नेपथ्य

मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। जब मौन हो ये मंच, तो बोलता है नेपथ्य, यूँ टूटती है खामोशी, ज्यूँ खुल रहा हो रहस्य, गूँजती है इक आवाज, हुंकारता है सत्य, मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य। पार क्षितिज के कहीं, प्रबल हो रहा नेपथ्य, नजर के सामने नहीं, पर यहीं खड़ा है नेपथ्य, गर्जनाओं के संग, वर्जनाओं में रहा नेपथ्य, क्षितिज के मौन से, आतुर है कहने को अकथ्य। जब सत्य हो पराश्त, असत्य की हो विजय, चूर हो जब आकांक्षाएँ, सत्यकर्म की हो पराजय, लड़ने को असत्य से, पुनः आएगा Continue reading नेपथ्य

मौन अभ्यावेदन

मौन अभ्यावेदन मुखर मनःस्थिति, मनःश्रुधार, मौन अभ्यावेदन! ढूंढता है तू क्या ऐ मेरे व्याकुल मन? चपल हुए हैं क्यूँ, तेरे ये कंपकपाते से चरण! है मौन सा कैसा तेरा ये अभ्यावेदन? तू है निश्छल, तू है कितना निष्काम! जीवन है इक छल, पीता जा तू छल के जाम! प्रखर जरा मौन कर, तू पाएगा आराम! मौन अभ्यर्थी ही पाता विष का प्याला! कटु वचन, प्रताड़ना, नित् अश्रुपूरित निवाला! मौन वृत्ति ने ही तुझको संकट में डाला! भूगर्भा तू नहीं, तू है इक निश्छल मन, तड़़पेगा तू हरपल, करके बस मौन अभ्यावेदन! स्वर वाणी को दे, कर प्रखर अभ्यावेदन! अग्निकुण्ड सा Continue reading मौन अभ्यावेदन