बहुत याद आते हो

कभी अकेली अँधेरी रातों में जब सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई साथ होते हैं, तब तुम बहुत याद आते हो.. तुम , मेरे गाँव की सड़कें मेरे गाँव की धूप मेरे गाँव की अल्हड़ मस्ती मेरे गाँव का नुक्कड़  बहुत याद आते हो..   कुछ पल के लिए ही सही आज फिर लौट चलने का मन करता है फिर उन्हीं वादियों में घूमने का जी करता है जहाँ छोड़ आए हैं अपना सबकुछ सबकुछ,  सबकुछ,  सबकुछ मस्ती में,  हवाबाजी में बहुत कुछ बहुत कुछ    जहाँ कुछ ही दोस्त जीवन थे जहाँ कुछ ही सड़कें रोज़ की हमराह थी जहाँ एक ही खिड़की Continue reading बहुत याद आते हो

मेरा गाँव

कभी अकेली अँधेरी रातों में जब सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई साथ होते हैं, तब तुम बहुत याद आते हो.. तुम , मेरे गाँव की सड़कें मेरे गाँव की धूप मेरे गाँव की अल्हड़ मस्ती मेरे गाँव का नुक्कड़  बहुत याद आते हो.. कुछ पल के लिए ही सही आज फिर लौट चलने का मन करता है फिर उन्हीं वादियों में घूमने का जी करता है जहाँ छोड़ आए हैं अपना सबकुछ सबकुछ,  सबकुछ,  सबकुछ मस्ती में,  हवाबाजी में बहुत कुछ बहुत कुछ  जहाँ कुछ ही दोस्त जीवन थे जहाँ कुछ ही सड़कें रोज़ की हमराह थी जहाँ एक ही खिड़की की तलाश Continue reading मेरा गाँव

दोहे

राजस्थानी दोहे चौमासो बरसो घणो, साजण याद सताय। एक पल भी जुग लागे,बरसे रिमझिम हाय।। काळी काळी बादली,आसमान पर छाय। घर घर करती हे घटा, तू धरती पर आय।। होरी खेल रही सखी,रंग मलमल लगाय। फागण में भींगे घणी, मनड़ो भी हरसाय।। बिजुरी चमके बावरी, हिवड़ो भी शरमाय। बादल बरसे जोर सूं, पिया मिलन की आय।। टाबर सगळा देख के,जीव में जीव आय। खेलण में बिसरा न दे, हिवड़ा बैठे छाय।। महँगाई ने कर दी, देखो नींद खराब। सुरसा सी बढ़ती जाय, चले सियासी दाव।। करसान बैठ रो रिया, देख राजनीत को खेल। योजना कागज़ में छे,बढतो जावे मेल।। कवि Continue reading दोहे

अभी तो पहला ज़ाम है (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

   इक नयी नवेली दुल्हन ने दुलारे पति को फोन किया प्यारे जानू घर कब आओगे मुझे इतनी जल्दी भुला दिया पलट कर बेचारा पति बोला प्यारी बस लेता हूँ तेरा नाम बेसब्री झेल लो कुछ पल और यहाँ लगा है जाम पर जाम झल्ला कर पत्नी चिल्लाई घर कब तक पहुंचोगे कब ख़त्म होगा ये जाम क्या यहीं पर जमे रहोगे होकर मदहोश पति बोला प्रिये क्या नशीली शाम है तनिक धैर्य धरो गजगामिनी अभी तो बस पहला जाम है (किशन नेगी ‘एकांत’ )

चले दूल्हे राजा (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

अपनी ख़्वाबों की रानी को पत्नी बनाने चले दूल्हे राजा असुरों की बारात संग लिए संग में है बेसुरा बैंड-बाजा लेकिन पता चला जब उसको दहेज़ में ससुर देता है बाइक लौटा दी बारात उसने क्योंकि पेट्रोल के दाम हो गए हाइक ख़बर ये सुन, वरमाला पकड़े दुल्हन पड़ी थी कोने में बेहोश कोस रही थी निष्ठुर पेट्रोल को क्या आज ही होना था मदहोश (किशन नेगी ‘एकांत’ )

रिश्ता कच्चे धागों का

रिश्ता कच्चे धागों का बाँध दिया रक्षा सूत्र भैया सुनी नहीं है कलाई आज बहना को जो दिया वचन भैया रखना उसकी लाज मेरे भैया पर मुझे है नाज़ दो ताली बजाओ साज झूमो, नाचो, गाओ आज फिर करेंगे मिलकर काज भैया करता रहे मेरा राज देती हूँ दुआ दिल से आज निर्भय हो करता रहे काज जय हो भैया कहे समाज कवि राजेश पुरोहित

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

मेने वक़्त बदलते देखा है !!

मेने वक़्त बदलते देखा है ! मेने तूफानों को साहिलो पर ठहरते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने दिन के उजालो को, रात के अँधेरे में बदलते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने हर दिल अजीज़ लोगो को भी, एक पलभर में बिछड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. चंद रुपयों के लालच में, अपनों को अपनों से झगड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखे है.. एक सत्ता की कुर्सी के आगे, अच्छे अच्छों का ईमान सड़क पर बिकते हुए देखा Continue reading मेने वक़्त बदलते देखा है !!

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो तुम शब्दों में अर्थ जगाकर संस्कार जगा दो।   शब्दों की झंकार तुम्हीं हो प्राणों की हुँकार तुम्हीं हो श्रद्धा का विस्तार तुम्हीं हो करुणा की पुकार तुम्हीं हो।   झंकृत कर मधुर स्वर तुम अपनी वीणा के मेरे भी गीतों में श्रद्धा की गूँज निखार दो।   खगवृन्दों के स्वर गुंजन की किलकारी गीतों में भर दो ले भ्रमरों से यौवन उन्माद शब्द पुष्प में कुछ रस भर दो।   चेतनता की प्रखर प्रभा से आलौकित करने कवि के मृदु हृदय में शक्ति का संचार करा दो।   मस्त पवन के Continue reading मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

कविता

अग्नि परीक्षा कल्पना चावला सी बेटियाँ अंतरिक्ष मे सफर करती है इंदिरा सी होती है बेटियाँ राजनीति में नाम करती है पी टी उषा बन दौड़ लगाती देश का नाम रोशन करती है निवेदिता बन सेवा करती सबको शिक्षा से जोड़ती है मदर टेरेसा बन सेवा करती सबको निरोग बनाती है गार्गी जैसी विदुषी बनती शास्त्र ज्ञान में अव्वल आती सीता सी पतिव्रता बन ये पल पल अग्नि परीक्षा देती मीरां सी भक्ति में खो जाती कृष्ण नाम का सुमिरण करती वसुंधरा बन गौरव बढ़ाती प्रतिभा बन उच्च पद पाती मीरा कुमार,मायावती ममता जैसी राजनैतिक पद पाती फाइटर प्लेन उड़ाने Continue reading कविता

कान्हा संग खेलू आज होली (होली विशेषांक)

आयी बृज में रंगबिरंगी होली रे केसरिया रंग रंगी मोरी चोली रे गुलाल उड़ावे कान्हा की टोली रे आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल हाथ जोड़ पडूँ तोरी पावन पैंया चल हट छोड़ मोरी नाजुक बैंया मोहे रंग दे आज मोरे भोले सैंया आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल कान्हा अब तो दिखा दे झलक तुझ बिन कैसे झपकाऊँ पलक अल्हड यौवन मोरा जाये छलक  आज धरती अंबर सब भयो है लाल आज पवन भी उड़ाए अबीर गुलाल मादक फागुन भी होरी रंग में चहके फ़ाग गावत Continue reading कान्हा संग खेलू आज होली (होली विशेषांक)

होली खुशियों की झोली

आयी बसंत की होली मीठी लगती है बोली रंग सराबोर है वन मे लाल सुनहरी पीली फाग का रंग चढा है सब निकल पडी है टोली प्रिय प्रियतम को रंग डाले सब भीज गयी है चोली फागुन के गीत सुनाए मीठी लगती है बोली कोई गुझिया पूडी खाये कोई भंग सो रंग जमाए कोई पकड के रंग लगाए कोई करता हंसी ठिठोली अबीर गुलाल लगे है सुन्दर लगती है टोली। ढोल के थाप लगे है सब रंग खेले हमजोली। भूल गये सब शिकवे खुशियां लाती है होली। रंग उडे नभ तक है उड रही अबीर और रोली। होली की शुभकामनाएं Continue reading होली खुशियों की झोली

गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से

सजी महफ़िल ख़्वाबों की, चांदनी रात के आँचल तले। इसी आँचल ने पाला इनको, इसकी छाँव में ही पले। संगीत की मादकता में, उधर ख्वाब थिरक रहे थे। आबशार बनकर बा-दस्तूर, इधर पैमाने छलक रहे थे। ख़ामोशी थी चिर निद्रा में, मदहोशी का था आलम। कोई किसी की प्रियतमा, कोई किसी का था बालम। थिरक रहा था मैं भी, पकड़ कर हाथ में प्याला। ख़्वाबों में भी ना देखी, ऐसी उन्मत्त मधुशाला। पूछा मैंने एक ख्वाब से, क्या देखा है कभी ख्वाब? मुस्कुराकर उसने दिया, मेरे कौतुक प्रश्न का ज़वाब। देखते नहीं हम ख्वाब कभी, ख्वाब दिखाते हैं इंसानों को। Continue reading गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से

गिरने का जमाना है आया।

गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । समझता था ऊपर चढे वो है गिरते मगर जो है नीचे वही गिर रहे हैं । क्या बात है सच का साथी रहा जो वही घिर रहा है सही घिर रहा है । गिराने की ख्वाहिश रही दिल में जिसके मुझे तो गिराने में खुद गिर रहे है । गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । कहीं पर चढ़ा भाव आलू के देखो कहीं प्याज उछली नभ छू रही है । मगर यह भी देखा भाव भारी Continue reading गिरने का जमाना है आया।

चाँद सितारों से रात सजा रखी है

चाँद सितारों से रात सजा रखी है चाँद सितारों से रात सजा रखी है जमीं पे मखमली दूब सजा रखी है। बता, ये दुनिया क्यूँकर सजा रखी है वो बोला, तेरे लिये सजा रखी है। … भूपेन्द्र कुमार दवे