तीन तलाक

तीन तलाक ………………………………………………….. मेरे इस्कूल जाते वक्त तीन तीन घंटे, तेरा मेरे दिदार का तकल्लुफ दिखते ही मेरे, तेरे चेहरे पर रंगत आ जाना मेरे बुर्कानशीं होकर आने पर वो तेरी मुस्कान का बेवा हो जाना मेरे इस्कूल ना जाने कि सूरते हाल में तेरा गली में साइकिल की घंटियां बजाना सुनकर खो गई थी मैं, और तेरी जुस्तजू में दे दिया था मैंने मेरे अपनों की यादों को तलाक कबूल है, कबूल है, कबूल है…… वो जादुई तीन शब्द और तेरा करके मूझे घूंघट से बेपर्दा, करना मुझसे पलकें उठाने की गुजारिश वो मुखङा दिखाने की आरजू-ओ-मिन्नत लेटकर मेरी Continue reading तीन तलाक

बेटी तो रह गई पराई

बिटिया के ख़त की हर रेखा में दर्द का बयान आँखों की स्याही बेदना की कलम से लहू को पानी पानी कर दें कांटेदार टहनियां सी चुभन तप्ता सा सूरज मन के अंदर, दावानल जलाता पीड़ा दबाये लुकाता है भीतर अनसुनी यातनाओं की कर्कश वाणी झुरमुट अनहोनी का लहराने लगा बहने लगा नदिया के तट सा सुखी रेती में रेंगता कीड़ा मर रहा प्यासा वधू वेश में डोलि सजाकर जब बेटी गई, मौन आँख बरसी थी तब जैसे नदियों की धारा बीछू के डंक सा चढ़ते उतरते चिट्ठी के शब्द बिटिया ने लिखा यातना के तट पर रेती में लेटे Continue reading बेटी तो रह गई पराई