चाहत

चाहत बड़ी मुश्किल शरारत हो गयी है न पूछो यह बगावत हो गयी है नज़ाक़त तेरी रास आये नही ग़म से अब मोहब्बत हो गयी है अँधेरा जैसा लगता है यों ही दिल की कंही तिज़ारत हो गयी है फ़रेब व जालसाजी के हुनर से बेवफ़ाई कि आदत हो गयी है माना नाउम्मीदी की घडी़ में एक उम्मीद की चाहत हो गयी है हालात ऐसे से हो गए मेरे तु मेरे लिए इबादत हो गयी है सच तो यह है न कोई अफ़साना सजन तुझे मोहब्बत हो गयी है सजन Advertisements

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अब तो तू आजा प्रिये

अब तो तू आजा प्रिये अब आया समझ में,मैं ना समझ नहीं प्यार हैं,चाहत हैं,उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं,जीवन में तैर सिवा कोई और नहीं अब इस दिल को कोई स्वीकार नहीं दिल मेरा हर बार तड़पता, तुझे चाहता अब तो तू आजा प्रिये .. जिंदगी मुझसे रुठ चुकी तेरी चाहत बढ़ चुकी तेरे लिए भटका हर दर-दर मैं गलियां मेरे हाथों से टूट चुकी कोमल-कोमल कलियाँ खो बैठा अपनी नादानी से प्यार भरा अपार कोष प्रिये फिर कर लेने दो प्यार प्रिये .. तेरे बिन अब ये दिल ना जियें अब तो तू आजा प्रिये…

एक उम्मीद

एक उम्मीद जग ऐसा कोई बनाई दे सबको दोस्त से मिलाई दे रिश्तों से जो परेशान ना हों वो नूर आँखं पे चढा़ई दे गंगा-जमुना तहजीब में दिखे भाईचारे का जग बनाई दे मन्दिर मस्जिद में भेद काहे शंख अजा़ं साथ सुनाई दे ईद दिवाली एक सी मनाये आदाब मिले या बधाई दे होली हुड़दगं की मस्ती हो हर कोई अपना दिखाई दे सजन

माँ

माँ माँ शब्द है जिन दिलो में यहाँ, पार हूॅआ है जग जूलो में यहाँ। दुःख की परछाईयों में जो घिरा , छलकते थे दर्द आंखो में वहाँ। माफ़ किया है उसी माँ ने सदा , हम सभी गुनाहगारो है यहाँ। बरसती उस ह्रदय से दुआ सभी , कामयाबी आज ढेरो है यहाँ। नींद लेते सुख सपने देखते, जागती वो रात हजारो है यहाँ। साथ में वो रोई थी हमारे कभी , राह में खाई ठोकरों में यहाँ। बात से उनकी कहानी निकले, फिरते थे फूल तारों में यहाँ। देखती थी मूरते मंदिर में , फिरभी माँ को हूँ प्यारो Continue reading माँ

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

श्वेताक्षर

श्वेताक्षर यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर, तप्त शिलाओं के मध्य, सूखी सी बंजर जमीन पर, आशाओं के सपने मन में संजोए, धीरे-धीरे पनप रहा, कोमल सा इक श्वेत तृण………… क्या सपने बुन रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वो श्वेत तृण, इक्षाओं से परिपूर्ण, जैसे हो दृढसंकल्प किए, जड़ों में प्राण का आवेग लिए, मन में भीष्म प्रण किए, अवगुंठन मन में लिए, निश्छल लहराता वो श्वेत तृण………….. क्या तप कर रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वियावान सी उजड़ी मन की पहाड़ी पर, इक क्षण को हो जैसे Continue reading श्वेताक्षर

प्यार की कशिश

प्यार की कशिश अजीब तोहमत लगाये थे हमने प्यार से नज़र चुराये थे हमने मिरा दामन थामा था बिश्वास में बेवफ़ाई में छुड़ाये थे हमने दोस्ती के लिये तिरे एहसास थे न निभा अफसोश जताये थे हमने रिश्तों के हर चिराग रौशन करके उसी को राह में बुझाये थे हमने मोहब्बत को तमाशा बनाया है बेवफ़ा हस्र अजमाये थे हमने मोहब्बत या दोस्ती का सवाल था बेतुके जवाब बताये थे हमने सजन

मैं अकेला

मैं अकेला आया हूँ मैंअकेला,रहना अकेला चाहता हूँ इस दुनियादारी के झमेले में नहीं उलझना चाहता हूँ अपने दिल का गुणगान औरों से नहीं चाहता हूँ इसलिए शायद खुदको मैं अकेला ही पाता हूँ चाहता हूँ अकेला रहकर कुछ लिखा करूँ अपने मन की व्यथा का मैं खुद ही गुणगान करूँ देख कर प्रकृति की सुंदरता मैं खामोश रहता हूँ इसका मधु अपार, शायद इसको ही पिया करूँ आते हैं जीवन में सुख और दुःख अपार मैं उस अड़िग, कठोर, पेड़ की तरह खड़ा रहूं ना सुख मुझे बहलाएगा,ना दुःख मुझे सतायेगा युवा हूँ,पलट कर वायु मैं बन जाऊँगा जानता Continue reading मैं अकेला

वक्त

वक्त वक्त से सीखा की वक्त किसी के लिये रूकता नहीं वक्त ने ही जताया, वक्त सब का एक सा चलता नहीं बदलते वक्त के साथ जो बदल गये,उन्हें परेशानी नहीं जो बदल नहीं पाये,उनकी निशानी वक्त ने छोड़ी नहीं वक्त से पहचान,वक्त के आगे किसी की चली नहीं जब वक्त आये, पतन का कारण,अभिमानी जाने नहीं अहम अपने ग़रूर का,वहम से असर को माने नहीं वक्त बनाता,वक्त ही मिटाता,यह बात अनजानी नहीं सजन

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

तेरी याद

तेरी याद जब याद आएगी तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते, एक बार फिर शाम-ए-गज़ल बन जाएंगी, जब तेरे-मेरे मिलन की याद हमें आयेगी, छलक उठेगा हर एक जाम महखाने में, जब तेरी याद हमे ख़लिश सी सताएंगी, ना रुकेंगी कलम आज गज़ल लिखते-लिखते, जब तक दर्द बयां ना हो जाता कोरे कागजों पर, उभर कर आएंगे लफ़्ज इन बेगुनाह पन्नों पर, जब इन आँखों से नीर की धार बहेंगी, पलट जायेगा हवा का रुख़, थम जायेगी लहरें, जब दीदार होगा तेरा तो खिल जाएंगे दो चेहरे, जब आएगी याद तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते।

नवगीत

नवगीत अनकहे, अनसुलझे जज्बातों से मन मचलता है जैसे रोता बच्चा खिलौना पाने चाहे सम्भाल पाये या नहीं ढंग से ……! उमंग हैं अपनी जाने कैसे अनजानी पहचान से जैसे होते सपने, जब तक उम्मीद दिल में खूब ललचाता है जज्बातों के खेल में मन गिरगिट सा रंग बदलता है जैसे रोता बच्चा पाने को हर चीज नासमझे कोई बंधन बेफिक्र दिल से रोता न मिलने पर । या फिर मिलने पर खुब खेलता कुछ वक्त और फिर तोड़कर न समझ सका देख देख कर पर जोड़ने की कोशिश, हारकर झट पट बहुत पलटता है खेल खेल में नये जज्बातों Continue reading नवगीत

हमेशा की तरह

हमेशा की तरह हकीकत है ये कोई या है ये दिवास्वप्न, हमेशा की तरह!हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता, ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा, कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा……. हमेशा की तरह, फिर दिखते कुछ ख्वाब सुनहरे, कुछ बनते बिगरते, कुछ टूट के बिखरे, सपने हों ये जैसे, किसी हकीकत से परे…… हमेशा की तरह,किसी झील में जैसे पानी हो ठहरा, मन की झील में, चुपके से कोई हो आ उतरा, वो मासूम सी, पर छुपाए राज कोई गहरा….. हमेशा की तरह, खामोशियों के ये पहरे, रुमानियत हों ये जैसे, किसी हकीकत Continue reading हमेशा की तरह

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी

ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ माँ बेटो को जन्म देकर पछताती है। लड़की रात को घर से बाहर निकलने से घबराती है, और निर्भया की आत्मा आज तक लज्जाति है।। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी, जहाँ राजपद की आस रोज कोई दंगा करवाती है। भारत माँ जहाँ रोज आसूं बहाती है, शहीद स्मारक की आग जहां शर्मिंदगी से बुझ जाती है। ये दिल्ली है मेरे देश की राजधानी।। ***नि-3***

विरह की व्यथा

विरह की व्यथा फांस सी खटकती अंतस मन में चंचल सी मुस्कान अब कैसे रास आये पैजनिया जब गुनगुनाये ओठों के सहज सहगान पनघट की डग़र लगे सुनसान सी बेजान टूटी पट्टी पे आतुर है संगम स्नान अंतस में अटक गई दिल की धड़कन बेचैन है मन सुनने पायल की तान सूरज की पहली किरण जगाती संदेश मचलता तन दौड़ पड़े, खोजने तेरे पांव के निशान रो रो कर बेहाल उलझ गई सांसें धड़कन हुई बेजान जैसे की थम गया समय का चक्र घूमें सारा जहान ओंठों के अनबोले सुनना चाहे कान फांस सी खटकती अंतस मन में विरह की Continue reading विरह की व्यथा