अनन्त प्रणयिनी

कलकल सी वो निर्झरणी, चिर प्रेयसी, चिर अनुगामिणी, दुखहरनी, सुखदायिनी, भूगामिणी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… छमछम सी वो नृत्यकला, चिर यौवन, चिर नवीन कला, मोह आवरण सा अन्तर्मन में रमी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… धवल सी वो चित्रकला, नित नवीन, नित नवरंग ढ़ला, अनन्त काल से, मन को रंग रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… निर्बाध सी वो जलधारा, चिर पावन, नित चित हारा, प्रणय की तृष्णा, तृप्त कर रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… प्रणय काल सीमा से परे, हो प्रेयसी जन्म जन्मान्तर से, निर्बोध कल्पना में निर्बाध बहती, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… अतृप्त तृष्णा अजन्मी सी, तुम में ही समाहित है ये कही, तृप्ति की Continue reading अनन्त प्रणयिनी