अकथ्य प्रेम तुम

अकथ्य प्रेम तुम अकथ्य ही रहे तुम इस मूक़ प्रेमी हृदय की जिज्ञासा में! ओ मेरी हृदय के अकथ्य चिर प्रेम-अभिलाषा, चिर प्यास तुम मेरे हृदय की, उन अभिलाषित बुंदों की सदा हो तुम ही, रहे अकथ्य से तुम मुझ में ही कहीं, हृदय अभिलाषी किंचित ये मूक सदा ही! ओ मेरी हृदय के अप्रकट प्रेमी हम-सानिध्या, चिर प्रेमी तुम मेरे हृदय की, हम-सानिध्य रहे सदा तुम यादों में मेरी, अप्रकट सी कहीं तुम मुझ में ही, हृदय आकुल किचिंत ये मूक़ सदा ही! ओ मेरी हृदय के अकथ्य चिर-प्यासी उत्कंठा, चिर उत्कंठा तुम मेरे हृदय की, प्यासी उत्कंठाओं की सरिता Continue reading अकथ्य प्रेम तुम

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छाया अल्प सी वो

छाया अल्प सी वो बुझते दीप की अल्प सी छाया वो, साथी! उस छाया से मिलना बस सपने की बात….. प्रतीत होता जिस क्षण है बिल्कुल वो पास, पंचम स्वर में गाता पुलकित ये मन, नृत्य भंगिमा करते अस्थिर से दोनों ये नयन, सुख से भर उठता विह्वल सा ये मन, लेकिन है इक मृगतृष्णा वो रहता कब है पास…. उड़ते बादल की लघु सी प्रच्छाया वो, साथी! उस छाया से मिलना बस सपने की बात….. क्षणिक ही सही जब मिलते हैं उनसे जज्बात, विपुल कल्पनाओं के तब खुलते द्वार, पागल से हो जाते तब चितवन के एहसास, स्मृति में Continue reading छाया अल्प सी वो

“जाने क्यों”

जाने क्यों वो कुछ कहते नहीं हैं। जो है लबो पे वो रखते नहीं हैं। ना ना कहते जो दूर हैं मुझसे, पास ही रहो जाने क्यों ये कहते नहीं हैं। हर दिल टूटा है यहाँ गम के भंवर में, हर दर्द साथ ही क्यों वो सहते नहीं हैं। गुलाब , चन्दन , महावर अब भाते हैं उन्हें, जाने क्यों वो मेरे ही गीतों से सजते नही हैं। वो कह के गए थे इस दिल को अमानत अपनी, जाने क्यों वो ही इस दिल में अब रहते नहीं हैं। कल तो जो बहता दरिया था इश्क का “मैकश”, आज वो Continue reading “जाने क्यों”

भूकंप

प्रकृति का कंपन कम्पित हो गया जीवन विनाश का रूदन त्रस्त है जनगण अनहोनी के लक्षण हताश नहीं पर मन करेगें पूनः गठन सम्पादित होगें नए सपंदन अश्रुजल से सीचंन उभरेगा नया जीवन क्षति का नहीं आकलन नव निर्माण से पूरण चलता रहे यह ही प्रण सजन

झुटा गुण गान

वही सुनी सुनाई बात कई तरह, हरबार कई कई प्रकार बहुतों ने सुनाई अलग अलग अंदाज शब्दों को संजोकर अल्फ़ाज़ों में समेट बार बार, कई बार पर उनसे सुनकर बेहद खूबसूरत लगा हर कोई फ़िदा उस पर वाह, वाह कितना सुन्दर तारीफ का स्तर व्यक्त उछाल खाकर ऐसी कोई बात नहीं थी उस अभिव्यक्ति में सिवाय कहने वाली बला की खूबसूरत हुस्न की मलिका जवानी के दहलीज़ पर सभी सुन्दरता के प्रेमी खूबसूरती की तारीफ कर रहे थे लेख को माध्यम बनाकर आश लगाये कंही ध्यान आकर्षण में सफल हो जाये झुटा ही सही गुण गान कर सजन (किसी पर Continue reading झुटा गुण गान

ख्वाहिश

अनकहे, अनसुलझे जज्बातों से मन मचलता है जैसे रोता बच्चा खिलौना पाने चाहे सम्भाल पाये या नहीं ढंग से उमंग हैं अपनी जाने कैसे अनजानी पहचान से जैसे होते सपने, जब तक उम्मीद दिल में खूब ललचाता है जज्बातों के खेल में मन गिरगिट सा रंग बदलता है जैसे रोता बच्चा पाने को हर चीज नासमझे कोई बंधन बेफिक्र दिल से रोता न मिलने पर मिलने पर खुब खेलता कुछ वक्त और फिर तोड़कर न समझ सका देख देख कर पर जोड़ने की कोशिश, हारकर झट पट बहुत पलटता है खेल खेल में नये जज्बातों से मन गिरगिट सा रंग Continue reading ख्वाहिश

जिंदगी

जिंदगी मे हर पल जैसे गुज़रते जाते हैं, हर पल सब नया नज़र आता हैं, हर पल मे नई .मुसीबत, हर मोड़ नया संघर्ष, यूँही लड़ते लड़ते हर पल, दिल तक सा जाता हैं, फिर अगले ही पल, यह ख़याल आता हैं, नई मुसीबत, नये संघर्ष मे ही, मज़ा जीनेका आता हैं. राजीव कुमार जांगिड़

बिटिया

तू जब जीवन मैं आई खुशिया ढेरो संग लाई, तेरी हंसी रंगबिरंगी कलि, बाते मानो मिश्री की डली, तेरी प्यारी शरारते दुख मैं भी चैन देती, मीठे सवाल जिंदगी के जवाब देती, ये खुशियाँ जो तू लाई मानो मेरी जिंदगी बनके तू आई. वो मम्मी से डरके पापा पापा कहते भागना, और मुझमें चुपके से समाजाना, सुकून मुझे मिला या तुझे, पता नही, पर मेरे दुखोका अब कोई अता पता नही, समय बिता तू बड़ी हो गई, मानो हर सवाल का जवाब जो हो गई, अब तू अपने घर जो जाएगी, पता नही फिर कब आएगी, अगले जन्म तू फिर Continue reading बिटिया