सवाल

सवाल सवाल यह नहीं कि हर सवाल का जबाब ढूढ़ ही लिया जाय सवाल यह भी नहीं कि सवाल किन-किन हालातों से पैदा हुए हों सवाल यह है कि कील की तरह सवाल आखों में जब चुभने लगे सपने लहूलुहान हो जाय तब कोई तो हो जो अनगिनत हाथों की ताकत बन जाय धक्के मार कर बंद दरवाजों को तोड़ दे जबाब बाहर निकालें सपनों को मरने से बचा ले Advertisements

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खेल का मैदान

खेल का मैदान रचा जा रहा षड्यंत्र मासूम बच्चों के खिलाफ़ कच्चे घड़ों को बंदूक की शक्ल में ढाला जा रहा हैं खिलौनों में भरे हैं विस्फोटक पदार्थ सिरफिरे कर रहे ऐलान माँ की लोरियाँ गाई न जाए सुनो, धमाके का शोर घर-बाहर ,हर ओर सुरक्षित  नहीं बचपन किन्तु ,बच्चे मानते कहाँ होते हैं बड़े शरारती किसी भी हालात में चुप नहीं बैठ सकते घरों में दुबकने को कतई नहीं तैयार किसी न किसी दिन ढूढ़ ही लेंगे खेल का मैदान जहां – लहू के कतरे नहीं मजहब की पाबंदियाँ नहीं नस्ल का भेदभाव नहीं बस केवल गूंजेगी खिलखिलाने की Continue reading खेल का मैदान

गांधी तेरे देश को

गांधी तेरे देश को ग़ांधी तेरे देश को कोडियो के मोल बिकते देखा है, सत्यपथ का सबब भुलाकर झूठ के लिये सत्याग्रह करते देखा है। भुला ये भगतसिंह और आजाद की कुर्बानी, आज एक-एक को मैंने गुलामी की नींव रखते देखा है।।1।। ठिठुरती औलाद को जो अपनी कम्बल ओढती है, बाजार में उसी माँ को नंगा करते देखा है। खून के रिश्तों की रासलीला भी खूब देखी मैंने, भाई को भाई के खून का प्यासा देखा है।।2।। समाज की सतायी औरत को तिल-तिल कर मरना पड़ता है, बलात्कारियो को इज़्ज़त की जिंदगी जीते देखा है।। खूबसूरती पर ग़ज़ल पढ़ते शायरों Continue reading गांधी तेरे देश को

मुक्तक- तू और मैं

मुक्तक — तू  और मैं  तू आगे आगे था तूने पलटकर नहीं देखा तेरे पीछे मैं था तूने पलटकर नहीं देखा। तेरे पीछे किसका लहूलुहान नक्शे-कदम था तेरा था या मेरा तूने पलटकर नहीं देखा।               ——   भूपेन्द्र कुमार दवे              00000

पर्वत का दुःख

पर्वत का दुःख सोचों जरा कैसा हादसा हुआ होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत बना होगा जड़ ज़मीन पर शिखर आसमान पर कितना बँटा–बँटा किसी का न हो सका होगा सोचों जरा कितना हैरान हुआ होगा उसके सीने से दर्द का सोता फूट पड़ा होगा कहीं नदियाँ कहीं झरने बन कर आसुओं की धार न जाने कितनी घाटियों में गिरा होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत हुआ होगा सोचों जरा कितना फूट फूट कर रोया होगा एक ही वक्त में कहीं ठिठुरता कहीं सुलगता कहीं चटकता कहीं खिसकता कितना परेशान हुआ होगा माटी यूँ ही नहीँ पर्वत बना होगा सोचों Continue reading पर्वत का दुःख

तेरा बदन

तेरा बदन तेरा बदन मुझ में समा जाता है। यु रात के दुझे पहर तक जब नींद नही आती है, करवट बदल-बदल कर जब थकावट सी छा जाती है। जब घडी की टिक-टिक से भी आवाज छन-छन की आती है, जब रोजाना के उसी बासी कम्बल से खुशबु इत्र की आती है।। जब पलकें भारी होने लगती है, और नींद आँखों में बसने लगती है। ऐसे में प्रियतमा तेरा ख्याल मुझे आता है, और कोई ख्वाब तुझे मेरे करीब ले आता है।। तेरा फितूर फिर मुझ पर हावी हो जाता है, और निःस्वार्थ प्रेम का पूरा ज्ञान धरा रह जाता Continue reading तेरा बदन

मुक्तक — भारत माँ

मुक्तक — भारत माँ वह बूढ़ी है मगर परी सुन्दर-सी लगती है वह गाँव में रहती है पर शहर-सी लगती है। जिसके पास दौड़ बच्चे सभी चहचहाते हैं वह चिड़िया के प्यारे सब्ज शजर-सी लगती है। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे               00000

ईश्वर और शैतान

ईश्वर और शैतान मै अपूज्य तमाधिपति मेरे अधीन अन्धकार का राज्य मेरा असुरत्व काम ,क्रोध ,लोभ , मद ,मोह में समाहित तुमने ही अपनी भावनाओं  से किया हैं सिंचित फलता ,आकर्षण में बांधता कपट से छलता बहुरूपिये बन छुपा लेता अपने सींग , नुकीले दांत विशालकाय देह रक्तरंजित पंजे दबाता रहता सदा आत्मा की आवाज़ रक्तबीज सा कायम रहता मेरा वजूद हाँ ,तुम्हीं ने तो अमरता का पान कराया खड़ा हूँ तुम्हारे ईश्वर के  समकक्ष ईश्वर हैं तो शैतान हैं शैतान हैं तो ईश्वर हैं कि पाप की गहराइयों  से पुण्य का पहाड़ हैं प्रकाश रहित योजना ही अंधकार की Continue reading ईश्वर और शैतान

है सफर में

है सफर में है सभी तो सफर में इस जिंदगी में जो यहाँ, फिरते है अक्सर उदास ज़िंदगी मे जो यहाँ। पलभर भी कभी ये लम्हें पाते खुशी के कहाँ? खुदको बस आ गए है रास ज़ीन्दगी मे जो यहाँ। जो कभी मिली इजात गमें -हयात से राह में, तो वहीँ जी ले कुछ यूँ ख़ास ज़िंदगी में जो यहाँ। ढूंढते क्यूँ फिरते रहते सब अपने आप को, कोइ प्यारा ओर भी है पास जिंदगी में जो यहाँ। राह खुदा की यहाँ सबको न अक्सर मिलती, सब यहाँ भूले उसे है आसपास जिंदगी में जो यहाँ। -मनीषा जोबन देसाई

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो मेरे चेहरे पर मेरा ही चेहरा रहने दो जब तक खुद वो अपने गुनाह ना कबूल करे तुम इन गवाहों को गूंगा बहरा रहने दो कितनी मिन्नतों के बाद ये बहार आयी है अब मौसम न बदले हवा का पहरा रहने दो वो बूढ़ा शजर चिड़ियों का बड़ा प्यारा है अब के खिजां में कुछ पत्तों को हरा रहने दो गूंगे बहरे का एहसास जरा न होने दो होठों पर सन्नाटा तुम भी गहरा रहने दो मेरी मां के आंसू अब और न बहने दो मेरी फोटो पर गुनाह का कुहरा रहने दो Continue reading मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

फासलों में माधूर्य

फासलों में माधूर्य इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग…. बोझिल सा होता है जब ये मन, थककर जब चूर हो जाता है ये बदन, बहती हुई रक्त शिराओं में, छोड़ जाती है कितने ही अवसाद के कण, तब आती है फासलों से चलकर यादें, मन को देती हैं माधूर्य के कितने ही एहसास, हाँ, तब उस पल तुम होती हो मेरे कितने ही पास…. इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग….. अनियंत्रित जब होती है ये धड़कन, उलझती जाती है जब हृदय की कम्पन, बेवश करती है कितनी ही बातें, राहों में हर तरफ बिखरे से दिखते Continue reading फासलों में माधूर्य

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार वरना तेरी वीणा पर मेरा क्या अधिकार।   मौन कंठ है, मौन अश्रू हैं गुमसुम है सब सूनापन भी गीत अधूरा, बोल अछूता बुझा-बुझा-सा है तन मन भी।   मधु की बूँदें बनकर जब बरसें अश्रू अपार अधरों पर तब खिलता है शब्दों का श्रंगार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार   तूफानों में चलने आतुर बोल गीत के मचला करते लहरों से भी टकराने की अर्थ गीत में उछला करते।   नैया दुख की हो जिसकी हो पीड़ा पतवार सुन सकता Continue reading गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे चलो आज फिर दिल को मनाया जावे यादों की  किश्ती को  सजाया  जावे।   यूँ  नंगे बदन  कब तक  चलोगे, यारों चलो फिर किसी का कफन चुराया जावे।   इस शहर को और भी सजाया जाये हर लाश को चौक पे  बिठाया जाये।   यह गुजरात है यहाँ क्या किया जाये मैकदा  अब घर को ही बनाया जाये।   जला दिया जाता है हर घोंसला यहाँ क्यूँ  न इस चमन को जलाया जाये।   पढ़कर गजल बहुत जो रोना आ गया क्यूँ  ना  इसे अश्क से  मिटाया जाये।   पर- शिकस्ता हूँ  यह Continue reading चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   कँप कँप लहरें उठती जाती हर छंद बद्ध के मंथन की गीतों में उठती जाती है हर छवि तेरे दर्शन की।   ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   नभ में उड़ते खगगण सारे करते हैं नवगीत तरंगित इससे मौन-हृदय में होती गीतों की हर रचना मुखरित।   जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   छिप जाती सीपी सागर में मोती भी सीपी के अन्दर वैसे छिपते Continue reading छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

पुकारता मन का आकाश

पुकारता मन का आकाश पुकारता है आकाश, ऐ बादल! तू फिर गगन पे छा जा! बार बार चंचल बादल सा कोई, आकर लहराता है मन के विस्तृत आकाश पर, एक-एक क्षण में जाने कितनी ही बार, क्युँ बरस आता है मन की शान्त तड़ाग पर। घन जैसी चपल नटखट वनिता वो, झकझोरती मन को जैसे हो सौदामिनी वो, क्षणप्रभा वो मन को छल जाती जो, रुचिर रमणी वो मन को मनसिज कर जाती जो। झांकती वो जब अनन्त की ओट से, सिहर उठता भूमिधर सा मेरा अवधूत मन, अभिलाषा के अंकुर फूटते तब मन में, जल जाता है यह तन Continue reading पुकारता मन का आकाश