बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं…..   व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी, चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी, देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी, वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी, सनैः सनैः बर्फ के फाहों से ढक चुकी…..   कुछ बर्फ, सुखी डालियों पर थी जमीं, कुछ फाहे, हरी पत्तियों पर भी रुकी, अवसाद कम गए, साँस थोड़े जम गए, किरण धूप की, कही दूर जा छुपी, व्यथित जमीं, परत दर परत जम चुकी….   यूँ ही व्यथा तभी, भाफ बन कर उड़ी, रूप कई बदल, यूँ बादलों में उभरी, कभी धुआँ, Continue reading बर्फ के फाहे

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

घट पीयूष

घट पीयूष मिल जाता, गर तेरे पनघट पर मै जाता! अंजुरी भर-भर छक कर मै पी लेता, दो चार घड़ी क्या,मैं सदियों पल भर में जी लेता, क्यूँ कर मैं उस सागर तट जाता? गर पीयूष घट मेरी ही हाथों में होता! लहरों के पीछे क्यूँ जीवन मैं अपना खोता? लेकिन था सच से मैं अंजान, मैं कितना था नादान! हृदय सागर के उकेर आया मैं, उत्कीर्ण कर गया लकीर पत्थर के सीने पर, बस दो घूँट पीयूष पाने को, मन की अतृप्त क्षुधा मिटाने को, भटका रहा मैं इस अवनी से उस अंबर तक! अब आया मैं तेरे पनघट, Continue reading घट पीयूष

आदमी का आदमी से संवाद

आदमी का आदमी से संवाद जब से आदमी का आदमी से संवाद कम हो गया। रिश्तों में प्रेम और अपनापन अब धीरे धीरे खो गया।। नहीं दिखती अब अपनत्व की भावना कहीं भी । लगता है आज का व्यस्त आदमी एकाकी हो गया।। मतलबपरस्ती का मिजाज इस कदर छाया समाज में। दूसरों के लिए सोचना लगता नामुमकिन हो गया।। सभी पैसों के पीछे पागल से होने लगे हैं दोस्तों। इंसानियत के नाम पर आदमी आज कलंक हो गया।। जानते हुए भी इंसान अनजान बनता है आजकल। मर्यादा को रख ताक में आज इंसान शातिर हो गया।। कवि राजेश पुरोहित Mob.7073318074 Continue reading आदमी का आदमी से संवाद

बेखबर

काश! मिल पाता मुझे मेरी ही तमन्नाओं का शहर! चल पड़े थे कदम उन हसरतों के डगर, बस फासले थे जहाँ, न थी मंजिल की खबर, गुम अंधेरों में कहीं, था वो चाहतों का सफर, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! बरबस खींचती रहीं जिन्दगी मुझे कहीं, हाथ बस दो पल मिले, दिल कभी मिले नहीं, शख्स कई मिले, पर वो बंदगी मिली नही, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! साहिल था सामने, बस पावों में थे भँवर, बहती हुई इस धार में, बहते रहे हम बेखबर, बांध टूटते रहे, टूटता रहा मेरा सबर, Continue reading बेखबर

क्यों डरना रात के अंधकार से

क्यों डरना रात के अंधकार से रात के ख़ौफ़नाक अन्धकार से क्यों भागते हैं हम क्यों डरते हैं हम क्यों कतराते हैं हम धरते क्यों नहीं पग अपने हम रात के अँधेरे में जबकि झरती हैं जीवन की कई धाराएँ इसी अँधेरी रात के निर्मल झरनों से जो छूती हैं दहलीज़ हमारी मंज़िल की जो स्पर्श करती हैं हमारे मार्ग की माटी को जो जगाती हैं हमारे सोये हुए अहसासों को और दिखाती हैं हमें हमारे मंज़िल की खिड़की रात का अपरिचित सन्नाटा इतना अशुभ नहीं होता इतना निष्ठुर नहीं होता इतना क्रूर नहीं होता तो फिर क्यों सहमते हैं Continue reading क्यों डरना रात के अंधकार से

मौन अभ्यावेदन

मौन अभ्यावेदन मुखर मनःस्थिति, मनःश्रुधार, मौन अभ्यावेदन! ढूंढता है तू क्या ऐ मेरे व्याकुल मन? चपल हुए हैं क्यूँ, तेरे ये कंपकपाते से चरण! है मौन सा कैसा तेरा ये अभ्यावेदन? तू है निश्छल, तू है कितना निष्काम! जीवन है इक छल, पीता जा तू छल के जाम! प्रखर जरा मौन कर, तू पाएगा आराम! मौन अभ्यर्थी ही पाता विष का प्याला! कटु वचन, प्रताड़ना, नित् अश्रुपूरित निवाला! मौन वृत्ति ने ही तुझको संकट में डाला! भूगर्भा तू नहीं, तू है इक निश्छल मन, तड़़पेगा तू हरपल, करके बस मौन अभ्यावेदन! स्वर वाणी को दे, कर प्रखर अभ्यावेदन! अग्निकुण्ड सा Continue reading मौन अभ्यावेदन

रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे दर्पण तू झूठ न बोले जीवनकाल के इस लम्बे सफर में देखे हैं अनगिनित उतार-चढ़ाव की ढलानें मैंने एक दिन अनायास ही क्लान्ति की रेखाएं लगी उभरने मेरे परिश्रांत मुखाकृति पर मन ने कहा कि तनिक रुक, और विराम दे अपनी दिशाहीन यात्रा को काल की शीतल छाँव में बिसरा ले और कर विचार कि तूने इस सफर में क्या खोया-क्या पाया मैंने कर्मों के दर्पण में निहारा चेहरा अपना उस धूमिल छवि पर असंख्य परतें धूल की क्रूर निगाहों से घूर रही थी मुझे तभी एक हल्की-सी गूँज ने दी दस्तक़ मेरे कानों में जो कह रही थी Continue reading रे दर्पण तू झूठ न बोले

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार! मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार, झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर, किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार! हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार! जटिल बड़ी है यह पहेली,नहीं किसी की ये सहेली! झुंझलाहट होती दिशाहीन मन की गति पर, ठिठककर दबे पाँवों फिर देखता, समय का विस्तार! हूँ मैं इक लघुकण, क्या पाऊँगा अभिसार? निर्झर है यह समय, कर पाऊँगा मैं केसे अधिकार? अकुलाहट होती संहारी समय की नियति पर, निःशब्द स्थिरभाव  फिर देखता, समय का विस्तार! रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा Continue reading किंकर्तव्यविमूढ

भादो की उमस

दुरूह सा क्युँ हुआ है ये मौसम की कसक? सिर्फ नेह ही तो ….. बरसाए थे उमरते गगन ने! स्नेह के…. अनुकूल थे कितने ही ये मौसम! क्युँ तंज कसने लगी है अब ये उमस? दुरूह सा क्युँ हुआ…. ये बदली का असह्य मौसम? प्रतिकूल क्युँ है… ये भादो की चिलमिलाती सी कसक? कहीं तंज कस रहे… ये प्रतिकूल से होते ये मौसम! कही बाढ की भीषण विभीषिका! कई चीखें …. कही हो चली है इनमें दफन! क्युँ भर चली है…. इस मौसम में ये अगन सी तमस? क्युँ व्यंग भर रहे… ये भादो की चिपचिपाती सी उमस? कई साँसें Continue reading भादो की उमस

नवव्याहिता

रिवाजों में घिरी, नव व्याहिता की बेसब्र सी वो घड़ी! उत्सुकता भड़ी, चहलकदमी करती बेसब्र सी वो परी! नव ड्योड़ी पर, उत्सुक सा वो हृदय! मानो ढूंढ़ती हो आँखें, जीवन का कोई आशय! प्रश्न कई अनुत्तरित, मन में कितने ही संशय! थोड़ी सी घबड़ाहट, थोड़ा सा भय! दुविधा भड़ी, नजरों से कुछ टटोलती बेसब्र सी वो परी! कैसी है ये दीवारें, है कैसा यह निलय? कैसे जीत पाऊँगी, यहाँ इन अंजानों के हृदय? अंजानी सी ये नगरी, जहाँ पाना है प्रश्रय! क्या बींध पाऊँगी, मैं साजन का हिय? दहलीज खड़ी,  मन ही मन सोचती बेसब्र सी वो परी! छूटे स्नेह Continue reading नवव्याहिता

स्वमुल्यांकण

सब कुछ तो है यहाँ, मेरा नहीं कुछ भी मगर! ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर, बंद थी हथेलियों में कई चाहतें मगर! घुटन भरे इस माहौल में ऊँगलियां खुलती गईं, मरती गईं चाहतें, कुंठाएं जन्म लेती रहीं! यहाँ पलते रहे हम इक बिखरते समाज में? कुलीन संस्कारों के घोर अभाव में, मद, लोभ, काम, द्वेष, तृष्णा के फैलाव में, मुल्य खोते रहे हम, स्वमुल्यांकण के अभाव में! जाना है वापस हमें ऊँगलियों को खोलकर, संस्कारों की बस इक छाप छोड़कर, ये हथेलियाँ मेरी बस यूँ खुली रह जाएंगी, कहता हूँ मैं मेरा जिसे, वो भी न साथ Continue reading स्वमुल्यांकण

त्यजित

त्यजित त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन में।  क्षितिज की रक्तिम लावण्य में, निश्छल स्नेह लिए मन में, दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में, हर क्षण जला हूँ मैं अगन में… ज्युँ छाँव की चाह में, भटकता हो चातक सघन वन में। छलता रहा हूँ मैं सदा, प्रणय के इस चंचल मधुमास में, जलता रहा मैं सदा, जेठ की धूप के उच्छवास में, भ्रमित होकर विश्वास में, भटकता रहा मैं सघन घन में। स्मृतियों से तेरी हो त्यजित, अपनी अमिट स्मृतियों से हो व्यथित, तुम्हे भूलने का अधिकार दे, प्रज्वलित हर पल मैं इस अगन में, त्यजित हूँ Continue reading त्यजित

किन्नर

किन्नर वहीं चेहरा वहीं चाल-ढाल, वहीं रंग-रूप वहीं वाणी में राग। इंसान ही है हम दिखते भी इंसान, फिर क्यों हमारे संग ये परायेपन का स्वांग? ना समाज बेटी मानता हमे, ना ईश्वर ने माँ बनने का हक़ दिया। नर-नारी की इस दुनिया ने, हमेशा इस किन्नर का तिरस्कार किया।। दुआओं से मेरी उनके घर सजते है, उन घरो में खुशियो के रंग भरते है। बस उन घरो से थोडा अपनापन ही तो माँगा है हमने, क्यों हम अपनी ही पहचान को तरसते है? ना पत्नी होने का अधिकार मिला, ना किसी से सास-ससुर का प्यार मिला। नर-नारी की इस Continue reading किन्नर