मेरा नाम आया..

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बेताब था बहुत लेकिन मुझे आराम आया,
गुनाहों के खुनी पन्नों पे जब मेरा नाम आया,
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वक़्त की रेत थी जो हाथों से अब जा चुकी थी,
मोहलत अब क्या मांगू जब नया फरमान आया,
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बदलती राह अब तब्दील हुई गलियों के बीच,
उस ख़ौफ़ में भी वो तो सर-ए-आम आया,
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इंसान भी नहीं बाकि रहा इस खेल में अब,
मंजर मौत का था ना कोई निशान आया,
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रुपहले चेहरे अब और धुंधले से हो चुके थे,
तन भी थक चूका था ना कोई आराम आया,
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काल भी जैसे अब मुझको है लगता भूल गया,
सभी के बीच में बदनाम मेरा नाम आया,
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हौसले पस्त हुए अब मुझे अपना तो सही,
हार बैठा हूँ जहाँ, वहाँ मेंरा मुकाम आया,
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बेताब था बहुत………………
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#विराज़

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"Poet"

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