सूखती नदी

चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! संग ले चली थी, ये असंख्य बूँदें, जलधार राह के, कई खुद में समेटे, विकराल लहरें, बाह में लपेटे, उत्श्रृंखलता जिसकी, कभी तोड़ती थी मौन, वो खुद, अब मौन सी हुई है… चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! कभी लरजती थी, जिसकी धारें, पुनीत धरा के चरण, जिसने पखारे, खेलती थी, जिनपर ये किरणें, गवाही जिंदगी की, देती थी प्रवाह जिसकी, वो खुद, अब लुप्त सी हुई है….. चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! अस्थियाँ, विसर्जित हुई है जिनमें, इस सभ्यता की नींव, रखी है Continue reading सूखती नदी