उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ….. जाने…. कितने ही पलों का… उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ…. तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध हूँ मैं हर उस पल से, चाहूँ भी तो मैं …. खुद को… परित्यक्त नहीं कर सकता, बीते उस पल से। उपांतसाक्षी हूँ मैं…. जाने…. कितने ही दस्तावेजों का… उकेरे हैं जिनपर… अनमने से एकाकी पलों के, कितने ही अभिलेख…. बिखेरे हैं मन के अनगढ़े से आलेख, परिहृत नही मैं पल भर भी… बीते उस पल से। आच्छादित है… ये पल घन बनकर मुझ पर, आवृत है…. ये मेरे मन पर, परिहित हूँ हर पल, जीवन के उपांत Continue reading उपांतसाक्षी

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे, वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे? संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे? सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे? सवालों में थे ये अब मुझको ही घेरे! वो कुछ पल जो थे बस मेरे…… सालों तलक शायद था अनभिज्ञ मैं इनसे, वो पल मुझ संग यूँ जिया भी तो कैसे? किस बात पर वो इतना दुखी था? मैं तो हर उस पल में सदा ही सुखी था! उलझन बड़ी थी अब सामने मेरे! वो कुछ पल जो थे बस Continue reading मेरे पल