लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर, सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना, वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती, अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक, शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। गरीबों के सदा हक़ में, उठा आवाज़ जीता हूँ, सदा मेरी अगर जो हो, तो Continue reading लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल