सीलन भरी सुबह

सीलन भरी सुबह गंदी सी बिन नहायी, ठंड से ठिठुरती फटे चिथङों में लिपटी कोने में दुबकी बैठी थी वो लड़की…… दो तीन बार कि थी उसने कोशिश अपनी गोद में छुपाये कंकालित अर्धनग्न बिमार भाई की खातिर जाने को सड़क किनारे जलते अलाव के पास लेकिन वहां जाकर भी बारबार लौट आती थी वो उसी हिमधुसरित सीलन भरे ठंडे कौने में क्योंकि उसकी बर्दाश्त के बाहर थी वहां आग तापते लोगों कि आंखों के गर्म नाखूनों की चुभन….. ।। गोलू…… मेरा प्यारा गोलू….. इसी नाम से पुकारती थी वो अपने भाई को जो इस वक्त तप रहा था शीतकालीन Continue reading सीलन भरी सुबह