रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

रे मुसाफ़िर चलना तेरा काम रुकना तेरी नियति नहीं तू स्वयं अपना भाग्यविधाता कर्मठ कर्मयोगी बनकर करले धारण कर्मशील कवच उमंग तेरा खड्ग उत्साह तेरा चांदनी रथ बनाकर ढाल अपने प्रचंड पराक्रम को बन स्वयं सारथी इस आलोकित रथ का और झोंक दे स्वयं को कर्मों के इस अग्नि-कुंड में पसीना बहेगा-बहने दे लहू बहेगा-बहने दे शैल शिखर बनकर ललकारना उस आंधी और तूफान को जो करे दुस्‍साहस तेरे कर्मपथ पर बनकर निर्भीक सिपाही पायेगा अवश्य तू अपनी मंज़िल गायेंगे मंगल गीत चाँद और सूरज और गूंजेगी हर्षध्वनि तेरे विजयपथ पर हिमगिरि के उतुंग शिखर बैठ आज भाग्य भी तुझे Continue reading रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

शरद हंसिनी

नील नभ पर वियावान में, है भटक रही….. क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी? व्योम के वियावान में, स्वप्नसुंदरी सी शरद हंसिनी, संसृति के कण-कण में, दे रही इक मृदु स्पंदन, हैं चुप से ये हृदय, साँसों में संसृति के स्तब्ध समीरण, फिर क्युँ है वो निःस्तब्ध सी, ये कैसा है एकाकीपन! यह जानता हूँ मैं… क्षणिक तुम्हारा है यह स्वप्न स्नेह, बिसारोगे फिर तुम निभाना नेह, टिमटिमाते से रह जाएंगे, नभ पर बस ये असंख्य तारे, एकाकी से गगन झांकते रह जाएंगे हम बेचारे! व्योम के वियावान में, शायद इसीलिए…! भटक रही एकाकी सी वो शरद हंसिनी!

इधर सांझ भी अलसाई है

इधर सांझ भी अलसाई है लौट चले है पंछी नीड़ में, तिमिर जो गहराई है, क्षितिज है मुस्कुराता, इधर सांझ भी अलसाई है| बयार पग धरे मंद-मंद, डूबती लालिमा मुस्कुराई है, क्लांति छाई नील गगन में, इधर सांझ भी अलसाई है। खोई-खोई-सी निशा है, खोई-सी उसकी तनहाई है, बेक़रार वह पिया मिलन को, इधर सांझ भी अलसाई है। मध्यम हुई बेचैन किरणें, धुंधली दिनकर की परछाई है, अधीर मुस्कान लिए लताऐं, इधर सांझ भी अलसाई है। आकुल मेघा चली परदेश को, पूरब दिशा भी शरमाई है, बेक़रार क्यों है हर दिल यहाँ, इधर सांझ भी अलसाई है। प्रचण्ड अहसासों के Continue reading इधर सांझ भी अलसाई है

जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

ऐ ज़िन्दगी तूने कहा चल और मैं चला उन राहों में बिछाए थे तूने जहाँ अनगिनित चट्टानी पत्थर मैंने ठोकर खाई, गिरा और फिर सम्भला अपने ही पावों पर जिंदगी तूने कहा कर्म कर उन पगडंडियों पर चल कर काँटों के जंगल जहाँ बिछाए थे तूने मैं चला, पावं हुए रक्तरंजित पर मैं रुका नहीं, डिगा नहीं, चलता रहा निरन्तर अपने कर्मपथ पर बनकर कर्मठ कर्मयोगी बनकर कर्मशील बटोही जिंदगी तूने कहा उड़ नील गगन में उन पंखों के सहारे लहूलुहान कर दिया था जिन्हें तूने मगर मैं उड़ा, गिरा, फिर उड़ा बैठकर उत्साह के चांदनी मंगल रथ पर लगा Continue reading जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

कोलाहल

कोलाहल क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? काँप उठी ये वसुन्धरा, उठी है सागर में लहरें हजार, चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार, दुर्बल सा ये मानव, कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? कोलाहल के है ये स्वर, कण से कण अब रहे बिछर, स्रष्टा ने तोड़ी खामोशी, टूट पड़े हैं मौन के ज्वर, त्राहिमाम करते ये मानव, तज अहंकार, ईश्वर का अब कर रहे पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? या है छलनी उस रचयिता का Continue reading कोलाहल

जो तुमसे मुलाकात हो गई

जो तुमसे मुलाकात हो गई गए थे मयख़ाने हम, ज़िन्दगी के ग़म भुलाने को, भूले ग़म सारे जहाँ के, जो तुमसे मुलाकात हो गई! रात के अँधेरे में देखा जब, तेरा चाँद-सा मुखड़ा, मेरी वीरान ज़िन्दगी में, फिर से चांदनी रात हो गई! झील-सी नीली आँखों से, जब बरसने लगे मोती, बादल तो गरजे नहीं, मगर क्यों बरसात हो गई! तेरी जुल्फों के साये में, खुद को भूल गए थे हम, तू खोई थी तन्हाई में और हमें हवालात हो गई! तन्हाई में तेरे बिन, करवटें लेकर गुजरी है रातें, जिंदगी के खेल में, ज़िन्दगी ही शह-मात हो गई! कवी Continue reading जो तुमसे मुलाकात हो गई

क्यों डरना रात के अंधकार से

क्यों डरना रात के अंधकार से रात के ख़ौफ़नाक अन्धकार से क्यों भागते हैं हम क्यों डरते हैं हम क्यों कतराते हैं हम धरते क्यों नहीं पग अपने हम रात के अँधेरे में जबकि झरती हैं जीवन की कई धाराएँ इसी अँधेरी रात के निर्मल झरनों से जो छूती हैं दहलीज़ हमारी मंज़िल की जो स्पर्श करती हैं हमारे मार्ग की माटी को जो जगाती हैं हमारे सोये हुए अहसासों को और दिखाती हैं हमें हमारे मंज़िल की खिड़की रात का अपरिचित सन्नाटा इतना अशुभ नहीं होता इतना निष्ठुर नहीं होता इतना क्रूर नहीं होता तो फिर क्यों सहमते हैं Continue reading क्यों डरना रात के अंधकार से

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रियतमा, झटकती हो जब तुम अपने गीले केशों को छज्जे पर खड़े हो कर तो दिल मेरा करता है त्ताक-झांक तेरी अजनबी दुनिया में, और निहारता है तेरी अनछुई यौवन की अंगड़ाई को समझाने से समझे ना ये दिल क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रेयसी, मध्य-रात्रि को जब तुम सखियों संग चाँद की चांदनी में तलैया किनारे चांदनी-स्नान करती हो तो भीगे वस्त्रों से छन् कर आती तुम्हारी सुंदरता को देख चाँद भी शरमा कर बादलों की ओट में छिप जाता है, और मेरा नादान दिल भी चोरी-चोरी कनखियों से झांककर Continue reading क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

मौन अभ्यावेदन

मौन अभ्यावेदन मुखर मनःस्थिति, मनःश्रुधार, मौन अभ्यावेदन! ढूंढता है तू क्या ऐ मेरे व्याकुल मन? चपल हुए हैं क्यूँ, तेरे ये कंपकपाते से चरण! है मौन सा कैसा तेरा ये अभ्यावेदन? तू है निश्छल, तू है कितना निष्काम! जीवन है इक छल, पीता जा तू छल के जाम! प्रखर जरा मौन कर, तू पाएगा आराम! मौन अभ्यर्थी ही पाता विष का प्याला! कटु वचन, प्रताड़ना, नित् अश्रुपूरित निवाला! मौन वृत्ति ने ही तुझको संकट में डाला! भूगर्भा तू नहीं, तू है इक निश्छल मन, तड़़पेगा तू हरपल, करके बस मौन अभ्यावेदन! स्वर वाणी को दे, कर प्रखर अभ्यावेदन! अग्निकुण्ड सा Continue reading मौन अभ्यावेदन

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम कहाँ थे, कहाँ हैं, और कल कहाँ होंगे हम साथ लेकर चले थे जो कहाँ भटक गए वो कदम हिमालय के चुम्बन को चले थे कहाँ अदृश्य गए वो करम अपने ही पगों के भूले निशाँ न लज़्ज़ा, न आती हमको शर्म कर्म-पथ पर अग्रसर हैं क्यों सींचते हैं ऐसे भ्रम बयार शीतल आई पूरब से मगर अहसास क्यों इसके गरम धरम का ज्ञान देने चले थे मगर क्यों भूले अपना ही धरम जो कदम उठे थे जोश में अचानक क्यों पड़ गए हैं नरम जख्मों से बहता रुधिर हमारे लगाएगा कौन इन पर Continue reading कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे दर्पण तू झूठ न बोले जीवनकाल के इस लम्बे सफर में देखे हैं अनगिनित उतार-चढ़ाव की ढलानें मैंने एक दिन अनायास ही क्लान्ति की रेखाएं लगी उभरने मेरे परिश्रांत मुखाकृति पर मन ने कहा कि तनिक रुक, और विराम दे अपनी दिशाहीन यात्रा को काल की शीतल छाँव में बिसरा ले और कर विचार कि तूने इस सफर में क्या खोया-क्या पाया मैंने कर्मों के दर्पण में निहारा चेहरा अपना उस धूमिल छवि पर असंख्य परतें धूल की क्रूर निगाहों से घूर रही थी मुझे तभी एक हल्की-सी गूँज ने दी दस्तक़ मेरे कानों में जो कह रही थी Continue reading रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे मनुआ! अब तो धीरज धार

रे मनुआ! अब तो धीरज धार क्यों होता व्याकुल इतना, व्यथा होता क्यों बेचैन चैतन्य को बना सारथी, सूर्यरथ होकर पर सवार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार भोर भई अब आंखें खोल, बावरे क्यों तू सोवत है पतवार संभाल अपनी, कश्ती है तेरी मंझधार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार प्राण पखेरू हो जायेंगे जब, कब तू जागत है सह ले पीड़ा अपनी, कोई ना सुने तेरी पुकार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार अपनी पीड़ा तू ही जाने और न Continue reading रे मनुआ! अब तो धीरज धार

मेरी इकलौती परछाई

मेरी इकलौती परछाई गुजरा जब तेरे हुस्न का काफ़िला हवाओं के संग मेरे गाँव से होकर बादल भी चले संग तेरे-तेरे और बदला मौसम का भी मिज़ाज़ लेकिन हम न कर सके दीदार तेरे हुस्न के चाँद का क्योंकि उन रुपहले पलों में मैं रात के घने अँधेरे में, बलखाती सन्नाटे की उबड़-खाबड़ पगडंडियों किनारे खोज रहा था अपनी ही परछाई को जो शायद तुम्हारे हुस्न की तरुणाई देख सिमट गई थी कहीं रात के सन्नाटे के अंचल की ओट में कुछ शर्माकर-कुछ सकुचाकर खोकर तुम्हें अब नहीं खोना चाहता अपनी इकलौती परछाई को जो चलती है हरदम संग मेरे Continue reading मेरी इकलौती परछाई

हमें तुमसे चाहत कितनी

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते जब-जब मेरी सांसें, तुम्हारी साँसों से जा टकराई दिल चाहता है छूलूं, इन ठंडी साँसों की गहराई खिले उषा की लालिमा, देख तुम्हारे हाथों की हीना क्यों बहके कदम हमारे, तुम्हारी मधुशाला के बिना हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते बिन बदरिया के सजना, बूंदें क्यों बरसती हैं तुमसे मिलने को सखी, आंखें क्यों तरसती हैं तुम्हारी धड़कनों से, दुनिया क्यों बहकती हैं तुम्हारी मादक सुगंध से, हवा क्यों महकती है कैसे काटे हैं Continue reading हमें तुमसे चाहत कितनी

दुर्गे

दुर्गे अग्निज्वाला अनन्त अनन्ता अनेकवर्णा, पाटला, अनेकशस्त्रहस्ता अनेकास्त्रधारिणी अपर्णा,अप्रौढा, अभव्या अमेय अहंकारा एककन्या आद्य आर्या, इंद्री करली पाटलावती मन ज्ञाना कलामंजीरारंजिनी । कात्यायनी कालरात्रि यति कैशोरी कौमारी क्रिया, कुमारी घोररूपा चण्डघण्टा चण्डमुण्ड विनाशिनि , क्रुरा  चामुण्डा  चिता  चिति चित्तरूपा चित्रा चिन्ता, बहुलप्रेमा प्रत्यक्षा जया जलोदरी ज्ञाना तपस्विनी। त्रिनेत्र दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी दुर्गा देवमाता, बुद्धि नारायणी निशुम्भशुम्भहननी पट्टाम्बरपरीधाना पुरुषाकृति प्रत्यक्षा प्रौढा बलप्रदा बहुलप्रेमा बहुला नित्या परमेश्वरी पाटला पाटलावती पिनाकधारिणी । बुद्धि बुद्धिदा ब्रह्मवादिनी ब्राह्मी भद्रकाली लक्ष्मी, भाव्या मधुकैटभहंत्री महाबला महिषासुरमर्दिनि, महातपा महोदरी मातंगमुनिपूजिता मातंगी माहेश्वरी, मुक्तकेशी यति रत्नप्रिया रौद्रमुखी बहुला वाराही, युवती विष्णुमाया वनदुर्गा विक्रमा विमिलौत्त्कार्शिनी। वृद्धमाता वैष्णवी शाम्भवी शिवप्रिया शिबहुला, शूलधारिणी Continue reading दुर्गे