किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

इंद्रधनुष सा जीवन

इंद्रधनुष सा जीवन अनंत , असीम , नील गगन सा है ईश्वर। जिसमें सृष्टि का कण -कण समाया है।। जलचर ,थलचर ,नभचर , असंख्य जीव है। उत्पत्ति , संहार , पालन – पोषण पाया है।। पल पल घुटन सिहरन तो कभी खुशी । इंद्रधनुष सा रंग बिरंगा जीवन हमने पाया है।। कंटीली झाड़ियों से नील गगन में झांक कर। आशाओं का फिर से हमने एक सूरज पाया है।। व्यर्थ रोज के आडम्बरों ने कैसा उलझाया है। सारा जीवन जब सच देखा ये तो झूंठी काया है।। कोई नहीं अपना जग में गवाह नील गगन है। दौड़ भाग सारी होगी बेकार Continue reading इंद्रधनुष सा जीवन

परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

वो कभी वक्त का मारा तो कभी हुआ परेशान सिंधु लहरों में बह गए हैं उसके सभी अरमान कभी वह बंजर जमीं तो कभी खोखला आसमान रहम करो ऐसे पति पर आखिर वह भी है इंसान नहीं है कोई ठौर ठिकाना ना उसका कोई गाँव नसीब में नहीं है शायद पीपल की शीतल छाँव कंटीली डगर चलते रक्तरंजित हुए उसके पाँव खोटी तक़दीर पर कौवे भी मंडराते कांव-कांव गीता पढता वह ताकि मिल जाए उसे आज़ादी ग्रन्थ साहिब भी सुनता ताकि रुक जाए बर्बादी नित्य क़ुरान वह पढता बन कर उसका फरियादी जिसने ऐसा हाल किया वह थी उसकी शहज़ादी Continue reading परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

पति-पत्नी दोनों गए एक कॉकटेल पार्टी में जहाँ ग़मों के जाम पर जाम छलक रहे थे मदहोश मनचले जोड़े डाल बाहों में बाहें उन्मत हो मदिरा के समुन्द्र में बहक रहे थे चढ़ा कर एक जाम लड़खड़ाती पत्नी बोली डार्लिंग, टल्ली हो कर वह जो मटक रहा है ठुकराया था रिश्ता उसका मैंने एक दिन मुझे न पाकर अब देखो कैसे भटक रहा है पति बोला, नशे में वह नहीं तुम हो कामिनी ख़ुमारी में दिमाग तो तुम्हारा ही घूम रहा है तुम्हें ही न पाकर खुशनसीब है वह कितना, लगाकर जाम ख़ुशी के जश्न में झूम रहा है हाथ Continue reading डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

  थका चेहरा लटकाये पति घर लौटा जैसे पतझड़ में सावन की झड़ी हो झल्लाकर बोला खाना लगा दो जानू पत्नी जैसे छप्पन व्यंजन लिए खड़ी हो   भूखे ने जैसे ही खाया पहला निवाला उड़ गयी बेचारे की चेहरे की चमक आक्रोशित हो लगा पत्नी को कोसने क्या सब्जी में नहीं डाला था नमक   घबराई, फिर मुस्कुराकर बोली पत्नी जानू, भूखे पेट इतना नहीं बिगड़ते सब्जी जल गयी थी, माँ मेरी कहती है जले पर कभी नमक नहीं छिड़कते   जले-भुने पति ने निकाली दबी भड़ास मेरे जले पर नमक ही तो छिड़कती हो  तुम्हारे बाप ने बाँधा Continue reading जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

रसोई में बजाकर बर्तन सुबह-सुबह पत्नी झल्लाई अपने वफ़ादार दुल्हे पर चादर ताने देखते हो ख़्वाब पड़ोसन के और जलते हैं इधर ख़्वाब मेरे चूल्हे पर होती अर्धांगिनी अगर किसी राक्षस की शायद कभी ना होती मैं इतनी परेशान किस कर्मजले पंडित ने मिलाई कुंडली जो ढूंढ कर मिला तुम जैसा पति शैतान पति सकुचाया, फिर मुस्कराकर बोला भली हो तुम जैसे कश्मीर की वादी राक्षस को कैसे तुम वरमाला पहनाती जानू, खून के रिश्ते में नहीं होती शादी अगर होती तुम सुहागन राक्षस की सदैव कहलाती तुम उसकी दानवी काश, ये सपना अगर सच हो जाता मेरे ख़्वाबों में Continue reading अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

ये शाम कितनी मदहोश है

मखमली धुमिल चादर लपेटे ये शाम कितनी मस्तानी है मंथर गति से ढलता सूरज दस्तक देती रात की रानी है उन्माद में डूबा है नभमण्डल जैसे फैलाकर पंख असमानी धीमे पग धर बटोही चला है गठरी में बांधे ख्वाब अरमानी ले चुम्बन धान की बालियों का हवा गीत कोई गुनगुनाती है खेत किनारे थिरकती पीपल बांसुरी लिए राग एक सुनाती है ढलते सूरज की चंचल किरणें कुछ उदास, कुछ ग़मगीन हैं थकी-सी अनजान परछाईयाँ कदमों की आहट नमकीन हैं मंदिर की घंटी की धुन संग शाम ठुमक-ठुमक ढलती है पायल की झंकार थिरक कर ठंडी आहें भर कर चलती है Continue reading ये शाम कितनी मदहोश है

पुस्तक समीक्षा

विषय:- पुस्तक समीक्षा कृति:- दीपक तले उजाला कवयित्री:- उर्मिला श्रीवास्तव पृष्ठ:-94 मूल्य:-100/- समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित” लखनऊ की कवयित्री उर्मिला श्रीवास्तव की यह आंठवी कृति “दीपक तले उजाला” पढ़ी। इस कृति की सभी कविताएँ मानव को कुछ न कुछ सीख देती है। इस कृति की पहली काव्य रचना चार घड़ी है। यह जीवन क्षण भंगुर है। जीवन कब तक है किसी को पता नहीं। यह सच्चाई हमेशा याद रहे। ये मानव तन मिलना दुर्लभ है। यदि मिला है तो इसमें अच्छे कर्म करें। बदला,अनकही ,खुद सर,36 की गिनती जैसी रचनाओं से श्रीवास्तव ने जीवन की अच्छाइयों को बताने का प्रयास Continue reading पुस्तक समीक्षा

दोहे

राजस्थानी दोहे चौमासो बरसो घणो, साजण याद सताय। एक पल भी जुग लागे,बरसे रिमझिम हाय।। काळी काळी बादली,आसमान पर छाय। घर घर करती हे घटा, तू धरती पर आय।। होरी खेल रही सखी,रंग मलमल लगाय। फागण में भींगे घणी, मनड़ो भी हरसाय।। बिजुरी चमके बावरी, हिवड़ो भी शरमाय। बादल बरसे जोर सूं, पिया मिलन की आय।। टाबर सगळा देख के,जीव में जीव आय। खेलण में बिसरा न दे, हिवड़ा बैठे छाय।। महँगाई ने कर दी, देखो नींद खराब। सुरसा सी बढ़ती जाय, चले सियासी दाव।। करसान बैठ रो रिया, देख राजनीत को खेल। योजना कागज़ में छे,बढतो जावे मेल।। कवि Continue reading दोहे

इश्क के बाज़ार में

इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार   अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों धोता है नादानी में जिसे तू, मुहब्बत समझ बैठा था है ये वही गुनाह, जिसे आज तू ढोता है   गुनाह नहीं था कोई, हाथ की लकीरों का नतीजा तो वही होता है, जो कर्म होता है काँटों से खुशबू की, चाहत न रखना कभी कल वही उगेगा फिर, जो आज तू बोता है दस्तक देने आयी थी, किस्मत तेरे द्वार पर रुठ कर चली गयी, चादर ताने क्यों सोता है इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों Continue reading इश्क के बाज़ार में

कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अपने सुहाग से चंचल सुहागन बोली आज पड़ोसन के यहाँ राम कथा थी पंडित पांडे जी ने कहा रामराज्य में ना कोई दुःख था, ना कोई व्यथा थी  रामराज्य में शेर-बकरी भी जानू बेफिक्र पीते पानी एक ही घाट पर संभव ये कैसे, हमने तो नहीं काटी अब तक कोई रात एक ही खाट पर  व्यंग-वाणों से घायल पति बोला संभव ये कैसे नहीं हो सकता है जब मैंने काटी ज़िन्दगी बन बकरी तो यह किस्सा भी सच हो सकता है  ये सुनकर पत्नी फूली ना समायी फिर खो गयी अपने ही साम्राज्य में जब यह घटित हो सकता है Continue reading कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अभी तो पहला ज़ाम है (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

   इक नयी नवेली दुल्हन ने दुलारे पति को फोन किया प्यारे जानू घर कब आओगे मुझे इतनी जल्दी भुला दिया पलट कर बेचारा पति बोला प्यारी बस लेता हूँ तेरा नाम बेसब्री झेल लो कुछ पल और यहाँ लगा है जाम पर जाम झल्ला कर पत्नी चिल्लाई घर कब तक पहुंचोगे कब ख़त्म होगा ये जाम क्या यहीं पर जमे रहोगे होकर मदहोश पति बोला प्रिये क्या नशीली शाम है तनिक धैर्य धरो गजगामिनी अभी तो बस पहला जाम है (किशन नेगी ‘एकांत’ )

चले दूल्हे राजा (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

अपनी ख़्वाबों की रानी को पत्नी बनाने चले दूल्हे राजा असुरों की बारात संग लिए संग में है बेसुरा बैंड-बाजा लेकिन पता चला जब उसको दहेज़ में ससुर देता है बाइक लौटा दी बारात उसने क्योंकि पेट्रोल के दाम हो गए हाइक ख़बर ये सुन, वरमाला पकड़े दुल्हन पड़ी थी कोने में बेहोश कोस रही थी निष्ठुर पेट्रोल को क्या आज ही होना था मदहोश (किशन नेगी ‘एकांत’ )

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वो कोई और नहीं

वो तूफानी रात मचलती शीत लहर धुंधली चादर लपेटे चेतनाशून्य में डूबा रात का सन्नाटा ख़ामोशी करती पहरेदारी ऐसी संवेदन-शून्य वीरानी रात में चला जा रहा था कोई अपनी डगर जैसे भूल गया हो मंज़िल अपनी फकत किसी परछाई का अहसाह था अकस्मात गुजरा एक वाहन उसी पथ से जिस पथ थी वह सहमी परछाई अनजान चेहरा कोई उतरा उस वाहन से, देख उस परछाई को शायद इरादे भी नेक नहीं लगा करने कुछ इशारे भद्दे, हरकतें अश्लील चेहरा कामातुर भाव लिए परछाई डरी-डरी, सहमी-सी क़दमों की रफ़्तार तेज कर दौड़ी जा रही थी, ढूंढने कोना कोई सुरक्षित कभी चिल्लाती Continue reading वो कोई और नहीं