सीलन भरी सुबह

सीलन भरी सुबह गंदी सी बिन नहायी, ठंड से ठिठुरती फटे चिथङों में लिपटी कोने में दुबकी बैठी थी वो लड़की…… दो तीन बार कि थी उसने कोशिश अपनी गोद में छुपाये कंकालित अर्धनग्न बिमार भाई की खातिर जाने को सड़क किनारे जलते अलाव के पास लेकिन वहां जाकर भी बारबार लौट आती थी वो उसी हिमधुसरित सीलन भरे ठंडे कौने में क्योंकि उसकी बर्दाश्त के बाहर थी वहां आग तापते लोगों कि आंखों के गर्म नाखूनों की चुभन….. ।। गोलू…… मेरा प्यारा गोलू….. इसी नाम से पुकारती थी वो अपने भाई को जो इस वक्त तप रहा था शीतकालीन Continue reading सीलन भरी सुबह

वैराग चित्

वैराग चित्‌ कर पाए जब तूं दिल से प्रति सुख और दुख के, एक समान उपेक्षा I कर पाए जब अंतर मन से विभिन भ्रांतियों पर, चिरकाल विजय I कर पाए जब यह अनुभूति ना इधर कोई राग, ना उधर कोई राग I कर पाए जब अपने अन्दर हो कर उसकी लौ में रोशन, मातृ सत्य का दर्शन I कर पाए निर्लेप-निर्मल चित्‌ जिसमे तूं नही, मैं नही, कोई विचलन नही  I जान ले, पैदा कर पाया अब ख़ुद में उसकी मन-भाती, संपदा वोह वैराग की I विजय तेरे इस वैराग-चित्‌ को देगा ख़ुद आकर वोह, इक दिन अपनी स्वीकृति Continue reading वैराग चित्

पल – पल

पल – पल पल – पल बदलता सब कुछ यहां , जो कल था तूं , है वोह आज नहीं , है जो आज तूं , होगा वोह कल नहीं I पल – पल रचता यहां कुछ नया , जो था कल तक सच , जिंदा वोह आज नहीं , है लगता जो आज सच , मौत उसकी कल यहीं I पल – पल घटता बहुत कुछ यहां , जो रिश्ते कल बुने , देखा उनका अंत आज यहीं , ख्वाब नये जो देख रहा , होगा उनका भी अंत यहीं I पल – पल बदलती-रचती-घटती इस दुनिया मॆं , Continue reading पल – पल

शुद्ध – दान

शुद्ध – दान   अलौकिक उसका तराजू है, आखिर सबको जिसमे तुलना है , यह सच की ऐसी टेड़ी कुंडी है, जिसमे फँसता हर पाखंडी है , करवा कर्मो का अपने वजन, इनसान जन्मो का फेरा पाता है , जो हमनें शुद्ध-दान किए, उनका साँचा मोल वहां लग जाता है I   नजर उसकी में कोई अमीर-गरीब नहीँ, सब उसकी ही संतान है , इस जहाँ की रीत ना चलती वहां, वहां तौल का पूरा ईमान है , विजय दान देकर यहां व्योपार किया , कौड़ी के ना भाव वहां , पैसा-हीरा-रुत्बा सब बेमौल वहां, सब खेल है वहां विचार Continue reading शुद्ध – दान

गुरु – महिमा

गुरु – महिमा यह रचना है , गुरु-देव की महिमा का गुनगान , वो ख़ुद के चित्‌ में है अन्तहीन , जिनकी परिभाषा है असीम , ऋषि की विशिष्टताओं का पैग़ाम I जो देकर हमको शिक्षा , हमारा ज्ञान ही ना बड़ाए ,हमें ही बड़ा जाए I पड़ा कर पाठ हमको, जानकारी ही ना दे जाए ,अ‍सलीयत उनकी सिखा जाए I सिखा शब्दों के मायने मत्लब् ही ना समझा जाए ,उन मायनो से हमे बना जाए I दिखा ज़िन्दगी की राहे , पथ-परिदर्शत ही ना कर जाए, जीवन रोशनी से भर जाए I किताबी अर्थो को बता , सिर्फ़ विचार Continue reading गुरु – महिमा

काली छाया

ख़ुद को पाने की राह में, ध्यान लगा जो ख़ुद में खोया, अन्तर मन में उतरा मैं जब, अंधकार में ख़ुद को पाया , अन्दर काली छाया देख के, ख़ुद को गर्त में डूबा पाया , खुद को राख का ढेर सा पाकर, मन मेरा अति गभराया I   पूछा छाया से मैंने गभरा कर बाहर की छाया तो तन सह्लाए, क्यों तू मुझको जला सी जाएँ ?   बोली छाया अंधकार में ख़ुद तूने जीवन बिताया ,अज्ञानता में में सब ज्ञान गवाया, अन्तर तेरे प्रकाश का अभाव हो पाया, तब मुझको तू जन्म दे पाया I क्या पाएगा मुझसे Continue reading काली छाया

मृत्यु सिमरन

मृत्यु सिमरन अंधकार नही , जीवन का द्वार है मृत्यु I भय नही , उससे मिलने की राह है मृत्यु I   होता तात्पर्य मृत्यु का मिटना , पर मिटता यहां कुछ भी नहीं , फिर कैसी मृत्यु और कैसा अंत , यथार्थ में मृत्यु कभी होती ही नहीं I   मृत्यु है ही नही मृत्यु , है तो सिर्फ़ मानव के अज्ञान में , मृत्यु नाम है बस एक पड़ाव का , रुक कर जहां, हो जाता मिलना उससे I   विजय गर उसे पाने का नाम है मृत्यु , तो जीते जी क्यों ना वोह राह् चलूँ , Continue reading मृत्यु सिमरन

अहिंसक हो

अहिंसक हो मेरे चित्‌ , अहिंसक हो I शस्त्र उपयोग ,क्भी नहीं I छल कपट , क्भी नहीं I दुर्वचन अपशब्द ,क्भी नहीं I जीव हत्या ,क्भी नहीं I वनस्पति अपमान ,क्भी नहीं I अनैतिक भाव ,क्भी नहीं I निर्जीव पे वार ,क्भी नहीं I ज्ञान निरादर, क्भी नहीं I   ना होना हिंसा का, नहीं अहिंसा का लक्षण , तलवार फेंक देने से, अहिंसक ना हो पाएगा , अहिंसक विचारों का दहन जब कर पाएगा , तब संपूर्ण अहिंसा की राह् तूं चल पाएगा I   है नही कोई मुखौटा यह , आत्मा का है पह्नावा यह  , है Continue reading अहिंसक हो

कृष्ण अर्जुन

कृष्ण अर्जुन मन मेरा शंकित हो कहता , अर्जुन मैं भी हो जाता , गर सारथी मेरा कृष्ण हो पाता , जीवन मेरा भी तर जाता , गर कृष्ण को मैं ढूंढ़ पता I   चित्‌ मेरा निस्संदेह कहता , घोड़़ों की लगाम कृष्ण को थमाना , तो एक बहाना था , असल में अर्जुन को , ख़ुद के मन को उसे थमाना था , पा कृष्ण के मन का साथ,अर्जुन चला विजय की राह , मन मेरे भी कृष्ण की चाह, विजय चला अर्जुन की राह I   कहे कृष्ण मंद-मंद मुसकरा के, मन तेरा जब अर्जुन सा भटके Continue reading कृष्ण अर्जुन