कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ