पारो जैसी लगती हो

पारो जैसी लगती हो तुम तो पतझड़ मे भी बहारों जैसी लगती हो, किसी झरने की मीठी धारों जैसी लगती हो। मै तड़पता हुआ देवदास बन गया देखो, तुम मुझे बिछड़ी हुई पारो जैसी लगती हो।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज पश्चिमी चम्पारण :-8051804177 Advertisements

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श्रापमुक्त

श्रापमुक्त कुछ बूँदे! … जाने क्या जादू कर गई थी? लहलहा उठी थी खुशी से फिर वो सूखी सी डाली…. झेल रहा था वो तन श्रापित सा जीवन, अंग-अंग टूट कर बिखरे थे सूखी टहनी में ढलकर, तन से अपनों का भी छूटा था ऐतबार, हर तरफ थी टूटी सी डाली और सूखे पत्तों का अंबार.. कांतिहीन आँखों में यौवन थी मुरझाई, एकांत सा खड़ा अकेला दूर तक थी इक तन्हाई, मुँह फेरकर दूर जा चुकी थी हरियाली, अब दामन में थे बस सूखी कलियों का टूटता ऐतबार… कुछ बूँदे कहीं से ओस बन कर आई, सूखी सी वो डाली Continue reading श्रापमुक्त

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

जिन्दगी चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये गरीब की झोपड़ी में झाँक के देखा जाये यहीं पे ईश्वर और उसकी आस्था बसती है चलो, गरीब के आँसू तैर के देखा जाये।   कल ही रात में बड़ी जोर की बारिश हुई थी झोपड़ी ढह गई होगी जाके देखा जाये मुआवजा माँगती वहाँ कई लाश तो होंगी उनकी मुस्कराहट को पास से देखा जाये।   चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये इक चमचमाती कार में चल के देखा जाये बहुत सुखद लगता है गरीब का दर्द देखना चलो, भूखे बच्चे को तड़पते देखा जाये।   बहुत ऊब Continue reading चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

विरह के पल

विरह के पल सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं….. आया था जीवन में वो जुगनू सी मुस्कान लिए, निहारती थी मैं उनको, नैनों में श्रृंगार लिए, खोई हैं पलको से नींदें, अब असह्य सा इन्तजार लिए, कलाई की चूरी भी मेरी, अब करती शोर नहीं, सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं…. इक खेवनहार वही, मेरी इस टूटी सी नैया का, तारणहार वही मेरी छोटी सी नैय्या का, मझधार फसी अब नैय्या, धक-धक से धड़के है जिए, खेवैय्या अब कोई मेरा नदी के उस ओर नही, सखी री! विरह की इस Continue reading विरह के पल

उजड़ा हुआ पुल

उजड़ा हुआ पुल यूँ तो बिसार ही चुके हो अब तुम मुझे! देख आया हूँ मैं भी वादों के वो उजरे से पुल, जर्जर सी हो चुकी इरादों के तिनके, टूट सी चुकी वो झूलती टहनियों सी शाखें, यूँ ही भूल जाना चाहता है अब मेरा ये मन भी तुझे! पर इक धुन! जो बस सुनाई देती है मुझे! खीचती है बार बार उजरे से उस पुल की तरफ, टूटे से तिनकों से ये जोड़ती है आशियाँ, रोकती है ये राहें, इस मन की गिरह टटोलकर , बांधकर यादों की गिरह से, खींचती है तेरी तरफ ये! कौंधती हैं बिजलियाँ Continue reading उजड़ा हुआ पुल

काफी नहीं ?

काफी नहीं ? बैठे रहते है जब हम खोये हूँए सपनो की खोज में , आसमान से टपकते पानी से संवेदना हथेली पर शायद फिर से संजोले ! पर .. ये जो समय है, वो दूर से चमककर टूटते हुए तारे की तरहा बिखर बिखर जाता है, और ..आंसुओ की सतह पर सदीओ तक चमकता रहता है, फिर भी ज़िंदा हूँ काफी नहीं ? –मनीषा ‘जोबन ‘

रक्तधार

रक्तधार अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू, अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू….. चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को, मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई, सतत प्रयत्न कर भी पाप धरा के न धो पाई, व्यथित हृदय ले यह रोती अब, जा सागर में समाई। व्यर्थ हुए हैं प्रयत्न सारे, पीड़ित है इसके हृदय, अन्तस्थ तक मन है क्षुब्ध, सागर हुआ लवणमय, भीग चुकी वसुन्धरा, भीगा न मानव हृदय, हत भागी सी सरिता, अब रोती भाग्य को कोसती। व्यथा के आँसू, कभी बहते व्यग्र लहर बनकर, तट पर Continue reading रक्तधार

ख्वाब जरा सा

ख्वाब जरा सा तब!……….ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! कभी चुपके से बिन बोले तुम आना, इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना, वो राह जो आती है मेरे घर तक, उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना, उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा, तेरी पग से की होंगी जों उसने बातें, उनकी जज्बातों को मैं चुपके से सुन लूंगा, तब ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! मृदुल बसन्त सी चुपके से तुम आना, किल्लोलों पर गूँजती रागिणी सी कोई गीत गाना, वो गगन जो सूना-सूना है अब तक, Continue reading ख्वाब जरा सा

अतृप्ति

अतृप्ति अतृप्त से हैं कुछ, व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न! अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक, समय के ढ़ेर पर…… सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण, अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन! अनगिनत मथु के प्याले, पी पीकर तृप्त हुआ था ये मन, शायद कहीं शेष रह गई थी कोई तृष्णा! या है जन्मी फिर……. इक नई सी मृगतृष्णा इस अन्तःमन! क्युँ इन इच्छाओं के हाथों विवश होता फिर ये मन? अगाध प्रेम पाकर भी, इतना अतृप्त क्युँ है यह जीवन? जग पड़ती है बार-बार फिर क्युँ ये तृष्णा? क्युँ जग Continue reading अतृप्ति

परखा हुआ सत्य

परखा हुआ सत्य फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य, किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य, आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य! अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? गंगोत्री की धार सा सतत बहा है वो सत्य, गुलमोहर की फूल सा सतत खिला है वो सत्य, झूठ को इक शूल सा सतत चुभा है वो सत्य! बन के बिजली बादलों में चमक रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते Continue reading परखा हुआ सत्य

खिलौना

खिलौना तूने खेल लिया बहुत इस तन से, अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना? माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण, माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना। बहलाया मन को तूने इस तन से, जीर्ण खिलौने से अब, क्या लेना और क्या देना? बदलेंगे ये मौसम रंग बदलेगा ये तन, बदलते मौसम में तू चुन लेना इक नया खिलौना। है प्रेम तुझे क्यूँ इतना इस तन से, बीते उस क्षण से अब, क्या लेना और क्या देना? क्युँ रोए है तू पगले जब छूटा ये तन, खिलौना है बस ये इक, तू कहीं खुद Continue reading खिलौना

त्यजित

त्यजित त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन में।  क्षितिज की रक्तिम लावण्य में, निश्छल स्नेह लिए मन में, दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में, हर क्षण जला हूँ मैं अगन में… ज्युँ छाँव की चाह में, भटकता हो चातक सघन वन में। छलता रहा हूँ मैं सदा, प्रणय के इस चंचल मधुमास में, जलता रहा मैं सदा, जेठ की धूप के उच्छवास में, भ्रमित होकर विश्वास में, भटकता रहा मैं सघन घन में। स्मृतियों से तेरी हो त्यजित, अपनी अमिट स्मृतियों से हो व्यथित, तुम्हे भूलने का अधिकार दे, प्रज्वलित हर पल मैं इस अगन में, त्यजित हूँ Continue reading त्यजित

बूढ़ी माँ

बूढ़ी माँ वो आँखे किसी का दीदार करने के लिए तरस रही थी।उस बूढ़ी औरत के चेहरे पर बनी झुर्रियां इस बात का संकेत कर रही थी कि उस पर बुढ़ापा हावी होते जा रहा था।अचानक एक घंटी बजती हैं और वो इस बात का संकेत कर रही थी की किसीने दरवाजे पे बहुत दिनों बाद दस्तक दी थी ।वह बूढी औरत भगवान् का नाम स्मरण करते हुए’हाय राम’ कौन हैं?कहते हुए दरवाजे की तरफ अपने दबे पैरों से बढ़ती हैं और कोमल डाली जैसे हाथों से दरवाज़े की कुंठी खोलने का प्रयास करती हैं।जैसे ही वह दरवाजा खोलती हैं Continue reading बूढ़ी माँ

ओ मेरे पुज्य पिताजी

ओ मेरे पुज्य पिताजी [दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ठाकुर ईश्वर सिंह इस भू लोक को त्याग कर चले गये… जीवन में उनकी कठिन तपस्या से ही आज हम सुखद जीवन जी पा रहे हैं….] “हे ईश्वर मेरे पूजनीय पिता जी को….अपने पावन चरणों में स्थान देना….” ओ मेरे पूज्य पिता जी, कल तक मैं खुद को दुनिया का सब से बड़ा आदमी समझता था क्यों कि मेरे सिर पर तुम्हारा हाथ था…. हम नहीं जानते हम कौन हैं, पर तुम भिष्म थे, जिन्होंने हमारे घर रूपी हस्तिनापुर को चारों ओर से सुर्क्षित कर के Continue reading ओ मेरे पुज्य पिताजी

किन्नर

किन्नर वहीं चेहरा वहीं चाल-ढाल, वहीं रंग-रूप वहीं वाणी में राग। इंसान ही है हम दिखते भी इंसान, फिर क्यों हमारे संग ये परायेपन का स्वांग? ना समाज बेटी मानता हमे, ना ईश्वर ने माँ बनने का हक़ दिया। नर-नारी की इस दुनिया ने, हमेशा इस किन्नर का तिरस्कार किया।। दुआओं से मेरी उनके घर सजते है, उन घरो में खुशियो के रंग भरते है। बस उन घरो से थोडा अपनापन ही तो माँगा है हमने, क्यों हम अपनी ही पहचान को तरसते है? ना पत्नी होने का अधिकार मिला, ना किसी से सास-ससुर का प्यार मिला। नर-नारी की इस Continue reading किन्नर