बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं…..   व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी, चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी, देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी, वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी, सनैः सनैः बर्फ के फाहों से ढक चुकी…..   कुछ बर्फ, सुखी डालियों पर थी जमीं, कुछ फाहे, हरी पत्तियों पर भी रुकी, अवसाद कम गए, साँस थोड़े जम गए, किरण धूप की, कही दूर जा छुपी, व्यथित जमीं, परत दर परत जम चुकी….   यूँ ही व्यथा तभी, भाफ बन कर उड़ी, रूप कई बदल, यूँ बादलों में उभरी, कभी धुआँ, Continue reading बर्फ के फाहे