ये जख्म जो ताजे हैं

ये जख्म जो ताजे हैं

जो कफ़न बाँधकर निकलते है वो घर नही जाते
शुरमा शेरों को देखते ही डर नही जाते
.
आप कहते हो कि हम बडे जुबां के पक्के है
तो कैसे मान लें ? होते तो यूं मुकर नही जाते
.
ये जख़्म जो ताजे है सब अपनों की निशानी है
दुश्मनों ने दिये होते तो भर नही जाते
.
हम भूखे पेट सो जाते हैं अपने घर दो चार दिन
खाली हाथ मगर बहनों के घर नही जाते
.
जुझने का जज्बा रक्खो अच्छे दिन भी आएंगे
वक्त बुरे भी आते हैं तो ठहर नही जाते
.
यकीनन ये नशा किसी माशूका के है
शराब के होते तो उतर नही जाते
.
एक शहर में जल गया मेरे अरमानों का मकां
मुद्दत हुई अब हम किसी शहर नही जाते

©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)

About Satyendra Govind

I always try to write the voice of my heart.