बेचैन खग

बेचैन खग तट के तीरे खग ये प्यासा, प्रीत की नीर का जरा सा, नीर प्रीत का तो मिलता दोनो तट ही! कलकल सा वो बहता, इस तट भी! उस तट भी! पर उभरती कैसी ये प्यास, सिमटती हर क्षण ये आश, यह कैसी है विडम्बना? या शायद है यह इक अमिट पिपास….? या है अचेतन मन के चेतना की इक अधूरी यात्रा, या भीगे तन की अंतस्थ प्यास की इक अधूरी ख्वाहिश! उस डाली खग ढूंढे बसेरा, चैन जहाँ पर हो जरा सा, छाँव प्रीत का तो मिलता हर डाली पर! रैन बसेरा तो रमता, इस डाली भी! उस Continue reading बेचैन खग

Advertisements

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   अपनी पीड़ा सहते सहते ऊब गया तो तब फिर मैंने जीवन पथ पर चलते चलते व्यथा जगत की जानी मैंने था पीड़ा का विस्तार अनंत अपनाकर दुख-दर्द सभी का कुछ क्षण जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   हाथ पकड़कर प्रभु का मैंने सीखा बिन बैसाखी चलना सीख लिया तब उनसे मैंने औरों की भी पीड़ा हरना चल पड़ा तभी से सबके संग खुद बैसाखी बन औरों की मंजिल पाना सीख Continue reading ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

सोचो, समझो और परखो

सोचो, समझो और परखो दिल में कुछ, जबान पर कुछ नज़र आता है l कौन अपना, कौन पराया समझ नहीं पाता हैl कब कौन पीठ में, छूरा घोप दे कुछ नहीं पता l कभी-कभी विश्वास-पात्र भी धोखा दे जाता है ll चंद पलो की मुलाकात से, पहचान नहीं सकते l किसी के दिल में क्या छिपा है जान नहीं सकते ll मन की भवरों को आसानी से यूँ अगर पढ़ पाते l शायद दोस्त कम यहाँ दुश्मन ज्यादा नज़र आते ll रूप -रंग से सुंदरता आक सकते हो  व्यक्तित्व नहीं l बंद जबान से चुप्पी आक सकते हो कडवडाहट नहीं Continue reading सोचो, समझो और परखो

उल्लास

उल्लास इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन! पलक्षिण नृत्य कर रहा आज जीवन, बज उठे नव ताल बज उठा प्राणों का कंपन, थिरक रहे कण-कण थिरक रहा धड़कन, वो कौन बिखेर गया उल्लास इस मन के आंगन! नयनों से वो कौन भर लाया मधुकण आज इस उपवन! पल्लव की खुशबु से बौराया है चितवन, मधुकण थोड़ी सी पी गया मेरा भी यह जीवन, झंकृत हुआ झूमकर सुबासित सा मधुबन, जीर्ण कण उल्लासित चहुंदिस हँसता उपवन! इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन!

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी दिखने में नायाब! मगर किसी भी क्षण ढहने को बेताब! बेमिसाल, मगर टूटती हुई ख्वाहिशों की जिन्दगी! अकस्मात् ही, रुक से गए जैसे जिन्दगी के रास्ते, मोहलत भी न मिली हो ख्वाहिशों के परिंदों को ऊड़ने की जैसे! रूठ जो गई थी खुद उसकी ही सांसे उससे! मोह के धागे सब टूट चुके थे उसके…. जैसे सरकती हुई बर्फ की पहाड़ी ढह गई हो कोई, पत्तियों के कोर पर शबनमी बूंदों की सूखती सी लड़ी, रेगिस्तान में बनता बिगरता रेत का टीला कोई! कभी थे कितने प्रभावशाली, जीवन्त, गतिशीलताओं से भरे ये जिन्दगी के रास्ते, निर्बाध Continue reading टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

सोचो ! अगर ये ना होता…

सोचो अगर ये रात ना होती, तो क्या होता l इंसा हर पल दो के चार, में ही लगा होता ll दिल को सुकून, ना दिमाग को आराम होता l इंसा परेशा है जितना और ज्यादा परेशा होताll सोचो अगर ये सूरज ना होता, तो क्या होता l बिन सूरज धरती पर जीवन संभव ना होता ll बिन सूरज पेड़-पौधे अपना भोजन न कर पातेl बिन पेड़-पौधों के फिर हम साँस भी न ले पाते ll सोचो अगर ये पेट ना होता, तो फिर क्या होता l ना कुछ खाना होता ना फिर कुछ कमाना होता ll ना इंसान दिन-रात Continue reading सोचो ! अगर ये ना होता…

कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ मैंने जग देखा है जगजीवन देखा है? मैंने तो बस महलों के अंदर देखा है सबकी आँखों अश्क नहीं शबनम देखा है। परदों के पीछे परदों का मंजर देखा है मधुकलशों में यौवन का दमखम देखा है। कैसे कह दूँ मैंने सुख का दुख का आलिंगन देखा है? चमन फूल कलियों की बस खुश्बू समझी है काँटों बिंधी तितली की तड़प नहीं देखी है। चहकती चिड़िया की भी गुफ्तगू समझी है हर पिजरे में पलती कसक नहीं देखी है। कैसे कह दूँ मैंने कोलाहल में सूनापन देखा है? मैंने बस पायल की थिरकन देखी है थककर थमते Continue reading कैसे कह दूँ

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। इसने ही दिया है धर्म जगत को सुसंस्कृति और संस्कारों का । इसके ग्रंथों ने सबसे पहले हर मानव को श्रेष्ठ बताया है सारे जग को एक सूत्र में बँध बस सूत्र प्रेम का सिखलाया है। इसके कारण ही मानवता का मुकुट सजा है अधिकारों का। यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। सत्य अहिंसा का पथ इक सुन्दर इसके मंत्रों में दिख जाता है और निडर हो पथ पर चलना भी यह धर्म सभी का बन जाता है। यह संग्रह है Continue reading यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

वक्त के सिमटते दायरे

वक्त के सिमटते दायरे हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? अंजान सा ये मुसाफिर है कोई, फिर भी ईशारों से अपनी ओर बुलाए रे, अजीब सा आकर्षण है आँखो में उसकी, बहके से मेरे कदम उस ओर खीचा जाए रे, भींचकर सबको बाहों में अपनी, रंगीन सी बड़ी दिलकश सपने ये दिखाए रे! हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे? छीनकर मुझसे मेरा ही बचपन, मेरी मासूमियत दूर मुझसे लिए जाए रे, अनमने से लड़कपन के वो बेपरवाह पल, मेरे दामन Continue reading वक्त के सिमटते दायरे

दर्द

दर्द दूसरो का दर्द सिर्फ वो ही समझ पाता है l जो उस दर्द से कभी होकर गुजर जाता है ll जो उस दर्द को महसूस ना कर पाया हो l वो क्या खाक दूसरो का दर्द समझ पाता हैll दर्द यूँ हर किसी को बताया नहीं जाता है l बताया जाता है उसे जो दर्द समझ पाता हैll वर्ना आपका दर्द एक मज़ाक बन जायेगा l हल नहीं निकलेगा सिर्फ बवाल बन जायेगा ll अगर ना मिले दर्द सुनने वाला कोई अपना l ईश्वर से कहो मन हो जायेगा हल्का अपना l कम से कम ये बातें आगे नहीं Continue reading दर्द

आदमी

आदमी आदमी सोचता है, कुछ लिखे…… जिंदगी के अव्यावहारिक होते जा रहे समस्त शब्द से सार्थक वाक्य बना दे मुक्त हो जाए उन आरोप से जिसे स्वयं पर आरोपित कर थक चुका है, उब चुका है आदमी सोचता है,कुछ करे….. सतत मरते हुए कुछ पल जी ले जीवन के मसानी भूमि पर चंद उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर जला डाले उदासीनता के कफ़न अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को आदमी सोचता है, कुछ कहे ……. जो कह न पाया कभी किसी से और न जाने क्या क्या कहता रहा तमाम उम्र कि बस एक बार अपनी बात कह Continue reading आदमी

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई, सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई, खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के, चंद बूंदे मोतियों के,आ छलक पड़ते हैं इन नैनों में… क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? ऐ अभ्र की वादियाँ, न शहनाईयों से तू यूँ रिझा, तन्हाईयों में ही कैद रख, यूँ न सोए से अरमाँ जगा, गा न पाएंगे गीत कोई, टूटी सी वीणा हृदय के, अश्रु की अविरल धार कोई, Continue reading गूंजे है क्युँ शहनाई

हे प्रभू

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।) हे प्रभू! तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।   देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।   सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो। हे प्रभू! तुम भी Continue reading हे प्रभू

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे हैं हम।   खुली जिल्द की सी किताब रही जिन्दगी खुले पन्नों तरह बिखरते रहे हैं हम।   पूछा सच्चे दिल से तो दिल ने कहा सुलझते सुलझते उलझते रहे हैं हम।   ख्याल में होती रही हर साँस की हार शुष्क पत्तों तरह बिखरते रहे हैं हम।   कभी तो आयेंगे वो मेरी कब्र पर यही सोच के बस मचलतेे रहे हैं हम। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000