वंदना

“वन्दना” इतनी ईश दया दिखला, जीवन का कर दो सुप्रभात। दूर गगन में भटका दो, अंधकारमय जीवन रात।।1।। मेरे कष्टों के पथ अनेक, भटका रहता जिनमें यह मन। ज्ञान ज्योति दर्शाओ प्रभो, सफल बने मेरा यह जीवन।।2।। मेरी बुद्धि की राहों में, ये दुर्बुद्धि रूप पाषाण पड़े। विकशित ज्ञान की सरिता में, ये अचल खड़े भूधर अड़े।।3।। मेरे जीवन की सुख निंद्रा, मोह निंद्रा में बदल गई। जीवन की वे सुखकर रातें, है घन अंधकार से सन गई।।4।। मेरी वाणी वीणा का, है बिखर गया हर तार तार। वीणा रहित गुंजित मन का, कैसे प्रगटे वह भाव सार।।5।। स्वच्छ हृदय Continue reading वंदना