कोलाहल

कोलाहल क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? काँप उठी ये वसुन्धरा, उठी है सागर में लहरें हजार, चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार, दुर्बल सा ये मानव, कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? कोलाहल के है ये स्वर, कण से कण अब रहे बिछर, स्रष्टा ने तोड़ी खामोशी, टूट पड़े हैं मौन के ज्वर, त्राहिमाम करते ये मानव, तज अहंकार, ईश्वर का अब कर रहे पुकार! क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार? या है छलनी उस रचयिता का Continue reading कोलाहल