आज सुर गा न सकेंगे संगीत

आज सुर गा न सकेंगे संगीत आज सुर गा न सकेंगे संगीत अथ में अदभुत अंत में भरम अनोखा परिचय निशीथ की विकल साँसों की नहीं प्रात: से प्रेम आर्द्र आँचल निर्जल व्योम-जल कितना सत्य शस्य गीत की नहीं सहेगी प्रभंजन,शीत प्रिय सरस सौरभ कोमल अनुबंध बाकी सभी शेष दीप की लौ के हर कॅपकँपी में सुर मेरे होंगे संगीत । ————- डॉ छेदी साह

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना माँ वीणा पुस्तक धारिणी नमन करो स्वीकार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार। ऋणी रहे हम सदा तुम्हारे तेरी स्तुति गाये । ऋषि मुनि करे वंदना तेरी देव भी शीश नवाये।। मिटा दो माँ इस जीवन से अज्ञानता का अंधकार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार।।। दया करो इस दास पर माँ दर्शन दो एक बार । तेरे बच्चे तुझे बुलाये आओ माँ करके हंस सवार ।। मांगे माँ बस ज्ञान तुझसे ना मांगे संसार । आए माँ तेरी शरण दो विद्या का उपहार ।। जय माँ शारदे।

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे मेरी किस्मत की कतरनें भी तमाम भेज दे। ए डूबते सूरज, बस इक मेहरबानी कर जा अपनी तपस बटोरकर सुलगती शाम भेज दे। ना पानी है, ना शराब का इक कतरा बचा है तू अपने लबों से चूमकर इक जाम भेज दे। कच्ची गागर है, मालूम है, फूट जावेगी बस आखरी दरार का लिखा पैगाम भेज दे। मैं कब से आँख मूँदे यूँ बेजान पड़ा हूँ अब ख्वाब में साकी दरका एक जाम भेज दे। अब की हवा का झोंका पतझर ही लावेगा हर जर्जर पत्ते पे लिख मेरा नाम भेज दे। Continue reading इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती कहीं चिन्गारी नहीं दिखती, कहीं जिन्दगी नहीं दिखती।   हरइक आवाज ऊँची थी, दूर तक गूँजती गई थी इस सन्नाटे के आगोश में खामोशी नहीं दिखती।   मौत हर रोज दिखती है, लेकिन जिन्दगी नहीं दिखती गुनाह की फेरिश्त में तड़पती जिन्दगी नहीं दिखती।   इस कफस में बैठकर देखो ए सैयाद, मेरे दोस्त! तेरे कारनामों में रहम की निशानी नहीं दिखती।   गुनहगारों में तू भी था, हर इक गुनाह करता हुआ पर तेरे चेहरे पर खुदा! परेशानी नहीं दिखती।   मुझे इस कदर रोता देखकर, तू बस हँसता रहा क्या Continue reading आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

चुप क्यूं हैं सारे?

चुप क्यूं हैं सारे? लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे? जब लुटती है अस्मत अबला की, सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ, बिलखता है नारी सम्मान, तार तार होता है समाज का कोख, अधिकार टंग जाते हैं ताख पर, विस्तृत होती है असमानताएँ… ये सामाजिक विषमताएँ…. बहुप्रचारित बस तब होते हैं ये नारे… वर्ना, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे? जब बेटी चढती हैं बलि दहेज की, बदनाम होते है रिश्तों के कोमल धागे, टूटता है नारी का अभिमान, जार-जार होता है पुरुष का साख, पुरुषत्व लग जाता है दाँव पर, दहेज रुपी ये विसंगतियाँ…. Continue reading चुप क्यूं हैं सारे?

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो कभी आगे इन्हें हकीकत भी बनने दो।   तमाम रात मैकदों को खुला रहने दो तमाम उम्र यूँ ही बस मदहोश रहने दो।   ये बहार आके चली भी जावे तो क्या मौसमे-मैकदा साकी, बने रहने दो।   भूख मिट जावेगी जरा इंतजार करो उसे बासी रोटी तो इधर फैंकने दो।   संभलकर चलना भी मैं सीख जाऊँगा अभी गिर-उठने का मजा जरा चखने दो।   दिल को मायूस कर देनेवाली यादें तुम भूले सभी, कुछ मुझे भी भूलने दो।   कफस में वो परकटा पंछी कैद ना रख उसे आजाद होकर बाहर Continue reading अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो

समाचार

कवि सम्मेलन में “हिन्दवीर सम्मान” से समान्नित झालावाड़ जिले के कवि राजेश पुरोहित को साहित्य संगम संस्थान,दिल्ली द्वारा “हिन्दवीर सम्मान” से सम्मानित किया गया। भारतीय नववर्ष पर आयोजित ऑनलाइन कवि सम्मेलन में पुरोहित को उत्कृष्ट काव्य प्रस्तुति हेतु प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान संस्थान के अध्यक्ष राजवीर सिंह मंत्र,सचिव कविराज तरुण सक्षम, उपाध्यक्ष सौम्या मिश्रा अनु श्री, एवम संयोजक आशीष पांडे जिद्दी ने प्रदान किया। पुरोहित कवि, ग़ज़लकार, गीतकार एवम श्रेष्ठ मंच संचालक के रूप में जाने जाते हैं।

हकीकत

हकीकत अक्सर गरीबों को लड़ते झगड़ते देखा है। रोटी के लिए बच्चों को बिलखते देखा है।। नवयुवकों को बन ठन के संवरते देखा है। नशे में मदमस्त लोगों को बहकते देखा है।। अपने हुनर से लोगों के घर बनते देखा है। उनकी खूबसूरत बगिया को महकते देखा है।। आशिकी में युवाओं को मरते देखा है। माँ बाप को उनके हमने तड़फते देखा है।। फैशन में नई पीढ़ी को तन समेटते देखा है। राजेश हकीकत को ख्वाबों में लपेटते देखा है।। कवि राजेश पुरोहित भवानीमंडी

कभी कभी कागज कहता है ।

कभी कभी कागज कहता है , कभी लेखनी खुद कहती है आज तुम्हें कुछ लिखना हैं । नही आ रहा तो सिखना है । कभी कभी मेरा मन कहता है, कभी कभी चिंतन कहता है । आज कही कुछ सृजना है, मन की बातें लिखना हैं । कभी कभी तरुवर कहता है कभी उपवन खुद कहता है । आज तुम्हें कुछ लिखना है, नहीं आ रहा तो सिखना है । कभी कभी मसि कहती हैं कभी तो अक्षर ही कहता आज तुम्हें कुछ लिखना हैं नहीं आ रहा तो सिखना है । कभी कभी पंक्तियाँ कहती हैं कभी प्रकृति स्वयं Continue reading कभी कभी कागज कहता है ।

प्रकृति-प्रणय गीत

प्रकृति-प्रणय गीत  संध्या की स्वर्णिम किरणों से आलिंगनों का ले उपहार सजी सँवारी संध्या-सी तब करती प्रकृति सोलह श्रंगार।   पश्चिम की लाली में बिंधकर शर्माती सकुचाती जाती क्षितिज पार झुरमुट के पीछे दुल्हन-सी वह लुक छिप जाती।   खगवृन्दों के सुर गुंजन से निखर रही नुपुर की झंकार। डाल डाल पर झूम झूम कर प्रणय स्वरूप दिखता संसार।   शीतल झोंकों का स्पर्श मधुर जब सिरहन-सा उपजाता है पलकों के अंदर नयनों में चाँद रूप सा खिल जाता है।   छिलमिल तारों की सेज चढ़ी चपल चांदनी इतराती है ओढ़ पंखुड़ी की सी चुनरी रजनी रमती खिल जाती है। Continue reading प्रकृति-प्रणय गीत

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में

मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर प्रकृति की भी पावन परछाई में खोज रहा हूँ कृति-चिन्ह निरंतर।   किस किसको खोजूँ, किसको पाऊँ क्षीण-शक्ति-स्त्रोत युक्त जीवन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में   मन वीणा तेरे संकेतों से करती साधना का मात्र प्रयास पर खंड़ित तारों में खो जाता हर साध्य स्वर का अटूट विश्वास   कौन गीत मैं किस लय में गाऊँ सरगम के फैले सूनेपन में ढूँढ़ रहा हूँ तेरी छवि सुन्दर मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में     बनने खुद मैं भी तेरी Continue reading मैं जीवन के दुर्लभ दर्पण में

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो तुम शब्दों में अर्थ जगाकर संस्कार जगा दो।   शब्दों की झंकार तुम्हीं हो प्राणों की हुँकार तुम्हीं हो श्रद्धा का विस्तार तुम्हीं हो करुणा की पुकार तुम्हीं हो।   झंकृत कर मधुर स्वर तुम अपनी वीणा के मेरे भी गीतों में श्रद्धा की गूँज निखार दो।   खगवृन्दों के स्वर गुंजन की किलकारी गीतों में भर दो ले भ्रमरों से यौवन उन्माद शब्द पुष्प में कुछ रस भर दो।   चेतनता की प्रखर प्रभा से आलौकित करने कवि के मृदु हृदय में शक्ति का संचार करा दो।   मस्त पवन के Continue reading मेरे गीतों के शब्दों में श्रंगार सजा दो

यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे

यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे मंदिर से बाहर आकर साथ चलो तो अच्छा लगे।   पत्थर की मूरत हो तराशी मुस्कान से सजे हो असली मुस्कानों से कभी निहारो तो अच्छा लगे।   माना कि बहुत पाप किये होंगे अनजाने में मगर कुछ मेरे पुण्य का भी हिसाब रखो तो अच्छा लगे।   हिम्मत से जूझता रहा हूँ तूफान की लहरों से अब मेरी किश्ती तुम्हीं बचा सको तो अच्छा लगे।   यूँ रह रह कर खींच तलवार मुझे डराया ना करो इक बार कातिल की तरह वार करो तो अच्छा लगे।   तुमको Continue reading यूँ ही तुम चुप रहते हो बात करो तो अच्छा लगे

बिखरी साँसें कहती जाती

बिखरी साँसें कहती जाती हर पल को बस खुश रहने दो। अधरों को मुस्कानों से कुछ बिखरे मोती चुन लेने दो।   पीड़ा के पलने से उठकर कुछ कदम जगत में चलने दो गिरकर उठने का साहस ले जीने का सार समझने दो।   डर से डर जाने के भय से मुक्त सभी को हो जाने दो बार बार जीवन में आती मँड़राती मौत हटाने दो।   उसमें साहस की कुछ घड़ियाँ बस पल दो पल तो चलने दो जग में सिर भी ऊँचा करके मानव-सा बन कुछ रहने दो।   उसके अंदर विनम्र भाव खुद शांत चित्त से आ Continue reading बिखरी साँसें कहती जाती

मानव कुल कितना जीता है

मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। मरने के पहले किश्तों में मरते मरते ही जीता है। जन्म समय हर शिशु रोता है फिर हँसता है, मुस्काता है आगे चिन्ता लिये हुए वह हँसता कम, रोता ज्यादा है। मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। मानव सबको ठुकराता है विविध रूप से कलपाता है खुद भी मुरझाया रहता है मुस्कानों से कतराता है। मानव कुल कितना जीता है कुछ पल कुछ क्षण जीता है। कोलाहल से डर जाता है वीरानों में जा बसता है त्याग सपन जब वह उठता है आगे बढ़ने Continue reading मानव कुल कितना जीता है