सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई, नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई! कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल, ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल, झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल, डाली पे झूलते हुए ये नव दल, मगर, अब ये सारे न जाने क्यूँ इतने गए हैं बदल? उड़ते है हर तरफ ये बन के यादों के सैकत! ज्यूँ वो पल, यहीं कहीं रहा हो ढल! मुरझाते हों जैसे झील में कमल, सूखते हो डाल पे वो कोमल से दल, हृदय कह रहा धड़क, चल आ तू Continue reading सैकत