सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा? सच में सच का साथ न दोगे कमजोरो को हाथ न दोगे । दोष सिद्ध निर्बल पर होता। सबल पाप करता और सोता। नीर क्षीर सा कौन चुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । सदय भाव अब हृदय न आते। बदले की भावनाए पाले। काम करते रहते काले। पश्चाताप से कौन धुलेगा । सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । घबराहट सच्चाई से , जैसे तीखी दवाई से, दूरी है अच्छाई से । हितकारी पर कौन गुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । दीवारों के कान सुना है । जेलों के मेहमान Continue reading सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

अरुणोदय

अरूणोदय की बेला आयी कली कली डाली मुस्काई ओस विन्दु मिट गए धरा के प्रातःकाल सुखद सुहाई काली रात दूर है दुख सी फिर सुख सी बेला आई प्राची में प्रकाश दिख रहा चिड़ियो मे कोलाहल सुनाई। भौरे मुदित मना है देखो पल्लव मे स्मित है आई। धरा शस्यश्यामला पूरित फूल फूले नही समाई। उदय सूर्य का होता है तब बीती रात प्रात जब आई। विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

कविता

*विषैली हवा* हर कोई शहर में आकर बस रहा। नित नई समस्याओं से घिर रहा।। बीमार रहते है शहर वाले अक्सर। विषैली हवा का असर दिख रहा।। काट दिये शहरों में सब पेड़ो को। इमारतों में घुट घुट कर पिस रहा।। धूल , धुँआ इस कदर फैला देखो। जिंदगी के दिन आदमी गिन रहा।। गरीबी देखी नही जाती इंसान की। तन ढँकने को वह पैबन्द सिल रहा।। शूल सारे राह के अब कौन उठाता। पुरोहित सब मतलबपरस्त मिल रहा।। कवि राजेश पुरोहित 98,पुरोहित कुटी श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

वर्ण पिरामिड

वर्ण पिरामिड रे चन्दा निर्मोही, करता क्यों आंख मिचौली। छिप जा अब तो, किन्ही खूब ठिठौली।।1।। जो बात कह न सकते हैं, हम तुमसे। सोच उसे फिर ये नैना क्यों बरसे।।2।। गा मन मल्हार, मिलन की रुत है आई। मोहे ऋतुराज, मन्द है पुरवाई।।3।। रो मत नादान, छोड़ दे तू सारा अज्ञान। जगत का रहे, धरा यहीं सामान।।4।। तू कर स्वीकार, उसे जो है जग-आधार। व्यर्थ और सारे, तत्व एक वो सार।।5।।

बेटियाँ

बेटियाँ पढाओ जनजन से आह्वान है । ये काम महान है ये काम महान है । किससे कम है मेरी बेटी चढती है हिमालय की चोटी । करो सदा सम्मान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । पढ़कर बेटी दो घरों को रोशन करती देती शिक्षा भेद न करो बेटे बेटी में दो समान शिक्षा दिक्षा। दहेज मुक्त हो सब समाज जब समझे बहू को बेटी समान है । यही आह्वान है । ये काम महान है । आधी आबादी की जिससे होती है भागीदारी । एक नहीं दो दो मात्राएं नर से भारी नारी हम Continue reading बेटियाँ

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे पिला इतनी कि मैखाना इक पैमाना लगे।   बैठ तेरे आगोश में ताउम्र ऐ साकी जिन्दगी हर सूरत अक्स-ए-मैखाना1 लगे।   वक्त अब क्यूँ इस तरह खुद-इंतशारी2 का हो दर्द हो भी तो गमे-दिल3 का दीवाना लगे।   सिर्फ छूकर ही जाम तिरा नशा आने लगा हरेक बूँद अब इक छलकता पैमाना लगे।   मुश्किल अब मैखाने से उठ घर जाना लगे मैकदे की दर भी दीवारे-मैखाना लगे।   इस कदर पिला कि हमें जमाना मदहोश कहे और हमें भी मदहोश सारा जमाना लगे।   तिरी दहलीज पर जब भी आऊँ तो, ए Continue reading पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

शहीद की माँ

शहीद की माँ  बेटा, बचपन तेरा भोलेपन में जाने क्या क्या करता था पलने पर बस लेटे लेटे हँसता था, मुस्काता था।   घुटने के बल चलते चलते कुछ रुकता फिर बढ़ता था माँ का आँचल दिख जाने पर होकर खुश मुस्काता था।   और गोद पे चढ़ जाने का अभिनय प्यारा करता था बाहर तारों की माला में चाँद पिरोया करता था।   फूलों के गुच्छों पर हरदम महक प्यार की भरता था पास बुलाने तितली को तू ‘ऐं ऐं’ कर कुछ कहता था।   माँ की गोदी में सिर रखकर सोता तू मुस्काता था क्या सपने थे जिसे Continue reading शहीद की माँ

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा रात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।   पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहा फिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।   आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहा उड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।   अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहा फिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।   मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैं उलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।   अपने होने का अब क्यूँ अहसास हो खोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।                  ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

आज सुर गा न सकेंगे संगीत

आज सुर गा न सकेंगे संगीत आज सुर गा न सकेंगे संगीत अथ में अदभुत अंत में भरम अनोखा परिचय निशीथ की विकल साँसों की नहीं प्रात: से प्रेम आर्द्र आँचल निर्जल व्योम-जल कितना सत्य शस्य गीत की नहीं सहेगी प्रभंजन,शीत प्रिय सरस सौरभ कोमल अनुबंध बाकी सभी शेष दीप की लौ के हर कॅपकँपी में सुर मेरे होंगे संगीत । ————- डॉ छेदी साह

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना माँ वीणा पुस्तक धारिणी नमन करो स्वीकार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार। ऋणी रहे हम सदा तुम्हारे तेरी स्तुति गाये । ऋषि मुनि करे वंदना तेरी देव भी शीश नवाये।। मिटा दो माँ इस जीवन से अज्ञानता का अंधकार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार।।। दया करो इस दास पर माँ दर्शन दो एक बार । तेरे बच्चे तुझे बुलाये आओ माँ करके हंस सवार ।। मांगे माँ बस ज्ञान तुझसे ना मांगे संसार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार ।। जय माँ शारदे।

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे मेरी किस्मत की कतरनें भी तमाम भेज दे। ए डूबते सूरज, बस इक मेहरबानी कर जा अपनी तपस बटोरकर सुलगती शाम भेज दे। ना पानी है, ना शराब का इक कतरा बचा है तू अपने लबों से चूमकर इक जाम भेज दे। कच्ची गागर है, मालूम है, फूट जावेगी बस आखरी दरार का लिखा पैगाम भेज दे। मैं कब से आँख मूँदे यूँ बेजान पड़ा हूँ अब ख्वाब में साकी दरका एक जाम भेज दे। अब की हवा का झोंका पतझर ही लावेगा हर जर्जर पत्ते पे लिख मेरा नाम भेज दे। Continue reading इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे