एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग) नाराज़ पत्नी बोली आजकल नजरें भी नहीं मिलाते खोये-खोये रहते अब आँखों से कभी नहीं पिलाते हूँ मैं तुम्हारी चाहत क्या तुम्हें इतना भी नहीं ज्ञान जाने क्या हुआ तुम्हें मेरा ज़रा भी नहीं रखते ध्यान पति ने व्यंग किया तुम मेरे साँसों की मधुशाला हो मैंने बर्बाद होना सीखा जहाँ तुम वह पाठशाला हो जानू, केवल तुम ही मेरे दिल को मना सकती हो एक तुम ही तो जो मेरे घर को स्वर्ग बना सकती हो पत्नी लजा कर बोली, सचमुच डार्लिंग, मगर कैसे तुम भी बड़े वह हो जी, तड़पती राधा के श्याम जैसे Continue reading एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग) विवाहित जीवन गुजर रहा था सुख-शांति से बहुत दिनों से पति-पत्नी में नहीं कोई तकरार मगर पति बेचैन बिन खटपट के कैसी ज़िन्दगी कुछ तो बिगड़े संतुलन है अब इसकी दरकार मदहोश तारों की बारात गगन भी मस्त मौला रात्रि के आगोश में छाई थी मधुर चांदनी रात रोमांटिक पति को था इन्हीं पलों का इंतज़ार थाम कर हाथ पत्नी का बताई दिल की बात हे स्वप्न सुंदरीं, चाँद-सूरज मिलते नहीं कभी विचित्र कुदरत का नियम अजीब है ये क़ायदा मगर कभी-कभीं ख्याल आता है मेरे दिल में तुमसे शादी करके मुझे Continue reading गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग) शादी के सुनहरें पिंजरे में क़ैद तड़पता पति बन गया था अपनी मनमोहिनी का देवदास कैसे कराऊँ खुद को आज़ाद इस पिंजरे से देदा-दौड़ा गया पत्नी पीड़ित तांत्रिक के पास चेहरा देख उसका तांत्रिक मुस्कुराकर बोला बेटा, सब जानता हूँ क्यों मेरे पास तू है आया कभी मेरी ज़िन्दगी भी थी बहुत ही खुशहाल जिसके पास तू आया वह भी पत्नी का सताया गंभीर मुद्रा में खोकर तांत्रिक धीरे से बोला धोखा है ये माया-मोह, नश्वर है निर्बल काया मगर बात मेरी सुनकर बेहोश मत हो जाना बेटा तुझ पर है एक निष्ठुर चुड़ैल Continue reading एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)

शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)   शादी के पिंजरे में क़ैद ज़िन्दगी स्वर्ग है या नर्क पति-पत्नी इस विवादास्पद बात पर झगड़ रहे थे शादी शुदा ज़िन्दगी के काल्पनिक नाटक मंच पर अपने किरदारों के संवाद संग माथा रगड़ रहे थे   नादान शोहर ने वेदना भरे स्वर में कहा पत्नी से शादी करके हम दोनो ने किया है एक अनुबंध जैसे बिगड़ैल बाढ़ के विध्वंस से बचने के लिए नदी किनारे बनाना पड़ता है एक सबल तटबंध   अच्छा कैसे।? तीखा कटाक्ष कर सुहागन बोली घुमा फिराकर क्यों बुदबुदाते हो मेरे मन भावन पहले पोंछो आंसुओं की झड़ी Continue reading शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)

जिम्मेदारी का अहसास

कुछ वर्ष पहले नीम का एक नन्हा पौंधा उगाया था मैंने अपने घर के आँगन में तब वह नन्हे बालक की भांति खेलता था हवा के झोंकों से मतवाली हवा भी सहलाकर उसके कोमल पत्तियों को थी झूमती खिलखिलाकर रिमझिम बरसात की बूंदों से अटखेलियाँ करना उसे भाता था उन बूंदों के कोमल स्पर्श से खिल उठता था, भीग कर उन बूंदों में अबोध बालक की तरह किलकारियाँ मारता मैं उसका बहुत ध्यान रखता था समय पर पानी देना समय पर खाद देना जैसे मेरी दिनचर्या थी उसके मासूम गालों को सहलाकर असीम आनंद अनंत हर्ष की अनुभूति होती थी Continue reading जिम्मेदारी का अहसास

आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

घर में खुशहाली लाने का कोई उपाय पूछने चिंतातुर पत्नी पहुंची पांडे पंडितजी के पास शरणागत होकर बताई अपने दिल की वेदना नहीं है सुख शांति घर में उपाय बताओ खास नैनों में देख झरते अश्क इक अबला नारी के पंडित जी के ख्वाब आसमान में टहलने लगे सोलह शृंगार संपन्न मोहिनी से मिलते ही नज़र दिल में दबे अरमान आज फिर से मचलने लगे प्रेम सागर में लगाकर डुबकी पंडित जी बोले सुंदरी, चाहती हो अगर घर में खुशहाली लाना बताता हूँ अचूक उपाय, पहली रोटी गाय को आखिरी रोटी किसी भिखारी को ही खिलाना प्रेम सिंधु की लहरों Continue reading आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

बहुत याद आते हो

कभी अकेली अँधेरी रातों में जब सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई साथ होते हैं, तब तुम बहुत याद आते हो.. तुम , मेरे गाँव की सड़कें मेरे गाँव की धूप मेरे गाँव की अल्हड़ मस्ती मेरे गाँव का नुक्कड़  बहुत याद आते हो..   कुछ पल के लिए ही सही आज फिर लौट चलने का मन करता है फिर उन्हीं वादियों में घूमने का जी करता है जहाँ छोड़ आए हैं अपना सबकुछ सबकुछ,  सबकुछ,  सबकुछ मस्ती में,  हवाबाजी में बहुत कुछ बहुत कुछ    जहाँ कुछ ही दोस्त जीवन थे जहाँ कुछ ही सड़कें रोज़ की हमराह थी जहाँ एक ही खिड़की Continue reading बहुत याद आते हो

मेरा गाँव

कभी अकेली अँधेरी रातों में जब सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई साथ होते हैं, तब तुम बहुत याद आते हो.. तुम , मेरे गाँव की सड़कें मेरे गाँव की धूप मेरे गाँव की अल्हड़ मस्ती मेरे गाँव का नुक्कड़  बहुत याद आते हो.. कुछ पल के लिए ही सही आज फिर लौट चलने का मन करता है फिर उन्हीं वादियों में घूमने का जी करता है जहाँ छोड़ आए हैं अपना सबकुछ सबकुछ,  सबकुछ,  सबकुछ मस्ती में,  हवाबाजी में बहुत कुछ बहुत कुछ  जहाँ कुछ ही दोस्त जीवन थे जहाँ कुछ ही सड़कें रोज़ की हमराह थी जहाँ एक ही खिड़की की तलाश Continue reading मेरा गाँव

बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

बिगड़े पति की हरकतों से परेशान बीवी बोली सपने में भी मत सोचना मैं कभी तुमसे डरूंगी ये वादा है मेरा जानू अगर तुम ठीक से रहोगे भाजपा के चुनाव चिह्न से आपका स्वागत करुँगी लेकिन बावला पति रहता सदा अपनी धुन में किसी कली ने नहीं डाली इस भँवरे को घास पत्नी ने किया आगाह ज़्यादा चतुराई दिखाई तो फिर कांग्रेस का चुनाव चिह्न है सदैव मेरे पास दीवाने आशिक की हरकतें होती गयी हद पार भवंरा मंडराता कभी इस डाल, कभी उस डाल हर महफ़िल से बेआबरू हो कर निकला भवंरा मगर फर्क नहीं पड़ा उसे जैसे हो Continue reading बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

उदास मेहबूबा को देख रसिक पति बोला जानू मैं तुम्हारा कृष्म, तुम हो मेरी राधा चांदनी रात में देखो कैसे झिलमिलाते तारे मगर मेरा पूनम का चाँद क्यों खिला आधा रूठी पत्नी बोली अब नज़र भी नहीं मिलाते यही नज़रें होती थी कभी तुम्हारी मधुशाला पत्नी को मनाने का ये हुनर सीखा कहाँ से मेरे महबूब हमें भी दिखा दो वो पाठशाला राधा को मनाने प्रेमातुर पति ने की ठिठोली हे सखा थक जाती हो अब रख लो इक बाई तुनक मिजाज पत्नी को जैसे सूंघ गया सांप पुरानी चोट शायद आज फिर उभर आयी भावुक हो कर पत्नी बोली Continue reading रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

इंद्रधनुष सा जीवन

इंद्रधनुष सा जीवन अनंत , असीम , नील गगन सा है ईश्वर। जिसमें सृष्टि का कण -कण समाया है।। जलचर ,थलचर ,नभचर , असंख्य जीव है। उत्पत्ति , संहार , पालन – पोषण पाया है।। पल पल घुटन सिहरन तो कभी खुशी । इंद्रधनुष सा रंग बिरंगा जीवन हमने पाया है।। कंटीली झाड़ियों से नील गगन में झांक कर। आशाओं का फिर से हमने एक सूरज पाया है।। व्यर्थ रोज के आडम्बरों ने कैसा उलझाया है। सारा जीवन जब सच देखा ये तो झूंठी काया है।। कोई नहीं अपना जग में गवाह नील गगन है। दौड़ भाग सारी होगी बेकार Continue reading इंद्रधनुष सा जीवन

परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

वो कभी वक्त का मारा तो कभी हुआ परेशान सिंधु लहरों में बह गए हैं उसके सभी अरमान कभी वह बंजर जमीं तो कभी खोखला आसमान रहम करो ऐसे पति पर आखिर वह भी है इंसान नहीं है कोई ठौर ठिकाना ना उसका कोई गाँव नसीब में नहीं है शायद पीपल की शीतल छाँव कंटीली डगर चलते रक्तरंजित हुए उसके पाँव खोटी तक़दीर पर कौवे भी मंडराते कांव-कांव गीता पढता वह ताकि मिल जाए उसे आज़ादी ग्रन्थ साहिब भी सुनता ताकि रुक जाए बर्बादी नित्य क़ुरान वह पढता बन कर उसका फरियादी जिसने ऐसा हाल किया वह थी उसकी शहज़ादी Continue reading परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

पति-पत्नी दोनों गए एक कॉकटेल पार्टी में जहाँ ग़मों के जाम पर जाम छलक रहे थे मदहोश मनचले जोड़े डाल बाहों में बाहें उन्मत हो मदिरा के समुन्द्र में बहक रहे थे चढ़ा कर एक जाम लड़खड़ाती पत्नी बोली डार्लिंग, टल्ली हो कर वह जो मटक रहा है ठुकराया था रिश्ता उसका मैंने एक दिन मुझे न पाकर अब देखो कैसे भटक रहा है पति बोला, नशे में वह नहीं तुम हो कामिनी ख़ुमारी में दिमाग तो तुम्हारा ही घूम रहा है तुम्हें ही न पाकर खुशनसीब है वह कितना, लगाकर जाम ख़ुशी के जश्न में झूम रहा है हाथ Continue reading डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

  थका चेहरा लटकाये पति घर लौटा जैसे पतझड़ में सावन की झड़ी हो झल्लाकर बोला खाना लगा दो जानू पत्नी जैसे छप्पन व्यंजन लिए खड़ी हो   भूखे ने जैसे ही खाया पहला निवाला उड़ गयी बेचारे की चेहरे की चमक आक्रोशित हो लगा पत्नी को कोसने क्या सब्जी में नहीं डाला था नमक   घबराई, फिर मुस्कुराकर बोली पत्नी जानू, भूखे पेट इतना नहीं बिगड़ते सब्जी जल गयी थी, माँ मेरी कहती है जले पर कभी नमक नहीं छिड़कते   जले-भुने पति ने निकाली दबी भड़ास मेरे जले पर नमक ही तो छिड़कती हो  तुम्हारे बाप ने बाँधा Continue reading जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)