मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ बिखराव तपन-सी रहती है सुनसान अंधेरे पथ पर भी कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है। पर आशा की लहरें तब भी चंचल मन में आ बसती हैं। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। तुमसे हटकर दूर चलूँ तो सफर विकट-सा बन जाता है और अकेला निकल पडूँ तो पथ अनजाना बन जाता है। पर इन घड़ियों में भी आशा तेरा रूप लिये रहती है। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं तट पर जा लहरें गिनता भूल गया था साँसें गिनना क्रोध Continue reading मेरे अंतः की आशायें

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हम कहा जा रहे है

हम कहा जा रहे है 364 दिन महिलाओं पर ज़ुल्म करने वाले लोग आज 1 दिन फेसबुक व्हाट्सएप्प पर चिल्ला चिल्ला कर  महिला दिवस मना रहे है, ना जाने हम क़हा जा रहे है, बेटियो को मार रहे कोख में और बेटो के पैदा होने पर जश्न मना रहे है, ना जाने हम कहा जा रहे है, जहा एक तरफ साक्षी, सिंधु, साइना, सानिया की जीत का जश्न मना रहे है, पर अपनी बहू – बेटी के घर से बाहर निकलने में भी ऐतराज़ जता रहे है, ना जाने हम कहा जा रहे है, अपनी बहन को कोई आँख उठा Continue reading हम कहा जा रहे है

जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जिन्दगी क्या है यह तो वक्त बताता है इसका मकसद भी वक्त बदलता जाता है।   जो मुहब्बत जताता है मुकर जाता है जो मुहब्बत करता है हरदम निभाता है।   तूफाँ का उठाकर किनारे फेंक देना जिन्दगी का अजीब नजारा दिखाता है।   जिन्दगी उम्मीद का एक पैमाना है जब दरक जाता है तो अश्क बहाता है।   जिन्दगी जब भी मौत से डरने लगती है डर हर इक साँस को रोककर डराता है।               ——    भूपेन्द्र कुमार दवे                00000

थकी प्रार्थना

थकी प्रार्थना थक गई प्रार्थना हो निष्फल सो गई साधना पूर्ण विफल अब क्यूँकर दीप जले निश्चल अब क्या मंदिर में पैर धरू? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? सभी आस निरास बन बैठी सुख की घड़ियाँ पीड़ा में ऐंठी मिली न वरदानों की लाठी अब किसको माला गुँथकर दूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? आँसू अब मुझसे शरमाते पलको में आ थम थम जाते पीड़ित मन भी कहता जावे कितने दुख को अपना समझूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से Continue reading थकी प्रार्थना

होली आई रे

होली आई रे रंग बिरंगी लो आई होली l बिखरे चहु ओर रंग हज़ारl प्रेम प्यार का रंग लगाओ l आया फिर होली त्यौहार ll भेदभाव की दीवार गिराके l दुश्मनी भुला दो, मेरे यार l आओ मिलजुल कर खेलेl रंगों भरा होली त्यौहार ll रंगों भरी पिचकारी से हम l धो दे मन के मैल हज़ार l प्रेम प्यार से गले लगाकर l मनाये होली का त्यौहार ll रंग लगाये, ऐसे हम यूँ l ना रूठे कोई , इस बार l चेहरे पर मुस्कान आये l मुबारक  होली त्यौहार ll ————–  

विरहन का विरह

विरहन का विरह पूछे उस विरहन से कोई! क्या है विरह? क्या है इन्तजार की पीड़ा? क्षण भर को उस विरहन का हृदय खिल उठता, जब अपने प्रिय की आवाज वो सुनती फोन पर, उसकी सिमटी विरान दुनियाँ मे हरितिमा छा जाती, बुझी आँखों की पुतलियाँ में चमक सी आ जाती, सुध-बुध खो देती उसकी बेमतलब सी बातों मे वो, बस सुनती रह जाती मन मे बसी उस आवाज को , फिर कह पाती बस एक ही बात “कब आओगे”! पूछे उस विरहन से कोई! कैसे गिनती वो विरह के इन्तजार की घड़ियाँ? आकुल हृदय की धड़कनें अगले ही क्षण Continue reading विरहन का विरह

होली तुम संग

होली तुम संग प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से,। रंग जाऊंगा जीवन तेरा, खुशियों की रंगों से, सूखेगी न चुनरी तेरी, सपनों की इन रंगों से, चाहतें भर दूंगा जीवन मैं, अपने ही रंगों से। प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से। जनमों तक ना छूटेगी, ऐसा रंग लगा जाऊंगा, तार हृदय के रंग जाएंगे, दामन में भर जाऊंगा, आँखें खुली रह जाएंगी, सपने ऐसे सजाऊंगा। तेरे सपनों की रंगों से, जीवन की फाग खेलूंगा। प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से।

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं गम आगोश लिया मस्त मैखाना हूँ मैं। तू अक्स और तेरा आईना हूँ मैं तेरे फेंके पत्थर का निशाना हूँ मैं। तू ही गम है मेरी मस्ती भी है तू इन्हीं बातों का हुआ दीवाना हूँ मैं। अब क्यूँ धुँआँ देती है तू ए शमा तूने जिसे जलाया वो परवाना हूँ मैं। गम भुलाने जो हरसू याद किया जावे वो ही जश्ने-गम का अफसाना हूँ मैं। बस पा सका हूँ कुछ ऐसी जिन्दगी मौत का बना हुआ इक नजराना हूँ मैं। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

औरत

औरत औरत ने सपना देखा चिड़िया उसे पंख दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह चिड़िया बन खुले आसमान में ऊँची उडान भरने लगी औरत ने सपना देखा नदियाँ उसे उफान दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह नदी बन तीव्र वेग से बहने लगी औरत ने सपना देखा – पर्वत उसे दृढ़ता दे गुम हो गए न जाने कहाँ और वह पर्वत बन धरती पर अडिग हो गई औरत ने सपना देखा – वृक्ष उसे अपनी जड़े दे न जाने कहाँ गुम हो गए और वह वृक्ष बन हर मौसम में तन कर खड़ी हो Continue reading औरत

जिंदगी तो है

जिंदगी तो है ज़िंदगी तो है पर यहाँ साथ में ही ये गम क्यो है , हरपल यहाँ खुश,तो आँख उसकी नम क्यों है। हार जाता है अक्सर यहाँ सच रहेके तन्हा यूँ, जूठ के ही पाँव में इस तरहा संग दम क्यों है। जिसने भी यूँ कभी जो है निभाई ता-उम्र वफ़ा, और उससे ही रहेता दूर उसका सनम क्यों है। भूल जाते है अगर वो ही हमसे दूर जा कर, तो, यहाँ गमे -इंतज़ार में ही खड़े हम क्यों है। सोच तो वो भी कुछ अलग रहा है हम से, दिल फिर उसी शख्स का हूँआ हमदम क्यों Continue reading जिंदगी तो है

कयामत के रंग भर देता है

कयामत के रंग भर देता है खुदा खुबसूरती में कयामत के रंग भर देता है, रुखसार पर एक काला तिल रख देता है। आँखे वेसे ही उसकी कातिलाना है, वो सुरमे से सजाकर उन्हें कतार कर देता है।।1।। कौन कम्बखत कहता है कि कुदरत में फेरबदल नही होते, वो झरोखे में आए तो खुद खुदा ईद की तारीखों में बदलाव कर देता है। खूबसूरती पर उसकी हर एक फ़िदा है, आसमां भी उनके सजदे में अमावस को पूनम की रात कर देता है।।2।। ये तो मुकद्दर है हमारा की वो हमारे हिस्से आयी है, वरना पूरा शहर उन्हें पाने को Continue reading कयामत के रंग भर देता है

उत्कंठा और एकाकीपन

उत्कंठा और एकाकीपन दिशाहीन सी बेतरतीब जीवन की आपाधापी में, तड़प उठता मन की उत्कंठा का ये पंछी, कल्पना के पंख पसारे कभी सोचता छू लूँ ये आकाश, विवश हो उठती मन की खोई सी रचनात्मकता, दिशाहीन गतिशीलताओं से विलग ढूंढता तब ये मन, चंद पलों की नीरवता और पर्वत सा एकाकीपन… जीवन खोई सी आपधापी के अंतहीन पलों में, क्षण नीरव के तलाशता उत्कंठा का ये पंछी, घुँट-घुँट जीता, पल-पल ढूंढता अपना खोया आकाश, मन की कँवल पर भ्रमर सी डोलती सृजनशीलता, तब अपूर्ण रचना का अधूरा ऋँगार लिए ढूंढता ये मन, थोड़ी सी भावुकता और गहरा सा एकाकीपन….. Continue reading उत्कंठा और एकाकीपन

चाह

यदि जो चाहे, वो आसानी से मिल जाये l तो पत्थर रुपी भगवान यूँ पूजा ना जाये ll और यदि इंसान, जीवन में कुछ ना चाहे l तो इंसान, इंसान नहीं भगवान बन जाये ll हर किसी की कोई  ना कोई चाह  होती है l क्योकि जहाँ चाह होती है वहीँ राह होती है ll राह के मिलने से मंज़िले नज़र आ जाती है l मेहनत करने से हर चाह पूरी हो जाती है ll चाह हो ऐसी,  जो दूजे को भी ख़ुशी दे पाए l चाह की चाहत में ना गलत  कदम उठाये ll चाह हमें जिंदगी में आगे Continue reading चाह

सवाल

सवाल सवाल यह नहीं कि हर सवाल का जबाब ढूढ़ ही लिया जाय सवाल यह भी नहीं कि सवाल किन-किन हालातों से पैदा हुए हों सवाल यह है कि कील की तरह सवाल आखों में जब चुभने लगे सपने लहूलुहान हो जाय तब कोई तो हो जो अनगिनत हाथों की ताकत बन जाय धक्के मार कर बंद दरवाजों को तोड़ दे जबाब बाहर निकालें सपनों को मरने से बचा ले

खेल का मैदान

खेल का मैदान रचा जा रहा षड्यंत्र मासूम बच्चों के खिलाफ़ कच्चे घड़ों को बंदूक की शक्ल में ढाला जा रहा हैं खिलौनों में भरे हैं विस्फोटक पदार्थ सिरफिरे कर रहे ऐलान माँ की लोरियाँ गाई न जाए सुनो, धमाके का शोर घर-बाहर ,हर ओर सुरक्षित  नहीं बचपन किन्तु ,बच्चे मानते कहाँ होते हैं बड़े शरारती किसी भी हालात में चुप नहीं बैठ सकते घरों में दुबकने को कतई नहीं तैयार किसी न किसी दिन ढूढ़ ही लेंगे खेल का मैदान जहां – लहू के कतरे नहीं मजहब की पाबंदियाँ नहीं नस्ल का भेदभाव नहीं बस केवल गूंजेगी खिलखिलाने की Continue reading खेल का मैदान