पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल, परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश, या प्यार से कहता दरख्तेपल…. दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से, फागुन सी होती ये पवन, होली के रंगों से रंगते उनके गेेसू, अबीर से रंगे होते उनके नयन….. रमते इन त्रिपर्नकों में त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नित दिन कर पाता मैं ब्रम्हपूजन, हो जाती नित ये पूजा विशेष….. दर्शन नित्य ही होते त्रित्व के, होता व्याधियों का अंत, जलते ये अवगुण अग्निज्वाला में, नित दिन होता मौसम बसंत…. काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… —————————- Continue reading पलाश

कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ