जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए, तब मंज़िल का पता उसे भला कौन बताए ? समंदर के गिर्दाब में फंसी हो जब कभी कश्ती, इस तूफां में माँझी तब कैसे उसे पार लगाए? जरूरी नहीं कि हर मुसाफ़िर को सही रास्ता मिले, तमाम हैं जो भटके तो फिर कभी लौट के ना आए | गुमान भी शागिर्द बन बैठा है कामयाबी का , बहुत कम लोग हैं यहाँ जो इससे हैं बच पाए | गर मज़बूत हो इरादा और यकीं खुद पर तो, किसकी है जुर्रत यहाँ जो उसे राह से डिगाए ? मेरी शायरी से –

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग) शादी के सुनहरें पिंजरे में क़ैद तड़पता पति बन गया था अपनी मनमोहिनी का देवदास कैसे कराऊँ खुद को आज़ाद इस पिंजरे से देदा-दौड़ा गया पत्नी पीड़ित तांत्रिक के पास चेहरा देख उसका तांत्रिक मुस्कुराकर बोला बेटा, सब जानता हूँ क्यों मेरे पास तू है आया कभी मेरी ज़िन्दगी भी थी बहुत ही खुशहाल जिसके पास तू आया वह भी पत्नी का सताया गंभीर मुद्रा में खोकर तांत्रिक धीरे से बोला धोखा है ये माया-मोह, नश्वर है निर्बल काया मगर बात मेरी सुनकर बेहोश मत हो जाना बेटा तुझ पर है एक निष्ठुर चुड़ैल Continue reading एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

ये बालक कैसा? (हाइकु विधा)

ये बालक कैसा? (हाइकु विधा) अस्थिपिंजर कफ़न में लिपटा एक ठूँठ सा। पूर्ण उपेक्ष्य मानवी जीवन का कटु घूँट सा। स्लेटी बदन उसपे भाग्य लिखे मैलों की धार। कटोरा लिए एक मूर्त ढो रही तन का भार। लाल लोचन अपलक ताकते राहगीर को। सूखे से होंठ पपड़ी में छिपाए हर पीर को। उलझी लटें बरगद जटा सी चेहरा ढके। उपेक्षितसा भरी राह में खड़ा कोई ना तके। शून्य चेहरा रिक्त फैले नभ सा है भाव हीन। जड़े तमाचा मानवी सभ्यता पे बालक दीन। बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ तिनसुकिया

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़, गुरबत के दिनों की कुछ पुरानी यादें फिर ताज़ा हो जाती हैं I इंसानी फितरत मापने का अच्छा पैमाना है ये मुफ़लिसी भी, अपनों के बे-रब्त हुए त-अल्लुकों का आईना दिखा जाती है I वो गुरबत का मंज़र भी देखा है तमाम घरों में अक्सर मैने, जब माँ बच्चों को खिला खुद बचा-खुचा खाकर सो जाती है I बेटी के ब्याह की फ़िक्र ने बाप को असमय बूढ़ा सा कर दिया, अज़ीब रिवाज़ है बिन दहेज़ बेटी घर से विदा नहीं हो पाती है I शहर में अमीरी की तश्वीर Continue reading कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

सरहदी मधुशाला

सरहदी मधुशाला मधुशाला छंद (रुबाई) रख नापाक इरादे उसने, सरहद करदी मधुशाला। रोज करे वो टुच्ची हरकत, नफरत की पी कर हाला। उठो देश के मतवालों तुम, काली बन खप्पर लेके। भर भर पीओ रौद्र रूप में, अरि के शोणित का प्याला।। झूठी ओढ़ शराफत को जब, वह बना शराफतवाला। उजले तन वालों से मिलकर, करने लगा कर्म काला। सुप्त सिंह सा जाग पड़ा तब, वीर सिपाही भारत का। देश प्रेम की छक कर मदिरा, पी कर जो था मतवाला।। जो अभिन्न है भाग देश का, दबा शत्रु ने रख डाला। नाच रही दहशतगर्दों की, अभी जहाँ साकीबाला। नहीं चैन Continue reading सरहदी मधुशाला

तुम सरहद के वीर सिपाही हो

तुम कर्मठ हो, बलशाली हो तुम सरहद के वीर सिपाही हो तुम पुण्य धर्म के अनुयायी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो तुमने वेदों से जीना सीखा है सच्चाई के बल चलना सीखा है तुमने गीता का पथ अपनाना सीखा है तुम सच्चेे प्यारे हिन्दुस्थानी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो। तुमने सूर्य उदित होते देखा है उसकी गरिमा को बढ़ते देखा है गंगा में वही अवतरित होते देखा है तुम इन प्रखर किरण के साथी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो। जंजीरें तुमने खुलती देखी है तुमने आजादी आती देखी है खुद कुछ कर सकने की चाहत भी देखी Continue reading तुम सरहद के वीर सिपाही हो

मेरी याद तो आती रहेगी

मेरी याद तो आती रहेगी मेरे जाने के बाद मेरी याद तो आती रहेगी आँसू की ओट से चुपके छिपाती वो आती रहेगी। मुरझाये हुए फूलों से तो पूछकर देखो बहार हर साल हर सूरत तो आती दिखेगी नदियाँ सूखकर कभी निर्जल हुआ नहीं करती कलेजा रेत का चीरो नमी उसकी दिखेगी संजोकर रखी होती है याद जो, वो आती रहेगी आँसू की ओट से चुपके छिपाती वो आती रहेगी। कलियाँ थीं तो भौरे थे गुनगुनाते हुए थे अब याद उनकी खुश्बू तरह मँड़राती दिखेगी ये सूनापन ये सन्नाटा भी चुप नहीं रहता हर आहट पे ये खामोशी भी जागी Continue reading मेरी याद तो आती रहेगी

देखूँ जिस ओर

देखूँ जिस ओर देखूँ जिस ओर तो मुझको श्रंगार अनूठा दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है। वह मँड़राते फिरते भ्रमरों का फिर कुछ इतराना कलियों का डाल डाल पर खिलते सुमनों का सजना और रिझाना गंधों का खुली पंखुरी पर शबनम कण भी मोती जैसा दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है। चूम चूमकर लाली पूरब की वह प्यार जताना नव किरणों का फिर संध्या की गोदी में छिपकर और नशीला बनना रातों का तारों की झुरमुट में छिपता चाँद सलोना दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता Continue reading देखूँ जिस ओर

गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा

गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा तार-तार दिल में भी मैं स्वर सजा लूँगा। तू नफरत भी ना कर पावेगा मुझसे प्यार के हर बोल से तुझे रिझा लूँगा। राह पर इन बिखरे सारे पत्थरों को चूम चूमकर मैं अब खुदा बना लूँगा। आँसुओं से भिंगोकर हरेक काँटे को बाग में खिलते फूलों-सा बना लूँगा। मंदिर से बाहर तू क्यूँकर भटकेगा आ दिल में मेरे मैं अपना बना लूँगा।                भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत मौत से पूछ तो लो कि कब कहाँ ले जावेगी इस अपाहिज जिन्दगी को कैसे ले जायेगी। एक बार तो वाह जरूर इस तरफ आवेगी बटोरकर पुरानी यादें नई दे जावेगी। इन पलकों ने लरजते अश्क रखें है जनम से नमालूम कब तक ये इन्हें यूँ सहलायेगी। न जाने कहाँ ये तूफॉन उड़ा ले जावेगा और कौन सी लहर उस किनारे ले जायेगी। जीवन कब बिगड़ जावेगा, कब सँवर जावेगा नमालूम ये मौत यहाँ कब क्या कर जायेगी। जिन्दगी! अब तू इस मौत के खौफ की ना सोच सहेली है यह तेरी प्यार से ले जायेगी। …. Continue reading जिन्दगी और मौत

रिश्ता

रिश्ता तोड़ना मत रिश्ता कभी कच्चा मकान देखकर किसी गरीब का क्योंकि पकड़ बहुत मजबूत होती है मिटटी की धरती से याराना ये मिटटी और धरती का पुराना है युगों-युगों से संगमरमर पर तो अक्सर पैर फिसलते ही रहते हैं क्योंकि क्षणिकहै ये याराना (किशन नेगी ‘एकांत’ )

पसंद

पसंद बना दिया अगर किसी को अपनी पसंद तो कोई बड़ी बात नहीं इस सफर में क्योंकि तुम अकेले मुसाफिर हो लेकिन बन गए जो किसी की पसंद तुम तो ये बात बहुत बड़ी होगी क्योंकि इस सफर में तुम अकेले नहीं कोई और मुसाफिर भी चलता है संग तुम्हारे इस सफर में (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वक्त का मिजाज

वक्त का मिजाज बहुत वक्त गुजारा जिंदगी का हमसाया बनकर सागर की लहरों की तरह पल आते गए, पल गुजरते गए पर कुछ न बदला लगता था लगेगा वक्त जिंदगी को बदलने में मगर जब देखा वक्त के बदलते मिज़ाज़ को तो गले उसे लगा लिया हाथ थामे इक-दूजे का चल पड़े बनकर हमसफ़र पर नहीं पता था कि इक दिन बदला हुआ वक्त ही जिंदगी बदल देगा (किशन नेगी ‘एकांत’ )

दो दिन

दो दिन हे मनु की संतानतेरी ये ज़िन्दगी हैबस दो दिन कीएक दिन तेरे हक में औरदूसरा दिन तेरे खिलाफजब तेरे हक़ का दिन होगातू गुमान न करनाभाग्य और किस्मतहोंगी तेरी परछाईयाँ जिंदगी होगी मेहरबानमगर पाँव तू जमीन पर ही रखनाजिस दिन ज़िन्दगी होगी तेरे खिलाफतू धीरज मत खोना, शांत रहनामंडराएंगे निराशा के काले बादलभाग्य और किस्मत भी रूठे होंगेमगर आशा की ज्योति जलाये रखनाकर्मगति को विराम न देनारहना होगा अग्रसर कर्मपथ पर (किशन नेगी ‘एकांत’ )

इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)

इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति) “शिवेंद्रवज्रा स्तुति” परहित कर विषपान, महादेव जग के बने। सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।। माथ नवा जयकार, मधुर स्तोत्र गा जो करें। भरें सदा भंडार, औघड़ दानी कर कृपा।। कैलाश वासी त्रिपुरादि नाशी। संसार शासी तव धाम काशी। नन्दी सवारी विष कंठ धारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।१।। ज्यों पूर्णमासी तव सौम्य हाँसी। जो हैं विलासी उन से उदासी। भार्या तुम्हारी गिरिजा दुलारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।२।। जो भक्त सेवे फल पुष्प देवे। वाँ की तु देवे भव-नाव खेवे। दिव्यावतारी भव बाध टारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।३।। धूनी जगावे जल को चढ़ावे। जो भक्त Continue reading इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)