चुप क्यूं हैं सारे?

चुप क्यूं हैं सारे? लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे? जब लुटती है अस्मत अबला की, सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ, बिलखता है नारी सम्मान, तार तार होता है समाज का कोख, अधिकार टंग जाते हैं ताख पर, विस्तृत होती है असमानताएँ… ये सामाजिक विषमताएँ…. बहुप्रचारित बस तब होते हैं ये नारे… वर्ना, लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं हैं सारे? जब बेटी चढती हैं बलि दहेज की, बदनाम होते है रिश्तों के कोमल धागे, टूटता है नारी का अभिमान, जार-जार होता है पुरुष का साख, पुरुषत्व लग जाता है दाँव पर, दहेज रुपी ये विसंगतियाँ…. Continue reading चुप क्यूं हैं सारे?