मुख्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे, देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से, इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे, सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों में मेरी! सिंदूरी ख्वाब लिए, फिर सो जाती है रात… मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. झांकती है सुबह, उन खिड़कियों से मुझे, रंग वही सिंदूरी, जैसे सांझ मिली हो भोर से, मींचती आँखों में, सिन्दूरी सा रंग घोल के, रंगमई सी सुबह, बस जाती है फिर आँखों में मेरी! दिन ढ़ले फिर, Continue reading मुख्तसर सी कोई बात