हम कहा जा रहे है

हम कहा जा रहे है 364 दिन महिलाओं पर ज़ुल्म करने वाले लोग आज 1 दिन फेसबुक व्हाट्सएप्प पर चिल्ला चिल्ला कर  महिला दिवस मना रहे है, ना जाने हम क़हा जा रहे है, बेटियो को मार रहे कोख में और बेटो के पैदा होने पर जश्न मना रहे है, ना जाने हम कहा जा रहे है, जहा एक तरफ साक्षी, सिंधु, साइना, सानिया की जीत का जश्न मना रहे है, पर अपनी बहू – बेटी के घर से बाहर निकलने में भी ऐतराज़ जता रहे है, ना जाने हम कहा जा रहे है, अपनी बहन को कोई आँख उठा Continue reading हम कहा जा रहे है

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मौन से अधर

मौन से अधर काश! उनसे कुछ कह भी देते ये मेरे मौन से अधर! बस अपलक देखता ही रह गया था ये नजर, मन कहीं दूर बह चला था पराया सा होकर, काँपते से ये अधर बस रह गए यूँ हीं थिरक कर, अधरों से फूट सके ना, कँपकपाते से ये स्वर! काश! मौन अधरों की मेरी ये भाषा तुम पढ लेते! काश! मेरी अभिलाषा व्यक्त करते मेरे मौन से अधर! फूट पड़े थे मन में प्रेम के मेरे बेस्वर से गीत, हृदय की धुन संग मन गा रहा था प्रेम का गीत, पर वाणी विहीन होकर रह गई मेरी Continue reading मौन से अधर

अपने-अपने द्वीप

अपने-अपने द्वीप सभी के पास है अपने-अपने द्वीप हर किसी के लिए थोड़ा सा प्यार जी भर की नफरतें भूत की अधभूली यादें समेटे मन-मस्तिष्क में गहरी रेखाएं खीँच अजीब सी आकृति उकेरते सच-झूठ को तोड़ते मरोड़ते जिन्दा है संबंधो की बखिया उधेड़ते कोसते और लतारते रह जाते हैं भीड़ में अकेले कभी-किसी से मिलते भी तो उबाल खाते, भड़ास निकालते कुढ़ते और धिक्कारते दर्द की ज्वालामुखी में तपते दुःस्वप्नो से पीछा छुड़ाने वर्तमान की नाव में सवार चल पड़ते है तरो ताज़ा होकर हर बार पहुँच जाते अपने-अपने द्वीप में —–

अन्तर्द्वन्द

अन्तर्द्वन्द दिल की धकधक और मन की फकफक, अन्तःद्वन्द घनघोर दोनों में नित झकझक। दिल केंन्द्र भावना विवेचना का, महसूस कर लेता स्पंदन हृदय का, विह्वल हो प्यार में धड़कता पागल सा, एकाकीपन के पल बेचैन हो उठता, धड़क उठता मंद आहटों से भी धकधक। मन कहता, दिल तू मत हो विह्वल, विवेचना भावनाओं की तू मत कर, राह पकड़ नित नई लगन की, उड़ान ऊँची धर, मत एकाकीपन की सोच, आहटों की मत सुन, अपनी लय मे तू धड़क। दिल कहता, मन तू तो है स्वार्थी, बेचैन रहता है तू भी अपनी चाह के पीछे, टूटता है तब तू Continue reading अन्तर्द्वन्द

आ जाऊंगा मैं

आ जाऊंगा मैं इक अक्श हूँ, ख्यालों में ढल जाऊँगा मैं, सोचोगे जब भी तुम, सामने नजरों के आ जाऊँगा मैं… जब दरारें तन्हा लम्हों में आ जाए, वक्त के कंटक समय की सेज पर बिछ जाएँ, दुर्गम सी हो जाएँ जब मंजिल की राहें, तुम आहें मत भरना, याद मुझे फिर कर लेना, दरारें उन लम्हों के भरने को आ जाऊँगा मैं…… इक अक्श हूँ, ख्यालों में ढल जाऊँगा मैं, सोचोगे जब भी तुम, सामने नजरों के आ जाऊँगा मैं… जब लगने लगे मरघट सी ये तन्हाई, एकाकीपन जीवन में जब लेती हो अंगड़ाई, कटते ना हों जब मुश्किल Continue reading आ जाऊंगा मैं

खामोशियों के छंद

खामोशियों के छंद स्तब्ध निशान्त सा है ये आकाश, स्निग्ध खामोश सी है ये समुन्दर की लहरें, गुमसुम सी मंद बह रही ये हवाएँ, न जाने चाह कौन सी मन में दबाए, तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो…. कहना ये मुझसे चाहती हैं क्या, निःस्तब्ध सी ये मन में सोचती है क्या, खोई है कहाँ इनकी गतिशीलता, यहाँ पहले न थी कभी इतनी खामोशियाँ, तुम ही कुछ बोल दो, कोई छंद खामोशियों को दो…. शायद बात कोई इनके मन में है दबी, या ठेस मुझसे ही इसकी मन को है लगी, चुपचाप अब वो क्युँ रहने Continue reading खामोशियों के छंद

अंजान सी रात

अंजान सी रात जरा सा चूमकर, उनींदी सी पलकों को, कुछ देर तक, ठहर गई थी वो रात, कह न सका था कुछ अपनी, गैरों से हुए हालात, ठिठक कर हौले से कदम लिए फिर, लाचार सी, गुजरती रही वो रात रुक-रुककर। अंजान थी वो, उनींदी स्वप्निल सी आँखें,, मूँदी रही वो पलकें, ख्वाबों में डूबकर, न तनिक भी थी उसको, बिलखते रात की खबर, गुजरती रही वो रात, बस सिसक कर, मजबूर सी, उनींदी उन पलकों को छू-छूकर। सुनता कौन उसकी? रात ही तो था वो! ख्वाब भरने वो चला था, उनींदी आँखों में सबके, कितने ही पलकों में, Continue reading अंजान सी रात

टहनी

टहनी अनुराग के मंजर टहनी पर, खिल आई थी फिर खुश्बू लेकर, मिला हो जैसे उस टहनी को, किसी कठिन तपस्या का प्रतिफल। घनीभूत हुई थी रूखे तन पर, उमरते आशाओं के बादल, फूट पड़े थे जैसे इच्छाओं के स्वर, अन्त: तक भीगा मन का मरुस्थल। झूम उठी वो टहनी मंजराकर, महक उठी थी फिजाएँ, उसकी भीनी सी खुश्बू लेकर, स्वागत मे उसने फैलाए थे आँचल। रूप श्रृंगार यौवन का लेकर, हरित हुई थी वो टहनी, सृष्टि मुस्काई मुखरित होकर, मंजर मंजर खिल आए थे मधुफल। क्षण आकर्षण के बिखेरकर, मुरझाई अब वो टहनी, अगाध अनुराग के खुश्बू देकर, प्रतिफल Continue reading टहनी

तीन तलाक

तीन तलाक ………………………………………………….. मेरे इस्कूल जाते वक्त तीन तीन घंटे, तेरा मेरे दिदार का तकल्लुफ दिखते ही मेरे, तेरे चेहरे पर रंगत आ जाना मेरे बुर्कानशीं होकर आने पर वो तेरी मुस्कान का बेवा हो जाना मेरे इस्कूल ना जाने कि सूरते हाल में तेरा गली में साइकिल की घंटियां बजाना सुनकर खो गई थी मैं, और तेरी जुस्तजू में दे दिया था मैंने मेरे अपनों की यादों को तलाक कबूल है, कबूल है, कबूल है…… वो जादुई तीन शब्द और तेरा करके मूझे घूंघट से बेपर्दा, करना मुझसे पलकें उठाने की गुजारिश वो मुखङा दिखाने की आरजू-ओ-मिन्नत लेटकर मेरी Continue reading तीन तलाक

सीलन भरी सुबह

सीलन भरी सुबह गंदी सी बिन नहायी, ठंड से ठिठुरती फटे चिथङों में लिपटी कोने में दुबकी बैठी थी वो लड़की…… दो तीन बार कि थी उसने कोशिश अपनी गोद में छुपाये कंकालित अर्धनग्न बिमार भाई की खातिर जाने को सड़क किनारे जलते अलाव के पास लेकिन वहां जाकर भी बारबार लौट आती थी वो उसी हिमधुसरित सीलन भरे ठंडे कौने में क्योंकि उसकी बर्दाश्त के बाहर थी वहां आग तापते लोगों कि आंखों के गर्म नाखूनों की चुभन….. ।। गोलू…… मेरा प्यारा गोलू….. इसी नाम से पुकारती थी वो अपने भाई को जो इस वक्त तप रहा था शीतकालीन Continue reading सीलन भरी सुबह

मुक्तक

पूर्वानुमान सब धुंवा हो गये, हो गयी गणितें सारी बेकार, देखो भईया प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, बड़ा अनोखा हाल चहुं ओर पानी ही पानी, कृपा बरस रही इंद्र की या फ़िर है ये मनमानी l

धूप

धूप बाहर बिखरी है सुनहरी धूप खूब भर -भर के लेकिन , अन्दर कमरे में लगभग नाप -तौल के , सिर्फ खिड़की की लम्बाई और चौड़ाई भर , बंध गयी है वह भी एक निश्चित आकार में। फर्श पर उभरती है ठीक वैसी ही आकृति ढाली गयी है जैसी लोहे की सलाखों में। मिलती है रौशनी उतनी ही लेना चाहते हम जितनी ही अलग -अलग खांचे सबके और अलग आकार हैं। @चंद्रलेखा

कविता पर विरोधाभास

कविता पर विरोधाभास दोपदिया की कविता पर आये विचार से बहुत हद तक सहमत हूं। परन्तु तुलनात्मक स्थिति में विरोधाभास यह है:- कविता महज आँसू नहीं है मन की अभिव्यक्ति, पीड़ा, दर्शन, खुशीयां, जिसे चाहिए सहानूभूति परन्तु शिष्टता की सीमा लाघंकर नंगापन दिखायें और इसे शालीनता या अशालीनता की जंग समझाये जो कभी नहीं रोये…. उतारे जाते जान्घियों पर फाड़े जाते पेटीकोटों पर और मूंछों के नाम गाढ़े जाते जातीय झंडों पर जांघों के बीच वह क्या फिर जानवर हो जाये जानवरों के वंशज इसलिये की भूल गए हैं शायद ये कि कपड़ों के नीचे हर कोई नंगा होता है Continue reading कविता पर विरोधाभास

तलाश

उन्वान– तलाश रख हौसला मन में मंज़िल की तलाश रख प्यास अगर लगी है जल की तलाश रख थक हार के नहीं रुकना ऐ मुसाफिर हर पल कामयाबी के पल की तलाश रख परिंदो को भी मिले मंज़िल उड़ने पर बिश्वासी हो आत्मबल की तलाश रख रहे खामोश अक्सर जिन में नहीं हुनर बेहतरीन हो ऐसे कल की तलाश रख टूट जाए हर शीशा पत्थर कि चोट पर तोड़े पत्थर को उस बल की तलाश रख ज़िन्दगी हसीन है उसी से प्यार कर सुदंर हो जीवन उस पल की तलाश रख सजन

सरसती माई

सरसती माई माओ, मार्क्स व लेनिन की जबान अम्बेडकर का संविधान गांधी का भारत महान सरसती माई का अनुदान भूखे- नंगो की यातना का मसान बिसमताऔं का खुला ब्याखान आजाद अभिव्यक्ति की दुकान सरसती माई का अनुदान एक तरफ़ा फ़रमान विचारों का युद्ध घमाशन वंचित और वंचना का निदान सरसती माई का अनुदान ज़हर घोलता अभिमान विभेद का अंतर्घाती प्रमाण आतंकवाद का अभियान सरसती माई का अनुदान बोलो क्या पहले नहीं थी जबान गूँगे से सब कुछ क्यों लिया मान पतित- दलित का उत्थान सरसती माई का अनुदान ज्ञान पाया हमने सहकर अपमान नव जागरण का अभियान जगया पीड़ित स्वभिमान Continue reading सरसती माई