सपनों की महक

 सपनों की महक फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है सपनों की महक कभी दबती नहीं है।   नींद करवटें चाहे बदला करे अचेतन हो नयन भी सोया करे। स्वच्छ चंचल चाँदनी-सी रात में मायूस मन भी भ्रमण करता रहे।   महक सपनों की कभी मिटती नहीं है। फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है सपनों की महक कभी दबती नहीं है।   अश्रू चाहे जितना श्रंगार कर ले घूँघट पलक के हटा रोया करे। या धधकता हृदय अंगार बनकर राख का कफन ओढ़े सिसका करे।   पर स्वप्न-जागी आस मिटती नहीं है। फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है Continue reading सपनों की महक

बेखबर

काश! मिल पाता मुझे मेरी ही तमन्नाओं का शहर! चल पड़े थे कदम उन हसरतों के डगर, बस फासले थे जहाँ, न थी मंजिल की खबर, गुम अंधेरों में कहीं, था वो चाहतों का सफर, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! बरबस खींचती रहीं जिन्दगी मुझे कहीं, हाथ बस दो पल मिले, दिल कभी मिले नहीं, शख्स कई मिले, पर वो बंदगी मिली नही, बस ढूंढता ही रहा, मैं मेरी तमन्नाओं का शहर! साहिल था सामने, बस पावों में थे भँवर, बहती हुई इस धार में, बहते रहे हम बेखबर, बांध टूटते रहे, टूटता रहा मेरा सबर, Continue reading बेखबर

नेपथ्य

मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। जब मौन हो ये मंच, तो बोलता है नेपथ्य, यूँ टूटती है खामोशी, ज्यूँ खुल रहा हो रहस्य, गूँजती है इक आवाज, हुंकारता है सत्य, मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। पार क्षितिज के कहीं, प्रबल हो रहा नेपथ्य, नजर के सामने नहीं, पर यहीं खड़ा है नेपथ्य, गर्जनाओं के संग, वर्जनाओं में रहा नेपथ्य, क्षितिज के मौन से, आतुर है कहने को अकथ्य। जब सत्य हो पराश्त, असत्य की हो विजय, चूर हो जब आकांक्षाएँ, सत्यकर्म की हो पराजय, लड़ने को असत्य से, पुनः आएगा Continue reading नेपथ्य

शरद हंसिनी

नील नभ पर वियावान में, है भटक रही….. क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी? व्योम के वियावान में, स्वप्नसुंदरी सी शरद हंसिनी, संसृति के कण-कण में, दे रही इक मृदु स्पंदन, हैं चुप से ये हृदय, साँसों में संसृति के स्तब्ध समीरण, फिर क्युँ है वो निःस्तब्ध सी, ये कैसा है एकाकीपन! यह जानता हूँ मैं… क्षणिक तुम्हारा है यह स्वप्न स्नेह, बिसारोगे फिर तुम निभाना नेह, टिमटिमाते से रह जाएंगे, नभ पर बस ये असंख्य तारे, एकाकी से गगन झांकते रह जाएंगे हम बेचारे! व्योम के वियावान में, शायद इसीलिए…! भटक रही एकाकी सी वो शरद हंसिनी!

दुर्गे निशुम्भशुम्भहननी

अग्निज्वाला अनन्त अनन्ता अनेकवर्णा, पाटला, अनेकशस्त्रहस्ता अनेकास्त्रधारिणी अपर्णा,अप्रौढा, अभव्या अमेय अहंकारा एककन्या आद्य आर्या, इंद्री करली पाटलावती मन ज्ञाना कलामंजीरारंजिनी । कात्यायनी कालरात्रि यति कैशोरी कौमारी क्रिया, कुमारी घोररूपा चण्डघण्टा चण्डमुण्ड विनाशिनि , क्रुरा  चामुण्डा  चिता  चिति चित्तरूपा चित्रा चिन्ता, बहुलप्रेमा प्रत्यक्षा जया जलोदरी ज्ञाना तपस्विनी। त्रिनेत्र दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी दुर्गा देवमाता, बुद्धि नारायणी निशुम्भशुम्भहननी पट्टाम्बरपरीधाना पुरुषाकृति प्रत्यक्षा प्रौढा बलप्रदा बहुलप्रेमा बहुला नित्या परमेश्वरी पाटला पाटलावती पिनाकधारिणी । बुद्धि बुद्धिदा ब्रह्मवादिनी ब्राह्मी भद्रकाली लक्ष्मी, भाव्या मधुकैटभहंत्री महाबला महिषासुरमर्दिनि, महातपा महोदरी मातंगमुनिपूजिता मातंगी माहेश्वरी, मुक्तकेशी यति रत्नप्रिया रौद्रमुखी बहुला वाराही, युवती विष्णुमाया वनदुर्गा विक्रमा विमिलौत्त्कार्शिनी। वृद्धमाता वैष्णवी शाम्भवी शिवप्रिया शिबहुला, शूलधारिणी सती Continue reading दुर्गे निशुम्भशुम्भहननी

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार! मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार, झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर, किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार! हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार! जटिल बड़ी है यह पहेली,नहीं किसी की ये सहेली! झुंझलाहट होती दिशाहीन मन की गति पर, ठिठककर दबे पाँवों फिर देखता, समय का विस्तार! हूँ मैं इक लघुकण, क्या पाऊँगा अभिसार? निर्झर है यह समय, कर पाऊँगा मैं केसे अधिकार? अकुलाहट होती संहारी समय की नियति पर, निःशब्द स्थिरभाव  फिर देखता, समय का विस्तार! रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा Continue reading किंकर्तव्यविमूढ

सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई, नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई! कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल, ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल, झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल, डाली पे झूलते हुए ये नव दल, मगर, अब ये सारे न जाने क्यूँ इतने गए हैं बदल? उड़ते है हर तरफ ये बन के यादों के सैकत! ज्यूँ वो पल, यहीं कहीं रहा हो ढल! मुरझाते हों जैसे झील में कमल, सूखते हो डाल पे वो कोमल से दल, हृदय कह रहा धड़क, चल आ तू Continue reading सैकत

भावस्निग्ध

कंपकपाया सा क्युँ है ये, भावस्निग्ध सा मेरा मन? मन की ये उर्वर जमीं, थोड़ी रिक्त है कहीं न कहीं! सीचता हूँ मैं इसे, आँखों में भरकर नमीं, फिर चुभोता हूँ इनमें मैं, बीज भावों के कई, कि कभी तो लहलहाएगी, रिक्त सी मन की ये जमीं! पलकों में यूँ नीर भरकर, सोचते है मेरे ये नयन? रिक्त क्युँ है ये जमीं, जब सिक्त है ये कहीं न कहीं? भिगोते हैं जब इसे, भावों की भीगी नमी, इस हृदय के ताल में, भँवर लिए आते हैं ये कई, गीत स्नेह के अब गाएगी,  रिक्त सी मन की ये जमीं! भावों Continue reading भावस्निग्ध

भादो की उमस

दुरूह सा क्युँ हुआ है ये मौसम की कसक? सिर्फ नेह ही तो ….. बरसाए थे उमरते गगन ने! स्नेह के…. अनुकूल थे कितने ही ये मौसम! क्युँ तंज कसने लगी है अब ये उमस? दुरूह सा क्युँ हुआ…. ये बदली का असह्य मौसम? प्रतिकूल क्युँ है… ये भादो की चिलमिलाती सी कसक? कहीं तंज कस रहे… ये प्रतिकूल से होते ये मौसम! कही बाढ की भीषण विभीषिका! कई चीखें …. कही हो चली है इनमें दफन! क्युँ भर चली है…. इस मौसम में ये अगन सी तमस? क्युँ व्यंग भर रहे… ये भादो की चिपचिपाती सी उमस? कई साँसें Continue reading भादो की उमस

कलपता सागर

हैं सब, बस उफनती सी उन लहरों के दीवाने, पर, कलपते सागर के हृदय की व्यथा शायद कोई ना जाने! पल-पल विलखती है वो … सर पटक-पटक कर तट पर, शायद कहती है वो…. अपने मन की पीड़ा बार-बार रो रो कर, लहर नहीं है ये…. है ये अनवरत बहते आँसू के सैलाब, विवश सा है ये है फिर किन अनुबंधों में बंधकर…. कोई पीड़ दबी है शायद इसकी मन के अन्दर, शांत गंभीर सा ये दिखता है फिर क्युँ, मन उसका ही जाने? बोझ हो चुके संबंधों के अनुबंध है ये शायद! धोए कितने ही कलेश इसने, सारा का Continue reading कलपता सागर

नवव्याहिता

रिवाजों में घिरी, नव व्याहिता की बेसब्र सी वो घड़ी! उत्सुकता भड़ी, चहलकदमी करती बेसब्र सी वो परी! नव ड्योड़ी पर, उत्सुक सा वो हृदय! मानो ढूंढ़ती हो आँखें, जीवन का कोई आशय! प्रश्न कई अनुत्तरित, मन में कितने ही संशय! थोड़ी सी घबड़ाहट, थोड़ा सा भय! दुविधा भड़ी, नजरों से कुछ टटोलती बेसब्र सी वो परी! कैसी है ये दीवारें, है कैसा यह निलय? कैसे जीत पाऊँगी, यहाँ इन अंजानों के हृदय? अंजानी सी ये नगरी, जहाँ पाना है प्रश्रय! क्या बींध पाऊँगी, मैं साजन का हिय? दहलीज खड़ी,  मन ही मन सोचती बेसब्र सी वो परी! छूटे स्नेह Continue reading नवव्याहिता

स्वमुल्यांकण

सब कुछ तो है यहाँ, मेरा नहीं कुछ भी मगर! ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर, बंद थी हथेलियों में कई चाहतें मगर! घुटन भरे इस माहौल में ऊँगलियां खुलती गईं, मरती गईं चाहतें, कुंठाएं जन्म लेती रहीं! यहाँ पलते रहे हम इक बिखरते समाज में? कुलीन संस्कारों के घोर अभाव में, मद, लोभ, काम, द्वेष, तृष्णा के फैलाव में, मुल्य खोते रहे हम, स्वमुल्यांकण के अभाव में! जाना है वापस हमें ऊँगलियों को खोलकर, संस्कारों की बस इक छाप छोड़कर, ये हथेलियाँ मेरी बस यूँ खुली रह जाएंगी, कहता हूँ मैं मेरा जिसे, वो भी न साथ Continue reading स्वमुल्यांकण

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

श्वेताक्षर

श्वेताक्षर यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर, तप्त शिलाओं के मध्य, सूखी सी बंजर जमीन पर, आशाओं के सपने मन में संजोए, धीरे-धीरे पनप रहा, कोमल सा इक श्वेत तृण………… क्या सपने बुन रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वो श्वेत तृण, इक्षाओं से परिपूर्ण, जैसे हो दृढसंकल्प किए, जड़ों में प्राण का आवेग लिए, मन में भीष्म प्रण किए, अवगुंठन मन में लिए, निश्छल लहराता वो श्वेत तृण………….. क्या तप कर रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वियावान सी उजड़ी मन की पहाड़ी पर, इक क्षण को हो जैसे Continue reading श्वेताक्षर

अकथ्य प्रेम तुम

अकथ्य प्रेम तुम अकथ्य ही रहे तुम इस मूक़ प्रेमी हृदय की जिज्ञासा में! ओ मेरी हृदय के अकथ्य चिर प्रेम-अभिलाषा, चिर प्यास तुम मेरे हृदय की, उन अभिलाषित बुंदों की सदा हो तुम ही, रहे अकथ्य से तुम मुझ में ही कहीं, हृदय अभिलाषी किंचित ये मूक सदा ही! ओ मेरी हृदय के अप्रकट प्रेमी हम-सानिध्या, चिर प्रेमी तुम मेरे हृदय की, हम-सानिध्य रहे सदा तुम यादों में मेरी, अप्रकट सी कहीं तुम मुझ में ही, हृदय आकुल किचिंत ये मूक़ सदा ही! ओ मेरी हृदय के अकथ्य चिर-प्यासी उत्कंठा, चिर उत्कंठा तुम मेरे हृदय की, प्यासी उत्कंठाओं की सरिता Continue reading अकथ्य प्रेम तुम