जुल्फ़ें

जुल्फ़ें

चेहरे पे आई आवारा ज़ुल्फ़ को संवारा कीजिए
ज़ुल्फ़ के पीछे छीपेे हुस्न-ए-चांद को निखारा कीजिए

लहराती ये ज़ुल्फ़ नागीन सी की दिल है मचल उठे
बांध के ये ज़रा कायदे से हुस्न का इशारा कीजिए

रुखसार के लिये हों परेशान ऐसा ना क़हर कीजिए
ज़ुल्फ़ के साये में शाम-ए-सकून गुजरे आसरा कीजिए

कुडंली बना कर इन ज़ुल्फ़ों को चोटी सजाया कीजिये
बेणी सजाके फूलों की इन ज़ुल्फ़ों को संवारा कीजिए

ये ज़ुल्फ़ें यूँ गिराई चेहरे पर दिल दीदार को मचल उठा
यों झटका के ज़ुल्फ़ मेरे दिल पे खंजर न मारा कीजिए

बाँध ज़ुल्फ़ें ज़रा दीदार-ए- हुस्न का नज़ारा कीजिये
है इल्तिजा सजन की ये भूल ना कभी दूबारा कीजिए

(हर्ष महाजन जी की ग़ज़ल को आधार कर के रचित)

सजन

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