व्यथा वृक्ष की।

क्यो काटते हो मुझे मैं तो जीवन देता हूं स्वयं ना लेकर अपना कुछ भी फल तुमको दे देता हूं।। चोट तुम्हारी कुल्हाड़ी का हर पल सहता रहता हूँ जब तक अंतिम स्वास चलती है मेरी प्राणवायु ही देता रहता हूँ।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं तो हर सुख दुख में काम आता हूं कभी द्वार बन कभी बन खिड़की घर की लाज बचाता हूँ।। पल पल ऐ मनुष्य तू हमको कितने घाव देता है गर्मी के मौसम में शीतल छाँव हम्हीं से लेता है।। फिर क्यों काटते हो मुझे मैं भी तो तुम्हारी तरह इसी धरती माँ की Continue reading व्यथा वृक्ष की।

व्यथित मन की वेदना

कहूँ किससे अस्थिर मन की वेदना, नहीं किसी चेहरे को फुर्सत यहाँ। अपरिचित राहों में भागता हर कोई, मुठ्ठी में समेट लेने को सारा जहाँ। चाँद देख क्यों सकुचाता है ये मन, क्यों भरता ठंडी-सांसे ये हर पल। है त्रिषित सदियों से तन्हाइयों में, बुझे प्यास कैसे बिन शीतल जल। निर्जनता की अजनबी परछाई भी, लगी है मुरझाने देख इस मन को। शीतल बयार की चंचल झोंके अब, नहीं छूते इसके कुम्हलाये तन को। टूटे तार इसकी घायल वीणा के, अपने मीठे सुरों से संवारेगा कौन। चहकते थे जो कल तक संग इसके, फेर कर नज़रें क्यों हो गए हैं Continue reading व्यथित मन की वेदना

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर….. जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर, सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर, कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर? बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम… बिन मात्रा, शब्दों बिन प्रस्फुटित होते ये अक्सर, ये निराकार से प्रतिबिंब यूँ ही काटते चक्कर, मन के ये प्रतिबिंब, देखे कौन आकर? लिखने को क्युँ झाँकूं मैं बाहर…. लिखने के कितने ही अवसर है इस मन के भीतर, अलिखित से स्वलेख उपजते इसके अन्दर, मन की ये उपज, काटे कौन आकार? बिन खाद-बीज, बिन पानी… ऊपजाऊ सा है ये मन, मरुभूमि सी नहीं ये ब॔जर, Continue reading क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

चूल्हे चौके

चूल्हे चौके चूल्हे चौके संभालती है बेटियाँ परिवार की आन बान है बेटियाँ तगारी फावड़े चलती है बेटियाँ नरेगा में काम करती है बेटियाँ घर की देहरी छोड़ती है बेटियाँ देश की प्रहरी बनती है बेटियाँ सीमा की रक्षा करती है बेटियाँ वतन की शान ये प्यारी बेटियाँ ओलंपिक में जीतती है बेटियाँ स्वर्ण पदक लाती है बेटियाँ कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात, विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात, पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ, धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… चुपचाप कालिमा घोलती ये रात, स्वप्नातीत, रूपातीत नैनों में ऊँघती सी उथलाती नींद, अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब, मींचती आँखों में तल्खी मन में बेचैनियाँ, बस है इक उम्मीद और अधूरी सी है कई बात… धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात… Continue reading रात और तुम

मानव मात्र का धर्मशास्त्र

मानव मात्र का धर्मशास्त्र – यथार्थ गीता श्रीमद्भगवतगीता की अद्वितीय व्याख्या यथार्थ गीता मानव मात्र का धर्म शास्त्र है।भारत में प्रकट हुई गीता विश्व मनीषा की धरोहर है।भारत सरकार को चाहिए कि यथार्थ गीता को भारत का राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित कर दिया जाए। यथार्थ गीता को राष्ट्रीय शास्त्र का मान देकर उंच नीच भेदभाव तथा कलह परम्परा से पीड़ित विश्व की सम्पूर्ण जनता को शांति देने के प्रयास की आज आवश्यकता है।यथार्थ गीता पढ़ने सर सुख शांति मिलती है साथ ही यह अक्षय अनामय पद भी देती है। यथार्थ गीता में ईश्वरीय साधना ईश्वर तक की दूरी तय करना कि Continue reading मानव मात्र का धर्मशास्त्र

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। अंतःसलिल हो जहाँ के तट, सूखी न हो रेत जहाँ की, गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की। दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर, हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर, मन के क्लेश धुल जाए, हो ऐसी ही आब जहाँ की। वापी जहाँ थिरता हो धीरज, अंतःकीचड़ खिलते हों जहाँ जलज, मन को शीतल कर दे, ऐसी खार हो आब जहाँ की। ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक, हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक। ऐ नाविक, रोको मत, तुम खुद बयार बन Continue reading वापी

वो मैं ही था

वो मैं ही था जब कभी चांदनी रात में बैठ गाँव के तल्लैया किनारे निहारा करती थी तुम प्रीतिबिम्ब चाँद का तो कोई चुपके से फेंक कर कंकड़ कर देता धुंधली तस्वीर चाँद की वो कोई और नहीं, मैं ही था बदल-बदल कर करवटें पूर्णिमा की रात को जब तुम बुना करती थी सुनहले खवाब अपनी कल्पनाओं के राजकुमार संग तो कोई चुपके से चुरा लेता ख्वाब तुम्हारे देकर दस्तक तुम्हारे दिल की खिड़की पर वो कोई और नहीं, मैं ही था क्या तुम्हें याद है जब तुम सो जाया करती थी बेसुध हो कर पलटते-पलटते किताब के पन्ने तो Continue reading वो मैं ही था

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल

जलता दिल

राख! सभी हो जाते हैं जलकर यहाँ, दिल ये है कि जला… और उठा न कहीं भी धुँआ! है जलने में क्या? बैरी जग हुआ दिल जला! चित्त चिढा, मन को छला, दिल जला! कहीं आग न कहीं दिया, दिल यूँ ही बस जला! ये धुआँ? दिल में ही घुटता रहा, घुट-घुट दिल जला, बैरी खुद से हुआ, दिल को छला, उठता कैसे फिर धुआँ, दिल के अन्दर ये घुला! राख ही सही! पश्चाताप की भट्ठी पर चढा, बस इक बार ही जला, अंतःकरण खिला…… स्वरूप बदल निखरा, धुआँ सा गगन में उड़ा, पुनर्जन्म लेकर खिला।

स्नेह वृक्ष

बरस बीते, बीते अनगिनत पल कितने ही तेरे संग, सदियाँ बीती, मौसम बदले…….. अनदेखा सा कुछ अनवरत पाया है तुमसे, हाँ ! … हाँ! वो स्नेह ही है….. बदला नही वो आज भी, बस बदला है स्नेह का रंग। कभी चेहरे की शिकन से झलकता, कभी नैनों की कोर से छलकता, कभी मन की तड़प और संताप बन उभरता, सुख में हँसी, दुख में विलाप करता, मौसम बदले! पौध स्नेह का सदैव ही दिखा इक रंग । छूकर या फिर दूर ही रहकर! अन्तर्मन के घेरे में मूक सायों सी सिमटकर, हवाओं में इक एहसास सा बिखरकर, साँसों मे खुश्बू Continue reading स्नेह वृक्ष

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे दे सके तो अपनी मुस्कान की कतरन दे।   इक बहाना चाहिये था मंदिर आने का शुक्र है तूने दर्द दिया दवा अब न दे।   मौत तो सबको दी है ये मैं जानता हूँ पर मुझ गरीब को लाकर कहीं से कफन दे।   अंधे सभी हैं जिन्हें दिखाई नहीं देता पर मुझे ले चल जहाँ तू दिखाई न दे।   ये जख्मो-दाग मुझे तोहफे में मिले हैं अब मुझे खुश रखने ये सजाऐं और न दे।                            Continue reading ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

कुछ कहो ना

प्रिय, कुछ कहो ना! यूँ चुप सी खामोश तुम रहो ना! संतप्त हूँ, तुम बिन संसृति से विरक्त हूँ, पतझड़ में पात बिन, मैं डाल सा रिक्त हूँ… हूँ चकोर, छटा चाँदनी सी तुम बिखेरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! सो रही हो रात कोई, गम से सिक्त हो जब आँख कोई, सपनों के सबल प्रवाह बिन, नैन नींद से रिक्त हो… आवेग धड़कनों के मेरी सुनो ना, मन टटोल कर तुम, संतप्त मन में ख्वाब मीठे भरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! चुप हो तुम यूँ! जैसे चुप हो Continue reading कुछ कहो ना

दिनकर की गरिमा

शैल शिखर पर तेजस्वी दिनकर लगा उंडेलने अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्णराशि भानु की स्वर्णिम आभा से ओत-प्रोत होने लगा सारा परिसर अनायास ही शांतचित्त झील का शीतल, निर्मल जल भी लगा समेटने उस स्वर्णिण आभा को अपने मार्मिक आगोश में जल में तैरते कमलपुष्पों के दल झूम उठे आनंदमय होकर पाकर सूर्य-रश्मियों के स्पर्श उनका सिकुड़न एवं संकुचन हो गए विलीन आनंद के सागर में और खुलने लगे उसके बंद मुँह उनकी कलियाँ थी आतुर भास्कर की अरुणिमा के अवलोकन को शीतल समीर के मंद-मंद झोंके भी टकराकर इन कमलपुष्पों से सुगंध-सुरभि फैला रहा था वातावरण में हिमगिरि जो Continue reading दिनकर की गरिमा