इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

सूखती नदी

चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! संग ले चली थी, ये असंख्य बूँदें, जलधार राह के, कई खुद में समेटे, विकराल लहरें, बाह में लपेटे, उत्श्रृंखलता जिसकी, कभी तोड़ती थी मौन, वो खुद, अब मौन सी हुई है… चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! कभी लरजती थी, जिसकी धारें, पुनीत धरा के चरण, जिसने पखारे, खेलती थी, जिनपर ये किरणें, गवाही जिंदगी की, देती थी प्रवाह जिसकी, वो खुद, अब लुप्त सी हुई है….. चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! अस्थियाँ, विसर्जित हुई है जिनमें, इस सभ्यता की नींव, रखी है Continue reading सूखती नदी

दरिया का किनारा

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा…. कितनी ही लहरें, यूँ छूकर गई मुझे, हर लहर, कुछ न कुछ कहकर गई है मुझे, दग्ध कर गई, कुछ लहरें तट को मेरे, खामोश रहा मै, लेकिन था मैं मन को हारा, गाती हैं लहरें, खामोश है किनारा…. बरबस हुई प्रीत, उन लहरों से मुझे, हँसकर बहती रही, ये लहरें देखकर मुझे, रुक जाती काश! दो पल को ये लहर, समेट लेता इन्हें, अपनी आगोश में भरकर, बहती है लहरें, खामोश है किनारा…. भिगोया है, लहरो ने यूँ हर पल मुझे, हूँ बस इक किनारा, एहसास दे गई मुझे, टूटा इक Continue reading दरिया का किनारा

संघर्ष से स्वाभिमान तक

शब्द, गान विलुप्त हुए, मौन था अबाधित अव्यक्त, अछूता व्यक्तित्व, दिवस -रात्र संवाद रहित मुखर, चपल वर्चस्व हो गया पूर्णतया पराजित अंतःकरण में अंतर्द्वन्द, विकलता समाहित ।। रंगमंच पर अभिनीत ज्यों हर पल अनुभव दुःख सुख के आए वेष बदल अवलंबन से कुंठा हुई प्रबल अवहेलित, तृषित दृग सदा सजल।। निश्छल मन की पुलक थी कहीं खोई व्यथाओं से शिथिल मन हुआ निर्मोही उल्लास, उमंग की जो सृष्टि संजोई उस पथ से भटक गया बटोही।। प्रतिभा ने आशा का खोल दिया द्वार प्रज्वलित ज्ञान दीप से कल्पना हो उठी साकार सार्थक हो रहे स्वप्न विचार ले रहे आकार साधना में Continue reading संघर्ष से स्वाभिमान तक

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग) चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में Continue reading लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) मन्नत मांगने सुबह-सुबह पति-पत्नी गए शिव मंदिर मन्नत का धागा बाँधने पत्नी ने जैसे ही हाथ उठाया अचानक मन में उसके आया कोई ख्याल पुराना मन्नत का धागा बांधे बिना उसने नीचे हाथ झुकाया हक्का-बक्का बेचारा पति बोला अपनी सुहागन से हे भागवान, क्यों नहीं बाँधा तुमने धागा मन्नत का किस ख्याल में डूबी हो, न करो कोई सोच-विचार बाँध दो धागा अगर भोगना है सुख तुमने जन्नत का पत्नी मुस्कुराकर बोली मन्नत मांगने ही वाली थी मैं कि ईश्वर दूर कर दे मेरे सुहाग की मुश्किलें तमाम फिर मन में विचार आया Continue reading कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले निभाकर धर्म कड़वा चौथ का पति-वता पत्नी सो रही थी चैन से सितारों की झिलमिल बारात को निहार रहा था चाँद अपने नैन से अधीर पति ने देखा पत्नी के पास कुंडली लगाए बैठी थी एक नागिन सोलह शृंगार में दुल्हन-सी सजी जैसे हो किसी नाग की सुहागिन ख़ुशी से पागल पति धीरे से बोला डस ले, डस ले, अच्छा अवसर है कोटि-कोटि नमन करता हूँ तुझे हे नागिन तुझे भला किसका डर है चुप कमीने, फुँकार कर बोली नागिन दीदी को चरण वंदना करने आयी हूँ कभी लगे न इसको तेरी बुरी नज़र नाग देवता Continue reading डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

कल वक्त मेरा भी होगा

कल वक्त मेरा भी होगा वक्त, मैंने किताबों में पढ़ा है करता नहीं तू किसी का इंतज़ार माँ की कहानियों में सुना है अक्सर फुर्सत के पल होते नहीं तेरे पास फिर क्यों तू टुकुर-टुकुर देखता मरता है जब कोइ निर्धन भूख से क्यों नहीं है तुझे कोई खबर लुटती है अस्मत जब बेटी की तूफान बनकर आया चोरी-चोरी बुझा दी रोशनी टूटी झोपडी की टपका बारिश बनकर उसकी छत से भीगा दिया कम्बल फिर गरीब का है बस औकात तेरी इतनी कि तू फिसल जाता है हर बार हाथ से जिस दिन होगा वक्त लाचार का शायद रफ़्तार तेरी Continue reading कल वक्त मेरा भी होगा

वक़्त

वक़्त वक्त तू रहता कहाँ है कहाँ बनाया है तूने बसेरा हो अगर कोई पता ठिकाना मुझे भी इक दिन बतलाना होगी वह कौन-सी डगर जिधर से अक्सर गुजरता है फुर्सत मिले जब कभी तुझे यार मुझे भी साथ ले चलना जब भी बाँधना चाहा तुझे पलों की रेशम की डोर से जाने कहाँ गुम हो जाता फिसली हो जैसे रेत मुट्ठी से थकान भी थक गयी है राह तेरी देखते देखते दिनकर भी हुआ ओझल तेरे ही मिलन की आस में कब होती है तेरी सुबह होती है कब तेरी रात क्या कोई रंग-रूप है है क्या कोई आकार Continue reading वक़्त

मैं तो फकत शून्य था

मैं तो फकत शून्य था सृष्टि के बीज से फूटा था इक नन्हा अंकुर नीले नभ तले लेता था सांस कोई जैसे पंखुड़ी पहली खिली हो बसन्त के पीले आँचल में याद कर तूने ही बोया था बीज इस अंकुर का मैं तो मात्र शून्य था ये तू ही तो था भरे प्राण जिसने इस निष्प्राण में मेरा तो अस्तित्व था नगण्य बनाया क्यों तूने इसे परिपूर्ण कण-कण में सांस तेरी पग-पग पर छाँव तेरी जिस डगर चलूँ पाऊँ तेरा ही प्रतिबिम्ब मैं तो केवल शून्य था रहा सदा इस भ्र्म में जैसे स्वयं को रचा हो मैंने बंद थी Continue reading मैं तो फकत शून्य था

सावन के जख्म

  सावन के जख्म घनन घनन-घनन घनन देखो कैसे गरजे हैं मेघा फिर से झूम-झूम कर रिझाती काली बदरिया अपने रूठे साजन को नन्ही-नन्ही जल की बूंदें फिर से लेकर आया है बादल बादलों में छिपकर जैसे विरह राग छेड़ा है किसीने सोलह शृंगार के रथ पर सवार फिर से थिरका है पागल सावन सावन के भीगे आँचल तले है पुकारती संतप्त सजना अब तो लौट आओ बेदर्दी प्रियतम इधर सहा ना जाये दर्द विरह का और उधर काली घटा देती जख्म हज़ार क्यों तड़पाते अपनी विरहन को चौमास की रिमझिम बौछारों में मर्म की छटपटाहट तुम क्या जानो बाट Continue reading सावन के जख्म

आयो रे सावन झूम के

आयो रे सावन झूम के रिमझिम-रिमझिम बरसती बूदों का अलबेला मौसम है सावन धुप से झुलसती और ताप से बेचैन धरा की प्यास बुझाता है सावन पृथ्वी और बादल मिलकर रचते हैं नए-नए तिलिस्म सृष्टि और हरियाली के फिर से कोई तान छेड़ता है सावन हैं इसकी झोली में अनगिनित ख्वाब कुछ उजले, कुछ भीगे हम सब के लिए कुछ न कुछ लेकर आया है दीवाना सावन अन्न-दाता के लिए धरती की गोद में फसल के साथ हरित सपने बोने का मौसम है सावन प्रेमियों के लिए अपने अधूरे प्रेम का इज़हार करने का मौसम है सावन आदि काल से Continue reading आयो रे सावन झूम के

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था मेरा मुकद्दर सहसा बदलने यहाँ आया था।   कितना खामोश, तन्हा, उदास दिख रहा है वो ना मालूम किस-किससे मिलके यहाँ आया था।   कितना अजीब चिराग है बुझाये बुझता नहीं वो किस अँधेरे से गुजरके यहाँ आया था।   इस राह की धूल पावों को जलाने लगी है किसका दहकता जिगर टहलने यहाँ आया था।   मेरी ही आवाज का झोंका मुझे रुला गया है ना जाने किस दर्द को छूके यहाँ आया था।           ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग)

क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग) छिड़ा गृह युद्ध पति-पत्नी के दरमियान बावली घटा छाई बिजली लगी कड़कने घर की सुनसान दीवारें बनीं तमाशबीन गुमसुम आँगन की सांसें लगी धड़कने व्यंग वाणों की बौछार दोनों दिशाओं से घर जैसे बन गया हो कुरुक्षेत्र का मैदान पति बोला तुझ जैसी मिल जाएँगी पचास ये सच्चाई मगर तू कहाँ समझेगी नादान क्रोध के अग्नि वाणों को देकर विराम पत्नी बोली हुजूर तनिक इधर तो आईये इतने वर्षों से झेला है बालम तुमने मुझे तो क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (किशन नेगी ‘एकान्त’ )