में… कहते हैं वो….., रंग मेहदी का गहराता है स्नेहिल आँखों से, मेंहदी हँस पड़ती है खुलकर तब इन हाथों में, बोल पड़ते हैं ये रंग स्नेहिल भाषा तब यौवन के, रंग जाता है यह मन बोझिल से तन मन के…., मेंहदी यह कैसी…! खुद पििस जाती Continue reading मेंहदी लगे हाथ

तुम रति सी सुन्दर

तुम रति सी सुन्दर तुम रति सी सुन्दर मैं कामदेव तुम्हारा हूँ, तुम स्नेह की मूरत में प्रेम तुम्हारा हूँ। तुम आभूषण कोई महंगा मैं देह तुम्हारा हूँ, तुम चाँद पूर्णिमा का मैं रैन तुम्हारा हूँ।।1।। तुम विष देकर मुझे वैरी हो जाओगी, मैं विषपान करूँ और अमी हो जाए। अश्रु है नैन में की तुम गैर हो जाओगी, कुछ तू दुआ दो की मेरे जीवन में रस्मी हो जाए।।2।। तुम राधा हो मेरी मैं किशन तुम्हारा हूँ, तुम परछाई उजालो की मैं दर्पण तुम्हारा हूँ। तुम नींद कोई गहरी मैं ख्वाब तुम्हारा हूँ, तुम गजल महोब्बत की मैं शब्दकोश तुम्हारा हूँ।।3।। तुम रति सी सुन्दर मैं कामदेव तुम्हारा हूँ। तुम स्नेह की मूरत मैं प्रेम तुम्हारा हूँ।।4।।

अनबुझी प्यास

अनबुझी प्यास अंकुरित अभिलाषा पलते एहसास, अनुत्तिरत अनुभूतियाँ ये कैसी प्यास? अन्तर्द्वन्द अन्तर्मन अंतहीन विश्वास, क्षणभंगूर निमंत्रण क्षणिक क्या प्यास? पिघलते दरमियाँ छलकते आकाश, अनकहे निःस्तब्ध जज्बात कैसी मौन प्यास? अमरत्व अभिलाषा स्मृति अविनाश, अंकुरित अनुभूति अनुत्तरित अनबुझी प्यास?

ओ मेरे साजन

ओ मेरे साजन फुहारें रिमझिम की लेकर आई फिर साजन की यादें………. घटाओं ने आँचल को बिखेरे हैं यूँ झूम-झूमकर, बिखरी हैं बूंदें सावन की तन पर टूट-टूटकर, वो कहते हैं इसको, है यह सावन की पहली फुहार, मन कहता है, साजन ने फिर आज बरसाया हैं मुझ पर प्यार। साजन मेरा साँवला सा, है सावन का वो संगी, साथ-साथ रहते हैं दोनो, उन घटाओं के उपर ही, वो कहते है, बावला है प्रियतम तेरा बरसाता है फुहार, मन कहता है, दीवाना है साजन मेरा करता वो मुझसे गुहार। ओ काले बादल जाकर मेरे साजन से तुम ये कहना, छुप-छुपकर Continue reading ओ मेरे साजन

लम्हों के विस्तार

निश्छल लम्हा, निष्ठुर लम्हा, यौवन लम्हों के साथ में… हर लम्हा बीत रहा, इक लम्हे के इंतजार में, हर लम्हा डूब रहा, उन लम्हों के ही विस्तार में, आता लम्हा, जाता लम्हा, हर लम्हे के साथ में। साँसे लेती ये लम्हा, बीते लम्हों की फरियाद में, आह निकलती हर लम्हे से, उन लम्हों की याद में, बीता लम्हा, खोया लम्हा, उन लम्हों के साथ में। जीवन है हर लम्हा, बीता है जीवन इन लम्हों में, हर पल बीतता लम्हा, खोया अपनों को इन लम्हों में, रिश्ता लम्हा, नाता लम्हा, गुजरे लम्हों के साथ में। हाथों से छूटा है लम्हा, लम्हे Continue reading लम्हों के विस्तार

वो चाय जो आदत बन गई

वो लजीज एक प्याली चाय जो अब आदत बन गई….. सुबह की मंद बयार तन को सहलती जब, अलसाई नींद संग बदन हाथ पाँव फैलाते तब, अधखुले पलकों में उभरती तभी एक छवि, चाय की प्याली हाथों में ले जैसे सामने कोई परी, स्नेहमई मूरत चाय संग प्यार छलकाती रही, वो लजीज एक प्याली चाय जो अब आदत बन गई….. चाय की वो चंद बूँदें लगते अमृत की धार से, एहसास दिलाते जैसे छलके हो मदिरा उन आँखों से, सिंदुरी मांग सी प्यारी रंग दमकती उन प्यालों में, चूड़ियों की खनखन के संग चाय लिए उन हाथों में, अलबेली मूरत Continue reading वो चाय जो आदत बन गई

अनसुना गीत कोई

अनसुना गीत कोई अनकहा कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी! यूँ तो आपने सुने होंगे गीत कई, मिल जाएंगे आपको राहों में मीत कई, कोई मिलता है कहाँ जो सुनाए अनकहा गीत कोई, धड़कनों ने छेड़ी है मेरी इक संगीत नई, आ सुना दूँ वो गजल तुझको, ओ मन मीत मेरी। अनसुना कोई गीत गुनगुना लूँ मैं, ओ मन प्रीत मेरी! तेरी धड़कनों में बजे होंगे संगीत कई, कहने वालों ने कहे होंगे गजल-गीत कई, दिल धड़कता है मेरा गा रहा अनसुना गीत कोई, गुनगना लूँ मैं आपके सामने संगीत वही, आ सुना दूँ वो गजल तुझको, Continue reading अनसुना गीत कोई

आँचल तले खग का नीर

आँचल तले बना लेता नीर, खग एक सुन्दर सा….! आँचल की कोर बंधी प्रीत की डोर, मन विह्ववल, चंचल चित, चितवन चितचोर, लहराता आँचल जिया उठता हिलकोर, उस ओर उड़ चला मन साजन रहता जिस ओर। नीले पीले रंग बिरंगे आँचल सजनी के, डोर डोर अति मन भावन उस गहरे आँचल के, सुखद छाँव घनेरी उस पर तेरी जुल्फों के, बंध रहा मन अाँचल में प्रीत के मधुर बंधन से। हो तुम कौन? अंजान मैं अब तक तुमसे, लिपटा है मन अब तक धूंध मे इस आँचल के, लहराता मैं भी नभ में संग तेरे आँचल के, प्रीत का आँचल Continue reading आँचल तले खग का नीर

मै प्रकृति होना चाहती हु

मै प्रकृति होना चाहती हु नीले आसमान तले ढ़ेर सारी बदलियों के धुंधलके मे छिपी हुई पहाड़ियों को दूर तलक देखना चाह्ती हुं पर्वत की चोटी से घाटी की तली तक श्वेत भुरभुरी बर्फ को पिघलते बूंद-२ बहते देखना चाहती हुं पर्वत के शिखर पर गिरती सुनहली किरण को अपनी आंखो की चमक मे बदलते देखना चाहती हुं जहां तक नजर जाये उस हर एक ऊंचाई को अपने कदमो तले झुका कर फतेह पाना चाहती हुं पहाड़ के उदार सीने मे छिप कर, उसके आलिंगन मे उसकी विशालता को महसूस करना चाहती हु पवन की पुछल्ली बन ,दूर-2 तक अपने Continue reading मै प्रकृति होना चाहती हु

कान्हा विछोह

कान्हा विछोह आज जो पूछत हैं, ये बरसाने की गोपियाँ, म्हारो वो कान्हा कहा खो गयो है। माखन चुरावन को आवत ना है अब, जानू ना वो नटखट कहा सो गयो है। अरी ओ मैय्या दे जइयो बता, उसकी ये बतिया, वो दिल का चोर जाने कहा गयो है। कहत यशोदा, मत पूछो री मोरी सखिया, म्हारे दिल को टुकड़ो जाने कहा रो गयो है। जो हमसे कहत मैय्या, थारो ही रहूँ तो, वो म्हारो कान्हा, दूजन का जाने हो गयो है। श्रेयस अपूर्व “मैकश”

करते हैं प्यार

करते हैं प्यार वो कह के गए हैं अब हमें याद ना करना कभी, कैसे बताये की यादो में ही तो गुजारा करते हैं। जो शिकवे बनाये थे हमने अपने हमदम से, कैसे बताये की सपनो में ही तो सुधारा करते हैं। वो बसा के जो गए थे अपना गुल सा चेहरा, कैसे बताये की उसे ही तो निहारा करते हैं। यूं तो बहुत से सूखे से गुजरा है ये दिल, कैसे बताये की उसमे ही तो बहारा करते हैं। वो तो गए थे हमको “मगरिब”, तनहा बेसहारा करके, कैसे बताये की अब दूसरो को ही तो सहारा करते हैं। Continue reading करते हैं प्यार

कान्हा रस

कहत अटारी से ये बरसाने की सखिया, कान्हा हमपे तेरा कुछ तो उधारी है। जानत ना हैं हम अपने दिल की ये बतिया, पर हम तुझपे ही तो वारी हैं। बहुत सताया है तूने जलन के विछोह में, तब ही तो हम तुझपे हारी हैं। थक सी गयी हैं ये राह देखत देखत, ना खुलत अब ये अखिया हमारी हैं। जाओ ना ओ कान्हा विनती करत हैं, देखन को हमपे कुछ तो विचारी हैं। मानत हैं तुम हो सखा सब हीं के, हम तो तेरे बिन जैसे बिचारी हैं। लौटत को देखन आ जइयो ऐ कान्हा, बार बार हम तुमको Continue reading कान्हा रस

“अनसुनी यादें”

सुनो आज कुछ सुना देता हूं मैं, तू साथ है मेरे तो गुनगुना लेता हूं मैं. -> वक्त ना जाया कर, वो तो एहसानफरामोश है. मेरे गीत लबों पे हैं, तब तू क्यों खामोश है. संजीदा है तू, या ये खयाल हैं मेरे. बेबाक है जिंदगी, पर तू क्यों मदहोश है. खोकर तुम्हे फिर से अपना बना लेता हूं मैं. सुनो आज ………… -> वो याद आता है मुझे, मां का बेटा कहना. रुला जाता है मुझे, पिता का बेटा कहना. बहना कहती है, तू तो मेरा प्यारा भाई है, सब कुछ यूं ही बदले “मगरिब”, पर तू अच्छा बेटा Continue reading “अनसुनी यादें”