वर्ण पिरामिड

वर्ण पिरामिड रे चन्दा निर्मोही, करता क्यों आंख मिचौली। छिप जा अब तो, किन्ही खूब ठिठौली।।1।। जो बात कह न सकते हैं, हम तुमसे। सोच उसे फिर ये नैना क्यों बरसे।।2।। गा मन मल्हार, मिलन की रुत है आई। मोहे ऋतुराज, मन्द है पुरवाई।।3।। रो मत नादान, छोड़ दे तू सारा अज्ञान। जगत का रहे, धरा यहीं सामान।।4।। तू कर स्वीकार, उसे जो है जग-आधार। व्यर्थ और सारे, तत्व एक वो सार।।5।।