बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा…. न जाने वो कौन सा, जादू था भला, न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला, कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला, आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला। आईना था वही, बस बदला सा था अक्श मेरा… इस दफा, जादू किसी का था चला, दुआ किसी की, कबूल कर गया खुदा, नई राह थी, नया था कोई सिलसिला, नूर लेकर यूँ, अक्श फूल सा खिला। इस दफा आईने में, यूँ बदला सा था अक्श मेरा…. धूंध छँट चुकी, इक शख्स था मिला, नूर-ए-खुदा शख्स के चेहरे पे Continue reading बदला सा अक्श

कोलाहल

कोलाहल क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? काँप उठी ये वसुन्धरा, उठी है सागर में लहरें हजार, चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार, दुर्बल सा ये मानव, कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? कोलाहल के है ये स्वर, कण से कण अब रहे बिछर, स्रष्टा ने तोड़ी खामोशी, टूट पड़े हैं मौन के ज्वर, त्राहिमाम करते ये मानव, तज अहंकार, ईश्वर का अब कर रहे पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? या है छलनी उस रचयिता का Continue reading कोलाहल