कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ

🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे पता नहीं वाग्जाल आ-आकर रुक जाते क्यों लबों पर मेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। इस गुफ़्तगू की निशा में जाने क्यों गुमसुम रहा हूँ ? इस दरमियान में कितना क़हर भरा दरवेश रहा हूँ ऊँघते नैनों में कबतक विकल हुए कल्प धनेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। मिले तार ह्रदय- बीन के तो सुर संसार में द्यतिमय हो जाँय हर्ष- विषाद का मानस लिखकर उसमें हम लीन हो जाँय सुरभित हों जीवन तुम्हारे, पराये बनें संगी तेरे। क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो Continue reading 🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

मन की नमी

मन की नमी दूब के कोरों पर, जमी बूँदें शबनमी। सुनहरी धूप ने, चख ली सारी नमी। कतरा-कतरा पीकर मद भरी बूँदें, संग किरणों के, मचाये पुरवा सनसनी। सर्द हवाओं की छुअन से पत्ते मुस्काये, चिड़ियों की हँसी से, कलियाँ हैं खिलीं, गुलों के रुख़सारों पर इंद्रधनुष उतरा, महक से बौरायी, हुईं तितलियाँ मनचली। अंजुरीभर धूप तोड़कर बोतलों में बंद कर लूँ, सुखानी है सीले-सीले, मन की सारी नमी। #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा की आस में, अधरपट कलियों ने खोले, मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा। छूके टोहती चाँदनी तन निष्प्राण से निःश्वास है, सुधियों के अवगुंठन में बस मौन का अधिवास है, प्रीत की बंसी को तरसे, अनुगूंजित हिय की घाटी खोयी दिशा। रहा भींगता अंतर्मन चाँदनी गीली लगी, टिमटिमाती दीप की लौ रोई सी पीली लगी, रात चुप, चुप है हवा स्वप्न ने ओढ़ी चुनर जग गयी निशा। #श्वेता🍁

मुख्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे, देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से, इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे, सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों में मेरी! सिंदूरी ख्वाब लिए, फिर सो जाती है रात… मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. झांकती है सुबह, उन खिड़कियों से मुझे, रंग वही सिंदूरी, जैसे सांझ मिली हो भोर से, मींचती आँखों में, सिन्दूरी सा रंग घोल के, रंगमई सी सुबह, बस जाती है फिर आँखों में मेरी! दिन ढ़ले फिर, Continue reading मुख्तसर सी कोई बात

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… यादों के कितने ही लम्हे देकर, अनुभव के कितने ही किस्से कहकर, पल कितने ही अवसर के देकर, थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर, कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल… प्रगति के पथ प्रशस्त देकर, रोड़े-बाधाओं को कुछ समतल कर, काम अधूरे से बहुतेरे रखकर, निरंतर बढ़ने को कहकर, युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… अपनों से अपनों को छीनकर, साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर, पीढी की नई श्रृंखला रचकर, जन्म नए से युग को देकर, सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल…. नव ऊर्जा बाहुओं Continue reading बदल रहा ये साल

जीवन नदिया, मन है कश्ती

” जीवन नदिया, मन है कश्ती “ ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! कभी शांत तो कभी चंचल , कभी उजला तो कभी अनमिट अँधेरा-सा ! ये जीवन है क्या ? एक बहती नदिया की धारा-सा ! जीवन की इस नदिया पर , तैरती मानव मन की ये कश्ती , कभी ख़ुशी की लहरों संग इठलाती-मुस्कुराती हुई , शांति और सुकून से बहती , तो कभी दुःख की लहरों से टकराती-डगमगाती हुई , निराशा के गर्त में डूबती ये कश्ती ! दिग्भ्रमित मानव मन की ये कश्ती , न दिशा का है कोई ज्ञान , Continue reading जीवन नदिया, मन है कश्ती

आइए आ जाइए

आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हँसिए-हँसाइए, रूठीए मनाइए, गाँठ सब खोलकर, जरा सा मुस्कुराइए, गुदगुदाइए जरा खुद को भूल जाइए, भरसक यूँ ही कभी, मन को भी सहलाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… हैं जो अपने, दूर उनसे न जाइए, रिश्तों की महक को यूँ न बिसर जाइए, मन की साँचे में इनको बस ढ़ालिए, जीते जी न कभी, इन रिश्तों को मिटाइए, जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए…… आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए…… भूल जो हुई, मन में न बिठाइए, खता भूलकर, Continue reading आइए आ जाइए

बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा…. न जाने वो कौन सा, जादू था भला, न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला, कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला, आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला। आईना था वही, बस बदला सा था अक्श मेरा… इस दफा, जादू किसी का था चला, दुआ किसी की, कबूल कर गया खुदा, नई राह थी, नया था कोई सिलसिला, नूर लेकर यूँ, अक्श फूल सा खिला। इस दफा आईने में, यूँ बदला सा था अक्श मेरा…. धूंध छँट चुकी, इक शख्स था मिला, नूर-ए-खुदा शख्स के चेहरे पे Continue reading बदला सा अक्श

जैसे कल ही की बात हो

पल थे कितने सुहावने वह जिए जो हमने साथ-साथ हर पल एक नया अहसास था हर पल था नई उमंग से भरा क्यों पल-पल याद आते हैं वह बीते पल जैसे कल ही की बात हो कितना ख़ुशगवार था वह चंचल मौसम मदहोश झोंके जब उन्मुक्त पवन के सहलाते थे हमारे रंगीन ख़्वाबों को अपने शीतल अहसासों से आज भी वह मौसम भुला नहीं ये दिल जैसे कल ही की बात हो पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा कैसे छिपकर सुनते थे हमारी मन की बातें पंखुड़ियां तरुण गुलाब की खिलती थी हमारी अबोध शरारत देख कर क्यों हर याद रच-बस गई मेरी आखों Continue reading जैसे कल ही की बात हो

ग़ज़ल

वक्त करवट बदल रहा कद्र कर मुलाकात अब आंधियों से कर जिंदगी घुट घट के जी लिया तू कर बात खिड़कियां खोल कर अब नहीं आता कोई हरकारा अब न तू चिठियों की बात कर बाग बगीचे सुने सुने दिख रहे अब तितलियों की बात न कर तालाब की हालात देख ली वहाँ मछलियों की बात न कर सारे शजर कट रहे साथियों अब टहनियों की फिक्र न कर मुल्क में सुरक्षित नहीं कोई तू बेटियों की बात न कर कवि राजेश पुरोहित श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी पिन 326502 जिला झालावाड़ Mob.7073318074 Email 123rkpurohit@,gmail.com

कुँवर नारायण की एक कविता

प्रिय दोस्त, मैं सबको प्रणाम करता हूँ । मैं विदेशी हूँ और मुझे हिंदी कविता में रुचि है । यह भी कह सकता हूँ कि मैं हिंदी भाषा का एक प्रेमी हूँ । अभी मैं एक कवि का अनुवाद कर रहा हूँ कुँवर नारायण । कभी कभी इनका अनुवाद करना अत्यंत मुश्किल है तो मैं यहाँ आया हूँ क्योंकि मैं आपकी मदद निवेदन करना चाहूँगा । आप कर सकते हैं क्या ? जैसे इस कविता में जो रेखांकित किया गया आप कैसे समझते हैं ? विदेशी होने की बावजूद मैं सब कुछ नहीं समझ सकता हूँ.. हिंदी भाषा अधिक रहस्यात्मक Continue reading कुँवर नारायण की एक कविता

ऋतुराज

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई, संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई, जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई, ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी….. नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा, जीर्ण काया को सँवार, निहार रही खुद को जरा, हरियाली ऊतार, तन को निखार रही ये जरा, शिशिर की ये पुकार, सँवार खुद को जरा….. कण-कण में संसृति के, यह कैसा स्पंदन, ओस झरे हैं झर-झर, लताओं में कैसी ये कंपन, बह चली है ठंढ बयार, कलियों के झूमे हैं मन, शिशिर ऋतु का ये, मनमोहक है आगमन….. कोयल ने छेड़े है धुन, Continue reading ऋतुराज