निशिगंधा

निशिगंधा घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ, अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें, बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें, महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा? प्रतीक्षा किसकी सजधज कर करती वो वहाँ? मन कहता है जाकर देखूँ, महकी क्युँ ये निशिगंधा? घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? है कोई चाँद खिला, या है वो कोई रजनीचर? या चातक है वो, या और कोई है सहचर! क्युँ निस्तब्ध निशा में खुश्बू बन रही वो बिखर! शायद ये हैं उसकी निमंत्रण के आस्वर! क्या प्रतीक्षा के ये पल Continue reading निशिगंधा

विरहन का विरह

विरहन का विरह पूछे उस विरहन से कोई! क्या है विरह? क्या है इन्तजार की पीड़ा? क्षण भर को उस विरहन का हृदय खिल उठता, जब अपने प्रिय की आवाज वो सुनती फोन पर, उसकी सिमटी विरान दुनियाँ मे हरितिमा छा जाती, बुझी आँखों की पुतलियाँ में चमक सी आ जाती, सुध-बुध खो देती उसकी बेमतलब सी बातों मे वो, बस सुनती रह जाती मन मे बसी उस आवाज को , फिर कह पाती बस एक ही बात “कब आओगे”! पूछे उस विरहन से कोई! कैसे गिनती वो विरह के इन्तजार की घड़ियाँ? आकुल हृदय की धड़कनें अगले ही क्षण Continue reading विरहन का विरह

नादान बेचारी

नादान बेचारी सोच रही वो बेचारी, आखिर भूल हुई क्या मेरी? यूँ ही घर से निकल गया था वो अन्तर्मुखी, दर्द कोई असह्य सी, सुलग रही थी उस मन में छुपी! बिंध चुका था शायद, निश्छल सा वो अन्तर्मन, अप्रत्याशित सी कोई बात, कर गई थी उसे दुखी! स्नेह भरा दामन, फैलाया तो था उस अबला ने, रखकर कांधे पे सर, हाथों से सहलाया भी था उसने, नादान मगर पढ पाई ना, उसके अन्तर्मन की बातें, दामन में छोड़ गया वो, बस विरहा की सौगातें! मन में चोट लगे जो, वो घाव बड़ी दुखदायी, तन सहलाते मिटे न पीड़ा, नादान Continue reading नादान बेचारी